Tuesday, May 6, 2008

रास्ता और घर

ये पुरानी है, पिछले साल जुलाई मे लिखी थी , पेश ऐ खिदमत है ...

रास्ता सबका एक ही था
लेकिन थोड़ा सा आगे जाने पर
पता चला
कि हम सबके रास्ते अलग थे
कोई पहली श्रेणी का चलने वाला था
जो चलने मे यकीन रखता था
कोई दूसरी...
जो छोटे रस्ते की तलाश कर रहा था
और कोई उड़ना चाहता था
इसी आस मे
हम सब चल रहे थे

हमने देखा
कि भूख से अंतड़ियाँ
कैसे ऐंठ्ती हैं
और फिर शुरू हो जाती है
तलाश एक ऐसे रास्ते की
जो भूख को ख़त्म कर सके
जो रास्ते की गरमी को भगा सके
जो हमे हमारे घर तक पंहुचा सके

घर
कब और किसलिये छोड़ा
ये तो सब जानते हैं
लेकिन
चुपके से
घर कब वापस गए
कब उसमे नई दीवारे खडी की
कब रंग रोगन हुआ
कब घर मे पूड़ी तरकारी बनी
ये कोई नही जानता

अब तो काफी लोग घर पर हैं
हम चंद लोग
उसी रास्ते पर हैं
हमने कोई छोटा रास्ता नही चुना
हमे घर जाने की बहुत इच्छा थी
हम चांदनी रात मे पुआलों पर लोटना चाहते थे
हम आम के पेड पर चढ़कर
सखपुतिया खेलना चाहते थे
लेकिन
हमे इससे ज्यादा अच्छा खेल
उस रास्ते पर चलना लगा
हम घर नही गए।

अभी भी हम
वैसे ही चल रहे हैं
और ....
घर गए लोग हमारे पीछे से
घंटियाँ बजा रहे हैं
रिझा रहे हैं।

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