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Friday, October 5, 2018

Fake News से लड़ने का facebook का fake दावा

जबसे कैंब्रिज एनालिटका और फेसबुक का चुनावी घोटाला खुला है, फेसबुक के मार्क जकरबर्ग बार बार कह रहे हैं कि उनकी कंपनी फेक न्यूज और अफवाहों से लड़ने के लिए अपनी तकनीक विकसित कर रही है। जब अमेरिकी कांग्रेस ने यह पूछा कि इस तकनीक को विकसित करने की अंतिम तारीख बताइए तो मार्क जकरबर्ग ने उन्हें जवाब दिया कि इसमें महीनों लगेंगे। मामला खुले अब एक साल होने को आए हैं, लेकिन मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक पर सिवाय थर्ड पार्टी चेक लगाने के ऐसा और कोई भी मैकेनिज्म तैयार नहीं किया है, जिससे फेक न्यूज पर रोक लग सके। अपने यहां भारत में तो फेसबुक ने न तो फेक न्यूज पर किसी तरह की कोई रोक लगाई है और न ही फेक न्यूज फैलाने वालों पर ही कोई रोक लगाई है। भारत के चुनाव आयोग से फेसबुक ने ये तो कह दिया है कि वह मतदान के दो दिन पहले अपने प्लेटफॉर्म पर चुनावी चकल्लस रोक देगा, लेकिन फेसबुक ऐसा कैसे करेगा, उसे खुद ही नहीं पता है।

इंडिया 272 प्लस, शंखनाद, पोस्टकार्ड न्यूज, सोशल तमाशा, द इंडिया आई, डार्क ट्वीट्स फ्रॉम लिबरल बेसमेंट जैसे फेक न्यूज के सैकड़ों पेज अभी भी फेसबुक पर धड़ल्ले से फेक न्यूज और अफवाह फैलाने का काम कर रहे हैं, लेकिन फेसबुक इनपर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगा रहा है। उल्टे हो यह रहा है कि सही खबरें देने वाली वेबसाइटों को फेसबुक पर से ब्लॉक किया जा रहा है। इन्हीं बातों को लेकर सीएनएन के रिपोर्टर ऑलिवर डैरसी ने फेसबुक के न्यूज फीड हेड जॉन हेगमैन से बड़ा सही सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि अगर फेसबुक सच में अफवाहों और फेक न्यूज से लड़ने के लिए सीरियस है तो इस तरह के फेक न्यूज फैलाने वाले अकाउंट्स अभी तक फेसबुक पर क्या कर रहे हैं? आप चेक करेंगे तो पाएंगे कि इंडिया 272 प्लस, शंखनाद, पोस्टकार्ड न्यूज, सोशल तमाशा, द इंडिया आई, डार्क ट्वीट्स फ्रॉम लिबरल बेसमेंट जैसे फेक न्यूज के सैकड़ों पेजों को फॉलो करने वालों की संख्या हजारों लाखों में है। जवाब में जॉन हेगमैन ने जो कहा, उससे आपकी चिंता और बढ़ने वाली है। उन्होंने कहा कि फेसबुक फेक न्यूज को नहीं हटाता।

लेकिन इसके आगे हेगमैन ने जो कहा, वह तो दुनिया को, सच को और लोकतंत्र को पूरी तरह से गड्ढे में धकेलने वाली बात है। उन्होंने कहा कि फेक न्यूज कम्यूनिटी स्टैंडर्ड को वॉयलेट नहीं करतीं और न ही फेक न्यूज फैलाने वाले ऐसे पेज हमारे समाज का ऐसा कोई नियम तोड़ते हैं, जिसके लिए कि उन्हें ब्लॉक किया जाए। एक बार फेसबुक पर चेक करिए तो आप पाएंगे कि इंडिया 272 प्लस, शंखनाद, पोस्टकार्ड न्यूज, सोशल तमाशा, द इंडिया आई जैसे फेक न्यूज फैलाने वाले फेसबुक पेज रोजाना ढेर सारी फेक न्यूज पोस्ट कर रहे हैं, लेकिन उनपर कोई रोक नहीं लगी है।

यह बात बिलकुल नहा धोकर साफ है कि फेसबुक भारत में किसी तरह की फेक न्यूज पर रोक लगाने नहीं जा रहा है। उसने जो थर्ड पार्टी चेकर लगाया भी है, वह उन्हीं खबरों को छूट देता है जो सब जगह होती हैं। लेकिन ऐसी खबरें, जो एक्सक्लूसिव होती हैं, उन्हें यह थर्ड पार्टी चेकर फेक न्यूज साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मसलन जज लोया की मौत की जो खबरें चलीं, हम जानते हैं कि मेन स्ट्रीम मीडिया ने उन्हें हम लोगों को न दिखाने के लिए पूरी कमर कसी और नहीं दिखाईं। आज की तारीख में जज लोया की मौत से जुड़ी न्यूज फाइलें जब फेसबुक पर डाली जाती हैं तो बीजेपी की ट्रॉल आर्मी उन्हें रिपोर्ट करती है। चूंकि वह खबरें मेनस्ट्रीम मीडिया में सभी जगहों पर नहीं मिलतीं, इसलिए उन्हें फेसबुक डाउन कर देता है। इस वजह से देश के इतने बड़े मामले से जुड़ी खबरें अधिकतर लोग न तो देख पाए और न ही जान पाए। इसी तरह से आदिवासियों के साथ जो घटनाएं होती हैं, मेनस्ट्रीम मीडिया उन्हें कवर नहीं करता। लेकिन जो लोग उन्हें कवर करते हैं, फेसबुक उन्हें फेक न्यूज कैटेगरी में डाल देता है।

देश के कई पत्रकारों को भी फेसबुक ने टारगेट कर रखा है। मसलन एनडीटीवी के रवीश कुमार और खुद मैंने भी जब फेसबुक के फ्री बेसिक्स के गोरखधंधे के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को समझाना शुरू किया कि फ्री बेसिक्स के तहत कैसे फेसबुक और अंबानी मिलकर ठगी का नया धंधा लाने जा रहे हैं तो हमारी फेसबुक रीच 80 प्रतिशत तक कम कर दी गई। उस वक्त मैंने इस मामले को लेकर इंग्लैंड में गैरी मैक्किननन से बात की थी। गैर मैक्कनिन स्कॉटिश हैं और हैकिंग के इतिहास में पहले सबसे बड़े हैकर माने जाते हैं जिन्होंने सन 2002 में दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री हैकिंग की थी और अमेरिकी सेना के कई कंप्यूटर्स हैक किए थे। गैरी ने बताया कि वह खुद फेसबुक पर ब्लॉक हैं और फेसबुक पर उनके हजार से ज्यादा दोस्त नहीं हैं। लेकिन उसके बावजूद कोई भी उन्हें फ्रेंड रीक्वेस्ट नहीं भेज सकता है। अभी वह जेल से बाहर हैं, लेकिन बेहद डरे हुए हैं, इसलिए उन्होंने इस बारे में सीधे-सीधे कुछ भी बात करने से मना कर दिया, अलबत्ता इतना जरूर कहा कि वह कतई नहीं मानते कि यह प्लेटफॉर्म सुरक्षित है। खैर, मैंने फेसबुक की इसी अघोषित बदमाशी के चलते फेसबुक हमेशा के लिए छोड़ दिया और उस वक्त रवीश कुमार को भी यही राय दी थी। अभी का हाल जानने के लिए रवीश कुमार को फोन मिलाया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। शायद अब वह भी फेसबुक के कीड़े हो चुके हैं कि जो जब तक फेसबुक को अच्छे से चाट न ले, उसे चैन नहीं मिलेगा। मेरा मानना है कि जिसे भी सही खबर जानने की ख्वाहिश होगी, वह मेहनत करेगा, सर्च करेगा, चार जगहों पर जाकर चीजों को पढ़ेगा या देखेगा। और जिसे सही खबर जानने की इच्छा नहीं होगी, वह इसी तरह से इंडिया 272 प्लस, शंखनाद, पोस्टकार्ड न्यूज, सोशल तमाशा, द इंडिया आई जैसे फेक न्यूज फैलाने वाले फेसबुक पेजों पर जा जाकर लाइक कमेंट और शेयर करता रहेगा। वह सच जानने के लिए मेहनत बिलकुल नहीं करेगा।

फेक न्यूज का किला बन चुके फेसबुक को छोड़ने के लिए मैं कई बार लोगों को समझा चुका हूं, लेकिन देखता हूं कि भारत में लोगों पर झूठ खाने और पचाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इसकी सीधी वजह यही है कि अभी अपने यहां लोकतंत्र को आए सिर्फ 70 साल हुए हैं और भारत के लोगों की सोच न तो लोकतंत्र को लेकर साफ हो पाई है और न ही सच को लेकर और न ही अपनी खुद की सुरक्षा को लेकर। लेकिन अमेरिका में लोकतंत्र हमसे कहीं ज्यादा पुराना है और गनीमत है कि वहां पर काफी लोगों की सोच लोकतंत्र को लेकर साफ है। इसी महीने, यानी कि सितंबर 2018 में वहां पर प्यू रिसर्च सेंटर वालों ने एक सर्वे कराया है, जिससे वहां पर साफ लोकतांत्रिक सोच बिलकुल साफ दिखाई पड़ती है। आपको बता दें कि प्यू रिसर्च सेंटर वही है, जिसने अपने यहां नोटबंदी के बाद सर्वे कराया था, जिसमें काफी लोगों ने नरेंद्र मोदी की सरकार में आस्था व्यक्त की थी। इसके बाद पिछले साल भी इसके सर्वे में देश के आर्थिक हालात में लोगों की बड़ी आस्था दिखाई गई थी और इसी महीने फिर से इसकी नई रिसर्च सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि लोगों का देश के आर्थिक हालात में अब भरोसा नहीं रह गया है।

तो फेसबुक के बारे में प्यू की ताजी रिसर्च कहती है कि अमेरिका की तकरीबन आधी आबादी अब फेसबुक पर बिलकुल भरोसा नहीं करती है। सन 2017 से लेकर अभी तक यानी कि सितंबर 2018 तक वहां के 42 प्रतिशत लोगों ने फेसबुक से किनारा कर लिया है। प्यू के सर्वे में शामिल 26 प्रतिशत लोगों ने  बताया कि उन्होंने अपने मोबाइल फोन से फेसबुक डिलीट कर दिया है। 54 प्रतिशत लोगों ने फेसबुक पर अपनी प्राइवेसी सेटिंग बदल डाली है और इन सबमें से 74 प्रतिशत लोग ऐसे रहे, जिन्होंने माना कि उन्होंने इन तीनों एक्शन में से कोई एक एक्शन लिया है। इस सर्वे की जो सबसे खास बात है, वह ये कि युवाओं ने सबसे ज्यादा फेसबुक के खिलाफ मोर्चा खोला है। 18 से 49 साल के लोगों ने सबसे ज्यादा फेसबुक डिलीट किया है या फिर उसकी प्राइवेसी सेटिंग बदली है या फिर फेसबुक का इस्तेमाल कंप्यूटर या मोबाइल या लैपटॉप पर करना बंद कर दिया है। लेकिन बात बुजुर्गों की करें, जिनके कंधे पर हम युवाओं को रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी है तो वह फेक न्यूज, अफवाह और प्राइवेसी को लेकर सबसे ज्यादा लापरवाह निकले हैं। 50 से 65 साल के लोगों में महज 33 प्रतिशत लोगों ने ही फेसबुक से किसी भी रूप में किनारा किया है, बाकी के 67 प्रतिशत लोग पहले की ही तरह फेसबुक पर बने हुए हैं और पहले की ही तरह फेक न्यूज और अफवाहों के साथ खड़े हुए हैं।

आपका डाटा यहां बेचता है फेसबुक

हम सभी ने देखा कि कैसे फेसबुक ने कैंब्रिज एनालिटिका के साथ शातिर गठजोड़ करके हम सभी का डाटा रूसियों को बेचा। इस मामले में जब सवाल उठा तो पहले पहल मार्क जकरबर्ग यही कहते नजर आए कि उन्हें तो कुछ पता ही नहीं था। सन 2014 से लेकर 2016 तक रूसियों ने फेसबुक पर एक के बाद एक 80 हजार फेक न्यूज पोस्ट अपडेट की, लेकिन मार्क जकरबर्ग चैन की बंसी बजाते रहे। जब मामला खुला और अमेरिकी कांग्रेस ने उनका कान पकड़कर कांग्रेस के सामने बैठा दिया, तब कहीं जाकर मार्क जकरबर्ग के मुंह से बड़ी मुश्किल से सॉरी निकला, वह भी सूखते गले के साथ। कांग्रेस की उस पूछताछ के इसी चैनल पर ढेर सारे वीडियो मौजूद हैं, उनमें आप देख सकते हैं कि कैसे वह बार बार पानी पीकर अपना गला तर करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के लोग उनके हलक में हाथ डालकर कैसे सच बाहर निकलवा रहे हैं। फेसबुक ने माना है कि उसने हम सभी भारतीयों का डाटा भी स्टोर किया है। सवाल उठता है कि क्या हमारी संसद में इतना भी दम नहीं है कि वह एक ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी बनाकर मामले की जांच करे और मार्क जकरबर्ग को बिलकुल उसी तरह से कान पकड़कर हमारी संसद के सामने बैठा दे, जैसा कि अमेरिकी संसद ने किया और बिलकुल उसी तरह से उनके हलक में हाथ डालकर सच उगलवाए?

लेकिन यह बात फेसबुक और कैंब्रिज एनालिटिका के उस गठजोड़ की नहीं है, जिसके तहत दोनों ने मिलकर हम सबके डाटा के साथ खिलवाड़ किया था। बात यह है कि क्या फेसबुक खुद हमारा डाटा बेचता है? क्या फेसबुक खुद हमारा डाटा स्टोर करता है और हमारी क्लोनिंग करके हमें डॉली नाम की भेड़ बनाने पर तुला है? क्या हो अगर डेनमार्क से कोई आपके ही नाम से बिलकुल ओरिजनल आईडी बनाए? क्या हो कि अगर कोई आपके ही नाम से बिलकुल आपकी ही भाषा में फेक न्यूज या अफवाह फैलाए? क्या हो कि कोई आपके नाम से आपकी वह तस्वीरें पोस्ट करे, जो आपने कभी फेसबुक पर डाली ही नहीं और जो आपके मोबाइल के गैलरी सेक्शन में रखी हुई हैं? क्या हो कि कोई आपकी ही आवाज में आपके नाते रिश्तेदारों को फोन करे और किसी खास पार्टी को वोट देने की पैरवी करे? इन सवालों के जवाब इसी वीडियो में मिलेंगे, लेकिन पहले यह जान लें कि क्या फेसबुक हमारा डाटा खुले बाजार में बेच देता है? वह खुला बाजार, जो बेहद खतरनाक है और अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकता है और किसी भी हद तक जा सकता है। और हर हद तक जाने के बावजूद हमारी सरकारें, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी की क्यों न हों, कुछ नहीं करेंगी क्योंकि वह भी सिर्फ वोटबैंक की राजनीति ही करती आई हैं और उन्होंने इसके अलावा और कुछ भी न तो सीखा है और न ही किया है। वह हम भारतीयों की औकात एक भेड़ से अधिक और कुछ नहीं समझते।

जब अमेरिकी कांग्रेस यानी कि अमेरिकी संसद ने मार्क जकरबर्ग के हलक में हाथ डाला, तब कहीं जाकर यह राज खुला कि फेसबुक ने अकेले कैंब्रिज एनालिटिका को ही हम सबका डाटा नहीं बेचा। ऐसी 81 कंपनियां हैं, जिनके नाम फेसबुक ने अमेरिकी संसद को दिए गए एफीडेविट में बताए हैं कि वह उन्हें डाटा बेचता आ रहा है। अपने सात सौ पेज के मेनीफेस्टो में फेसबुक ने अमेरिकी संसद की एनर्जी और कॉमर्स कमेटी को इन कंपनियों के नाम बताए हैं। कैंब्रिज एनालिटिका के साथ किए गए शातिर और आपराधिक गठजोड़ में नाम सामने आने के बावजूद इसी साल फेसबुक ने एप्पल, अमेजॉन, सैमसंग और अलीबाबा जैसी कंपनियों के साथ हमारा आपका डाटा बेचने का कॉन्ट्रैक्ट किया है। क्या आपने कभी देखा कि फेसबुक ने आपसे आपका डाटा किसी को भी बेचने के लिए अनुमति मांगी है? नहीं देखेंगे क्योंकि फेसबुक ने ऐसी कोई अनुमति कभी मांगी ही नहीं है।

हुवाई और अलीबाबा जैसी कंपनियां, जो भारत में भारतीय डाटा की स्मगलिंग के लिए पकड़ी गई हैं और जिनपर जांच भी चल रही है, फेसबुक ने हमारा सारा डाटा इन कंपनियों को बेच दिया है। फेसबुक का दावा है कि जिन 81 कंपनियों को वह हमारा डाटा बेच रहा है, उनमें से 38 कंपनियों से उसने अपनी पार्टनरशिप तोड़ दी है। लेकिन अभी भी 43 कंपनियां हैं, जिन्हें वह हमारा सारा डाटा बेच रहा है। हालांकि फेसबुक का दावा है कि वह सिर्फ 14 कंपनियों को हमारा डाटा बेच रहा है। सारा डाटा का मतलब सिर्फ हमारे फेसबुक का ही डाटा नहीं है। जो लोग मोबाइल से फेसबुक या फेसबुक का कोई भी प्रोडक्ट मसलन व्हाट्सएप्प और इंस्टाग्राम यूज करते हैं, इन एप्स को इंस्टाल करने से पहले और इंस्टाल करते ही फेसबुक हमारे मोबाइल में मौजूद सारा अपने पास फेच कर लेता है, यानी कि खींच लेता है। इसका वह बाकायदा फॉर्म भरवाता है और जिसे न भरने पर आप उसका कोई भी प्रोडक्ट यूज नहीं कर सकते। इस फॉर्म में हमारे मोबाइल का कैमरा, गैलरी, कॉन्टैक्ट लिस्ट, एसएमएस, दूसरे एप्स और मोबाइल में तकरीबन जो कुछ भी है, वहां तक पहुंचने के लिए फेसबुक को इजाजत देनी पड़ती है। इजाजत न देने की हालत में फेसबुक का कोई भी एप इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
इस बात के अप्रत्यक्ष सबूत मिल चुके हैं कि भारत में जितनी राजनीतिक पार्टियां हैं, बीजेपी और उसके सहयोगी दल फेसबुक के इस डाटा के सबसे बड़े खरीदार हैं। नरेंद्र मोदी के लिए तो फेसबुक ने अपनी पूरी टीम ही भारत में तैनात कर रखी है, जिसकी ग्लोबल हेड कैथी हरबाथ लगभग हर तीसरे महीने ही भारत भागी चली आती हैं। कैथी हरबाथ के बीजेपी के सभी बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों से संबंध हैं और वे भारत में तरह तरह के ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाती हैं। इसी तरह से दुनिया भर में जितने भी तानाशाह हैं, चाहे वह म्यांमार हो या अजरबैजान या फिर अमेरिका के ट्रंप, यह सभी फेसबुक से डाटा खरीदते हैं, लेकिन इस खरीद का जो चेहरा दुनिया को दिखाया जाता है, वह बिलकुल दूसरा होता है।

जैसा कि पहले बताया कि फेसबुक हमारा डाटा प्राइवेट कंपनियों को बेच रहा है। पहले जान लें कि इस डाटा में क्या क्या है। मोटे तौर पर हम अपना फेसबुक डाटा दो कैटेगरी में बांट सकते हैं। पहली कैटेगरी है आम लोग जो फेसबुक का इस्तेमाल अपने लोगों से जुड़ने और सूचनाओं को पाने के लिए करते हैं। दूसरी कैटेगरी है उन लोगों की, जो फेसबुक पर विज्ञापन देते हैं और कई तरह के बिजनेस या राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए हैं। कैंब्रिज एनालिटिका के घोटाले में जब फेसबुक पकड़ा गया तो उसने हमें अपना डाटा डाउनलोड करने की सुविधा दी। अब कोई भी अपनी फेसबुक की सेटिंग में जाकर अपना डाटा डाउनलोड कर सकता है। डाटा डाउनलोड करने के बाद अब हर कोई देख सकता है कि फेसबुक ने उसकी क्या क्या चीजें अपने पास स्टोर कर रखी हैं। आम लोगों की कैटेगरी में फेसबुक का स्टोरेज दिखाता है कि वह अबाउट यू, एप्स एंड वेबसाइट, कॉल्स एंड मैसेजेस, कमेंट्स, ईवेंट्स, फ्रेंड एंड फालोइंग, ग्रुप्स, लाइक्स एंड रियेक्शन, लोकेशन हिस्ट्री, इनबॉक्स की सारी बातचीत, दूसरी एक्टीविटी, फोटो और वीडियो, पोस्ट, प्रोफाइल फॉरमेट, सर्च हिस्ट्री, सीक्योरिटी और लॉगिन करने की जगहें और मशीन वगैरह रिकॉर्ड करता है। विज्ञापन देने वाले लोगों में मार्केटप्लेस, फेसबुक के पेज, पेमेंट हिस्ट्री वगैरह बढ़ जाती है। यह तो वह डाटा है जो फेसबुक हमें बताता है कि उसने स्टोर किया है। अब एक छोटा सा प्रयोग करें। अमेजन या फ्लिपकार्ट पर जाकर पेन ड्राइव के बारे में सर्च करें और बगैर कुछ खरीदे वापस आकर अपना फेसबुक रीफ्रेश करें। आप पाएंगे कि जो चीज आप उन वेबसाइटों पर सर्च कर रहे थे, उन्हीं चीजों का विज्ञापन फेसबुक आपको दिखा रहा है। यानि कि जो चीजें आपने फेसबुक पर की ही नहीं, वह भी फेसबुक रिकॉर्ड कर रहा है। इसी तरह से हम मोबाइल पर किससे क्या बातचीत करते हैं या किसे क्या एसएमएस करते हैं कि किसी कौन सी फोटो खींचते हैं, यह सबकुछ फेसबुक रिकॉर्ड कर रहा है, और उन सभी कंपनियों को बेच रहा है, जिनके प्रोडक्ट हम सर्च कर रहे हैं। अब जरा इसी सर्च को राजनीतिक पार्टियों के रूप में सर्च करके देखें। इसी तरह से हमारा सारा डाटा उन्हें भी बेचा जा रहा है।

फेसबुक बार बार यह कहता है कि वह किसी को भी हमारा डाटा नहीं बेचता है। लेकिन फिर वह अमेरिकी कांग्रेस को उन कंपनियों की लिस्ट भी पकड़ाता है, जिन्हें वह हमारा डाटा बेचता है या जिन्हें उसने पहले कभी हमारा डाटा बेचा। फेसबुक का कहना है कि वह कंपनियों को डाटा नहीं बेचता, लेकिन जिस तरह के डाटा पर कंपनियां अपना विज्ञापन दिखाना चाहती हैं, उस जगह पर वह उन कंपनियों का विज्ञापन ले जाकर रख देता है। जाहिर है कि बीजेपी अपना विज्ञापन वहीं या उन्हीं लोगों को सबसे पहले दिखाना चाहेगी, जो बीजेपी के बारे में जानना चाहते हैं या जिनके दिमाग में बीजेपी को लेकर कुछ चल रहा है। लोगों के दिमाग में क्या चल रहा है, फेसबुक से ज्यादा इस बारे में कौन जानेगा? आखिर फेसबुक खुलते ही जो सबसे पहला सवाल हमारे सामने आता है, वह होता है- व्हाट्स इन योर माइंड? इसमे जो सबसे ज्यादा चिंता की बात है, और जिसपर अमेरिकी कांग्रेस ने सवाल भी उठाया था और जिसका जवाब मार्क जकरबर्ग नहीं दे पाए थे, वह ये कि क्या वह हमारा डाटा किसी को भी बेचने से पहले, फिर चाहे वह उन्हीं की वेबसाइट पर विज्ञापन देने वाले ही क्यों न हों, उससे पहले क्या कभी उन्होंने हमसे पूछा या हमें बताया कि वह हमारा डाटा किसे बेच रहे हैं?

यहां से डाटा चोरी कर रहा है फेसबुक

28 सितंबर को फेसबुक ने एक प्रेस नोट जारी करके बताया कि उसके सरवर से पांच करोड़ लोगों की प्रोफाइल हैक हो चुकी हैं। हैक बोले तो चोरी। उन प्रोफाइल्स में जो कुछ भी था, वह सब चोरी हो गया। यह चोरी किसने की, फेसबुक का कहना है कि उसे इस बारे में कुछ भी नहीं पता। पांच करोड़ लोगों की प्रोफाइलों से क्या क्या चोरी गया, यह भी फेसबुक को नहीं पता। अलबत्ता फेसबुक को यह जरूर पता है कि इस बार जिन पांच करोड़ लोगों की फेसबुक प्रोफाइल्स चोरी हुई हैं, उसका असर फेसबुक पर मौजूद चार करोड़ दूसरे लोगों पर पड़ा है। इसके चलते फेसबुक ने कुल मिलाकर नौ करोड़ लोगों को उनके मोबाइल या कंप्यूटरों से लॉगआउट करा दिया है। सन 2016 में जब अमेरिका में चुनाव हो रहे थे, तब कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक पर मौजूद 8.7 करोड़ लोगों की प्रोफाइल का डाटा चुराया था। सन 2016 में हुई फेसबुक की पहली सबसे बड़ी डाटा चोरी के बाद दुनिया ने देखा कि कैसे अमेरिकी चुनाव में खेल हुआ और कैसे किसी के भी न चाहते हुए डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बन बैठे। अब अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं और भारत में राजस्थान मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव तो होने ही वाले हैं, कुछ ही महीनों में लोकसभा चुनावों के लिए वोटिंग होने वाली है। ऐसे वक्त में फेसबुक ने ऐलान किया है कि उसपर मौजूद नौ करोड़ लोगों का डाटा या तो चोरी हो चुका है, या फिर हैकर उनके डाटा तक पहुंच चुके हैं। हालांकि फेसबुक ने बताया है कि जिस रास्ते चोरी हुई है, उसने वह रास्ता बंद कर दिया है, लेकिन इंटरनेट की तकनीकी दुनिया में सभी जानते हैं कि यह रास्ता बंद नहीं हुआ है और अब इसे बंद कर पाना सिर्फ एक ही सूरत में संभव है। और वह है कि फेसबुक को ही बंद कर दिया जाए। दुनिया को अगर बचाना है, दुनिया को अगर साफ सुथरा रखना है, जैसी दुनिया बनाने का सपना हमारे बुजुर्गों ने देखा और हमारी उंगली थामकर हमें देखना सिखाया है, फेसबुक को बंद करने के अलावा और कोई भी दूसरा रास्ता नहीं है।

फेसबुक ने बताया है कि इस चोरी के लिए हैकरों ने फेसबुक प्रोफाइल पर मौजूद व्यू एज बटन का इस्तेमाल किया। इस बटन के जरिए फेसबुक यूजर अपने आपको बिलकुल वैसे देख सकते हैं, जैसा कि दूसरे उनकी प्रोफाइल पर उनको देखते हैं। पिछले साल यानी कि जुलाई 2017 में फेसबुक ने अपने वीडियो फीचर में कुछ बदलाव किए थे, जिसकी वजह से उसकी साइट में तीन तरह के कीड़े यानी कि बग लग गए। इन्हीं कीड़ों ने फेसबुक की सीक्योरिटी को कुतरकर हैकरों के लिए वह रास्ता तैयार किया, जिसके जरिए फेसबुक की नौ करोड़ प्रोफाइलों का डाटा चोरी हो गया।

अपने यहां अक्सर लोग यह पूछते हैं कि डाटा चोरी हुआ तो उनपर क्या फर्क पड़ेगा। इसका बड़ा ही सीधा जवाब है कि पहले यह जान लिया जाए कि फेसबुक के पास हमारा ऐसा कौन सा डाटा है जिसे पाने के लिए दुनिया भर के हैकर, तानाशाह और चुनाव में जीतने के लिए साम दाम दंड भेद अपनाने वाले नेता मरे जा रहे हैं। इसका बड़ा आसान तरीका है। अपने फेसबुक प्रोफाइल की सेटिंग्स में जाइए। वहां आपको डाउनलोड योर इन्फॉरमेशन नाम से एक बटन दिखेगा। यहां पर क्लिक करके आप अपना सारा फेसबुक डाटा डाउनलोड कर सकते हैं। इसे डाउनलोड करने के बाद जब आप इस फाइल को खोलेंगे तो पाएंगे कि यहां पर आपके बारे में अबाउट अस है, आप कब कहां गए, उसकी अलग फाइल है। आपने कब और कहां कौन सी तस्वीर फेसबुक पर अपलोड की, उसकी अलग फाइल है। आपने कब कौन सी वीडियो अपलोड की, उसकी अलग फाइल है। आपने कब कहां और क्या कमेंट किया, उसकी अलग फाइल मिलेगी। आपके दोस्तों की अलग फाइल मिलेगी तो आपके फॉलोवस और आप जिसे फॉलो करते हैं, उसकी अलग फाइल मिलेगी। लेकिन जो सबसे संवेदनशील फाइलें मिलेंगी, वह हैं आपकी चैटिंग का पूरा डाटा और आपने फेसबुक पर जो सर्च किया है, उसका पूरा डाटा। चैटिंग और सर्च की भी आपको फाइलें वहां मिल जाएंगी। चैटिंग में हम सभी अक्सर बेहद संवेदनशील जानकारियां बांटते हैं और इस विश्वास के साथ कि कम से कम इसे कोई और नहीं देख रहा है। सिर्फ वही देख रहा है, जिससे बात की जा रही है। इस चैटिंग में हम सभी ने अक्सर अपने बैंक अकाउंट, पासवर्ड, पैन कार्ड, आधार कार्ड और अपने बारे में लगभग सारी संवेदनशील जानकारियां अपने किसी ऐसे जाननेवाले को दे रखी हैं, जिसपर कि हमें पूरा भरोसा है। यह ऐसी जानकारियां होती हैं, जो किसी क्रिमिनल टाइप के आदमी के हाथ लग जाए तो वह हमें कंगाल बना देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगा। हमारी दूसरी सबसे संवेदनशील जानकारी है कि हमने सर्च क्या किया? हमारे दिमाग में जो सवालात आते हैं, वह हम सर्च करते हैं। हम जो कुछ भी जानना चाहते हैं, हम वह सर्च करते हैं। हमारे दिमाग में जो कुछ भी चल रहा है, वह इन्हीं सर्च से सामने आता है।

अब हमारे दिमाग में क्या चल रहा है, इसका सीधा फायदा दो लोग उठाते हैं। पहला बिजनेसमैन यानी कि धंधा पानी करने वाले। अगर हमारे दिमाग में चलती चीजें उनके प्रोडक्ट से मेल खाती हैं तो वह अपना प्रोडक्ट हमें बेचने पहुंच जाते हैं। दूसरे हैं हमारी राजनीतिक पार्टियां। हमारे दिमाग की थाह लेकर ही वह हमारी भावनाओं से खेलती आई हैं। फेसबुक ने इस खेल को और भी ज्यादा आसान बना दिया है। यही वजह है कि फेसबुक के आने के बाद से दुनिया भर की राजनीति में गंदगी और भी बढ़ गई है। इस गंदगी के चलते दुनिया भर के उन देशों में, जहां जनता का राज है, यानी कि जहां लोकतंत्र है, वहां के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर बहुत ही बड़ा खतरा मंडरा रहा है। वक्त वक्त पर फेसबुक के जरिए इसे भारी चोट भी पहुंचाई गई है। अमेरिका से लेकर म्यांमार और यूरोपियन यूनियन से लेकर मिडल ईस्ट तक हमने इसी फेसबुक के जरिए लोकतंत्र को घायल होकर कराहते देखा है।

इस साल यानी कि 2018 के सितंबर में फेसबुक ने जिन पांच करोड़ प्रोफाइलों का डाटा चोरी होने की बात बताई है और जिन दूसरी चार करोड़ प्रोफाइलों पर उसका असर होने की बात बताई है, अगर फेसबुक का पिछला रिकॉर्ड देखें तो पूरी संभावना है कि यह चोरी खुद फेसबुक ने कराई है। कैंब्रिज एनालिटिका में जब फेसबुक पकड़ा गया तो उसका मालिक मार्क जकरबर्ग पहले तो यह मानने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था कि ऐसी कोई चोरी हुई है। अमेरिकी संसद ने जब उसे हाजिर होने का समन भेजा, तब भी वह हाजिरी से बचने के लिए बहाने बनाता रहा। जब अमेरिकी संसद ने अपने तेवर कड़े किए, जब कहीं जाकर वह अमेरिकी संसद के सामने हाजिर हुआ। अमेरिकी संसद की पूरी कार्यवाही मैंने इसी चैनल पर अपलोड कर रखी है। उसे देखें तो आपकी आंख खुल जाएगी कि फेसबुक ने दुनिया को जोड़ने के नाम पर कैसे दुनिया को तोड़ताड़कर अलग थलग कर दिया है। भाई भाई में दुश्मनी पैदा करा दी है, पति पत्नी में फेसबुक के नाम पर अलगाव पैदा करा दिया है। लोग हत्याओं का सीधा प्रसारण फेसबुक पर कर रहे हैं और फेसबुक के अंदर बैठे लोग अपनी टीम को ट्रेनिंग देते पकड़े गए हैं कि इन हत्याओं का उल्टा सीधा या कैसा भी प्रसारण हो, उसे फेसबुक से नहीं हटाना है। यही हाल फेसबुक का यूरोपियन यूनियन में चले मुकदमे में हुआ है, जहां वह आईएसआईएस के लोगों को आगे बढ़ाता पकड़ा गया है। इंग्लैंड ने तो मार्क जकरबर्ग के ईंग्लैंड में घुसने पर तब तक के लिए पाबंदी लगा दी है, जब तक कि वह वहां की संसद के सामने हाजिर नहीं होता। आज की तारीख में मार्क जकरबर्ग इंग्लैंड से बिलकुल वैसे ही तड़ीपार कर दिया गया है, जैसे अपने यहां कभी अमित शाह को गुजरात से तड़ीपार किया गया था

फेसबुक ने इस बार की यह चोरी तो घोषित कर दी, लेकिन जो चोरी वह चौबीसों घंटे कर रहा है, उसे वह छुपाने की पूरी कोशिश करता रहा है। जिस चोरी को वह छुपाने की कोशिश करता रहा है, वह कैंब्रिज एनालिटिका और अब की हुई चोरी से भी कहीं बड़ी चोरी है। मैंने पहले ही बताया कि फेसबुक हमारा दिमाग पढ़ता है। हम पर्सनली क्या बातें करते हैं, हर एक चीज वह पढ़ता है। ऐसा वह सिर्फ फेसबुक पर ही नहीं करता, बल्कि व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर भी करता है। यह सारी जानकारियां वह इन तीनों माध्यमों यानी कि व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर विज्ञापन देने वालों को बेचता है। अमेरिकी संसद में यह सवाल उठा तो मार्क जकरबर्ग ने जवाब दिया कि वह यह जानकारियां सीधे सीधे नहीं बेचता। बल्कि लोग अपनी पसंद उसे बताते हैं, जिसके हिसाब से वह इन जानकारियों में उनकी पसंद की चीजें खंगालता है और सीधे वहीं पर उनका विज्ञापन दिखाता है, जहां लोग उसे देखना चाहते हैं। लेकिन जो लोग फेसबुक पर विज्ञापन का काम करते हैं, वह जानते हैं कि मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। विज्ञापन देने वालों को फेसबुक इसके अलावा भी ऐसा बहुत कुछ बताता है जो कि पूरी तरह से गैरकानूनी है। अमेरिकी संसद ने फेसबुक की इस हरकत पर कड़ी नाराजगी भी जताई है, इसके बावजूद उसका खुला खेल फर्रुखाबादी चालू है।

गिज्मोडो डॉट कॉम ने खुलासा किया है कि फेसबुक विज्ञापनों पर रिसर्च करने वालों ने पाया है कि फेसबुक हमारा बेहद संवेदनशील डाटा ही नहीं बेच रहा है, बल्कि वह हमारे मोबाइल नंबरों के साथ+साथ हमारे जानने वालों के भी मोबाइल नंबर विज्ञापन देने वालों को बेच रहा है। इसके अलावा नंबरों से ही जुड़ा एक और खुलासा किया है। अक्सर लोग अपना मोबाइल नंबर बदलते रहते हैं। अपने यहां जिस तरह से कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम है, लोगों की मजबूरी बन जाती है कि वह किसी और कंपनी का नंबर लेकर अपना काम चलाएं। दुनिया के दूसरे देशों में भी कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम खूब है। ऐसे देशों में भारत, पाकिस्तान, कंबोडिया, श्रीलंका, पोलैंड, इजरायल, लेबनान सहित थोड़ा बहुत अमेरिका भी शामिल है। इन सभी देशों में इस प्रॉब्लम के चलते लोगों को अपना मोबाइल नंबर बदलना पड़ता है, वरना वह बात ही नहीं कर पाते हैं। अब सवाल उठता है कि जब हम नंबर बदलते हैं तो हमारे पुराने नंबर का क्या होता है? जाहिर सी बात है कि कंपनियां वह नंबर किसी दूसरे को बेच देती हैं। अब जैसे मैंने अपना मोबाइल नंबर बदला और फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया कि अब मेरा ये वाला पुराना नंबर नहीं है बल्कि ये मेरा नया नंबर है। वहीं से फेसबुक पुराना वाला नंबर ट्रेस कर लेता है और विज्ञापन देने वाले चुनिंदा लोगों को बता देता है कि मेरा पुराना नंबर किसी नए आदमी के पास है। नया आदमी अपना नया नंबर अपनी फेसबुक प्रोफाइल से कनेक्ट करता है और फेसबुक उसकी सारी रुचियां जानकर विज्ञापन देने वाली उन्हीं चुनिंदा कंपिनयों को बता देता है। इस तरह से जो कोई भी नया नंबर लेता है, उसके नंबर पर तरह तरह की स्पैमिंग शुरू हो जाती है।

कुल मिलाकर बात इतनी है कि फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर आप चाहे जो करें, भले ही वह सबके सामने हो या इनबॉक्स की चैटिंग हो, फेसबुक वह सबकुछ रिकॉर्ड कर रहा है। यह सारी रिकॉर्डिंग वह विज्ञापन देने वालों को बेच रहा है। काफी कड़ाई से हुई पूछताछ में फेसबुक ने अमेरिकी संसद के सामने यह बात मानी है, लेकिन साजिशन यह बात उसने दुनिया के सामने नहीं आने दी है। 

बीजेपी, फेसबुक और महान भारतीय लोकतंत्र का गैंगरेप- Part- 2

वैसे कई बार फेसबुक से पूछा गया कि वह अपनी ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स यूनिट में काम करने वालों की संख्या बता दे, लेकिन उसने कभी नहीं बताया। लेकिन फेसबुक के ऑफिस में खुद उसके कर्मचारी कंपनी की नीतियों से परेशान हैं तो वह गाहे बगाहे मुंह खोल देते हैं। ऐसे ही फेसबुक के एक एग्जीक्यूटिव ने नाम सामने न आने देने की शर्त पर बताया चुनावों के वक्त जब फेसबुक की ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स यूनिट काम करना शुरू करती है तो इसमें कंपनी के लीगल, सूचना सीक्योरिटी और पॉलिसी टीम से सैकड़ों लोगों का ट्रांसफर कर दिया जाता है। चुनाव भर ये सब इस यूनिट में काम करते हैं और चुनाव के बाद वापस इन्हें इनके विभागों में ट्रांसफर कर दिया जाता है। चुनावों में जब फेसबुक की ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स यूनिट अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए इकट्ठा होती है तो केटी हरबाथ की टीम फेसबुक के विज्ञापन और सेल्स विभाग के साथ ही बैठने लगती है। विज्ञापन और सेल्स विभाग के लोग फेसबुक समर्थित उम्मीदवार के लिए अधिक से अधिक रिजल्ट लाने में पूरी मदद करते हैं। ये सब लोग मिलकर नेताओं को इस बात की ट्रेनिंग देते हैं कि वह किस तरह से अपना विज्ञापन तैयार करें कि जिससे अधिक से अधिक लोग उल्लू बनें। या फिर कैसे फेसबुक का वह नीला निशान चुटकी बजाते ही हासिल करें, जिसे कोई भी आसानी से नहीं पा सकता। या फिर वे किस तरह के वीडियो बनाएं कि जिसे देखते ही हमारे आपके जैसे वोटर्स उल्लू बन जाएं। और फिर जैसे ही फेसबुक समर्थित उम्मीदवार जीतता है, केटी हरबाथ अपनी टीम लेकर उसकी चौखट पर पहुंच जाती हैं और तुरंत सरकारी अधिकारियों के बीच अपनी पैठ बनाने लगती हैं ताकि आने वाले दिनों में वे और उनकी टीम मार्क जकरबर्ग के लिए और भी अधिक कानून तोड़ सके और किसी भी देश के नियम कायदों को ठेंगा दिखा सके।

इसी तरह से फेसबुक की इस यूनिट ने सन 2015 में स्कॉटिश नेशनल पार्टी को जीतने में न सिर्फ मदद की, बल्कि अपनी कॉरपोरेट वेबसाइट पर बेशर्म अदाबाजी के साथ इसकी सक्सेस स्टोरी भी पब्लिश कर रखी है। और तो और, जो लोग इंग्लैंड छोड़कर स्कॉटलैंड नहीं जाना चाहते थे, उन्होंने भी फेसबुक की यह बदमाशी खुलेआम देखी।

पिछले साल यानी कि 2017 के अप्रैल में वियतनाम के अधिकारियों ने सीना ठोंककर कहा कि फेसबुक ने उनके लिए बाकायदा अलग से ऐसा चैनल तैयार किया है, जिससे कि वे सरकार की आलोचना करने वालों का मुंह बंद कर सकते हैं। कुछ दिन पहले स्क्रॉल डॉट इन ने खबर छापी थी कि भारत सरकार के दर्जनों विभाग हम लोगों के सोशल मीडिया पर गहरी निगाह रख रहे हैं। वैसे एक बात और है। फेसबुक पर अगर कोई भारत का कानून तोड़ने वाली पोस्ट अपडेट करता है तो भले वह भारत से हट जाती है, लेकिन बाकी दुनिया में वह दिखाई देती है। ऐसा फेसबुक दुनिया के हर देश में करता है और कानून की खुलेआम खिल्ली उड़ाता है। यह समस्या और भी गहरी हो जाती है, जब हमें पता चलता है कि दुनिया भर में फैले फेसबुक के दफ्तरों में पहले कभी जो लोकतांत्रिक माहौल था, अब वह पूरी तरह से तानाशाही में बदल चुका है। अमेरिका के राजनीतिक और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था फ्रीडम हाउस ने 2017 के नवंबर में रिपोर्ट जारी करके बताया था कि कैसे दुनिया भर में ऐसे देशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जो सोशल मीडिया का प्रयोग लोकतंत्र को गड्ढे में धकेलने के लिए करते हैं। फ्रीडम हाउस ने इसमें सबसे बड़ा उदाहरण पैट्रियॉटिक ट्रॉलिंग का दिया था। पैट्रियॉटिक ट्रॉलिंग यानि कि देशभक्तों की ट्रॉलिंग। राष्ट्रवादियों की ट्रॉलिंग। ऐसे लोग जो देश या राष्ट्र के नाम पर किसी को भी मा बहन की गालियां देने लगते हैं, किसी को भी बलात्कार की धमकी देने लगते हैं या किसी को सरेआम कुल्हाड़ी से काट डालते हैं या गाय के नाम पर इंसान का बीफ बना देते हैं, ये सभी पैट्रियॉटिक ट्रॉलर्स होते हैं। इनका काम असहमतियों को कुचलना होता है और जो असहमत हैं, उन्हें किसी भी तरह से देशद्रोही साबित करना होता है।

फेसबुक के अंदर उसके एग्जीक्यूटिव्स हमेशा इस तरह के लोगों को बचाने में लगे रहते हैं, ताकि वे धड़ल्ले से नफरत फैलाने वाली बातें फैला सकें। वैसे दुनिया को दिखाने के लिए फेसबुक कभी कभार, बोले तो सौ में से प्वाइंट पांच पर्सेंट बार नफरत फैलाने वालों पर रोक भी लगता है। मसलन वह ग्रीस की अल्ट्रा नेशनलिस्ट पार्टी गोल्डेन डॉन की एकाध पोस्ट कभी बैन कर देता है तो कभी अमेरिका में सफेद चमड़ी वाले नफरती चिंटुओं की पोस्ट बैन करता है तो कभी मिडल ईस्ट में आईसिस यानी कि आईएसआईएस की पोस्ट बैन करता है। लेकिन सौ में से मुश्किल से प्वाइंट पांच पर्सेंट या फिर उससे भी कम। आईएसआईएस के साथ गांठ जोड़कर काम करने के चलते यूरोपियन यूनियन में भी फेसबुक पर मुकदमा चल रहा है और कड़ी जांच हो रही है। फेसबुक के डाटा का गलत प्रयोग और अवैध राजनीतिक गठजोड़ कंक्रीट की तरह मजबूत हो चुका है। सन 2007 में हमने बराक ओबामा को अमेरिका का पहला फेसबुकिया राष्ट्रपति बनते देखा था। इसी साल फेसबुक ने वॉशिंटन में अपना पहला ऑफिस खोला था। ओबामा ने तब अपने वोटरों को रिझाने और भरमाने के लिए फेसबुक की मदद ली थी। सन 2010 से लेकर 2011 के बीच में मिडल ईस्ट में फेसबुक यूजर्स कई गुना बढ़ गए और हमने पाया कि ये वही वक्त था जब मिडल ईस्ट में इस्लामिक स्टेट यानी कि आईएसआईएस और उसके भाई बंधु तेजी से अपना कद बढ़ा रहे थे।

सन 2014 के पहले तक अपने यहां जो चुनाव होते थे, वह लगभग पहले की तरह सामान्य रूप से हुआ करते थे। लेकिन सन 2014 में जबसे मार्क जकरबर्ग ने ट्रंप के दाहिने हाथ कहे जाने वाले रूडी जुलियानी की खासमखास केटी हरबाथ तो नौकरी पर रखा और उसे इस यूनिट की जिम्मेदारी दी, तबसे चुनाव सोशल मीडिया पर लड़े जाने लगे हैं। दुनिया में होने वाले बड़े से बड़े आयोजनों से कहीं ज्यादा और कई गुना कमाई फेसबुक इन चुनावों से कर रहा है। जैसे कि अर्जेंटीना में सन 2015 के चुनाव में मॉरिसियो मैक्री ने अपनी रैलियां फेसबुक पर लाइव दिखाईं और जब वे वहां के राष्ट्रपति बने तो अपना पूरा मंत्रिमंडल ही हंसती-गाती, आंख मारती इमोजीज के साथ फेसबुक पर उतार दिया। 2015 में ही पोलैंड के राष्ट्रवादी राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा दुनिया के पहले ऐसे नेता बने जिन्होंने अपना शपथ ग्रहण समारोह ही पूरी दुनिया को फेसबुक पर लाइव दिखाया। आंद्रेज डूडा साहब ने पोलैंड में प्रेस की आजादी की जमकर वाट लगाई है। पूरी बेशर्मी से फेसबुक अपनी कॉरपोरेट वेबसाइट पर यह कहता भी है कि वह चुनावों में होने वाली जीतों का स्थाई और ठोस हिस्सा है।

अमेरिका के बाद फेसबुक का सबसे बड़ा बाजार भारत है। यहां इसके यूजर्स अमेरिका की तुलना में दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहे हैं। इसमें फेसबुक के दूसरे प्रोडक्ट व्हाट्सएप्प के दो सौ मिलियन से भी अधिक यूजर्स शामिल नहीं हैं। व्हाट्सएप्प पर जितने यूजर्स अपने यहां हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं। प्रतिष्ठित मीडिया हाउस ब्लूमबर्ग ने खुलासा किया है कि सन 2014 के चुनावामें में फेसबुक नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के साथ महीनों सिर जोड़कर काम करता रहा था। इन तीनों ने मिलकर फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर काम करने के लिए आईटी सेल बनाई जिसका काम सोशल मीडिया पर तरह तरह की अफवाहें फैलाना है। आपको याद होगा कि इसका बड़ी जोर शोर से प्रचार भी किया गया था कि इस आईटी सेल में इंडियन इंस्टीट्यूट और टेक्नोलॉजी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से काफी लोगों की भर्ती की गई थी। यानि कि हमारे देश में जो कुछ भी सड़ा गला लोकतंत्र बाकी थी, इन्हीं आईआईटी और आईआईएम वालों ने उसे खत्म करने में काफी बड़ी भूमिका निभाई है। पता नहीं हम लोग किस मन से इन इंस्टीट्यूट में पढ़ने वालों पर गर्व करते हैं, जबकि दुनिया भर के शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग में ये नाखून बराबर भी औकात नहीं रखते। सन 2014 में जब नरेंद्र मोदी चुनाव जीते थे, तब फेसबुक पर फॉलोअर्स की संख्या 14 मिलियन के आसपास थी। लेकिन चुनाव जीतने के बाद यह संख्या अब 43 मिलियन फॉलोअर्स तक पहुंच गई है। यानी कि ट्रंप से भी दोगुनी। यह सब यूं ही नहीं हो गया। आपको याद होगा कि नरेंद्र मोदी सन 2014 में जब फेसबुक के इसी फर्जीपने के चलते चुनाव जीते थे तो जकरबर्ग अपनी चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर शेरिल सैंडबर्ग को लेकर महज कुछ ही हफ्ते में उनसे मिलने पहुंच गया था। यह दोनों तो तब अपना फ्री बेसिक्स का ठगी का ठेला लेकर पहुंचे थे। फ्री बेसिक्स के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी को वक्त रहते हम लोग पहचान गए और नरेंद्र मोदी को न चाहते हुए भी अंबानी और मार्क जकरबर्ग के उस मनचाहे गठजोड़ से हाथ जोड़ना पड़ा था, लेकिन उसी वक्त मार्क जकरबर्ग के साथ पहुंची कैटी हरबाथ ने तब सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक के बाद एक लगातार कई सारे ट्रेनिंग कैंप लगाए थे। इसमें उन्होंने छह हजार सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को इस बात की ट्रेनिंग दी थी कि कैसे नरेंद्र मोदी के झूठ को सच बनाकर या उनके मन की बात बनाकर हम लोगों के सामने परोसा जाए।

सन 2014 के बाद जबसे नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया रीच बड़ी है, उनकी ट्रॉल आर्मी फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ लगातार हैरेस करने वाली कैंपेन चला रही है। सन 2014 के बाद से ही भारत पूरी दुनिया में फेक न्यूज और अफवाहों का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। इन अफवाहों और फेक न्यूज के चलते कहीं पर लोग गाय के नाम पर पीट पीटकर जान से मार दिए जा रहे हैं तो कहीं बच्चा चोरी के नाम पर तो कहीं डायन होने के नाम पर तो कहीं सिर्फ मुसलमान होने के नाम पर मार दिए जा रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट है कि सन 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के महज छह महीने के अंदर गाय के नाम पर होने वाली हत्यायों में सीधे सीधे 75 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष ने जब मॉब लिंचिंग मीटर तैयार किया तो नरेंद्र मोदी ने उन्हें नौकरी से बाहर करा दिया। हिंदुस्तान टाइम्स की मालिका शोभना भरतिया ने अमित शाह और नरेंद्र मोदी के कहने पर बॉबी घोष को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया और बॉबी को इस्तीफा देना पड़ा। महाराष्ट्र से लेकर मणिपुर तक इन अफवाहों और फेक न्यूज का जाल ऐसा फैला कि एक दो नहीं, सात-सात लोग एक साथ पीट-पीटकर जान से मारे जाने लगे। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गई। और यह सब सोशल मीडिया पर बाकायदा धमकी देकर किया गया और नरेंद्र मोदी के उन्हीं समर्थकों ने किया, जिन्हें फिलहाल एनआईए से लेकर सीबीआई तक से हर तरह का अपराध करके छूट जाने की छूट मिली हुई है। मसलन पिछले साल यानी 2017 के सितंबर की पांचवीं तारीख को बेंगलुरु में रहने वाली पत्रकार गौरी लंकेश जब अपने घर का दरवाजा बंद कर रही थीं, नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने खुलेआम उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। गौरी लंकेश काफी समय से नरेंद्र मोदी और अमित शाह की फेसबुक समर्थित ट्रॉल आर्मी का निशाना बनी हुई थीं। यह ट्रॉल आर्मी एक महिला को भद्दी से भद्दी गालियां दे रही थी, बलात्कार की धमकियां दे रही थी, जान से मारने की और लाश घसीटने की धमकियां दे रही थी और फेसबुक की केटी हरबाथ इन धमकियों से आनंदित हो रही थीं। मरने से पहले गौरी लंकेश ने अपने अखबार के लिए जो आखिरी संपादकीय लिखा था, उसकी हेडिंग थी- झूठी खबरों के इस युग में। इस संपादकीय में उन्होंने बताया था कि किस तरह से सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा अफवाह और झूठ का प्रोपेगेंडा हमारे राजनीतिक वातावरण को जहरीला कर रहा है।

बीजेपी, फेसबुक और महान भारतीय लोकतंत्र का गैंगरेप- Part-1

कई बार आपने देखा होगा कि जो लोग फेसबुक पर गाली गलौज करते हैं, अश्लील हरकतें करते हैं, कितनी बार भी आप उनकी रिपोर्ट कर दें, फिर भी वो यह सब करते रहते हैं। कई बार तो कई कई बार उनकी रिपोर्ट करने के बावजूद वो दुगनी बेशर्मी से यह सब करने में लग जाते हैं और हम सब यूं ही गालियां खाते रह जाते हैं। लेकिन अगर हमने बगैर गाली दिए, या बगैर कोई गलत शब्द कहे  उन्हें कुछ कह दिया तो उल्टे हमीं लोग फेसबुक पर ब्लॉक हो जाते हैं। फेसबुक हमसे कई तरह की आईडी जमा कराता है, कई तरह के पासवर्ड और कई तरह के फॉर्म। तब कहीं जाकर हमारी आईडी खुलती है और हमें उस काम की सजा मिलती है, जो हमने किया ही नहीं। यही चीजें अपने चेहरे का रंग नीले से हरा करते हुए व्हाट्सएप्प पर हमारे सामने होती हैं और अपना चेहरा सफेद करके इंस्टाग्राम पर भी होती हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि सोशल मीडिया पर एक ट्रॉल आर्मी है जो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक के लिए काम करती है। यह ट्रॉल आर्मी हर उस यूजर को, यानी जो कोई भी सोशल मीडिया यूज कर रहा है, अगर वह सत्ता समर्थक नहीं है और विरोध में कानून के दायरे में रहकर कुछ भी कह रहा है या कर रहा है, उसे टारगेट बना लेती है। टारगेट बनाने के बाद यह बेहद बुरी बुरी गालियों के साथ उसपर अटैक करती है और कुल मिलाकर उसकी इज्जत से खिलवाड़ करने में जुट जाती है। जिसे यह गालियां देती है, इसी ट्रॉल आर्मी का एक हिस्सा उसपर फेक यानी कि नकली खबरें तैयार करता है और सोशल मीडिया पर वायरल करता है।

मगर एक मिनट। माफ करिए लेकिन सोशल मीडिया पर चीजों को वायरल करना ट्रॉल आर्मी का काम नहीं है। यह काम है खुद फेसबुक का, खुद मार्क जकरबर्ग का, जिसने इसके लिए अलग से पूरा एक ऑफिस बना रखा है। फेसबुक का यह ऑफिस इस ट्रॉल आर्मी को हर तरह की तकनीकी मदद और ट्रेनिंग देता है। इसी तकनीकी मदद के बल पर ट्रॉल आर्मी बेखौफ होकर लोगों के साथ गाली गलौज करती है, फेक न्यूज फैलाती है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी यानी कि भारतीय जनता पार्टी की जो ट्रॉल आर्मी है, उसे हर तरह की तकनीकी मदद और ट्रेनिंग देने के लिए मार्क जकरबर्ग ने अमेरिका के वॉशिंगटन में भरा पूरा ऑफिस खोल रखा है। इस ऑफिस की इंचार्ज हैं केटी हरबाथ।

कैंब्रिज एनालिटिका, व्लादीमीर पुतिन और डॉनल्ड ट्रंप के साथ गैंग बनाकर अमेरिकी चुनाव में वोटर्स के साथ खेल करते हुए फेसबुक के मार्क जकरबर्ग जब रंगे हाथों पकड़े गए तो कहने लगे कि फेसबुक का किसी के भी साथ भी किसी तरह का कोई राजनीतिक गठजोड़ नहीं हैं। फेसबुक अपने सभी यूजर्स को राजनीति का बराबर मौका देता है। लेकिन मार्क जकरबर्ग बड़ी चालाकी से यह छुपा गए कि उनकी कंपनी दुनिया भर की राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती है। और जिनके साथ वह काम करती है, हम सभी जानते हैं कि उनके पास मौजूद ट्रॉल आर्मी किस तरह की फेक न्यूज फैलाती है और किस तरह का जहर लोगों के दिमाग में भर रही है। इतना ही नहीं, कंपनी बाकायदा अपने बिजनेस पेज पर इसका प्रचार प्रसार भी करती है कि वह कैसे लोगों को लांच कराती है या प्रोडक्ट लांच कराती है। या फिर कैसे फटाफट वह ब्लू मार्क दिलाती है। आप फेसबुक पर सालों टिक टुक करते रह जाएंगे, आपको यह कभी नहीं मिलेगा, लेकिन अगर आपके मोहल्ले का सभासद बीजेपी से होगा तो वह दो चार दिन में ये ब्लू मार्क लेकर के मोहल्ले के ही ग्रुपों में रौब गांठता फिरेगा।

तो फेसबुक के जिस नंगेपन के बारे में मार्क जकरबर्ग ने पूरी बेशर्मी से पर्दा डाला, वह है फेसबुक ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स यूनिट। फेसबुक के बिजनेस पेज पर दावा है कि यह पूरी तरह से न्यूट्रल है और उन सभी के साथ मिलकर काम करती है जो पॉवर यानी कि शक्ति यानी कि बेइंतिहा ताकत के तलबगार हैं। मगर सिर्फ तलबगार होने से काम कैसे चलेगा? पीछे अंबानी जी और अडानी जी भी तो चाहिए होते हैं। अमेरिका हुआ तो पीछे टॉमी हिलफिगर जी चाहिए होते हैं, या पाकिस्तान हुआ तो? इमरान खान ने किसके बल पर छक्का मारा है, आप बताइए, ये आपके सामान्य ज्ञान का बड़ा ही सामान्य सा टेस्ट है। बहरहाल, इस फेसबुक ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स टीम की हेड हैं केटी हरबाथ। केटी हरबाथ पहले अमेरिकी रिपब्लिक पार्टी की डिजिटल रणनीति बनाती थीं। कभी न्यूयॉर्क के मेयर रहे और अब ट्रंप के खासमखास बने रूडी जुलियानी के लिए इन्होंने सन 2008 में प्रेसीडेंसियल कैंपेन चलाई थी। सन 2014 में मार्क जकरबर्ग ने इन्हें अपने यहां नौकरी पर रख लिया और फेसबुक ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स टीम का चीफ बना दिया। तब से केटी हरबाथ अपनी टीम के चुनिंदा लोगों के साथ दुनिया भर के नेताओं से मिलकर शातिर गठजोड़ बनाने में लगी हैं। ऊपरी तौर पर उनका दावा है कि वह अपने पॉलिटिकल क्लाइंट्स को कंपनी के पॉवरफुल डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करना सिखाती हैं।

केटी हरबाथ के कनेक्शन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, न्याय और सूचना मंत्री रविशंकर प्रसाद से तो हैं ही, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के चीफ सहित वहां के और दूसरे मंत्रालयों के छह हजार दूसरे अधिकारियों से भी हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में, चाहे वह भारत हो या ब्राजील, जर्मनी हो या ब्रिटेन, केटी हरबाथ जैसे ही किसी नेता के साथ चुनावी कॉन्ट्रैक्ट साइन करती हैं, उनकी टीम के लोग उस नेता के साथ उसके कैंपेन वर्कर्स की तरह जुड़ जाते हैं। वे उस नेता के लिए हर तरह का कानूनी और गैरकानूनी काम करते हैं। ज्यादातर तो वे गैरकानूनी काम ही करते हैं जिसपर पर्दा नेता के चुनाव जीतने के बाद उसके देश के सरकारी अधिकारी ही डाल देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जैसे ही फेसबुक समर्थित नेता चुनाव जीतता है, केटी हरबाथ की टीम तुरंत उसके पास पहुंचकर उसके सरकारी कर्मचारियों को हर तरह की तकनीकी मदद और ट्रेनिंग देना शुरू कर देती है। जैसे कि जब नेता जी मन की बात करें तो कर्मचारियों को क्या करना है। जैसे कि जब नेता जी मन की बात कहें तो कर्मचारियों या अधिकारियों को क्या कहना है। और जैसे कि जब नेता जी के मन की बात का झूठ पकड़ा जाए तो अधिकारियों को फटाफट लीपापोती कैसे करनी है।

अमेरिका के चुनाव में रूसी राष्ट्रपति पुतिन और कैंब्रिज एनालिटिका के साथ गैंग बनाकर साजिश करने के आरोप में जब फेसबुक पकड़ा गया तो अमेरिकी संसद ने मार्क से पूछा कि बताओ भैया, जब अमेरिका में चुनाव हो रहा था तो तुम्हारे खाते में रूस से इतना ढेर सारा पैसा कहां से आया? आपको बता दें कि अमेरिकी चुनाव के वक्त रूसी विज्ञापनों से फेसबुक की इनकम में दो चार दस या बीस नहीं, सीधे सेवेंटी नाइन पर्सेंट का इजाफा हुआ था और इस इजाफे की एकमात्र वजह रूस से मिलने वाले विज्ञापन थे। यह विज्ञापन अमेरिकी नामों से चलाए जा रहे थे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने ऐसे दर्जनों फर्जी विज्ञापन पकड़े हैं जो ट्रंप को जिताने से लेकर जनता को भरमाने का काम पूरे धड़ल्ले से कर रहे थे। मार्क जकरबर्ग ने अभी इन विज्ञापनों से मिलने वाले पैसे का न तो हिसाब दिया है और न ही अमेरिकी संसद के इस सवाल का जवाब दिया है कि इतना ढेर सारा पैसा उनकी जेब में आखिर आया कहां से? उल्टे वह तो इस कोशिश में ही लगे रहे कि कैसे भी करके इस मामले पर पर्दा डाल दिया जाए। हमारे न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद फेसबुक को बड़ी मीठी मीठी धमकियां देते हैं, पर क्या कभी किसी ने सुना कि सन 2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने फेसबुक को कितना पैसा दिया? कभी मार्क जकरबर्ग का कान पकड़कर कोर्ट के कटघरे में खड़ा करके किसी ने उस तरह से पूछने की हिम्मत की जैसे अमेरिकी संसद ने इस धोखेबाज को इन दिनों घुटने पर बैठा रखा है? वैसे अपने लालाजी ऐसी हिम्मत करेंगे ही क्यों जब केटी हरबाथ जब चाहें, उनके बगल आ बैठती हैं

और उन्हें 2019 के चुनावों में जीतने का सब्जबाग दिखाने लगती हैं। इसी साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के हर सांसद से कहा है कि हर एक सांसद के फेसबुक पेज को कम से कम तीन लाख जेनुइन लाइक्स करने वाले होने चाहिए वरना टिकट मिलना मुश्किल है। यह बयान भले ही हमारे मोदी जी के मुखारबिंद से निकला है, लेकिन सप्लाई फेसबुक की ओर से ही हुआ है। फेसबुक का पेज लाइक रेट पर लाइक अस्सी पैसे से ढाई रुपये के बीच बैठता है। सन 2014 के इलेक्शन में बीजेपी के 355 उम्मीदवार सांसद बने थे। मोदी का यह आदेश चुनाव के चार साल बाद का है। चुनाव के बाद रकम कम लगती है, और चार साल बाद तो और भी कम रकम लगती है,  इसलिए आप अंदाजा लगा सकते हैं कि चुनाव के वक्त बीजेपी ने फेसबुक को कितने पैसे दिए होंगे। अंदाजा ही लगाना पड़ेगा क्योंकि आप चाहे जितने घोड़े दौड़ा लें, बीजेपी आपको चुनावी खर्च का असल ब्योरा नहीं देगी। और फिर ये अमेरिका भी नहीं कि वहां की तरह यहां भी जो चाहे, सबूतों के साथ राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री, उसे कटघरे में लाकर खड़ा कर दे। जस्टिस बृज गोपाल लोया की हत्या के मामले में हम सबने देखा कि कैसे सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक एक गुजराती तड़ीपार को बचाने के लिए खड़ा हो गया था। अपने देश में हमारी औकात इतनी भी नहीं है कि हम अपने एक जज की हत्या की सिर्फ जांच करा सकें, उसके हत्यारों को सजा दिलाना तो बहुत दूर की बात है।

कभी फेसबुक की इसी फेसबुक ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स टीम में काम करने वाली एलिजाबेथ लिंडर बताती हैं कि किसी भी राजनीतिक कैंपेन से जुड़ना कम से कम फेसबुक का काम तो नहीं ही है। एलिजाबेथ ने सन 2016 में फेसबुक की इसी यूनिट के साथ यूरोप, मिडल ईस्ट और अफ्रीका में काम किया है। पहले पहल तो एलिजाबेथ अपने काम को लेकर बहुत एक्साइटेड थीं, लेकिन जब उन्होंने इस टीम की गैरकानूनी और लोकतंत्र को गहरी चोट पहुंचाने वाली हरकतों को अपनी आंख के सामने होते देखा तो उन्होंने वहां से नौकरी छोड़ दी। अमेरिका में तो अब सब जान गए हैं कि फेसबुक की इस अवैध टीम ने किस तरह से डॉनल्ड ट्रंप को चुनाव जीतने में मदद की। वैसे इस टीम ने हिलेरी क्लिंटन को भी ऑफर दिया था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया हाउसेस में से एक ब्लूमबर्ग बताता है कि इसी टीम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फेसबुक पर स्टैब्लिश किया। इसी यूनिट ने नरेंद्र मोदी के फेसबुक पेज में इतने फॉलोवर्स जोड़ दिए, जितने कि दुनिया के किसी भी नेता के पास नहीं हैं। यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पास भी नहीं हैं। यह इस यूनिट का ही काम है कि जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पेज को लाइक नहीं भी किया, उसकी आईडी से चुपके से इस पेज को लाइक करा दिया गया। ऐसे ही फिलीपींस के हत्यारे तानाशाह रोड्रिगो दुत्रेते के लिए भी इसी यूनिट ने काम किया। जर्मनी में इस यूनिट ने अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी पार्टी की भरपूर मदद की और इसे वहां से पहला चुनाव बंडेस्टाग से जितवाया। यह वही पार्टी है जो जर्मनी में शरणार्थियों के खिलाफ क्रिमिनल कैंपेनिंग करती रही है।

वैसे फेसबुक का कहना है कि वह हर तरह से सभी लोगों के लिए खुला प्लेटफॉर्म है और जो चाहे इसका यूज कर सकता है। फेसबुक तो बस उसे पैसे देने वालों को इतना बताता है कि उसकी तकनीक का प्रयोग कैसे करना है, न कि वह ये बताता है कि फेसबुक पर आकर कहना क्या है। इस मामले में हमने जब फेसबुक की ग्लोबल गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स यूनिट की हेड केटी हरबाथ को ईमेल लिखकर पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें गर्व है कि वह दुनिया के ऐसे हजारों नेताओं के साथ काम करती हैं जो चुनाव जीत चुके हैं और उनके सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को ट्रेनिंग देती हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी अब इस काम में आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग कर रही है। बहाना बनाया कि कंपनी हेट स्पीच और धमकियों को रोक रही है। बीजेपी का पैसा खाकर केटी की कंपनी यानी कि फेसबुक की सारी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस डकार लेकर सो जाती है और हमारे यहां कोई शंभू रैगर हिंदुत्व के नाम पर कुल्हाड़ी से बेगुनाह इंसान को काटते हुए बेरोकटोक फेसबुक लाइव करता है तो सिर्फ इसलिए कि कहीं न कहीं से उसे भी इसी फेसबुक की ऑफिशियल ट्रॉल आर्मी का समर्थन मिला हुआ है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की आईटी सेल उस वीडियो को हाथोंहाथ शेयर करती है और उसपर भी कहीं कोई रोक नहीं लगती तो सिर्फ और सिर्फ केटी की टीम की वजह से। आप अभी चेक करें तो अभी भी फेसबुक पर शंभु रैगर की यह हैवानियत आपको देखने को मिल जाएगी। केटी ने ईमेल के जवाब में यह भी कहा कि उनकी कंपनी अभी इस गठजोड़ को और मजबूत करने में लगी हुई है। यानी आइंदा दिनों में हमें हिंदुत्व के नाम पर होने वाली कई और हत्याओं के फेसबुक लाइव देखने के लिए खुद को तैयार कर लेना चाहिए।

to be continued...

Sunday, March 25, 2018

हमारी जानकारी अमरीकियों को बेच रहे पीएम नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही भले प्रधानमंत्री न हों, मगर व्यापारी बड़े भले हैं। उज्जवल धवल दाढ़ी के पीछे जतन से छुपाकर रखे चेहरे में दुनिया भर की भलाई समाई हुई है। यह उनकी भलाई ही तो है कि वह अपनी वेबसाइट के जरिए हम भारतीयों का डाटा लेते हैं और दुनिया में सबसे भले कहे जाने वाले अमरीकियों को बेच देते हैं। आप पूछ सकते हैं कि बेचना तो व्यापारी का मूल कर्म है, इसमें भला क्या खास बात? जवाब है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भलाई करने की पुरानी गुजराती आदत। साहेब हमारा डाटा अमरीकियों को बेचते भी हैं और बदले में उन्हें पैसा भी देते हैं।

चार दिन पहले की बात है। फ्रांस के अपने दोस्त एलियट एल्डरसन ने बताया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो काम कर दिखाया है, पिछले सत्तर सालों में कोई प्रधानमंत्री नहीं कर पाया। बल्कि पिछले सत्तर सालों में वह काम दुनिया का कोई प्रधानमंत्री नहीं कर पाया, जो काम अकेले इस महामानव ने कर दिखाया है। सत्तर सालों में पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अपनी वेबसाइट- narendramodi.in और नमो एप्प बनाया। आप पूछ सकते हैं कि इसमें ऐसा कौन सा महान काम कर दिया? वेबसाइट या एप्प बना लेना कौन सा महान काम है? जवाब है कि वेबसाइट और एप्प बना लेना महान काम नहीं, लेकिन इसके जरिए हम भारत के नागरिकों की वह सारी जानकारी अमेरिका के in.wzrkt.com को धन देकर बेचना महान काम है। महान लोग हैं, महान-महान करते हैं।

अब आप ये भी पूछ सकते हैं कि ऐसे कैसे दे दी हमारी जानकारी? वैसे इस सवाल के जवाब में मैं भी सवाल पूछ सकता हूं कि ऐसे कैसे दे दिया वोट? मगर मैं उस भक्त संप्रदाय से नहीं हूं जिसके भगवाधारी आईटी सेल में उगते हैं, इसलिए नहीं पूछूंगा। बस हिंदी में बताउंगा कि कैसे दे दी जानकारी। ये कोई बड़ी लंबी चौड़ी बात नहीं, बस इतनी ही है कि जब आप narendramodi.in पर अपने कंप्यूटर या मोबाइल से या नमो एप्प पर अपने कंप्यूटर या मोबाइल से जाते हैं तो यह आपसे कुछ डाटा मांगता है। फ्रांसीसी सुरक्षा शोधकर्ता एलियट एल्डरसन बताते हैं कि यह डाटा भरकर सबमिट करते ही यह सीधे अमेरिका स्थित in.wzrkt.com के सरवर में पहुंच जाता है।

एक चीज और। 23 मार्च 2018 तक narendramodi.in की प्राइवेसी पॉलिसी में साफ लिखा था कि Your personal information and contact details shall remain confidential and shall not be used for any purpose other than our communication with you. The information shall not be provided to third parties in any manner whatsoever without your consent. If you have any questions or suggestions regarding our privacy policy, please contact us at admin@narendramodi.in
यानी- हमारी व्यक्तिगत सूचना और कॉन्टैक्ट डीटेल्स गोपनीय रखी जाएंगी और सिवाय हमसे बातचीत के किसी और चीज के लिए प्रयोग नहीं की जाएंगी। बगैर हमारी इजाजत यह सूचना किसी तीसरे को किसी भी सूरत में नहीं दी जाएगी। प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर अगर हमारे पास कोई सवाल या सुझाव है तो साइट एडमिन से संपर्क करें।

अब जब लेन-देन, वायदा-व्यापार का मामला खुल गया है तो narendramodi.in पर पूरी बेशर्मी से लिख दिया गया है कि हमारा जो कुछ भी लिया है, उसे तीसरे को देंगे ही देंगे। इसलिए देंगे क्योंकि तीसरा वह डाटा लेकर हमें हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात बताता रहेगा। (यार कभी धन की भी बता दिया करो!)  यूटर्न लेने की आदी सरकार ने हमारे डाटा की गोपनीयता को जुमलेबाजी में उड़ा दिया है और उड़ाकर सीधे अमेरिका पहुंचा दिया है।

एक चीज और। in.wzrkt.com पर जाएंगे तो कुछ भी नहीं मिलने वाला। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही तरह वह अमेरिकी वहां से झोला उठाकर चल दिए हैं। फकीर हैं या नहीं, यह फकीर से ही पूछें। बहरहाल, राजनीति की दुनिया की तरह तकनीक की दुनिया से इतनी आसानी से कोई झोला उठाकर जा नहीं पाता। सुराग छोड़ ही जाता है। एल्डरसन भाई ने शर्लक होम्स की तरह उस सुराग का पीछा किया और खोजते-खोजते जा पहुंचे in.wzrkt.com की जड़ में। पता चला कि यह क्लेवर टैप नाम की अमेरकी कंपनी है, जो नेक्स्ट जेनरेशन एप्प
प्लेटफॉर्म तैयार करती है। बाजारू लोगों को यह डाटा बेचकर डेवलपर देकर वह कराती है, जो ब्रिटेन वाली कंपनी ट्रंप ताऊ को कराती थी। इस कंपनी के कर्ता-धर्ता सुनील थॉमस हैं। सुनील पहले नेटवर्क 18 में थे। वही, जो अंबानी का अखबार है, जिसमें अंबानी जी जो चाहते हैं, वही चलता है।

जय हो!!



चलते-चलते ये वीडियो भी देख ही लीजिए। बहुत समझ में तो नहीं आएगा, लेकिन इतना जरूर दिख जाएगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह लेन-देन कैसे कर रहे हैं-  

इस ट्रिक से टेस्ट करिए फेसबुक की ईमानदारी

फेसबुक कितना ईमानदार है, यह हम खुद टेस्ट कर सकते हैं और इसके लिए किसी का इंजीनियर होना जरूरी नहीं। फेसबुक की ईमानदारी चेक करने के लिए प्रोग्रामिंग लैंग्वेज जानने या कोडिंग की भी जरूरत नहीं।
इंटरनेट की दुनिया ट्रिक्स पर चलती है और ट्रिक्स के आविष्कारक डेवलपर्स नहीं, बल्कि हम आप जैसे आम लोग ही होते हैं, जो इंजीनियरिंग तो नहीं जानते, पर अपना काम निकालना जानते हैं।

बड़ी देखने को क्लिक करें
फेसबुक की ईमानदारी चेक करने के लिए दिन में दो बार मार्क जकरबर्ग की या फेसबुक की फोटो के साथ हैशटैग- #banfacebook और #deletefacebook डालिए। महज चौबीस घंटे के अंदर आप पाएंगे कि फेसबुक ने आपकी रीच कम कर दी है या लिमिटेड कर दी है। यानी आपको फेसबुक पर पहले से कम लोग देख पा रहे हैं या सीमित संख्या में ही वही लोग आपको देख पा रहे हैं, जो रोजमर्रा के स्टेटस अपडेट्स में आपसे जुड़े रहते हैं। यही चीज आप फेसबुक के दूसरे प्रोडक्ट इंस्टाग्राम पर भी चेक कर सकते हैं। इंस्टाग्राम पर तो मैंने आज ही चेक किया है। और शुक्र है कि मैं अकेला नहीं हूं। अब तक सात लाख से भी अधिक लोग इंस्टाग्राम पर फेसबुक का विरोध कर चुके हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसके चलते वह सभी एकाउंट अंडरप्ले कर दिए गए हैं, जिन्होंने फेसबुक का उसके किसी भी प्रोडक्ट पर विरोध किया है। 

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फेसबुक ने अपने खिलाफ प्रयोग होने वाले लगभग हर भाषा के शब्दों पर प्रोग्रामिंग की हुई है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप फेसबुक का विरोध मैथिली में करते हैं या जुलू में। फेसबुक के स्पाइडर्स उस विरोध को शुरू होते ही पकड़ लेते हैं। अगर वह विरोध आगे बढ़ता है तो वह उसे दबाने में जुट जाते हैं। कैसे दबाते हैं, यह पहले ही बता चुका हूं। अब टाइम है टेस्ट करने का। चाहें तो चेक करें, न चाहें तो वैसे ही उसी भाड़ में बैठकर फुंकते रहें, जिसमें फुंकते रहने को फेसबुक ने सारे यूजर्स को मजबूर कर दिया है। 


कॉरपोरेट से लेकर आतंकवादियों को डाटा बेच चुका है फेसबुक

फेसबुक पर डाटा ब्रीच का इतिहास क्या है? 
18 अक्टूबर 2010 में वॉल स्ट्रीट जरनल ने खुलासा किया था कि फेसबुक पर लाखों लोगों की प्राइवेसी के साथ सौदा हुआ है। अपने अध्ययन में अखबार ने पाया कि फेसबुक पर चलने वाले दस सबसे पापुलर एप्स और गेम्स, जिसमें फार्मविले, माफिया वार्स और टेक्सास होल्डे'म शामिल थे, इन सबने मिलकर उन सभी की आइडेंटिटी चुराकर कॉरपोरेट को बेची है, जो इन्हें यूज करते हैं या कभी इन एप्स या गेम्स को यूज किया है। फेसबुक की पॉलिसी में दिया है कि कोई भी उसके यूजर की सूचना किसी को भी नहीं बेच सकता। फिर भी सूचनाएं लगातार चोरी हो रही थीं (ऐसा फेसबुक का मानना है)। असल में सूचनाएं चोरी नहीं हो रही थीं, बल्कि पर्दे की पीछे समझौता करके बाकायदा बेची जा रही थीं (ऐसा दुनिया के अधिकतर डेवलपर्स का और मेरा भी मानना है)। जिस अल्गोरिदम का प्रयोग फेसबुक करता है, उसी का प्रयोग करके कई डेवलपर्स ने रेडिट डॉट कॉम पर पर्दे के पीछे की सारी बात डाली हुई है।  जो समझना चाहें, रेडिट पर जाकर समझ सकते हैं। वह सब कोड्स में हैं।

इसी तरह से सन 2012 में फेसबुक के मुताबिक उसे बग लग गए। मतलब कीड़े लग गए। फेसबुक के ही मुताबिक उसे इसका पता सन 2013 में जाकर लगा और 24 घंटे में उसके इंजीनियर्स ने कीड़े का इलाज भी बांध दिया। लेकिन तब तक फेसबुक पर उस वक्त तक मौजूद 1.1 बिलियन यूजर्स का कॉन्टैक्ट डाटा उड़ चुका था, या यूं कहें कि खुले बाजार में बाकायदा रेहड़ी लगाकर बेचा जा रहा था। फेसबुक खुद खुले बाजार का खिलाड़ी है और उसी बाजार में घूमता रहता है। अपनी वेबसाइट फेसबुक ने पीएचपी पर बनाई है, जो कि एक ओपन सोर्स प्रोग्रामिंग भाषा है और दुनिया भर के सभी डेवलपर्स अपने-अपने हिसाब से इसे डेवलप करते रहते हैं। दुनिया का एक भी डेवलपर गंगा में गले तक खड़ा होकर भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि इस बदमाशी में फेसबुक ने हिस्सा नहीं लिया।

हमारी प्राइवेसी में सेंध लगाने की तीसरी घटना अगस्त 2015 की गर्मियों में तब पता चली, जब हम लोगों के लाखों फोन नंबर खुले बाजार में बिकने लगे। यह वही वक्त है, जिसके आसपास फेसबुक ने सभी यूजर्स से उनका फोन नंबर जबरदस्ती भरवाया था। कुछ यूजर्स ने फोन नंबर तो दिया, मगर उसे अपनी प्रोफाइल में शो नहीं किया तो कुछ ने शो किया। इन सभी के फोन नंबर फेसबुक ने माफी मांग-मांगकर खुले बाजार में बिकवाया। लोगों के डाटा के साथ फेसबुक ने जो चौथी बदमाशी की, उसमें नंबर्स तो कम हैं, लेकिन वह सबसे ज्यादा खतरनाक थी।

जून 2016 में पता चला कि जकरबर्ग ने तकरीबन एक हजार ऐसे लोगों के पर्सनल डाटा बाजार में उठाकर फेंक दिए, जो आतंकवाद के खिलाफ किसी न किसी रूप में काम करते थे। फेसबुक की पांचवीं बदमाशी, जो अमेरिका के चुनाव में हुई, और मार्च 2018 में सामने आई, हम सब देख ही रहे हैं। वैसे फेसबुक और इसी तरह की दूसरी कंपनिया डाटा ब्रीच को थोड़ा सा फैशनेबल शब्द में बोलती आई हैं- माने- डाटा हारवेस्टिंग। फिर भी मैं इसे डाटा ब्रीच ही कहता रहूंगा क्योंकि जो डाटा आप किसी की सहमति से हासिल नहीं करते, या उसे धोखे में रखकर लेते हैं, या जिसका डाटा ले रहे हैं, उसे ही पता नहीं तो वह डाटा ब्रीच ही कहलाएगा।

कानूनी पंडित यह कह सकते हैं कि फेसबुक ने डाटा की नोंच-घसीट के लिए अपनी पॉलिसी में पहले ही लिख रखा है, लेकिन यह भी एक मजबूत तथ्य है कि फेसबुक की पॉलिसी से आम यूजर को कोई मतलब नहीं और न ही वह उसे पढ़ता है। इसलिए, ऑनलाइन कंपनियां, चाहे वह फेसबुक हो या दैनिक जागरण, अपनी कुकीज और प्राइवेसी पॉलिसी के जरिए जो कुछ भी बताती हैं या मनवाती हैं, वह असल में महज एक धोखा है और ऐसा धोखा है जो कि धोखा खाने वाले को जल्द पता ही नहीं चलता।

अगली किस्त में पढ़ें दुनिया में डाटा ब्रीच का इतिहास और कहां कैसे होता है हमारे डाटा का उपयोग

पिछली किस्त यहां पढ़ें- जितना सोच सकते हैं, उससे अरबों गुना बड़ा है डाटा ब्रीच

Friday, March 23, 2018

जितना सोच सकते हैं, उससे अरबों गुना बड़ा है डाटा ब्रीच

डाटा क्या है और कहां से आ रहा है? 
इंटरनेट के आने के बाद से इंटरनेट पर दुनिया भर ने जो कुछ भी किया है और जो कुछ नहीं किया है, वह सब डाटा है। आज दुनिया भर की 7 अरब 63 करोड़ के आसपास की आबादी में  4 अरब 15 करोड़ से कुछ ज्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं। जरूरी नहीं कि सभी वेबसाइट ही खोलते हों। इंटरनेट यूज करने के भी अलग-अलग तरीके होते हैं, जैसे- चैट, वीडियो चैट या ऑडियो कॉल वगैरह। सरसरी तौर पर हम मान सकते हैं कि डाटा प्रोडक्शन यही कर रहे हैं। लेकिन अगर इंटरनेट से जुड़ी मशीनों की संख्या देखी जाए, तो मामला थोड़ा अलग दिखता है। हर मशीन का आईपी एड्रेस होता है। दुनिया में दो तरह के आई पी एड्रेस होते हैं- IPv4 & IPv6। पहले वाले में सात साल पहले तक 4,294,967,296 आईपी एड्रेस रजिस्टर हो चुके थे और दूसरे वाले में- 340,282,366,920,938,463,463,374,607,431,768,211,456 । इन एड्रेस पर जिस किसी भी तरह की हरकत हुई है- वह डाटा है और यह उन्हीं मशीनों से आया है और आता जा रहा है।

फेसबुक डाटा ब्रीच क्या है? 
फेसबुक जैसी साइट्स भी इन्हीं आईपी एड्रेस से मिलने वाली हर तरह की जानकारी खुद रखती हैं। फेसबुक के टर्म एंड कंडीशंस में लिखा है कि हम उसकी साइट पर जो कुछ भी कर रहे हैं, उसका अधिकारी फेसबुक है- भले ही वह किसी भी आईपी एड्रेस से हो। पहला डाटा ब्रीच यहीं पर है। इंटरनेट पर प्राइवेसी की वकालत करने वालों का मानना है कि जो चीजें व्यक्तिगत हैं, उनका डाटा कलेक्शन न किया जाए। खुद फेसबुक भी न करे। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए फेसबुक हमारे डाटा से अपनी खेती करता रहा है और करता रहेगा। फेसबुक से जुड़ा डाटा कोई भी कलेक्ट कर सकता है। इसके लिए फेसबुक ने एपीआई- एप्लीकेशन प्रोग्राम इंटरफेस दिया हुआ है। इसकी पहचान बड़ी आसान है। किसी भी वेबसाइट या एप्प पर फेसबुक का जो नीला निशान दिखता है- ये वही है। दुनिया में हर तरह की कंपनियां और राजनीतिक पार्टियां इस तरह का डाटा ब्रीच करती रही हैं और कर रही हैं। हाल ही में ब्रिटेन की कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका ने भी इसी तरह का एक मास ब्रीच करके लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और संस्थाओं को गहरी चोट पहुंचाई है, इसलिए यह डाटा ब्रीच चर्चा में आया है, लेकिन यह लगातार होने वाली प्रक्रिया है।

डाटा को थोड़ा और समझाइए। इसके स्वरूप के बारे में बताइए। 
सरसरी तौर पर देखें तो टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो और फोटो के सभी तरह के सभी तरह के स्वरूप डाटा हैं। सोशल मीडिया ने इनमें इमोशन यानी भावनाएं जोड़ी हैं। इमोजी का प्रयोग इंटरनेट पर लंबे समय से होता आ रहा है। यह इमोजी हमारी भावनाएं हैं। सोशल मीडिया से जुड़ी हर कंपनी हमसे हमारी भावनाएं किसी न किसी माध्यम से लेती आ रही है। जैसे फेसबुक कई तरह से हमारी भावनाएं रिकॉर्ड करता है, भले हम बोलें या न बोलें। हमारी रिकॉर्डिंग का आलम यह है कि हम भले ही किसी की पोस्ट लाइक न करें, अगर वहां रुकते हैं और अगर वहां नहीं रुकते हैं- यह भी रिकॉर्ड होता है और इसी आधार पर फेसबुक हमें भविष्य में पोस्ट दिखाता है। यही चीजें सोशल मीडिया से जुड़ी दूसरी सुविधाओं- ट्विटर, गूगल प्लस, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप्प आदि सभी पर रिकॉर्ड होती रहती हैं, जिनसे यह कंपनियां अपने भविष्य की योजनाएं तो बनाती ही हैं, इनका लगभग सारा धंधा इसी डाटा पर टिका होता है।

यानी डाटा ब्रीच बहुत ही बड़ा है? 
हां। लगभग सभी कंपनियां डाटा ब्रीच करती हैं। सोशल मीडिया सर्विस देने वाली कंपनियां तो डाटा ब्रीच करती ही हैं, ऑनलाइन बाजार चलाने वाली कंपनियां, गूगल, दुनिया की सारी मीडिया कंपनियां यह डाटा ब्रीच करती हैं। हमारी भावनाएं उनके लिए महज एक डाटा है जिसका हिसाब लगाकर यह हमसे खेलती हैं। भले वह सोशल मीडिया पर हमारी राय प्रभावित करके हमारी दुनिया को डिस्टर्ब करने का काम हो या फिर घड़ी बेचने का या फिर खबरें बेचने का। सब का सब पूरी तरह से हमारी उन्हीं हरकतों पर निर्भर है, जो हम इंटरनेट पर करते हैं।  अभी हाल ही में ट्विटर ऑडिट रिपोर्ट की ओर से जो आंकड़े जारी किए गए थे, वह भी एक तरह का डाटा ब्रीच ही था। इससे पहले लिंक्डइन वेबसाइट के जरिए भारत के विभिन्न बैंकों के डेबिट कार्ड हैक हो चुके हैं- यह भी डाटा ब्रीच का ही एक उदाहरण है। लेकिन डाटा ब्रीच लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। अचानक सामने आने वाले कुछ लाख या कुछ करोड़ नंबर इसका एक छोटा सा उदाहरण हैं। अगर दुनिया भर के डाटा ब्रीच को एक साथ गिना जाए तो दुनिया में जितने आईपी एड्रेस हैं, यानी जितनी मशीनें हैं, वह इंटरनेट से कनेक्ट होते ही डाटा ब्रीच का शिकार होने लगती हैं।

अभी यह जारी है। अगले एपीसोड में फेसबुक डाटा ब्रीच का इतिहास, दुनिया में डाटा ब्रीच का संक्षिप्त इतिहास और कहां कैसे यूज होता है हमारा डाटा। 



Thursday, March 22, 2018

चाय की तलब हो तो पत्ती फांकिये: मार्क जकरबर्ग

डेटा ब्रीच से बचने का फेसबुक ने जो उपाय निकाला है, वह है कि हम अपनी सेटिंग्स में जाकर थर्ड पार्टी साइट डिसेबल कर दें। 
इसका मतलब है कि हम फेसबुक से बाहर की चीजों न देखें, न पढ़ें न किसी से बताएं या किसी को दिखाएं। अगर किसी एप पर हमें कोई खबर पसंद आ रही है और हम चाहते हैं कि दूसरे भी पढ़ें तो फेसबुक नहीं चाहता। इसलिए भी क्योंकि वह यह भी नहीं चाहता कि हम उसके अलावा बाकी की दुनिया से किसी तरह का कोई संवाद रखें। ऐसा तब भी किया गया था, जब फेक न्यूज का मामला प्रकाश में आया था। फेक न्यूज या अवांछित गतिविधि का एकमात्र मान्य इलाज फिल्टर होता है। हर बड़ी वेबसाइट के पास यह फिल्टर टीम होती है जो डाटा इंजीनियर्स के साथ मिलकर काम करती है। फिल्टर यानी छन्नी में अक्सर गड़बड़ चीजें पकड़ में आ जाती हैं। मगर फेसबुक छन्नी नहीं, सीधे ताला लगाने की बात कर रहा है। यानी हर तरह की थर्ड पार्टी से किनारा। बाकी लोग अब बिजनेस कैसे करेंगे, इसका कोई जवाब फेसबुक के पास नहीं है। अभी जवाब सोचा नहीं गया है, लेकिन महान लोगों की बड़ी बाते हैं, जिनके हो जाने के बाद जवाब तो बना ही लिए जाते हैं।

लेकिन मार्क भैया, एक बात तो बताओ, जब यह थर्ड पार्टी वेबसाइट्स या एप्प हमारी प्रोफाइल एक्सेस कर रहे थे, तब तुम क्या कर रहे थे? तुम्हें याद हो या न याद हो, पर मैं याद दिला दूं कि तब तुम चीन में चड्ढी पहनकर दौड़ रहे थे, मगर चीन तब भी तुम्हारी इसी बेईमानी पर नजर रखते हुए तुम्हें सिर्फ दौड़ा ही रहा था। भूल गए चीन ने कैसे भगाया? तो जब ये थर्ड पार्टी टूल्स हमारी प्रोफाइल्स एक्सेस कर रहे थे, हमारे पर तो इसकी नोटिफिकेशन आती थी, ऐसा कैसा तुम्हारा सिस्टम है कि तुम्हारे पास इसकी नोटिफकेशन ही नहीं आती थी? भावना एंड किंबा प्रकाशन कानपुर क्या अब सोचेंगी कि वह हमेशा नंबर वन दोस्त कैसे बनी रहती थीं? क्योंकि हमारे चैटबॉक्स के अंदर से लेकर बाहर तक, सबकुछ एनालाइज हो रहा था। अब जकरबर्ग कह रहे हैं कि पता ही नहीं चला। मतलब यार दुनिया में बस एक तुम्हीं समझदार हो?

एकबारगी फेसबुक यह तर्क दे सकता है कि जो कुछ भी हो, सिर्फ उसी की वेबसाइट पर हो, या यूजर जो कुछ भी करे, उसी की वेबसाइट पर करे। वेबसाइट के बाहर की चीजें फेसबुक में न आने पाएं, भले ही फेसबुक की चीजें उससे बाहर चली जाएं, जाती ही हैं। हालांकि, 70 फीसद चीजें जो फेसबुक से बाहर जाती हैं, वह फेसबुक के ही दूसरे प्रोडक्ट्स- इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप्प पर जाती हैं। गूगल और ट्विटर फेसबुक को सपोर्ट नहीं करते इसलिए उसकी चीजें आमतौर पर वह अपने हैंडल पर नहीं दिखाने देते। लेकिन भैया, हम बाहर से चाय की पत्ती लेकर आते हैं और जब चाय बनाते हैं तो उसमें अदरक इलायची दूध चीनी मिलाते हैं, जिन्हें चाय बनाने वाली कंपनी नहीं बनाती। मगर मार्क खुद को अधिक महीन दिमाग का समझते हैं सो इस मुसीबत से निपटने का उन्होंने जो तोड़ निकाला है- वह ये कि चाय की तलब हो तो सिर्फ पत्ती फांकिये। और ऐसा सिर्फ फेसबुक ही नहीं, दुनिया भर की वह सभी वेबसाइट्स करती हैं जिसमें लाला जी का पैसा लगा हुआ है। इसीलिए इंटरनेट में तीसरी-चौथी दुनिया तो बनी ही, भाई लोग तो मारियाना ट्रेंच तक का गोता लगा आए हैं।

एकबारगी यह बात मान भी ली जाए, और फेसबुक का कनेक्शन इससे बाहर की दुनिया से तोड़ भी दिया जाए, यानी थर्ड पार्टी ऑथेंटिकेशन डिसेबल कर भी दिया जाए, किसी के पास इसका कोई जवाब है कि फिर फेसबुक खुद हमारा डाटा नहीं चुराएगा? अरे भैया, फिर भी फेसबुक हमारा डाटा खूब चुराएगा। क्योंकि हमारे डाटा की चोरी करके वह अपने विज्ञापनदाताओं को वह डाटा बेचता है। जैसे मैं कई फेसबुक पेज चलाता हूं और फेसबुक का रेग्युलर विज्ञापनदाता हूं। इस ऐवज में फेसबुक मुझे लोगों की उम्र, लिंग, पसंद-नापसंद, जियोग्राफी, टाइम, एवरेज टाइम सहित इतने डाटा बेचता है, आम यूजर उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। मसलन, मुझे पता है कि पिछले 28 दिनों में मैं अमेरिका में कितने घंटे देखा गया हूं, किस-किस ने देखा है और जिसने भी देखा है, उसकी रुचियां-अरुचियां क्या हैं। एक चीज और है, जो मुझे नहीं पता पर फेसबुक को पता है। पर आने वाले दिनों में मुझे भी पता होगी क्योंकि पूंजीवाद बेचने की कोई चीज जेब में बचाकर कभी नहीं रखता। उसे तो बस मौका चाहिए जो अभी आया नहीं है। पर आएगा जरूर।

फेसबुक प्रोफाइल पर हम जो अपनी तस्वीर या सेल्फी अपलोड करते हैं, या फिर जो अपने बारे में डीटेल्स डालते हैं, मेरी नजर में वह बेहद छोटी डाटा चोरी है। सौ में से आधा फीसद या उससे भी कम। दुनिया की सबसे बड़ी डाटा चोरी हमारे इमोशंस हैं। फेसबुक हर पोस्ट पर छह तरह का इमोशन देता है, क्रमश: न्यूट्रल लाइक, रेड हार्ट इमोशन, हाहा इमोशन, वाऊ इमोशन, सैड इमोशन और क्रोध इमोशन। इन इमोशंस की डाटा माइनिंग से निकलने वाले सबसे प्रचलित प्रोडक्ट्स हैं- एआई प्रोडक्ट्स- यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस प्रोडक्ट्स। हम क्या देखते हैं, क्या देखना चाहते हैं, क्या नहीं देखना चाहते, क्या हमेशा ही देखते रहना चाहते हैं, हमें कब गुस्सा आता है और किसपर प्यार आता है, सबकुछ फेसबुक की मशीन में रिकॉर्ड होता रहता है। इससे आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस डेवलप की जाती है और इसी बेस पर मशीनों को थोड़ा और इंसानों जैसा बनाने की ओर विज्ञान के कदम बढ़ते हैं। यहां तक तो बात मेरी समझ में आती है और न-न करते हुए भी मुझे पूरी दुनिया को लैब बनाकर रख देने के इस अमानवीय प्रयोग से सहमत होना ही पड़ता है।

लेकिन अगर यही प्रयोग इंसानों को थोड़ा और बेईमान, थोड़ा और धोखेबाज या थोड़ा और लालची बनाकर उस सिस्टम में सेंध लगाने के लिए किया जाए, जिसे हम इंसानों ने सैकड़ों सालों में बनाया और पाया है और जिसे लगातार बनाने और पाने के लिए हम सभी लड़ रहे हैं तो? फेसबुक के दिए हुए छह तरह के इमोशन हमसे निकलकर किसी न किसी तरह के कंटेंट (टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो, फोटो) से जाकर चिपकते हैं। इंटरनेट पर मौजूद हर तरह के कंटेंट की हर तरह से डाटा माइनिंग हो सकती है। यहां तक कि इसकी भी कि आपने साल में कितने दिन मोदी जी से प्यार किया और कितने दिन भाभी जी से, इसकी भी। मैं अगर आपके घर आकर भाभी जी को बताऊं कि भैया तो आपसे ज्यादा प्यार मोदीजी से करते हैं, सोचिए फिर क्या होगा? पिछले दिनों इसी मुद्दे पर देश में कई तलाक भी हो चुके हैं। बहरहाल, कंटेंट पर इमोशंस के डेटा फ्लो के अध्ययन से हम भविष्य को बदल सकते हैं और बदल भी रहे हैं। लेकिन मैनमेड सिस्टम को बदलने का कोई तो रीजन होगा? कोई तो कारण होगा कि दुनिया ने अपने उगने के बाद से जो कुछ पाया है, उसे सांख्यिकी क्यों बदल दे?

अगले में गूगल बाबा की कारस्तानी। फेसबुक तो बच्चा है जी। 

Thursday, December 31, 2015

फेसबुक के फ्रॉड- 8

हम लोगों सहि‍त सरकार को भी उल्‍लू बनाने में लगा फेसबुक जि‍स बेशर्मी से ये कह रहा है कि 32 लाख लोगों ने ट्राइ को फ्री बेसि‍क्‍स के लि‍ए मैसेज भेजा है, उसमें भी झोल है। स्‍कॉर्ल ने इस मामले में दाहि‍ने बाएं देखा तो ये आंकड़ा पूरी तरह से भ्रामक है। अपने यहां कुल 30 करोड़ लोग इंटरनेट यूज करते हैं और इसमें से कुल साढ़े बारह करोड़ लोग ही फेसबुक यूज करते हैं। साढ़े सत्रह करोड़ ऐसे हैं जो फेसबुक यूज नहीं करते हैं। ट्राइ को जि‍न 32 लाख लोगों से फेसबुक ने फ्रॉड करके मैसेज कराया है, वो इंटरनेट पर मौजूद आबादी का कुल 1.06 फीसद हैं। इंटरनेट पर मौजूद 98.4 फीसद लोग फेसबुक का समर्थन नहीं करते हैं। और तो और, खुद फेसबुक यूजर्स का 97.44 फीसद हि‍स्‍सा फेसबुक के फ्री बेसिक्‍स का समर्थन नहीं करता है और न ही इसने ट्राइ को इस समर्थन में कोई मैसेज भेजा है। ये साधारण गणि‍त है जो रूपेंद्र ने करके दि‍खा दी। फि‍र भी सीना इनका ठीक वैसे ही फूला है, जैसे 30 फीसद वोट पाने के बाद भक्‍तों का फूला था।

मैं बार बार फ्रॉड शब्‍द यूज करता हूं तो इसलि‍ए क्‍योंकि जो चार सौ बीसी हुई है, वो मुझे साफ साफ दि‍खाई दे रही है। इसे आसानी से ऐसे समझा जा सकता है। मैं प्रोफेशनली फेसबुक यूज करता हूं और कुछ पेज हैंडल करता हूं। जैसे फेसबुक ने ट्राइ वाली कैंपेन चलाई, मैं भी दि‍न में कई बार ये कैंपेन चलाता हूं। मेरी कैंपेन ऐसी नहीं होती कि कि‍सी के फेसबुक खोलते ही अचानक मेरी पोस्‍ट का पॉपअप आ जाए। वो नॉर्मली पोस्‍ट के साथ ही आती है जो मेरे पेजों पर की जाती है और इसी का प्रावधान है, पॉपअप का नहीं। फेसबुक ने अपनी कैंपेन के लि‍ए खुद अपने बनाए नि‍यम तोड़ दि‍ए। इतना ही नहीं, सारे फेसबुक यूजर्स की प्रोफाइल पर जो पॉपअप जबरदस्‍ती दि‍खाए गए, वो भ्रामक थे क्‍योंकि उसमें कहीं भी ये साफ नहीं लि‍खा था कि इंटरनेट पर सि‍वाय फेसबुक के और कुछ भी फ्री नहीं होगा। पहली बात तो ये कि इंटरनेट ही नहीं होगा, जो होगा वो फेसबुक ही होगा और फेसबुक के जो सौ दलाल हैं, वो होंगे। मतलब कि वि‍ज्ञापन के जो भी एथि‍क्‍स फेसबुक ने सबके लि‍ए बनाए थे, सबसे पहले उसने अपना वि‍ज्ञापन/धोखाधड़ी करने के लि‍ए तोड़े। अब बेशर्मी से इंटरनेट डॉट ओआरजी का वाइस प्रेसीडेंट कहता है कि हमारी साइट है, हम कुछ भी करें। अब इस बात पर तो कोई चार सौ बीसी का मुकदमा दर्ज कराओ भाई। सबकुछ फेसबुक की वि‍ज्ञापन पॉलि‍सी में लि‍खा हुआ है।

हम लोग, जो नेट न्‍यूट्रैलि‍टी के पैरोकार हैं, हमने अभी तक ट्राइ को 2 लाख ईमेल भेजी हैं जो साफ कहती हैं कि फेसबुक को ऐसी कोई पाइपलाइन नहीं दी जा सकती। फेसबुक डाटा प्रोवाइडर नहीं है। अगर फेसबुक डाटा प्रोवाइडर है तो सारी वेबसाइट्स डाटा प्रोवाइडर हैं। और अगर सारी वेबसाइट्स डाटा प्रोवाइडर हैं तो जि‍तनी भी मोबाइल कंपनि‍यां हैं, उन्‍होंने बोरे में भरकर सरसों का तेल बेचने का धंधा कर लि‍या है और भारत सरकार के कम्‍युनि‍केशन डि‍पार्टमेंट ने तेल की मंडी लगानी शुरू कर दी है। इंटरनेट फ्री करना है, नहीं करना है, कि‍तना फ्री करना है, कि‍तनी स्‍कीम लानी है, कि‍स हि‍साब से टैरि‍फ लगना है, ये काम है ट्राइ का न कि फेसबुक का। अब मैं पूरे यकीन से कहना चाहता हूं कि अमेरि‍का में पि‍छले दि‍नों भांग की बि‍क्री पर से जो रोक हटाई गई, उसका असर मार्क पर अच्‍छे से दि‍खाई दे रहा है।

(जारी...)

फेसबुक के फ्रॉड- 7

अपने यहां ब्‍लाक स्‍तर तक इंटरनेट की कनेक्‍टि‍वि‍टी, उससे मि‍लने वाली लगभग सारी जरूरी सुवि‍धाएं जैसे लेखपाल का हाल, कंपटीशन रि‍जल्‍ट्स, वोटर सर्विस, बीएलओ, ईआरओ, वि‍धायक नि‍धि का हाल चाल, मनरेगा, ग्रामीण आवास योजनाएं, उद्योग बंधु, नि‍वेश मि‍त्र, ब्‍लड डोनर लि‍स्‍ट, टेंडर वगैरह का हाल चाल एनआइसी पहले ही मुहैया करा रही है। क्‍या वजह है कि इसमें से एक भी प्‍वाइंट फेसबुक की फ्री बेसि‍क योजना में नहीं है। एम्‍स और देश के वि‍भि‍न्‍न मेडि‍कल कॉलेज पि‍छले पांच साल से आपस में कनेक्‍ट होने की सफल टेस्‍टिंग कर रहे हैं, इसमें भी फेसबुक अपने फ्री बेसि‍क्‍स से कोई डेवलपमेंट नहीं करना चाहता। बुजुर्गों की पेंशन और छात्रों को जो स्‍कॉलरशि‍प मि‍लनी होती है, एनआइसी पहले से ही सारी जानकारी दे रहा है, लेकि‍न ये भी इस फ्रॉडि‍ए फेसबुक के फ्री बेसि‍क्‍स में नहीं है।

फेसबुक को समझना होगा कि ये साउथ एशि‍या है। चीन जापान से लेकर थाईलैंड, म्‍यामांर और भारत तक में गति में सुगति कछुए की मानी गई है जो गंत्‍व्‍य तक पहुंचाने की गारंटी है। और हमारी जि‍तनी औकात है, हम उतना कर रहे हैं। कम से कम पि‍छले पांच सालों में गावों से आने वाली सैकड़ों हजारों खबरों में लगातार आती एक खबर है कि सरकार गांव गांव में इंटरनेट की बेसि‍क सुवि‍धा मुहैया कराने के लि‍ए ट्रि‍पल पी योजना चला रही है और ये कैफे खुल भी रहे हैं। न सिर्फ खुले हैं बल्‍कि लोगों को इंटरनेट की बेसि‍क सुवि‍धा, जो हमारी खेती कि‍सानी, बैंकिंग से जुड़ी है, मुहैया करा रहे हैं। देश बड़ा है, काम करने वाले तनि‍क स्‍लो हैं, लेकि‍न ऐसा तो बि‍लकुल नहीं है कि काम नहीं हुआ है। कि‍सी भी जि‍ले के डीएम से बात कर लीजि‍ए, वो चुटकि‍यों में बता देगा कि अपने जि‍ले में उसने कि‍तने गावों में कंप्‍यूटर वि‍द इंटरनेट वि‍द ट्रेंड परसन फि‍ट कर दि‍ए हैं। फि‍टनेस के इस जमीनी काम का फेसबुक कहीं जि‍क्र भी जरूरी नहीं समझता।

सवाल उठता है कि क्‍यों? फ्री बेसिक्‍स में फेसबुक का कहना है कि वो सारी कमाई वि‍ज्ञापन के जरि‍ए करेगा। वि‍ज्ञापन बाजार का सीधा सा ट्रेंड है कि उनने वहीं पहुंचना है जहां उनका ग्राहक है। इसके अलावा उन्‍हें उनसे बाल बराबर भी मतलब नहीं, जो उनका ग्राहक नहीं है। ये ऊपर इंटरनेट से जुड़ी जि‍तनी चीजें बताई हैं, इन्‍हें प्रयोग करने वाले आज के बाजार के ग्राहक नहीं है। इन सारी योजनाओं से जि‍नका काम पड़ता है, उनका काम टोयेटा से लेकर नौकरी डॉट कॉम या फ्लि‍पकार्ट, डव शैंपू, जि‍लेट रेजर जैसी चीजों से आलमोस्‍ट नहीं ही पड़ता है। वो ईंट पर बैठकर दाढ़ी बनवाने वाले लोग हैं और बनाने वाले भी। यहां वि‍ज्ञापन का मार्केट नहीं है इसलि‍ए जो वाकई में फ्री बेसि‍क्‍स है, वो फ्रॉड फेसबुक के फ्री बेसि‍क्‍स में शामि‍ल नहीं है।


(जारी...)

फेसबुक के फ्रॉड- 6

खुद को दलि‍तों का नया मसीहा, पि‍छड़ों का तार्किक भगवान और वंचि‍तों का वि‍ष्‍णु समझने वाले कह रहे हैं कि फेसबुकि‍या फ्रॉड फ्री बेसि‍क्‍स पर उन्‍हें फि‍र फि‍र सोचना पड़ेगा क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि ये एक बड़ी आबादी की आवाज बुलंद करने का माध्‍यम हो सकता है। अबे अंबेडकर के आठवें झूठे अवतार, एक बेसि‍क बात तुम्‍हरी समझ में आती है या नहीं कि फेसबुक की फ्री सौ साइट बनाम दूसरी फ्री करोड़ों साइट्स का मामला है। या फि‍र जो नासमझी तुमने जबरदस्‍ती जाति के नाम पर ओढ़ रखी है, कोई कहेगा भी तो हटाओगे नहीं कि तुमको जाति वि‍शेष का कुछ वि‍शेष फायदा मि‍लता है

अबे इतनी भी बेसि‍क बात समझ में तुम्‍हारी नहीं आ रही है कि फ्री बेसि‍क्‍स के नाम पर कुछ भी फ्री नहीं है, अगर कुछ फ्री है तो वो तुम्‍हारा वक्‍त है जि‍से तुम समाज में कहीं कि‍तने कार्यक्रमों में लगा सकते थे, कि‍तनी बातें कर सकते थे, लेकि‍न वो सबकुछ करने का तुम्‍हारा सपना फेसबुक एक फ्री के अनफ्री मायाजाल में लपेटकर खत्‍म कर रहा है। अबे फैशनेबल दलि‍त बुद्धजीवी के बाल, कब समझोगे कि पूंजीवाद कतई नहीं चाहता कि तुम एकदूसरे के आमने सामने आकर बात करो।

इंटरनेट पर वायरल होने के लि‍ए गूगल के कीवर्ड से भ्रष्‍टाचार का सपना संजोने वाले, अबे शर्म तो तुमको पहले भी नहीं आती थी कि दलि‍त होने के नाते जो चाहो उल्‍टा सीधा बोल लो जो अत्‍याचार के बहाने बेशर्मी से जायज ठहराओ, लेकि‍न तकनीकी समझ तुममें तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है। खासकर जब तुम ये बोलते हो कि तुम देखेगो। अबे घंटापरसाद, मोटा मोटा भी तुम्‍हारी समझ में नहीं आता कि एक का समर्थन करने पर तुम्‍हरे हाथ से दूसरे करोड़ों प्‍लेटफॉर्म छीने जा रहे हैं?उनको यूज करने का अभी का समान रेट डि‍सबैलेंस कि‍या जाने की तैयारी है? ससुर तुम्‍हरी बुद्धी का भगवान बुद्ध भी ठीक ना कर पाएंगे।


(जारी...)

फेसबुक के फ्रॉड- 5

मैं सोच रहा हूं उस वक्‍त और उस वक्‍त के रि‍जल्‍ट्स के बारे में, जब भारत के आम चुनाव कब होने चाहि‍ए, कैसे होने चाहि‍ए और क्‍यों होने चाहि‍ए और उसका रि‍जल्‍ट क्‍या होना चाहि‍ए, फेसबुक इस बारे में हमारे यहां के हर मॉल, नुक्‍कड़ और सड़कों पर बड़ी बड़ी होर्डिंग्‍स लगाएगा। यकीन मानि‍ए, तब भी उसका यही कहना होगा कि वो जो कुछ कह रहा है, सही कह रहा है क्‍योंकि उसके पास भारत में पौने एक अरब यूजर्स हैं। मेरी मांग है कि मुझे कान के नीचे खींचकर एक जोरदार रहपटा लगाया जाए ताकि मैं इस तरह की वीभत्‍स और डरा देने वाली सोच से बाहर आ सकूं। मेरे देश के लोगों के अंग वि‍शेष पर उगे बाल बराबर भी नहीं है ये कंपनी और कि‍सी देश के बारे में ऐसा सोच रही है...एक्‍चुअली हम ही ढक्‍कन हैं और सिर्फ घंटा बजाने लायक हैं, अक्‍सर थामने लायक भी।

ये पौने एक से एक अरब लोग भी उसी धोखेबाजी का शि‍कार होंगे, जि‍स धोखेबाजी को यूज करके फेसबुक ने ट्राइ को 32 लाख लोगों से मैसेज भेजवा दि‍ए और जि‍नने ये मैसेज भेजे, उन्‍हें ये पता ही नहीं कि ये मैसेब भेजवाकर फेसबुक आखि‍र करना क्‍या चाहता है। इतना ही नहीं, लोगों से धोखे से ट्राइ को मैसेज भेजवाकर बाकायदा प्रचार भी कि‍या जा रहा है कि इतने लोगों ने मैसेज भेजे। ये तो वही बात हुई कि आपके फेसबुक पर कहीं कि‍सी कोने से नि‍कलकर एक बक्‍सा (पॉपअप) सामने आए जि‍समें ये लि‍खा हो कि आप वि‍कास चाहते हैं या वि‍नाश। ठीक उसी तरह से जैसे अभी की धोखाधड़ी फेसबुक ने 32 लाख लोगों से की कि आप फ्री में नेट चाहते हैं या पैसे देकर? जाहि‍र है कि आप वि‍कास को ही वोट देंगे और जहां आपने वि‍कास को वोट दि‍या, वो वोट सीधे मोदी से कनेक्‍ट हो जाएगा कि भैया, वि‍कास तो पप्‍पा ही पैदा कर सकते हैं। या फि‍र उस पार्टी से, जो कम्‍युनि‍केशन के इस गड़बड़घोटाले का समर्थन करता हो। इंडि‍यल आइडि‍यल की तरह इंडि‍यन प्राइम मिनि‍स्‍टर के लि‍ए कुछ तय समय के लि‍ए लाइन खुलेंगी और इसी से हमारे इस महान लोकतंत्र की मां चो***ने के बाद नया प्रधानमंत्री पैदा होगा। (शब्‍दों के लि‍ए माफी, पर कभी तो गुस्‍सा नि‍कालने दीजि‍ए)

मि‍स्र की घटना के बाद फेसबुक की इस हवाई आकांक्षा को और बल मि‍ला है कि वो परि‍वर्तन ला सकता है लेकि‍न ईमानदारी से दि‍ल पर हाथ रखकर कोई मुझसे कनफेस करे कि मि‍स्र में क्‍या सच में फेसबुक की वजह से बदलाव आया? और इतना ही बदलाव पर यकीन था तो जि‍तना पि‍छड़ा अफ्रीका और भारत है, मि‍स्र उससे भी कहीं ज्‍यादा पि‍छड़ा और बदलाव का इंतजार कर रहा है, वहां क्‍यों नहीं पहले इस योजना को लॉन्‍च कि‍या गया। जाहि‍र है, पूंजी अपनी अंर्तव्‍यवस्‍थात्‍मक समाज में कहीं भी कोई बदलाव अगर देखना चाहती है तो वो चेतना तो कतई नहीं हो सकती है, अर्धचेतनात्‍मक नशा जरूर हो सकता है... फेसबुक और क्‍या है भाई लोग?

(जारी...)

फेसबुक के फ्रॉड- 4

अब इसका क्‍या करेंगे? देशभर में जि‍न तीन कंपनि‍यों के खि‍लाफ हम लोगों सहि‍त प्राइवेट कंपनि‍यों और सरकारी वि‍भागों ने सबसे ज्‍यादा शि‍कायत की है, वो एयरटेल, रि‍लायंस और वोडाफोन है। इनकी कहानी तो याद होगी। रि‍लायंस भारत में इस फ्री के फ्रॉड के साथ साझेदारी कर रहा है तो अफ्रीका में एयरटेल पहि‍लेन फेसबुक के साथ फ्रॉड इंटरनेट डॉट ओआरजी लॉन्‍च कर चुका है और यहां भी कि‍सी न कि‍सी तरह से (चाहे सरकार में पैसे खि‍लाकर लांबिंग हो) अपना हि‍स्‍सा बनाएगा। अगर फेसबुक फ्री बेसि‍क्‍स का फ्रॉड काम कर गया तो पड़े करते रहि‍ए इनके खि‍लाफ शि‍कायत, ये घंटा कुछ नहीं करने वाले। अभी भी कौन सा कुछ कर ही दे रहे हैं। कॉल ड्रॉप पर कोर्ट की कइयो फटकार के बावजूद क्‍या कॉल ड्रॉप होनी बंद हो गई?

अब जरा फ्री के माल की भी बात हो जाए। कि‍तने लोगों को याद होगा कि वोडाफोन ने दि‍वाली में एक एसएमएस करने पर 400 एमबी की स्‍कीम चलाई थी। एयरसेल का कनेक्‍शन लेने पे 65केबीपीएस की स्‍पीड पर तीन महीने के लि‍ए फ्री इंटरनेट एक्‍सेस मि‍लती है। फ्री की या बहुत कम पैसे में इंटरनेट की सुवि‍धा अभी भी मि‍ल रही है। वैसे फ्री का एक फंडा और है जो पिंटू पंडि‍त की कहानी से ज्‍यादा अच्‍छे से समझ में आएगा। गांव में रहने वाले पिंटू पंडि‍त ( Ajay Tiwari) को रीचार्ज महंगा पड़ता है और नए सिम पर मि‍लने वाली स्‍कीम का रीचार्ज सस्‍ता। तो वो हर रीचार्ज पर सिम बदल देते हैं। इंटरनेट वाली बात अभी उन्‍हें शायद पता नहीं है नहीं तो वो हर तीसरे महीने सि‍म बदलेंगे और साल में चार सिम बदलकर फ्री नेट यूज करेंगे।

इंटरनेट के इस यूज पर कंपनी कुछ नहीं कर सकती है क्‍योंकि उसे तो अपनी स्‍कीम चलानी है। सि‍म का रेट कि‍तना सस्‍ता होता है ये हम सभी जानते हैं। ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही नहीं है बल्‍कि बांग्‍लादेश, अफ्रीका सहि‍त बहुतेरे देशों में मोबाइल कंपनि‍यां इस तरह की स्‍कीम देती हैं। हमारे देश में इतना सबकुछ है तो फेसबुक स्‍पेशली अपनी टांग काहे अड़ा रहा है और फ्री के नाम का गोरखधंधा काहे कर रहा है। मार्क की नाक पर मक्‍खी की तरह जड़े नि‍खि‍ल भाई पूछते हैं कि चच्‍चा एक बात बताओ, फ्री बेसि‍क्‍स में सिर्फ सौ साइट ही काहे? बाकी सब का गुनाह कि‍ए रहे कि उनको नहीं देखा रहे हैं? सीधी बात है कि इंटरनेट फ्री होना है या नहीं होना है, ये मोबाइल कंपनि‍यों का काम है न कि फेसबुक का!

(जारी...)

Wednesday, December 30, 2015

फेसबुक के फ्रॉड- 3

फेसबुक कह रहा है कि भारत में उसके बहुत ज्‍यादा यूजर्स हैं, इसलि‍ए फ्री बेसि‍क्‍स का अधि‍कार उसे मि‍लना चाहि‍ए। अंबानी अंकल का हाथ है तो पैसे की कोई कमी नहीं। फ्री बेसि‍क्‍स के लि‍ए फेसबुक ने भारत में जो एड कैंपेन चलाई, उसपर सौ करोड़ रुपये (सोर्स-द वायर) से भी ज्‍यादा खर्च कि‍या जा चुका है और अभी और भी खर्च होंगे। ये सारा का सारा पैसा भारतीयों को सिर्फ उल्‍लू बनाने के लि‍ए खर्च हो रहा है। क्‍या इतनी सी बात कि‍सी को सोचने पर मजबूर नहीं करती कि आखि‍र वो कौन सा फ्री प्‍लेटफॉर्म होगा, जि‍सके वि‍ज्ञापन पर एक अरब रुपए से ज्‍यादा खर्च कर दि‍या गया है और जि‍सकी लाइन बनाने बि‍छाने में अरबों रुपए खर्च होंगे? और इतने खर्च के बाद वो कौन सा धर्म होगा, जि‍सके खाते में सारा पुण्‍य बटोरने की कोशि‍श की जा रही है? रही बात यूजर्स की तो कुछ कम ज्‍यादा के साथ देश में फेसबुक के तकरीबन 125 मि‍लि‍यन यूजर्स हैं जबकि गूगल के 354 मि‍लि‍यन। गूगल तो फ्री की मांग नहीं कर रहा।

जाहि‍र है कि ये हार्डकोर बि‍जनेस है। बड़ा बि‍जनेस प्‍लान है तो बड़ी पूंजी भी लगाई जा रही है। बड़े बि‍जनेस मैन भी इसमें अपनी टांग अड़ा रहे हैं। जानकारी के लि‍ए, दुनि‍याभर में इंटरनेट पर जि‍तनी भी कंपनि‍यां जि‍तने तरह का धंधा कर रही हैं, डाटा यूजेस के आधार पर उनका सारा धंधा पेड होते हुए भी फ्री है। सरल शब्‍दों में समझें कि जब हम गूगल खोलें या वि‍कीपीडि‍या, हम समान डाटा प्रयोग करते हैं और अपने प्रयोग के आधार पर उसके पैसे देते हैं। फेसबुक चाहता है कि ये डाटा का प्रयोग उसके लि‍ए फ्री हो और बाकी के लि‍ए पेड।

इस फ्री प्‍लेटफॉर्म पर फेसबुक दुनि‍या भर के वि‍ज्ञापन दि‍खाने जा रहा है। इन वि‍ज्ञापनों को देखना पूरी तरह से फ्री होगा क्‍योंकि डाटा डाउनलोडिंग का कोई चार्ज नहीं लगेगा। अगर कि‍सी ने भूले से भी इन वि‍ज्ञापनों पर क्‍लि‍क करके कुछ ज्‍यादा जानने की कोशि‍श की तो अंबानी अंकल का प्‍लान इस स्‍टेप के आगे काम करने वाला है। अंबानी चच्‍चा ने ट्राइ को जो प्‍लान दि‍या है, उसमें गूगल के अलग तो फ्लि‍पकार्ट के लि‍ए अलग डाटा यूजेस तो फलां के लि‍ए अलग तो ढि‍मके के लि‍ए अलग चार्ज करने वाले हैं। सुख की सांस लीजि‍ए कि ट्राइ ने इसे मना कर दि‍या है।

कुछ समझे? मने फ्री बेसि‍क्‍स के नाम पर बाकी सारी चीजों के डाटा यूजेस के रेट डि‍स्‍बैलेंस कि‍ए जाने वाले हैं।



(जारी...)

फेसबुक के फ्रॉड- 2

आखि‍र क्‍या बात है जो मेनस्‍ट्रीम मीडि‍या फेसबुक के इस कदम का खुलकर वि‍रोध नहीं कर पा रहा है। जो मेरी समझ में आ रहा है, उसमें दो बातें हैं। एक तो मेनस्‍ट्रीम मीडि‍या की समझदानी इंटरनेट को लेकर अभी बहुत ही कमजोर है। दसूरी ये कि मीडि‍या मालि‍क पहले भी चुपचाप दलाली कि‍या करते थे और इस बार भी इस बड़ी दलाली में हि‍स्‍सा पाने का ख्‍़वाब देख रहे हैं। वैसे चिंता की कोई बात नहीं है, फेसबुक ज्‍यादा बड़ा वाला है, वो खुद से जुड़ रहे मीडि‍यावालों को कोई इनकम नहीं देने वाला।

पहले ये जान लें कि देश से कौन कौन फेसबुक के इस धोखे के साथ जुड़ चुका है। फेसबुक के मुताबि‍क बीबीसी, इंडि‍या टुडे, नेटवर्क 18, एक्‍यूवेदर, बिंग सहि‍त सौ से अधि‍क मीडि‍या हाउस इससे उस लालच में जुड़े हैं जो उन्‍हें पक्‍का लंबलेट करने वाला है। फ्री बेसि‍क्‍स के नाम पर जो पाइपलाइन बनेगी, उसमें इन सब मीडि‍या हाउसों को अपना कंटेंट डालने की सुवि‍धा दी जाएगी। अभी जि‍स तरह से फेसबुक कि‍सी भी चीज को प्रमोट करने के लि‍ए पैसे ले रहा है, वो वहां भी बदस्‍तूर जारी रहेगा। कंटेंट के साथ हर मीडि‍या हाउस अपनी साइट का लिंक डालेगा क्‍योंकि यूजर को साइट पर आमंत्रि‍त करना ही सोशल मीडि‍या का मूल व्‍यवसायि‍क उद्देश्‍य है, लेकि‍न यूजर फ्री के चक्‍कर में उसपर क्‍लि‍क ही नहीं करने वाला। (अभी भी नहीं करता है) यूजर अगर उस लि‍ंक्‍स पर क्‍लि‍क करेगा तो उसे उस साइट पर जाने के लि‍ए डाटा डाउनलोडिंग के पैसे देने होंगे। उसपर जो वि‍ज्ञापन चलेंगे, उसका होलसोल राइट फेसबुक और रि‍लायंस के पास ही है, एफबी ये पहले ही स्‍पष्‍ट कर चुका है।

अब जरा देखते हैं कि फ्री के नाम पर क्‍या फ्री नहीं हुआ। गूगल, यूट्यूब( अमेजॉन, फ्लि‍पकार्ट, याहू, लिंक्‍डइन, ट्वि‍टर, एचडीएफसी, आइसीआइसीआइ, पेटीएम, ईबे, आइआरसीटीसी, रेडिफ, स्‍नैपडील, एनएसई, बीएसई जैसी सैकड़ों चीजें हैं जि‍न्‍हें इंटरनेट यूज करने वालाा आम यूज रोजाना यूज करता है, ये फ्री नहीं होने वाली। इतना ही नहीं, सरकार की कोई भी साइट फि‍र चाहे वो चकबंदी की हो या जनसंख्‍या की या वाहन चोरी कराने की ऑनलाइन रि‍पोर्ट कराने की, इस जैसी सैकड़ों सुवि‍धाएं भी फ्री नहीं होने वाली हैं।


(जारी...) 

फेसबुक के फ्रॉड- 1

बराबरी का एक ही मतलब होता है दस नहीं। कान के नीचे खींच के रहपट धरे जाने का काम कर रहे फेसबुक के मालि‍क मार्क ज़करबर्ग से पूछेंगे तो वो सत्‍तर और मतलब बता देंगे कि बराबरी ये भी होती है, वो भी होती है और जो कुछ भी वाया फेसबुक हो, वही होती है। बराबरी के सत्‍तर गैरबराबर कुतर्क जि‍से वो फ्री बेसि‍क्‍स का नाम देकर हमपर थोपना चाह रहे हैं, उसके लि‍ए वो हर कि‍सी के बराबर से इतना गि‍र गए हैं कि उन्‍हें नीच कहना नीचता को मुंह चि‍ढ़ाना होगा।

मार्क अब तक भारत के 32 लाख लोगों को धोखा दे चुके हैं। धोखा ऐसे कि उन्‍होंने 32 लाख फेसबुक यूजर्स के सामने फ्री बेसि‍क्‍स का पॉपअप जबरदस्‍ती दि‍खाया। हर चीज फ्री में चाहने के अंधे हम लोग उसपर क्‍लि‍क करते गए। ये हमने जानने की कोशि‍श ही नहीं की कि फ्री में हमें ये चीजें कैसे मि‍लेंगी और जो चीजें फ्री में मि‍लेंगी, वो कैसी होंगी। वैसे भी बछि‍या भले बांझ हो, लेकि‍न दान में मि‍लती है तो घंटा कोई उसका दांत गि‍नेगा।

ट्राइ ने फ्री बेसि‍क्‍स के पॉपअप पर रोक लगाई, बोला कि बंद करो ये लंतरानी, ये यहां काम नहीं आनी। उसके बावजूद ये अभी तक कायम है, जि‍सपर कानूनी कार्रवाई बनती है, करेगा कौन ये सामने आना बाकी है। रोक के बाद मार्क ने इसे सड़क की लड़ाई बना हजारों बोर्डिंग्‍स लगा दि‍ए, करोड़ों रुपए वि‍ज्ञापन में बहा दि‍ए। 32 लाख लोगों काे उल्‍लू बनाने के बाद जब लोगों ने वि‍रोध करना शुरू कि‍या तो मार्क कहते हैं कि ये बात उनकी समझदानी से बाहर है कि लोग वि‍रोध क्‍यों कर रहे हैं।

अगर भारत में कुछ फ्री होना ही है तो वो जो पहले से ही इंटरनेट पर मौजूद है, जैसे सरकार से जुड़े सभी वि‍भागों की साइट न कि फेसबुक। स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा से जुड़े सारे सरकारी एप्‍स फ्री होने हैं न कि फेसबुक का एप। माना कि हम भारतीय बहुत बड़े वाले बकचोद हैं लेकि‍न इतने भी नहीं कि हमेशा यही कि‍या करें और सिर्फ फेसबुक पर ही कि‍या करें।


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