Friday, December 2, 2016

सरकार बदहवास, समझदारी खल्लास

अब बदहवासी में आने की बारी सरकार की है। नोटबंदी के फैसले के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि काला धन रखने वालों की रातों की नींद हराम हो गई है लेकिन सच बिल्कुल उल्टा निकला। सारे कालाधनधारी आराम से चैन की बांसुरी बजा रहे हैं। उनका पैसा सफेद होकर बैंक पहुंच रहा है और जनता परेशान है। दरअसल सरकार को उम्मीद थी कि इस पूरी कवायद में तकरीबन ढाई से तीन लाख करोड़ काला धन पकड़ लिया जाएगा। फिर उसे सरकार अपनी मर्जी के मुताबिक खर्च कर सकेगी। लेकिन सच यह है कि सारा काला धन सफेद होने के करीब है। राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया है कि 18 दिनों में 8.50 लाख करोड़ मूल्य की बड़ी नोटें जमा हो चुकी हैं। देश में बैंकों से लेकर बाजार तक 15 लाख 44 हजार मूल्य की कुल बड़ी नोटें हैं। इसमें बैंकों के रिजर्व बैंक में सीआरआर के तौर पर जमा तकरीबन 4 लाख करोड़ रुपये भी शामिल हैं। बाकी बैंकों में भी 70 हजार करोड़ रुपये पहले से मौजूद थे। ऐसे में अभी योजना को करीब एक महीने बचे हैं। जबकि अब बाजार से केवल 2.50 लाख करोड़ रुपये आने शेष हैं। रुपये जमा होने की जो गति है उसमें इन रुपयों के आने को लेकर कोई दुविधा नहीं है। यही वजह है कि सरकार ने आखिरी दौर में फिफ्टी-फिफ्टी की घोषणा कर दी। हालांकि उससे भी बहुत ज्यादा कुछ सरकार के खाते में आते नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में आनन-फानन में घोषणा प्रसाद ने एक नई घोषणा कर दी है। जो सोने से संबंधित है। इसके मुताबिक एक शादीशुदा महिला घर में 500 ग्राम सोना रख सकती है। जबकि गैर शादीशुदा 250 ग्राम और एक पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकता है। ये कितना कारगर होगा उसके बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। या फिर ये अमीरों के खिलाफ लड़ाई के लिए महज एक कागज की तलवार है। क्योंकि कालेधन का केवल 6-7 फीसदी हिस्सा ही करेंसी नोटों के तौर पर है। सरकार ने पूरे देश को उसके लिए कतार में खड़ा कर दिया है। अब जब मिलने की बारी आ रही है। तो मामला ठन-ठन गोपाल जैसा दिख रहा है।

इस बात से कई नतीजे निकाले जा सकते हैं। सरकार की मंशा कालाधन निकालना नहीं बल्कि उसके खिलाफ लड़ते हुए महज दिखना था। अगर सचमुच सरकार लड़ना चाह रही थी तो सबसे पहले उसे कालाधन के ज्ञात स्रोतों की तरफ ध्यान केंद्रित करना चाहिए था। जिसमें पनामाधारियों से लेकर बड़े घरानों की विदेशों में जमा रकम है। या फिर देश के उद्योगपतियों के ज्ञात स्रोत हैं। उदाहरण के लिए अडानी का 5400 करोड़ रुपया है जिसे उन्होंने मारीशस और मध्यपूर्व चैनेल के रास्ते बाहर भेजा। लेकिन सरकार न तो उनका नाम ले रही है और न ही उन जैसे दूसरों के खिलाफ कार्रवाई का कोई संकेत दे रही है। ऐसे में छोटे और काले धन के अज्ञात स्रोत पर केंद्रित करने का कोई तर्क नहीं बनता था। और यह बात तब और बेमानी हो जाती है जब खुद चौकीदार ही लूट की व्यवस्था का हिस्सा बन जाए। यह सरकार, बैंक और उसके मैनेजरों से लेकर इनकम टैक्स विभाग के कर्मचारियों तक के लिए सच है। और सबने मिलकर कालेधन को ठिकाने पर लगाने में पूरी मदद की है।

यह कुछ उसी तरह की कवायद है जिसे प्रधानमंत्री जी पिछले ढाई सालों में करते रहे हैं। तमाम भाग-दौड़ और व्यस्तता के बाद भी ढाई सालों का नतीजा सिफर है। और अब पूरी जनता को भी उन्होंने अपने ही पायदान पर लाकर खड़ा कर लिया है। जनता की सारी परेशानी के बाद भी देश को कुछ हासिल नहीं हुआ। अलबत्ता 100 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ गयी। क्या इसकी सीधी जवाबदेही फैसला लेने वालों की नहीं बनती है? और उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? भले ही ये धाराएं गैरइरादत हत्या की दर्ज की जाएं। लेकिन उसका मामला तो बनता है। देश और दुनिया के इतिहास में भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं। जब शासकों को उनकी नीतियों के लिए दोषी ठहराया गया है और उसकी सजा उन्हें भुगतनी पड़ी है।

अगर देश में कानून और संविधान नाम की कोई चीज है तो सरकार के फैसले को जरूर उसकी कसौटी पर कसा जाना चाहिए। किसी भी नोट के मामले में करार रिजर्व बैंक और धारक के बीच होता है। जिसमें यह बात शामिल होती है कि रिजर्व बैंक धारक को उतने रुपये देगा और न देने की स्थिति में उसके बराबर के मूल्य की कोई दूसरी चीज या फिर सोना देगा। रिजर्व बैंक और नोट के धारक के बीच कोई तीसरा नहीं आता है। वह सरकार भी नहीं हो सकती है। ऐसे में रिजर्व बैंक अपने इस शपथ से कैसे पीछे हट सकता है। और अगर वह इस भूमिका में नहीं खड़ा हो पाया तो ये उसकी नाकामी है। और इस नाकामी की सजा बनती है। जिसे जरूर देश की सर्वोच्च अदालत और सबसे बड़ी संस्था संसद को संज्ञान लेना चाहिए।

लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 

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