Sunday, August 12, 2007

दबी , दबती , दब गई जन पत्रकारिता

डा पुश्कर राज
पुष्कर राज जी पी यू सी एल के सचिव हैं लेकिन इससे ज्यादा वे उनकी आवाज़ हैं जिनकी कोई आवाज़ नहीया फिर जिनकी आवाजें जबरदस्ती दबा दी गई हैंकुछ लोगो के लिए मानव अधिकारों की बात करना एक फैशन की तरह है और कुछ के लिए पैशन की तरहहम कहते तो हैं कि आपकी आज़ादी वहाँ से शुरू होती है जहाँ मेरी नाक ख़त्म होती है लेकिन मानव अधिकारों के मामले मे तो कही नाक है और ना ही आज़ादीपड़े होते रहें आज़ादी के साठ साल पूरेआज भी वही बेआवाज़ हैं जो आज से साठ साल पहले थेमीडिया भी मानव अधिकारों के वही मामले उठाती है जिसमे टी आर पी हो , ग्लैमर हो , अंग्रेजी हो और चट्खारापन होइन सारी बातो से पुष्कर जी काफी व्यथित नज़र आते हैंइन्होने यह लेख मेरे आग्रह पर एक संध्य्कालीन अखबार के लिए दिया था जो अब मैं बजार मे प्रकाशित कर रहा हूँ -राहुल


कुछ वर्ष पहले एक जाने माने पत्रकार द्वारा संचालित एक पत्रकारिता आधारित वेबसाईट ने रक्षा सौदों से सम्बंधित घोटालों का पर्दाफाश किया था। नतीजतन देश की राजनीति व नौकरशाही मे खलबली मच गई। भाजपा , जो उस समय सत्ता मे थी उसके अध्यक्ष को इस्तीफ़ा देना पड़ा था तथा कई सैनिक अफसरों पर गाज भी गिरी। देश की जनता ने 'तहलका' नामक इस वेबसाईट की काफी तारीफ की। आम जनता का मानना था कि राष्ट्रिय हित ही पत्रकारिता का पहला धर्म होना चाहिऐ न कि किसी विशेष वर्ग अथवा दल का हित साधन। आम नागरिक का मानना था कि तहलका ने रक्षा सौदों मे भ्रष्टाचार उजागर करके सामाजिक हित का कार्य किया , लेकिन अगले तीन चार साल तहलका नामक इस संस्था के लिए काफी कष्ट भरे साबित हुए। भाजपा सरकार ने बदले की भावना से प्रेरित होकर उस छोटे से औधोगिक प्रतिष्ठान के खिलाफ कई मुकदमे बना दिए जिसकी आर्थिक सहायता तहलका को मिल रही थी। नतीजा यह हुआ कि तहलका बंद हो गया , पत्रकार बेरोजगार हो गए और सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाना महंगा साबित हुआ। हालांकि कुछ अंतराल बाद तहलका फिर शुरू हुआ जो कि एक अलग किस्सा है ।
यह घटना इस तथ्य की द्योतक है कि पत्रकारिता एक मुश्किल शगल है। खास करके जब इसके पीछे एक राजनितिक अथवा आर्थिक वरद हस्त न हो और अगर राजनितिक और आर्थिक उद्देश्य पत्रकारिता के पीछे होंगे तो वह पत्रकारिता नही है बल्कि एक व्यवसाय है ,जैसे दुकान पर बैठकर चीज़े बेचना। यही बात आम नागरिक को समझनी चाहिऐ। विशेषकर तब जब वह एक लोकतांत्रिक समाज मे रह रहा हो। देश मे आज की पत्रकारिता के परिदृश्य पर अगर नज़र दौडायें तो कमोबेश एक समरूप स्थिति नज़र आती है। जो चमकीला है वह बिकता है। अगर किसी अमीर के घर चोरी होती है तो वह पहले पेज के खबर बनती है , गरीब के घर की चोरी को अन्तिम पन्ना भी नसीब नही होता । मुझसे अक्सर मेरे टेलीविजन के पत्रकार दोस्त कहते हैं कि कही कोई मानव अधिकारों के हनन का मामला हो तो हमे बतायें। पर हाँ , जिसके मानव अधिकारों का हनन हो उसकी प्रोफाइल अच्छी होनी चाहिऐ । मतलब अगर वह महिला है तो खूबसूरत हो , और उस पर भी अंग्रेजी बोले । बेहतर टी आर पी का तर्क जन संवेदनाओं तथा जन आकाँक्षाओं को दरकिनार करते हुए हमारे वर्तमान जीवन की पत्रकारिता की कड़वी सच्चाई है।
पिछले दिनों दादरी मे किसानो की विरोध सभा को पुलिस ने बेरहमी से कुचला। स्त्रियों , बच्चों व बूढों को लाठियों से पीता गया , गाँव वालों के घरों को लूटा गया लेकिन क्योंकि किसानो का समूह कोई टेलीविजन चैनल या अख़बार नही चलाता इसलिये इस खबर की रिपोर्टिंग का नजरिया इस तरह का था जैसे सरकार तो अधिकृत जमीन का मुआवजा दे रही है पर किसान ही बखेडा खड़ा कर रहे हैं। क्योंकि मामला देश के एक बडे औधोगिक प्रतिष्ठान से जुडा था इसलिये रिपोर्टरों द्वारा भेजी लंबी तफ्सीलें मालिकों के इशारे पर अख़बार मे एक या दो कालम की बनकर रह गई ,वह भी बीच के किन्ही पन्नो पर।
पूरे देश के पत्रकारिता पर नज़र डालें तो आप पाएंगे कि अख़बार , टेलीविजन और एफ एम् रेडियो पर सिर्फ औधोगिक प्रतिष्ठानों का क़ब्जा है। इसीलिये जब हिंदुस्तान टाइम्स के कर्मचारी अपनी आम करने की परि स्थितियों के विरोध मे हड़ताल करते हैं या यू एन आई के पत्रकार जी टी वी द्वारा अधिग्रहण का विरोध करते हैं तो उनके विरोध का स्वर जनता तक नही पंहुचता । उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर मे संसाधनों का केंद्रीकरण , पूँजी का केंद्रीकरण , ज्ञान का केंद्रीकरण तथा सूचना का केंद्रीकरण एक उभरता खतरा है। इस ख़तरे की चाय देश के विभिन्न भागों मे महसूस की जा रही है तथा विरोध के स्वर छोटे छोटे जन आंदोलनों के रुप मे उभर रहे हैं।
इन जन आंदोलनों को एक व्यापक स्तर पर लाने के लिए जन पत्रकारिता की जरुरत है। ऎसी पत्रकारिता जो आम जनता की आवाज़ आम जनता के बीच पंहुचाते हुए मानवीय अस्मिता तथा अधिकारों की रचना करे। ऐसा तभी होगा जब इनमे से ही कुछ लोग धन की बैसाखी का सहारा लिए बिना पत्रकारिता को एक सामाजिक कर्म के रुप मे देखेंगे और पोषित करेंगे।
फोटो-जय देव सिंह , किसान , दादरी फोटो साभार - बी बी सी

1 comment:

संजय तिवारी said...

अच्छा प्रयास. ऐसे जानकार लोगों की राय ब्लाग पर देकर अच्छा काम कर रहे हैं. लेकिन टाईपिंग की कुछ गड़बड़ियां हैं.