Tuesday, November 8, 2016

BAN ON MEDIA: बिलकुल लोमड़ी की तरह काम कर रही मोदी सरकार

हर सरकार की अपनी एक भाषा होती है। कोई बल की भाषा में विश्वास करती है तो कोई बुद्धि की। और कोई सरकार अपनी अलग ही भाषा विकसित कर लेती है। मौजूदा मोदी सरकार बल की भाषा ही जानती है और उसी में विश्वास करती है और उसी भाषा में बात करती है। देश के गृहमंत्री ने कल ही इसकी ताजा नजीर पेश की है। जब कैराना में उन्होंने 'किसने अपनी मां का दूध पिया है' जैसी भाषा का इस्तेमाल किया। इसके पहले प्रधानमंत्री 56 इंच सीने की बात कर ही चुके हैं। इस तरह के डायलाग हम अभी तक धर्मेंद्र की फिल्मों में ही सुना करते थे। अब राजनीति में बीजेपी नेताओं के मुंह से सुन रहे हैं।

सरकार का शीर्ष नेतृत्व अगर इस तरह की भाषा में बात करेगा, तो नीचे कार्यकर्ताओं और भक्तों की भाषा का स्तर क्या होगा? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यह मूलतः ताकत की भाषा है और स्टेट की ताकत मिलने के बाद यह और भी ज्यादा अहंकारी और बलशाली हो जाती है। लेकिन इस भाषा की एक खासियत है। अपने से बड़ी ताकत के सामने यह तुरंत नतमस्तक हो जाती है। एनडीटीवी मसले पर भी यही हुआ। सरकार को अपनी ताकत से बड़ी ताकत सामने उभरती दिखी। उसे लग गया कि अब उसकी छीछालेदर होनी तय है। क्योंकि पूरी प्रेस बिरादरी एकजुट है और सुप्रीम कोर्ट से कोई बड़ा कोड़ा पड़ सकता है। प्रेस क्लब में पत्रकारों की कल हुई बैठक ने तस्वीर साफ कर दी थी। चंद चमचों और भक्त पत्रकारों को छोड़कर पत्रकारों के बड़े हिस्से ने इसमें शिरकत की। खुदा न खास्ता सुप्रीम कोर्ट अगर आगे के लिए कोई दिशा निर्देश जारी कर देता तो सरकार के भविष्य के मंसूबों पर पानी फिर जाता। इसलिए उसने तत्काल अपने कदम पीछे खींच लिए और चैनेल पर एकदिनी पाबंदी के फैसले को स्थगित कर दिया।

लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि चिंता और गहरी हो जाती है। अगर सरकार इस नतीजे पर पहुंची थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचा है और उसके लिए सजा मिलनी चाहिए, तो वह इस मुद्दे पर कैसे पीछे हट सकती है? उसे अपने फैसले पर अडिग रहना चाहिए था। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कहने का मतलब है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उसके लिए महज एक ढोंग है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसी चीज है जिससे समझौता किया जा सकता है? या फिर यह सरकार के हाथ का खिलौना है जिससे कभी भी खेला जा सकता है और एनडीटीवी पर पाबंदी भी उसी खेल का हिस्सा है।

अगर सचमुच में मोदी सरकार यह मानती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा दांव पर लगी थी तो फिर वह कैसे उससे समझौता कर सकती है? लेकिन अगर बात-बात सुरक्षा के नाम पर उसका इस्तेमाल हो रहा हो, फिर तो जरूर दाल में कुछ काला है। वैसे भी जिस पार्टी का एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष 1 लाख रुपये में बिका हो, जिस पार्टी का मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष कानूनन तड़ीपार हो, जिस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर नरसंहार के दाग हों, कम से कम उसे राष्ट्रवाद की परिभाषा तय करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। जो खुद को बार-बार एक खास तबके और खास हिस्से की सरकार के तौर पेश करने से परहेज नहीं करता हो, उससे किसी निरपेक्षता की आशा भी नहीं की जा सकती है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कल का कैराना का बयान इसकी ताजी नजीर है।

लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। कहा जा सकता है कि पहले दौर की जोर-आजमाइश में सरकार को मात खानी पड़ी है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि सरकार ने पहलवानी छोड़ दी है, या फिर उसकी भाषा बदल गई है। यह सरकार बिल्कुल लोमड़ी की तरह काम करती है। उसका एजेंडा साफ है। उसे विरोध की कोई आवाज बर्दाश्त नहीं। आज नहीं तो कल वह उसको बंद करने की कोशिश करेगी। मीडिया के एक बड़े हिस्से को उसने अपने काबू में कर लिया है। बाकियों को अलग-अलग तरीके से अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रही है। यहां तक कि एनडीटीवी भी समझौते की राह पर बढ़ गया था। पी चिदंबरम के इंटरव्यू का प्रसारण नहीं करना उसी का हिस्सा था। पिछले दिनों तमाम खबरों की प्रस्तुति में भी इसकी झलक मिल रही थी।

दरअसल एनडीटीवी का मैनेजमेंट कई मामलों में फंसा है जिनको सरकार हथियार बनाकर उसकी घेरेबंदी कर रही है। आज नहीं तो कल शायद वह एनडीटीवी के खिलाफ अपने मंसूबों में सफल हो जाएगी। इसलिए प्रेस और पत्रकार बिरादरी को भविष्य में इस तरह के किसी भी खतरे के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे में किसी एनडीटीवी और संस्थान की जगह पत्रकारों को खुद अपनी ताकत पर भरोसा करना होगा। क्योंकि प्रेस की आजादी किसी संस्थान का मोहजात नहीं। यह जितना पत्रकारों से जुड़ी है उससे ज्यादा जनता से। यह हमारे और जनता के लिए खुली हवा में सांस लेने जैसा है। इसके खत्म होने का मतलब है लोकतंत्र का खात्मा।


लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 

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