Monday, March 5, 2007

पुलिस ,पंडे और पॉकेट मार...2

के पी सिंह
सोचता है रामभरोसे सऱ्यू तट पर अपनी झोपड़ी मे बैठा हुआ - इसी झोपड़ी मे आकर मौक़ा ताड़ते , गुर्रते या गुनगुनाते थे - 'राम लला हम आए हैं ' और उपर से कोई वायु यान गुज़रता तो हसरत से उसे निहारने लगते थे . बाद मे राम लला की 'कृपा' से वे विमान पर चढ़े और गगन बिहारी हो गाये तो उन्हे इतनी फ़ुरसत ही नही रही कि जानें कि सऱ्यू माता की कृपा से राम भरोसे की झोपड़ी अभी तो बची हुई है , मगर बाढ़ का पानी चढ़ते चले आने से उसकी नींद उड़ी हुई है .
पानी और बढ़ा तो यह झोपड़ी तो डूब ही जाएगी . गगन बिहारी जी से मादा क्यों नही माँग लेते ? तुम्हारी तो जान - पहचान भी है . उन दिनों तो हुक्का पानी भी था . पूछा तो आँखे दबदबा आईं उसकी . बोला - अंधे के आगे क्या रोना भैया ! आजकल तो उन्हे सब बँटाधार ही दिखता है . इधर इतना सैलाब है और उधर उनकी आँखो का पानी ही मर गया है . अब तो जानें सऱ्यू मैया या जाने रामचंद्र जी . उन्ही का भरोसा है .
मन हुआ कहूँ, तभी तो तुम्हारा नाम रामभरोसे है . मगर नहीं कहा . इसीलिए कि राम की नगरी में राम के भरोसे एहने वाला रामभरोसे अकेला नही है . और भी कई लोग हैं जो तख़्त बिछाए और झंडा लगाए पसेरियँ लूढ़काते रहते हैं कि राम के जन आएँ और उनकी झोली भर जाएँ . पंडे कहलाते हैं बेचारे और इस अर्थ मे भले हैं कि गाँठ पर ही नज़र रखते हैं , ख़ून नही खौलाते . रामभरोसे की झोपड़ी मे से ही देखा - एक पंडे का तख़्त बहता हुआ चला आ रहा है . बाढ़ के चलते ? नहीं , मैं ग़लती पर था . पीछे-पीछे बचाने की कोशिश मे पंडा जी और उभे रोकते सिपाही जी भी थे . राम भरोसे ने कहा - बोलीएगा कुछ मत . बस,देखते रहिए . ये दोनो घाट घाट का पानी पी चुके हैं और रोज़ ही कितनो को पिलाते रहते हैं . मैने बात मान ली .
जारी ....

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