Wednesday, December 12, 2007

मेरी बीवी को बचा लो, वो मर जायेगी

बात कल शाम की है, लेकिन लगता है कि जैसे अभी ये सब हो रहा हो। कल दोपहर तकरीबन तीन बजे मैं मेरठ के मेडिकल कालेज से निकल रहा था, मेरे मोबाइल पर एक काल आई। ये कोई राजू था जो बता रहा था कि उसकी बीवी काफी बीमार है, उसे बच्चा होने वाला है और अस्पताल वालों ने उसे मेडिकल कालेज ले जाने के लिए कहा है। बात सीधी थी, अस्पताल वालों ने उस केस को मेडिकल कालेज रेफर किया था। सो मैंने उससे कहा कि १०१ नंबर पर फोन करे और एम्बुलेंस मँगाए। वो फोन करेगा और उसे एम्बुलेंस मिल जायेगी, ये सोच कर मैं घर कि तरफ खाना खाने चल दिया। लेकिन बीच रस्ते मे ही फिर से उसका फोन आ गया कि कोई एम्बुलेंस नही मिली और उसकी बीवी मरने वाली है। इसके बाद वो फोन पर ही रोने लगा और कहने लगा कि मेरी बीवी को बचा लो, वो मर जायेगी।
मैं पंहुचा अस्पताल
मैंने अपनी गाड़ी के टॉप गियर लगाए और बहुत तेजी से अस्पताल पंहुचा। ये सरकारी महिला अस्पताल था। वहाँ पहुच कर मैंने जो नज़ारा देखा, मेरे तो होश ही गायब हो गए। भयंकर लेबर पेन मे वो औरत अस्पताल के दरवाज़े के बाहर तड़प रही थी। मैंने तुरंत एक प्राइवेट नर्सिंग होम मे फोन किया और उनसे एम्बुलेंस भेजने को कहा। उन लोगो ने कहा कि वो एम्बुलेंस भेज रहे हैं। इसके बाद शुरू हुई मामले की तहकीकात। ये लोग मलियाना नाम के गाँव से आये थे । पति का नाम राजू था और पत्नी नीतू। पहले नीतू को तीन बच्चे हुए थे जिसमे दो मर गए थे। अस्पताल वालों का कहना था कि बच्चा प्री मेच्योर है और अस्पताल मे नर्सरी नही है, इसलिए वो लोग रिस्क नही लेंगे। लेकिन इस समय तक नीतू की हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि वही पर ओपरेशन करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नही था। खैर, ऑपरेशन से पहले कागजी कारवाही को लेकर भी डॉक्टरों से काफी झिकझिक हुई। राम राम कहकर ऑपरेशन शुरू हुआ और जैसे ही बच्चा पेट से बाहर निकला, उस प्राइवेट अस्पताल के एम्बुलेंस वाले उसे लेकर इन्क्युबेटर मे रखने के लिए भागे। अब अस्पताल वालों के मुह पर कालिख पुट गयी। जच्चा और बच्चा , जिसे वो कह रहे थे कि नही बचेंगे, दोनो को बचा लिया गया था। लेकिन कब तक ऐसे हर मरीज को मैंने मिलता रहूंगा.... कब तक, रोज़ ही ये लोग कोई न कोई खेल करते हैं।

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