Sunday, August 12, 2007

सरकार कपडे उतार कर नाच रही है

प्रदीप सिंह
अपनी आज़ादी को साठ साल होने जा रहे हैं । शायद इसी उपलक्ष्य मे किसानो को एक तोहफा दिया जाने वाला है - सिंचाई के खर्चे को और बढ़ाकर । पहले से ही कर्ज़ मे डूबे किसान , जिनके पढे लिखे बच्चों ने कब का घर छोड़ दिया है और कही बड़ी अच्छी कमाई भी नही कर रहे हैं कि वो अपने अपने बाबू को इतना पैसा दे दें कि धान लग जाय, उनके लिए स्वतंत्रता के ये साठ साल कोई मायने नही रखते । वहीं गाव के नौजवान ताश के पत्तों के साथ शहर का सपना भी संजोये हुए हैं। बेरोजगारी अलग से कोढ़ मे खाज का काम कर रही है। जो कुछ बच रहा है उसे सेज लील जाने को तैयार बैठा है। इन्ही सारी समस्यायों की विवेचना लेकर बजार मे प्रदीप जी आये हैं ......

भारत मे बेरोजगारी बढती जा रही है। देश की संसद के पास इस समस्या का कोई हल नही है। आर्थिक सर्वेक्षण मे यह बताया जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों मे १० % पुरुष व इससे भी ज्यादा महिलाएं रोजगार से वंचित हैं। यह संख्या बहुत ही कम है। हमारे देश मे बेरोजगारी की समस्या बहुत ही भयावह हो गई है। अशिक्षित लोग तो कुछ छोटा मोटा काम पा भी जा रहे हैं , किन्तु पढे लिखे बेरोजगारों की संख्या मे गुणात्मक वृद्धि हो रही है। विडम्बना तो यह है कि विकास के बावजूद बेरोजगारों की संख्या मे बढोत्तरी हो रही है और लगातार रोजगार के अवसर घट रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही जिस क्षेत्र मे रोजगार पैदा करने की अपूर्व क्षमता है , उस क्षेत्र की तरफ पर्याप्त ध्यान नही दिया गया। यदि हमारे देश मे सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस सरकार ने कृषि क्षेत्र को थोडा भी गम्भीरता से लिया होता तो आज भारत की दूसरी ही तस्वीर होती। लेकिन उनके लिए तो कम्प्यूटर महत्वपूर्ण है , किसान नही। हमारे देश मे आज किसान और कृषि की दशा अत्यंत ही दयनीय है। कृषि की दुर्दशा के पीछे गहरी साजिश है। विकसित देश विकास शील देशों पर जबरन दबाव डालकर कृषि पर मिलने वाली सब्सिडी कम करा रहे हैं। कृषि उत्पादन के लगत मूल्य मे वृद्धि , कृषि सब्सिडी मे लगातार की जा रही कमी , सिंचाई के साधनों का आभाव , किसानो का ऋण के जाल मे उलझना , फसलों का समुचित मूल्य न मिलना आदि अनेक कारण हैं । अब तो किसानो को सिंचाई का भी अच्छा खासा मूल्य चुकाना पड़ेगा। बड़ी संख्या मे किसान अब खेती करना पसंद ही नही कर रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार ४०% ग्रामीण युवक खेती नही करना चाहते । कृषि से लगातार घट रही आय के कारण ग्रामीण क्षेत्र से लोग शहर की तरफ पलायन कर रहे हैं। इस तरह शहरों पर जहाँ काम के इच्छुक लोगों का बोझ बढ रहा है , वहीं कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब प्रोद्योगिकी के प्रभाव से हर क्षेत्र उन्नति कर रह है तो कृषि पिछ़ड क्यों रही है। इसका एक उत्तर हो सकता है कि सिंचाई की पर्याप्त सुविधा का न होना और कृषि को उद्योग की तरह विकसित न करना। आज बडे उद्योगों के लिए जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को किसानो की उपजाऊ जमीन पर उद्योग लगाने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है । पूँजी निवेश को रिझाने के लिए हमारी सरकार किसी भी निवेशक के सामने अपने कपडे उतार कर नाचने के लिए तत्पर दिखती है। जो उद्योग लग रहे हैं उनमे स्वचालित मशीनों को प्रधानता दी जा रही है। ओद्योगिक घराने कारखानों मे ऎसी मशीने लगा रहे हैं जहाँ कम से कम मजदूरों की जरुरत पडे।

जारी .....

3 comments:

संजय तिवारी said...

तो क्या आप भी चाहते हैं प्रदीप भाई कि कृषि का उद्योग की तर्ज पर विकास हो. सरकार वही तो करने जा रही है. बहरहाल अगली कड़ियों में समझ में आयेगा कि लेख क्या कहना चाहता है.

प्रदीप सिंह said...

sarkar krishi ko udyog ka darja nahi de rahi hai. apitu krishi ko poojipatiyo ko saup rahi hai. udyog ka darja dene ka arth hai ki jo riyaite ya sabsidi udyogon ko diya jata hai wo krishi ko nahi diya jata. jis rate par bijli udyogpatiyon ko diya jata hai , kisano ko khad pani aur bijli par nahi diya jata , ulte udyogpati apne utpaad ka moolya khud tay karte hain lekin kisan ko apne utpaad ka moolya tay karne ka adhikar nahi hai. har panchvarshiy yojna me sare udyogon ke liye netiyan banti hain lekin krishi ke liye har bajay aur yojnao me hissa kam hota jata hai. udyog ka darza dene ka matlab hai udyogpatiyon kee tarah kisano ko jarrori cheezon me choot aur apne utpaad ka khud se moolya tay karne ka adhikar..

Anonymous said...

samsya ye hai ki har kaam ke liye ham sarkar ki taraf dekhte hain. Angrejon ke aane ke pahle hamare gaon svavlambi hua karte the, kam se kam sinchai ke mamale mein. Har gaon mein talab,kuein bavadi the. Lekin dheere dheere angrejon ne unhe khatam kar diya aur azad hone ke baad bhi humne Nehru ka model apnaya. Gandhi ka model apnate to hamare gaon self dependent hote.