Tuesday, August 25, 2026

यूपी के नारंगियों की पैट गीली कर देते हैं ये जज साहब, चाहे वे नेता हों, या अफसर



 यूपी में है संभल। वही संभल, जहां नागपुरी संतरे का गदाधारी सीओ मुसलमानों को गदा दिखाता धमकाता घूमता था। इसी संभल का डीएम है राजेंद्र पैसिया और एसएसपी है केके बिश्नोई। मामला ये हुआ कि इन दोनों को या तो सपना आया, या किसी नागपुरी संतरे ने ऑर्डर दिया कि वहां की एक मस्जिद में मुसलमान रमजान की नमाज शांति से न पढ़ पाएं। फिर क्या था, दोनों ने मिलकर ऑर्डर निकाला कि खबरदार अगर 20 से ज्यादा मुसलमानों ने वहां पर नमाज पढ़ी। तानाशाही फरमान के विरोध में मुनजिर खान इलाहाबाद हाई कोर्ट चले गए। अब इसे पैसिया और बिश्नोई की बदकिस्मती कहें या कायदा-कानून के शासन की किस्मत, मामला जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच में सुनवाई के लिए चला गया। अब दोनों माननीय जजों की बेंच ने जो कहा, उसके बाद तो कायदे से इन दोनों को इस्तीफा ही दे देना चाहिए था, मगर क्या पता, शायद इनकी चमड़ी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जितनी ही मोटी हो चुकी हो। 

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एकदम साफ साफ कहा कि अगर तुम दोनों ने कायदा-कानून न संभल पा रहा हो तो इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? चलो, इस्तीफा न सही, अपना ट्रांसफर ही मांग लो। 27 फरवरी को दिए अपने ऑर्डर में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने कमेंट किया कि अगर एसपी और डीएम कानून-व्यवस्था की समस्या की आशंका जताते हैं और महज इसलिए नमाजियों को सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफा दे देना चाहिए या तबादला ले लेना चाहिए, अगर वे कानून के शासन को लागू करने में असमर्थ हैं. ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य के वकील ने कहा है कि कानून-व्यवस्था की कथित स्थिति के कारण नमाजियों की संख्या को सीमित करने वाला ऐसा ऑर्डर पारित किया गया है. हम राज्य के वकील द्वारा रखे गए इस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं. यह राज्य का कर्तव्य है कि वह हर परिस्थिति में कानून का शासन सुनिश्चित करे. अदालत ने आगे कहा, यह राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक समुदाय अपने निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा/इबादत कर सके और जैसा कि अदालत ने पहले भी माना है, यदि वह एक निजी संपत्ति है, तो राज्य से किसी अनुमति के बिना पूजा/इबादत की जा सके. 

ये तो खैर एक मामला हुआ। दूसरा मामला भी सुन लीजिए। इसी यूपी के बरेली में कुछ लोग अपने घर में नमाज पढ़ रहे थे। यहां का डीएम है अविनाश सिंह और एसएसपी है अनुराग आर्य। इन लोगों ने अपने घर में नमाज पढ़ने के आरोप में 12 लोगों को हिरासत में ले लिया, जो बाद में जमानत पर छूट गए। मामला फिर गया जस्टिस अतुल श्रीधरन की कोर्ट में। जज साहब ने दोनों को जबरदस्त फटकार लगाई, नमाजियों की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात करने का ऑर्डर दिया और अब 23 मार्च को दोनों को अपनी कोर्ट में तलब किया है। पहुंचें ये दोनों जस्टिस अतुल श्रीधरन की कोर्ट में, वहां इनकी कायदे से नजर उतारी जाएगी। कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट किया है इन दोनों ने क्योंकि जनवरी में ही हाईकोर्ट ने मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ के एक और केस में फैसला सुनाया था कि उत्तर प्रदेश में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी में धार्मिक प्रार्थना सभा करने के लिए राज्य की इजाज़त की ज़रूरत नहीं है। इससे पहले फरवरी में ही जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एक और नागपुरी संतरे के बुलडोजर की हवा निकाल दी थी और कहा था कि बेटे, अब अगर बुलडोजर चलाया तो समझ लो, तुम लोगों की खैर नहीं। 

अब चलिए जानते हैं कि इन नागपुरी संतरों ने एक ईमानदार जज के साथ क्या क्या करने की कोशिश नहीं की। कोशिशें तो खैर अब भी जारी ही हैं। जैसा कि पिछले विडियो में बताया था कि मौजूदा सीजेआई यानी चीफ जमीन डीलर ऑफ इंडिया हाई कोर्ट के जजों के ट्रांसफर का नया रूल निकाला है। रूल ये कि वो रिलेटेड हाई कोर्ट में अपना पद संभालने से दो महीने पहले पहुंच जाएंगे। यह रूल सीजेआई सूर्यकांत ने कॉलेजियम की मीटिंग करके बनाया है। इसके तहत पहला ट्रांसफर जस्टिस लीसा गिल का हुआ है, लेकिन इस पॉलिसी के आने के बावजूद जस्टिस एसए धर्माधिकारी को महज एक दिन के नोटिस पर मध्य प्रदेश से ट्रांसफर करके मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। इससे रिलेटेड खबरें आप में से अधिकतर ने देख या पढ़ रखी होंगी। आमतौर पर ये एक आम बात है। किसी को किसी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया जाए, भला इसमें क्या खास बात। ये सब तो राजकाज है। लेकिन इस राजकाज की तह में एक ऐसा कलंक लगा है, एक ऐसी कालिख लगी है, जिसे अगर आप लोग जानेंगे तो पता चलेगा कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम न्याय नहीं, अन्याय का कॉलेजियम है, और पूरी तरह से कॉम्प्रोमाइज्ड है। ये पूरी विडियो आप देखेंगे तो सोचेंगे कि कहीं चीफ जमीन डीलर ऑफ इंडिया की भी तो कोई एपस्टीन फाइल कहीं किसी ने दबा तो नहीं रखी है? 

जैसा कि पहले बताया कि जस्टिस एसए धर्माधिकारी इसी महीने महज एक दिन के नोटिस के बाद मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बन चुके हैं। जस्टिस धर्माधिकारी को 7 अप्रैल 2016 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का एडिशनल जज बनाया गया था। ठीक उसी दिन जस्टिस अतुल श्रीधरन भी एडिशनल जज बनाए गए थे। बाद में दोनों जजों को 17 मार्च 2018 को उसी अदालत में परमानेंट जज के तौर पर तैनाती मिली। जब दो जजों की तैनाती की तारीख़ एक जैसी होती है, तो सीनियरिटी बार में शुरुआती दाख़िले की तारीख़ के हिसाब से तय की जाती है। यह बात उनकी मूल हाई कोर्ट में जारी हुए अपॉइंटमेंट वारंट में नामों की तरतीब से भी साफ़ होती है। इस पैमाने के मुताबिक जस्टिस श्रीधरन, जस्टिस धर्माधिकारी से सीनियर हैं। यहीं से सारा खेल शुरू होता है। दरअसल, कोलेजियम के क़रारनामे में यह नहीं बताया गया कि सीनियर होने के बावजूद जस्टिस श्रीधरन को मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफ़ारिश क्यों नहीं की गई। अभी इतना ही नहीं, अभी उस साजिश की भी सुनिए, जो जस्टिस अतुल श्रीधरन के साथ मोदी ने की।

कॉलेजियम की यह ख़ामोशी तब और भी साजिश लगने लगती है, जब हम जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रैक रिकॉर्ड देखते हैं। एक ऐसा जज, जो सिर्फ कानून की मानता है, कानून का इस्तेकबाल करता है। जब जस्टिस श्रीधरन जम्मू और कश्मीर में थे, तब उन्होंने बार-बार पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत की गई प्रिवेंटिव डिटेंशन को रद्द किया। बल्कि एक बार तो उन्होंने एक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पर निजी तौर पर जुर्माना भी लगाया, क्योंकि उनके मुताबिक़ वह हुक्म ग़ैर-मुनासिब था। मोदी सरकार जिस तरह से अपनी हर गलती के पीछे अपना पिछवाड़ा नेशनल सिक्योरिटी के पीछे छुपाती आई है, इसे भी उन्होंने आड़े हाथ लिया था। उन्होंने कहा था कि आप जजों को इस तरह से साइकोलॉजिकली डरा नहीं सकते। हर चीज में नेशनल सिक्योरिटी घुसेड़नी ठीक नहीं है।  

जैसा कि पहले बताया कि एमपी हाई कोर्ट में जस्टिस श्रीधरन का तबादला मार्च 2025 में हुआ था। इस हाईकोर्ट में वो पूरे सात महीने रहे। उन्होंने अपने 7 महीने के कार्यकाल में कई अहम फैसले दिए हैं, जिसमें से भाजपा सरकार के बेहूदा और भारतीय सेना की बेइज्जती करने वाले मंत्री विजय शाह के खिलाफ 24 घंटे में एफआईआर दर्ज करना था। फिर दमोह में ओबीसी वर्ग के लड़के से पैर धुलवा कर पानी पीने को मजबूर करने वालों पर NSA की कार्रवाई करने के भी ऑर्डर जस्टिस श्रीधरन ने दिए। साथ ही ग्वालियर हाई कोर्ट के जज ने जिला अदालत के जज पर जिस तरह का गंदा कमेंट किया था, उसे भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भेजने का ऑर्डर दिया था। इसके बाद तो शुरू हुआ जस्टिस श्रीधरन की सुप्रीम सजा का दौर। आखिर खाने छुपाने पर सुओ मोटो तक जाने वालों को ये बर्दाश्त कहां होना था। 

इसके बाद तो कॉलेजियम में जस्टिस श्रीधरन का जस्टिस मुरलीधर वाला हाल बनाकर रखा है। इसके बाद जस्टिस श्रीधरन के तबादलों का सिलसिला शुरू हुआ। अगस्त 2025 में कोलेजियम ने उन्हें मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ भेजने की सिफ़ारिश की, जहाँ वह हाई कोर्ट कोलेजियम का हिस्सा बने रहते। लेकिन दो महीनों के अंदर ही मोदी को चुल्ल उठी और उसने इस पर दोबारा ग़ौर करने को कहा। कोलेजियम ने भी मोदी को कहा, जी हुजूर, जैसा आप बजा फरमाएं। और फिर उनको छत्तीसगढ़ की जगह इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया, जहाँ सीनियरिटी में उनका नंबर सातवाँ है और वह पूरी तरह कोलेजियम से बाहर बैठते हैं। 

इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के कुछ एक जज, जिनकी रीढ़ अभी भी सीधी है, उन्होंने आवाज उठाई। सबसे पहले तो खुद तब सीजेआई रहे जस्टिस बीआर गवई बोले। विरोध में नहीं बोले, लेकिन जी हुजूरी का ये सारा मामला उन्होंने ही खोल दिया, ताकि जो कुछ जानना समझना हो, जनता अच्छे से जान समझ ले। उन्होंने बताया कि जस्टिस श्रीधरन के ट्रांसफर के लिए और उनके करियर में पलीता लगाने के लिए मोदी ने ही कहा था। बीते साल 25 अगस्त को कोलेजियम ने जस्टिस श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने का फैसला किया था. इसके बाद सरकार की तरफ से कहा गया कि कोलेजियम अपने फैसले पर फिर से विचार करे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने अपना फैसला वापस ले लिया. अब जस्टिस श्रीधरन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया जाता तो वह वहां दूसरे सबसे सीनियर जज होते. लेकिन, इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी सीनियरिटी सातवें नंबर पर है. 

कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने कहा कि इससे ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ को लेकर चिंता पैदा होती है. सीजेएआर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बयान में इस बात का कोई कारण नहीं बताया गया है कि सरकार ने पुनर्विचार का अनुरोध क्यों किया और कॉलेजियम को सरकार की मांगों पर सहमत होने और अपने निर्णय बदलने के लिए किस बात ने प्रेरित किया.’ सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने जस्टिस श्रीधरन का नाम लिए बिना कहा कि जजों के ट्रांसफर-पोस्टिंग में कार्यपालिका का दखल नहीं होना चाहिए. क्या किसी जज का सिर्फ इसलिए दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर हो जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के लिए कुछ मुश्किल ऑर्डर पास किए थे? बता दें कि पिछले साल भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर किया था. जस्टिस भुइयां ने सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जज के तबादले को 'न्यायपालिका की आजादी में दखल' करार दिया. बड़ी बात ये कि कॉलेजियम ने इस अन्याय के पीछे की एक भी वजह अभी तक नहीं बताई है। 

वाज़ेह कर देना चाहिए कि सीनियरिटी को दरकिनार करना अपने आप में कोई ग़ैर-मामूली बात नहीं है। कोलेजियम हमेशा सिर्फ़ सीनियरिटी के अलावा दूसरे पैमानों - जैसे बर्ताव, मिज़ाज और मुनासिबियत - को भी देखते हुए अपना इख़्तियार इस्तेमाल करता रहा है। मुमकिन है कि जस्टिस धर्माधिकारी वाक़ई मद्रास हाई कोर्ट की क़ियादत के लिए सही शख़्स हों। इस चुनाव के पीछे ठोस वजहें भी हो सकती हैं। लेकिन जब वजहें सामने नहीं रखी जातीं, तो हर शख़्स - बार, मुक़द्दमे लड़ने वाले लोग और आम अवाम - अपने-अपने हिसाब लगाने लगते हैं। इस मामले में कहानी कुछ जानी-पहचानी सी लगती है; एक ऐसा जज जिसका रिकॉर्ड आज़ादाना रवैये का रहा है, उसे बार-बार इधर-उधर भेजा गया, कोलेजियम से बाहर रखा गया, और तरक़्क़ी के मौक़े पर नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जबकि ज़िम्मेदार इदारे ने इसके लिए कोई वज़ाहत पेश नहीं की।

रंजन गोगोई | पूरा 'रस' पीकर अब पाएंगे पेंशन

 आजाद भारत के सबसे कुख्यात सीजेआई रहे रंजन गोगोई 16 मार्च को कुल 53 फीसदी हाजिरी लगाकर राज्यसभा से रिटायर हो चुके हैं। राज्यसभा में उनको ये सीट मोदी ने बतौर मलाई दी थी। 2020 में जब रंजन गोगोई ने पहली बार राज्यसभा में कदम रखा था, तो उनका स्वागत अभूतपूर्व बेइज्जती से हुआ था। पूरी राज्यसभा में रंजन गोगोई शर्म करो, रंजन गोगोई शर्म करो के नारे वैसे ही गूंज रहे थे, जैसे इन दिनों नरेंदर सरेंडर के नारे गूंजते हैं। जब वो राज्यसभा में आए थे तो विपक्ष ने वाकआउट कर दिया था। मोदी को उन्हें ईनाम देने की इतनी जल्दी थी कि सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद उनके छह महीने के कूलिंग पीरियड का भी इंतजार नहीं किया, और महज 4 महीने में ही उनको राज्यसभा में लाकर सजा दिया। फिर जल्दी क्यों न हो, आखिर भाजपा में जो जितना गंदा होता है, वो उतना ही बड़ा ईनाम पाता है। इन दिनों जो सीजेआई सूर्यकांत हैं, वो इन्हीं के शिष्य हैं। आज भी वहां के वकील बिना नाम बताने की शर्त पर बताते हैं कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में जब गोगोई थे तो कई लोगों ने पाया था कि जस्टिस सूर्यकांत रोज इनके चंडीगढ़ वाले बंगले में दुआ सलाम करने जाते थे।

15 अगस्त 1947 के बाद से आज 17 मार्च 2026 तक रंजन गोगोई इकलौते ऐसे शख्स हैं, जिन पर बतौर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहते हुए अपनी ही असिस्टेंट का यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगा है। उनके इस आरोप की शुरुआत इसके अंत से उपजे एक सवाल से करते हैं, जिसका जवाब आज तक किसी को नहीं मिला है। सवाल यह है कि आखिर में रंजन गोगोई ने पीड़िता को अपनी पत्नी के पैर पर गिरवाकर माफी क्यों मंगवाई? बताते हैं कि बाद में पीड़िता ने नौकरी जॉइन भी कर ली थी और अब सब कुछ सही है। लेकिन ये सवाल तो बना ही रहेगा कि जिसने रंजन गोगोई पर अपने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, उसने गोगोई की पत्नी के पैर पर गिरकर माफी क्यों मांगी। पंजाब से लेकर असम तक के परिवारों में ऐसा कब होता है? ऐसा कब होता है जब जिसके साथ जो गलत या सही जैसा भी करे, फिर उसे पत्नी के पैर पर गिराया जए। ऐसा क्यों होता है, ये कोई कहने वाली बात नहीं है, ये सब जानते ही हैं कि ऐसा क्यों होता है, कैसे होता है, कब होता है। खैर, इस केस में गाजीपुर का गुलाबजल गले में लगाकर अदालत पहुंचने वाले गंदन गोगोई पर ये इकलौता सवाल नहीं है। सवाल यह भी है कि अपनी गंदगी को साफ करने का टिश्यू पेपर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को क्यों बनाया? बता दें कि अपनी पत्नी के पैर पर पीड़िता को गिराकर माफी मंगवाने से पहले रंजन गोगोई ने इसकी अदालत भी खुद लगाई। 

गोगोई ने खुद एक खास बेंच बनाई, जिसमें वो खुद भी शामिल थे। इस बेंच में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना भी थे। कानून का सीधा सा उसूल है कि कोई भी आदमी अपने ही मामले में जज नहीं बन सकता। इस मामले में एक और अहम बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट की अंदरूनी जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी को फौरन एक्टिव नहीं किया गया। अगर ऐसा होता, तो शायद मामला इस हद तक खराब न होता। इसी मामले में एक और अजीब बात सामने आई, सुनवाई से जुड़े ऑर्डर में गोगोई का नाम ही हटा दिया गया, जो इस बेंच की खुद अगुवाई कर रहे थे। यह कदम पहले कभी नहीं देखा गया था। पूर्व जज मदन लोकुर ने इस पर साफ कहा कि किसी ऑर्डर से जज का नाम हटाना गलत है, और ऐसा तभी हो सकता है जब खुद उस जज ने ऐसा करने को कहा हो। इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और अब तक अनसुलझा सवाल वही है, जिससे हमने शुरुआत की थी, आखिर क्यों एक औरत, जिसने इतने गंभीर इल्ज़ाम लगाए, बाद में उसी शख्स के घरवालों के सामने जाकर माफी मांगती है? यह सिर्फ एक घटना का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है, जहां पावर और प्रेशर मिलकर ऐसे नतीजे पैदा करते हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं होता।

लोग कहेंगे कि राम मंदिर, लेकिन हमारा मानना है कि भारतीय जनता पार्टी को अगर रंजन गोगोई से कोई सबसे बड़ा फायदा मिला, तो वह था नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी का अपडेट। एनआरसी हमारे भारत को इन्हीं का दिया कैंसर है। असम पब्लिक वर्क्स नाम की एक संस्था ने अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें बाहर भेजने के लिए याचिका डाली थी। यह याचिका कई बार लिस्ट हुई, लेकिन उस पर ठीक से सुनवाई नहीं हो पाई। करीब चार साल बाद गोगोई ने इस मामले की जिम्मेदारी संभाली। 2 अप्रैल 2013 को इस केस की पहली सुनवाई हुई। गोगोई उस वक्त जस्टिस एच एल गोखले के साथ बेंच में थे। सुनवाई के बाद अगली तारीख अगले ही दिन रख दी गई। अक्टूबर 2013 से लेकर अक्टूबर 2019 तक गोगोई ने एनआरसी से जुड़े कई मामलों की सुनवाई की। 20 अगस्त 2014 को गोगोई ने एनआरसी के स्टेट कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला से हलफनामा मांगा कि क्या यह काम दिसंबर 2016 तक पूरा हो सकता है। बाद में हजेला को कहा कि 18 महीने के अंदर काम खत्म किया जाए। यहीं से एक और अहम चीज शुरू हुई- सीलबंद लिफाफा सिस्टम। अदालत ने कहा कि पूरी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में दी जाए और बिना किसी सरकारी दखल के सीधे अदालत को दी जाए। सरकार भी पूरी जानकारी नहीं देख सकती थी। जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि यह गलत तरीका है और अदालत खुद से ऐसा नहीं कर सकती। फरवरी 2017 में सुप्रीम कोर्ट के बंद कमरे में, बिना किसी की सुने एक और बड़ा फैसला हुआ- “फैमिली ट्री वेरिफिकेशन”। इसमें लोगों को अपने पुरखों का पूरा रिकॉर्ड देना था। यानी इन सुनवाइयों के दौरान उन्होंने असम में विदेशी माने जाने वाले लोगों की पहचान के लिए जो तरीका अपनाया गया, वह बेहद सख्त और टेक्निकल तो था ही, कानूनन भी सही नहीं था। इसके बाद बीजेपी ने इसे लपक लिया, आज तक हर चुनाव में इनके हर भोंपू से सिर्फ एक मंत्र सबसे ज्यादा बजता है, और वो है घुसपैठिया। अभी बंगाल से लेकर पुडुचेरी तक भाजपा यही घुसपैठिया राग अलाप रही है। फिर मोदी हुकूमत CAA लाई, जिसमें गैर-मुस्लिम लोगों के लिए नागरिकता हासिल करना आसान बना दिया गया। सीएए और पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात ने करीब 20 करोड़ मुसलमानों के बीच जो डर का माहौल पैदा किया गया है, उसकी जड़ में यही गोगोई है। 

वैसे अगर गोगोई का पर्सनल बैकग्राउंड देखें, तो 18 नवंबर 1954 को उनकी पैदाइश असम के डिब्रूगढ़ में हुई थी। ताकतवर लोगों का घराना रहा है तो साहब को सामाजिक, आर्थिक और सियासी तौर पर काफी सहूलियतें मिली हुई थीं। उनकी ननिहाल का रिश्ता अहोम राजवंश से था, जिसने करीब 600 साल तक असम पर राज किया। कई लोगों से बातचीत में पता चलता है कि अहोमों के बीच घुसपैठियों को लेकर लंबे समय से घृणा चली आ रही है। दिलचस्प बात यह है कि अहोम खुद भी कभी बाहर से आए थे। माना जाता है कि उनके पहले राजा सुकफा 1215 में चीन के युन्नान इलाके से आए थे और कई साल भटकने के बाद असम में बस गए। 2018 की एक साइंटिफिक स्टडी में अहोम लोगों और आज के थाई लोगों के बीच जैविक रिश्ता भी सामने आया। एडवोकेट प्रशांत भूषण का मानना है एनआरसी और सीएए के पीछे गोगोई में भाजपा की भलाई की जगह यह घृणा ज्यादा निर्णायक हो सकती है। 

गोगोई की जजी के दौर का एक और बड़ा मामला था, राफेल डील। सीधे मोदी को कहा जा रहा था कि चौकीदार चोर है। इस केस में गोगोई ने जमकर सीलबंद लिफाफे उड़ाए। जहाजों की कीमत और बाकी जानकारी सीलबंद लिफाफे में मांगी गई। यहीं एक और अजीब बात हुई। अदालत ने अपने आखिरी फैसले में CAG की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जो उस वक्त तक न संसद में रखी गई थी और न ही लोगों के सामने आई थी। गोगोई के दौर में सीलबंद लिफाफे धीरे-धीरे अदालत में जमकर उड़ने लगे। जनवरी 2019 में पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू ने गोगोई पर गंभीर इल्ज़ाम लगाए। उन्होंने कहा कि गोगोई ने एक निजी मामले में सरकार से बात की थी और किसी मंत्री के आगे गिड़गिड़ाए भी थे। काटजू ने लिखा कि ‘उन्हें सुनने में आया कि जस्टिस गोगोई जब सुप्रीम कोर्ट में सबॉर्डिनेट जज थे तब मोदी या उनके मंत्रिमंडल के किसी बड़े मंत्री से भेंट की और गिड़गिड़ाये कि उनके 'संबंधी' का तबादला न किया जाए.‘ काटजू ने आगे लिखा कि ‘अगर ऐसा है तो गोगोई ने पक्का बीजेपी सरकार का एहसान लिया जिसे उन्हें लौटाना ही था. 

राज्यसभा की वेबसाइट के हिसाब से, अपने पूरे छह साल के दौरान गोगोई ने सिर्फ एक बार बहस में हिस्सा लिया, अगस्त 2023 में, दिल्ली सर्विस बिल पर। उस बहस में उन्होंने बेसिक स्ट्रक्चर वाले उसूल पर सवाल उठाए और कहा कि इसकी कानूनी बुनियाद ही साफ नहीं है। यहीं सबसे बड़ा उलझाव दिखता है। जब वो चीफ जस्टिस थे, तब उन्होंने रोजर मैथ्यू केस में इसी बेसिक स्ट्रक्चर उसूल को सही माना था। और एक और अहम बात, अपने पूरे कार्यकाल में गोगोई ने कई बड़े कानूनों पर कुछ नहीं कहा। चाहे कृषि कानून हों, नए आपराधिक कानून, ट्रिब्यूनल सुधार कानून, वक्फ कानून में बदलाव या महिला आरक्षण बिल, इनमें से किसी पर भी उन्होंने कोई बात नहीं रखी। यह खामोशी भी उतनी ही अहम है, जितनी उनकी एकमात्र बहस। 

बहरहाल, गोगोई का राज्यसभा में जाना इस पूरी कहानी का अहम मोड़ तो है ही। पूर्व जज मदन लोकुर ने उनके जाने पर कहा था कि इससे अदालत की आज़ादी, निष्पक्षता और उसकी साख पर असर पड़ेगा। उन्होंने पूछा भी था कि क्या आखिरी किला भी गिर गया है? दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एपी शाह ने भी उनकी राज्यसभा एंट्री को ताकत के बंटवारे के उसूल के खिलाफ बताया था। उन्होंने कहा था कि यह न्यायपालिका की आज़ादी के लिए मौत की घंटी है। बहरहाल, मौत की ये घंटी संसद में छह साल में सिर्फ एक बार बजी, और यह कहने के लिए बजी कि संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर, यानी आत्मा तो होती ही नहीं है।

3 महीने, 510 केस और 508 ज़मानत

 


पिछले महीने यानी फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में ज़मानत देने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया की जमकर आलोचना की थी। अब एक इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि अक्टूबर से लेकर दिसंबर 2025 के बीच जस्टिस भाटिया की सरपरस्ती वाली सिंगल जज बेंच ने दहेज से जुड़े कत्ल के 510 मामले सुने थे, जिनमें से 508 केस में उन्होंने मुल्ज़िम को ज़मानत मंज़ूर की। इसी दरमियान इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने गुरुवार को एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसमें दूसरी बातों के साथ जस्टिस पंकज भाटिया के रोस्टर में तब्दीली की गई है। आने वाली 23 मार्च से लागू होने जा रहे नए नोटिफिकेशन वाले रोस्टर के तहत जस्टिस भाटिया अब सिविल मामलों की सुनवाई करेंगे।

बता दें कि यह तब्दीली जस्टिस भाटिया के उस हुक्म के कुछ ही दिनों बाद आई है, जिसमें उन्होंने चीफ़ जस्टिस से दरख्वास्त की थी कि आगे उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों का रोस्टर न दिया जाए। जब सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में उनके एक ज़मानत ऑर्डर को “बेहद हैरान करने वाला और मायूस करने वाला” बताया, बस उसी के चार दिन बाद की उन्होंने ये अपील की थी। बीती फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस पंकज भाटिया की उस हरकत पर सवाल उठाए थे, जिनमें वो दहेज हत्या से जुड़े मामलों में लगातार ज़मानत देते जा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को जुर्म की किस्म, सजा की सख्ती, मुल्ज़िम और मरने वाले के रिश्ते, वारदात की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था। अब इंडियन एक्सप्रेस की एक इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि पिछले साल 2025 के आख़िरी तीन महीनों में जिस बेंच की सरपरस्ती जस्टिस पंकज भाटिया कर रहे थे, उसने दहेज हत्या के लगभग तमाम मामलों में मुल्ज़िमों को ज़मानत दी है।

अख़बार की इन्वेस्टिगेशन बताती है कि तीन महीने यानी अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया की सरपरस्ती वाली सिंगल जज बेंच ने दहेज से जुड़े कत्ल के 510 मामलों में से 508 में ज़मानत दी। इसका मतलब है कि उन्होंने कुल मामलों के तक़रीबन 99.6 फ़ीसद में ज़मानत मंज़ूर की। अभी इतना ही नहीं, अभी और सुनिए कि इस खास इन्वेस्टिगेशन में निकला क्या। जो बड़ी बात सामने आई, वो ये कि इन ऑर्डरों की ज़बान और बनावट भी लगभग एक जैसी देखी गई। ज़्यादातर मामलों में ज़मानत के लिए 20-20 हज़ार रुपये के दो ज़मानतदारों के साथ निजी बॉन्ड देने का हुक्म दिया गया। अलग-अलग हालात में मौत होने के बावजूद ऑर्डरों की ज़बान और दलील काफ़ी हद तक एक जैसी थीं। अखबार ने तो ऐसा कोई शक जाहिर नहीं किया, लेकिन इस पूरे वाकिए को जानने समझने के बाद एक सवाल ये भी उठता है कि कहीं एआई यानी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस की तो मदद नहीं ली जा रही थी?

क़ाबिले-ग़ौर है कि 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही ज़मानत ऑर्डर को रद्द करते हुए सख़्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऑर्डर पढ़कर समझ ही नहीं आता कि हाईकोर्ट आखिर क्या कहना चाहता है और इतने संगीन जुर्म में मुल्ज़िम को ज़मानत देने की बुनियाद क्या थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ज़िम की ज़मानत रद्द करते हुए उसे सरेंडर करने का हुक्म दिया।

क़ाबिले-ग़ौर है कि जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की, वह श्रावस्ती जिले की 28 साल की सुषमा देवी की मौत से जुड़ा था। शादी के दो महीने से भी कम वक्त बाद उनका शव ससुराल के बरामदे में मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह गला दबाना बताई गई थी। सुषमा के वालिद का कहना था कि शादी के वक्त उन्होंने 3.5 लाख रुपये नकद दिए थे, लेकिन बाद में ससुराल वालों ने कार की मांग शुरू कर दी थी। इस मामले में सत्र अदालत ने पहले ही ज़मानत देने से इंकार कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने ज़मानत मंज़ूर कर ली।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हुक्म में कहा कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को जुर्म की किस्म, सजा की सख्ती, मुल्ज़िम और मरहूमा के रिश्ते, वाक़िए की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के तीन महीने के अंदर हुई मौत के मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत ख़ास क़ानूनी प्रावधान लागू होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की इस सख़्त टिप्पणी के कुछ ही दिनों बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से दरख्वास्त की कि उन्हें अब ज़मानत से जुड़े मामलों की ज़िम्मेदारी न दी जाए। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर बहुत “मायूस करने वाला और हौसला गिराने वाला असर” पड़ा है।

अख़बार ने इन मामलों पर जस्टिस भाटिया से प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजे गए सवालों के भी जवाब नहीं मिले।

ज़मानत ऑर्डर में एक जैसी बातों का दोहराव

अख़बार के मुताबिक, जिन 510 मामलों का तजज़िया किया गया, उनमें सब पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज हत्या) या भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 और दहेज निषेध क़ानून की धारा 3 और 4 के तहत इल्ज़ाम लगाए गए थे।

इन मामलों में ज़्यादातर मुल्ज़िम शौहर, सास-ससुर और दूसरे रिश्तेदार थे। कुल मुल्ज़िमों में 362 शौहर, 68 सास और 63 ससुर शामिल थे।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक 340 मामलों में मौत की वजह फांसी बताई गई, 27 मामलों में ज़हर, 16 में गला दबाना, 11 में जलने से मौत, जबकि कुछ मामलों में सिर पर चोट, दम घुटना या डूबने से मौत दर्ज हुई। छह मामलों में मरहूमा औरतें हामिला भी थीं।

ज़्यादातर मामलों में ज़मानत देते वक्त अदालत ने यह कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साफ सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि मौत से ठीक पहले औरत को दहेज के लिए परेशान किया गया था। यही दलील करीब 253 ऑर्डरों में दोहराई गई।

हालांकि, 510 में से दो मामलों में ज़मानत नहीं दी गई। पहले मामले में औरत के जिस्म का करीब 90 फ़ीसद हिस्सा जल गया था और उसने अपने वालिद को हमले की जानकारी दी थी। वहीं दूसरे मामले में मुल्ज़िम शौहर पर बीवी को गोली मारने का इल्ज़ाम था।

इन आंकड़ों के सामने आने के बाद न्यायिक फैसलों के तरीक़े और संगीन जुर्मों में ज़मानत देने के पैमानों को लेकर बहस तेज़ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी ने भी इस पूरे मामले को और चर्चा के मरकज़ में ला दिया है।

अपने ज़्यादातर ऑर्डरों में जस्टिस भाटिया ने लिखा है कि उन्होंने “दरख्वास्त देने वाले के वकील, एजीए (अतिरिक्त सरकारी वकील) की बात सुनी और रिकॉर्ड का जायज़ा लिया।” इसके बाद उन्होंने आगे एफआईआर नंबर, लगाई गई धाराएं, जेल में रहने की मियाद, दरख्वास्त देने वाले के आपराधिक रिकॉर्ड का ज़िक्र और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला दिया है।

इसके बाद ज़मानत के लिए दलीलें दी गईं और आखिर में ज़मानत की शर्तें दर्ज की गईं।

बता दें कि 253 ऑर्डरों में “मौत से ठीक पहले” परेशान किए जाने का इशारा देने वाले रिकॉर्ड में “कुछ भी नहीं” होने का ज़िक्र किया गया। इसके अलावा जस्टिस भाटिया ने ज़मानत देते वक्त “दरख्वास्त देने वाले के खिलाफ खास सबूत नहीं होने” और “कोई खास इल्ज़ाम नहीं” होने का हवाला दिया है।

एक ऑर्डर (जो दूसरे ऑर्डरों की तरह ही है, बस इसमें कुछ बातें बदली गई हैं) में लिखा गया है, “पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गौर करते हुए और दरख्वास्त देने वाले के खिलाफ कोई सबूत न होने की वजह से, जिससे यह इशारा मिले कि पीड़िता को मौत से ठीक पहले दहेज के लिए किसी तरह की जिस्मानी या ज़हनी तकलीफ दी गई थी। साथ ही इस बात को ध्यान में रखते हुए कि दरख्वास्त देने वाले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह 30.05.2025 से जेल में बंद है, मेरा मानना है कि दरख्वास्त देने वाला ज़मानत पर रिहा होने का हकदार है। लिहाज़ा, ज़मानत की दरख्वास्त मंज़ूर की जाती है।”

सभी 510 मामलों में आख़िरी हिदायतें लगभग एक जैसी हैं। ज़मानत ऑर्डर में कहा गया है कि मुल्ज़िम को “मुताल्लिक अदालत की तसल्ली के मुताबिक 20,000 रुपये के दो ज़मानती के साथ निजी बॉन्ड देने पर” रिहा किया जा रहा है।

इसके बाद यह शर्त भी रखी गई है कि दरख्वास्त देने वाला सुनवाई में हाज़िर रहे, कोई वैसा ही जुर्म न करे और सीधे या घुमा-फिराकर गवाहों को बहकाए या धमकाए नहीं।

Saturday, March 28, 2026

होकर रहेगी नमाज, औकात में रहे बुलडोजर

"इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आर्टिकल 25 की व्याख्या करते हुए कहा कि निजी जगह पर नमाज, दुआ या पूजा मौलिक अधिकार है, लेकिन धर्म के नाम पर दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काने की इजाजत संविधान नहीं देता।"



इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भारत के संविधान का आर्टिकल 25 देश में हर धर्म के लोगों को इबादत के लिए इकट्ठा होने का हक देता है, लेकिन यह दुआ के बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने की इजाजत नहीं देता। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी आदमी की अपनी निजी जगह पर की जाने वाली दुआ या धार्मिक कार्यक्रम पर कोई रोक या रुकावट नहीं हो सकती, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। ये बातें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहीं। याचिका में कहा गया कि योगी आदित्यानाथ का प्रशासन याचिकाकर्ता (मुनाजिर खान) को उस जगह पर नमाज पढ़ने से रोक रहा था, जहां याचिकाकर्ता का कहना है कि एक मस्जिद है। 

याचिकाकर्ता का कहना था कि रमजान के दौरान बड़ी संख्या में लोग आकर नमाज पढ़ना चाहते हैं और एक समय पर नमाज पढ़ने वालों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं हो सकती। 27 फरवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रशासन का फैसला खारिज कर दिया, जिसमें रमजान के दौरान नमाज पढ़ने वालों की संख्या सीमित की गई थी। कोर्ट ने कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। बेंच ने यह भी कहा कि अगर पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर को कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है और इसलिए वे इबादत करने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर वे कानून का राज लागू नहीं कर पा रहे हैं। 

16 मार्च को जब यह मामला फिर से आया तो सबसे बड़ी बात यह हुई कि योगी आदित्यनाथ की सरकार न सिर्फ अपनी बात से पलट गई, बल्कि भरी अदालत में झूठ भी बोलने लगी। आगे सुनिए कि अजय सिंह बिष्ट की सरकार ने कैसे अदालत को बरगलाने की कोशिश की। 16 मार्च को हुई सुनवाई में एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने वकील प्रियंका मिधा की मदद से अदालत को यह समझाने की कोशिश की कि 27 फरवरी के ऑर्डर में 20 लोगों की पाबंदी का जिक्र याचिकाकर्ता के वकील की गलतबयानी की वजह से आ गया, और राज्य ने असल में कभी ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई। कोर्ट ने अजय सिंह बिष्ट उर्फ आदित्यनाथ की सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 27 फरवरी का ऑर्डर खुली अदालत में दोनों पक्षों की मौजूदगी में दिया गया था। फिर जब ऑर्डर लिखा जा रहा था, तब राज्य की तरफ से कोई आपत्ति नहीं की गई। 

कोर्ट ने उस सप्लीमेंट्री हलफनामे को भी देखा, जिसमें उस जगह की तस्वीरें थीं। ये हलफनामा याचिकाकर्ता ने दिया था। यह सब देखने के बाद बेंच ने कहा कि जिस इमारत की बात हो रही है, वह आज की तारीख में मस्जिद नहीं है। हालांकि, यह देखते हुए कि उस जगह का इस्तेमाल पहले नमाज पढ़ने के लिए होता था, कोर्ट ने कहा कि उसी जगह पर नमाज पढ़ने वालों को कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। इस तरह कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए राज्य को कहा कि वह 'मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य' मामले में अपने पहले के फैसले का पूरा ध्यान रखे।

इस मामले में इसी बेंच ने इस साल जनवरी में कहा था कि किसी भी नागरिक को धार्मिक पूजा करने के लिए कानून के तहत किसी भी तरह की अनुमति की जरूरत नहीं होती। यह भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत उसका मौलिक अधिकार है, अगर वह अपनी निजी जमीन पर पूजा कर रहा हो। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई व्यक्ति या कोई समूह अपनी निजी जगह पर पूजा करता है और उसके खिलाफ कोई आपत्ति आती है, तो राज्य को उस पर ध्यान देना चाहिए। जरूरत पड़े तो पूजा की जगह और पूजा करने वालों को सुरक्षा भी दी जानी चाहिए। हालांकि राज्य ने कहा कि वह किसी भी धर्म के लोगों द्वारा अपनी निजी जमीन पर या अपने पूजा स्थल पर की जाने वाली पूजा में कोई दखल या रुकावट नहीं डालेगा। 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी कहा कि वह यह सुनिश्चित करे कि 1995 से उस जगह पर चली आ रही परंपराओं का सख्ती से पालन हो। इस मामले को खत्म करते हुए कोर्ट ने आर्टिकल 25 पर अहम बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि दुआ के लिए इकट्ठा होना अब्राहमिक धर्मों का एक हिस्सा है और यह कानून इबादत के लिए ऐसे इकट्ठा होने को सुरक्षा देता है। बेंच ने कहा, 'यहूदी शुक्रवार को शब्बत के लिए सिनेगॉग में इकट्ठा होते हैं। शनिवार उनके धर्म के अनुसार आराम और सोच का दिन होता है। ईसाई रविवार को चर्च में मास के लिए इकट्ठा होते हैं, और मुसलमान शुक्रवार की दोपहर की नमाज के लिए मस्जिद में इकट्ठा होते हैं। इसके उलट, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म जैसे पूर्वी धर्मों में मंदिरों में पूजा के लिए इकट्ठा होने के कोई तय दिन नहीं होते। इन धर्मों के लोग त्योहारों के समय इकट्ठा होते हैं, जिसमें पूजा भी शामिल होती है।' 

बेंच ने साफ कहा कि आर्टिकल 25 दुआ के बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने की इजाजत नहीं देता। बेंच ने कहा, '(आर्टिकल 25) ऐसे कामों पर रोक लगाता है, जिनसे एक धर्म के लोग दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाएं और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का खतरा हो। ऐसा करने पर वह काम आर्टिकल 25 की सुरक्षा से बाहर हो जाएगा। ऐसा करने वाले व्यक्ति को आपराधिक कानून के तहत सख्त सजा मिल सकती है।'

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आर्टिकल 25 का मतलब यह नहीं है कि यह भारत में इस्लाम धर्म के लोगों को कोई खास दर्जा देता है। कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 25 धर्म और आस्था के मामले में पूरी तरह निष्पक्ष है। इसके तहत एक नास्तिक व्यक्ति भी अपनी सोच, समझ और विज्ञान के आधार पर यह मान सकता है, उसका पालन कर सकता है और उसका प्रचार कर सकता है कि भगवान का कोई अस्तित्व नहीं है। बेंच ने आगे कहा, 'इस गणतंत्र की ताकत इसकी सहनशीलता में है। यह देश 1.4 अरब लोगों का घर है और इसकी ताकत इसकी अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाओं की विविधता से आती है। दुनिया में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है, जहां इतने अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाएं सदियों से शांति और आपसी सम्मान के साथ साथ रह रही हों, और जिसे भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत कानूनी मान्यता मिली हो।' 

इन बातों के साथ ही रिट याचिका को खत्म कर दिया गया। साथ ही राज्य सरकार से कहा गया कि इस ऑर्डर की एक कॉपी उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) तक पहुंचाई जाए, ताकि इसे राज्य में कानून-व्यवस्था लागू करने वाले सबसे निचले स्तर के अधिकारियों तक पहुंचाया जा सके।

अब आइए देखते हैं कि भारत के संविधान के आर्टिकल 25 में है क्या, ये कहता क्या है- 

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में धर्म, आस्था और पूजा की आजादी बहुत अहम मानी जाती है। इसी आजादी को सुरक्षित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 25 दिया गया है। यह अनुच्छेद हर नागरिक को अपनी अंतरात्मा के मुताबिक किसी भी धर्म को मानने, उस पर चलने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है।


इसमें नंबर 1 है आस्था की आजादी। अनुच्छेद 25 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ धर्म मानने का ही नहीं, बल्कि ‘अंतरात्मा की आजादी’ का अधिकार देता है। यानी कोई व्यक्ति चाहे तो किसी धर्म को माने, बदल ले या किसी भी धर्म को न माने - यह उसका निजी फैसला है। एक नास्तिक व्यक्ति भी इसी अधिकार के तहत अपनी सोच पर कायम रह सकता है। नंबर 2 है धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार। यानी यह अनुच्छेद तीन अहम अधिकार देता है: एक, धर्म को मानना, दो, धर्म के अनुसार जीवन जीना और तीन, अपने धर्म का प्रचार करना। लेकिन यह प्रचार जबरदस्ती नहीं हो सकता। किसी को बहकाकर, दबाव डालकर या लालच देकर धर्म बदलवाना इस अधिकार के दायरे में नहीं आता। 

नंबर 3 इसका प्वाइंट है सभी धर्मों के लिए बराबरी। अनुच्छेद 25 की एक और बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह निष्पक्ष है। इसमें किसी एक धर्म को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या कोई भी अन्य धर्म - सभी को बराबर हक मिलता है। यही भारत की धर्मनिरपेक्षता (secularism) की असली ताकत है। नंबर 4 है निजी और सार्वजनिक पूजा की आजादी। यह अनुच्छेद व्यक्ति को अपनी निजी जगह पर पूजा या इबादत करने की पूरी छूट देता है। साथ ही लोग सामूहिक रूप से भी इकट्ठा होकर धार्मिक गतिविधियां कर सकते हैं। लेकिन यह सब कानून और व्यवस्था के दायरे में रहकर ही होना चाहिए। 

नंबर 5 में यह सीमाएं भी देता है। यानी अनुच्छेद 25 पूरी तरह असीमित नहीं है। इस पर कुछ जरूरी शर्तें भी लागू होती हैं: एक, सार्वजनिक व्यवस्था (law and order), दो, नैतिकता (morality), और तीसरा है स्वास्थ्य (health)। अगर कोई धार्मिक गतिविधि इन चीजों को नुकसान पहुंचाती है, तो राज्य उस पर रोक लगा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी धार्मिक कार्यक्रम से हिंसा भड़कने का खतरा हो, तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है। हो सकता है अजय सिंह बिष्ट के प्रशासन ने इसी आधार पर रोक लगाई हो। नंबर 6 है सामाजिक सुधार का रास्ता। अनुच्छेद 25 राज्य को यह भी अधिकार देता है कि वह सामाजिक सुधार के लिए कानून बना सके, भले ही वह किसी धार्मिक प्रथा को प्रभावित करे। जैसे सती प्रथा या देवदासी प्रथा जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाना। नंबर 7 है विविधता में एकता की पहचान। भारत में अलग-अलग धर्म, परंपराएं और मान्यताएं हैं। 

अनुच्छेद 25 इन सबको साथ लेकर चलने की संवैधानिक नींव देता है। यह सुनिश्चित करता है कि हर व्यक्ति अपने विश्वास के साथ जी सके, बिना किसी डर या भेदभाव के। अनुच्छेद 25 सिर्फ एक कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा को दर्शाता है। यह व्यक्ति की आजादी, समानता और विविधता का सम्मान करता है। साथ ही यह संतुलन भी बनाए रखता है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरों के अधिकारों या समाज की शांति को नुकसान न पहुंचाए। इसी संतुलन की वजह से अनुच्छेद 25 भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक माना जाता है।

सबको जज लोया बनाने पर उतारू मोदी-शाह

 


जज लोया का भूत अभी तक जजों के सिर पर नाच रहा है। जज डर रहे हैं कि कहीं यह सरकार उन्हें ही जज लोया न बना दे। जज लोया की मौत के लगभग दस साल बीतने के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज भी अब ढके छुपे ही सही, लेकिन इस मसले पर आवाज उठाने लगे हैं। एक दो नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन-तीन जजों ने इस मसले पर आवाज उठाई है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम पहले ऐसे जजों की हिफाज़त करने में नाकाम रहा है, जिन्होंने हिम्मत और ईमानदारी दिखाई। उन्होंने जज लोया का नाम तो नहीं लिया, लेकिन जुडिशरी के हालिया इतिहास में अगर हम जज लोया के साथ ऐसा होते नहीं देखते हैं तो क्या जस्टिस रंजन गोगोई, या जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ ऐसा होते हुए देखते हैं। 

जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि ऐसी बातों की वजह से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय सही और ईमानदार रास्ता चुनने से पीछे हट सकते हैं। नाम तो नहीं लिया उन्होंने, लेकिन कहने को तो यह कहा ही जा सकता है कि जस्टिस अरुण मिश्रा बन सकते हैं या दीपक मिश्रा भी बन सकते हैं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि कई जजों में बड़े भले के लिए नुकसान उठाने का हौसला और मजबूत यकीन रहा है। लेकिन आज के वक्त में कितने जज अपने करियर की तरक्की के बजाय ईमानदारी को आगे रखेंगे? क्या आप उनसे यह उम्मीद करते हैं कि जो बातें वो दूसरों को समझाते हैं, उन पर खुद भी ईमानदारी से अमल करेंगे? यह एक कड़वी सच्चाई है, जिसे मानना आसान नहीं है। पहले भी कई ऐसे मामले रहे हैं, जहां जो लोग इस रास्ते पर चले, उन्हें कॉलेजियम की तरफ से कोई हिफाज़त नहीं मिली, यानी यह यकीन नहीं दिलाया गया कि उन्हें उनकी ईमानदारी की वजह से परेशान नहीं किया जाएगा।' 

जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई सोच' पर हुए 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के लोगों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथ काम करने वाले जजों की हिफाज़त करनी चाहिए। उन्होंने जस्टिस बी.वी. नागरत्ना से भी अपील की, जो मंच पर मौजूद थीं और कॉलेजियम की मेंबर भी हैं। उन्होंने जस्टिस बीवी नागरत्ना से कहा कि 'कॉलेजियम के मेंबर के तौर पर मैं आपसे गुज़ारिश करता हूं कि आप आगे आएं और उन जजों के साथ खड़ी हों और उनकी हिफाज़त करें, जो वही करते हैं जो आपने अपने उस खास भाषण में कहा था।' जस्टिस दत्ता, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में झिझकना नहीं चाहिए, चाहे इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन के रूप में चुकानी पड़े या इससे हुकूमत में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं। 

बता दें कि इसी महीने यानी मार्च में केरल हाई कोर्ट में हुए 'दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि 'भले ही जजों को पता हो कि गैर-लोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें बतौर अपने प्रमोशन, या एक्सटेंशन में चुकानी पड़ सकती है, या इससे वो हुकूमत में बैठे लोगों की नजर में नीचे गिर सकते हैं। लेकिन यह बातें उनके फैसलों के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। आखिर में हर जज का अपना मजबूत यकीन, हिम्मत और आज़ादी ही सबसे ज्यादा अहम होती है। जज के तौर पर हमें हमेशा अपने ओहदे की कसम का पालन करना चाहिए, जो उनका 'कानूनी फर्ज' है, और अपने करियर पर पड़ने वाले असर की परवाह किए बिना उस पर खरा उतरना चाहिए।' जस्टिस नागरत्ना की बात से भी कहीं न कहीं ये तो लगता ही है  कि जज लोया का भूत  आज तक जजों के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। भारत के जज अब मोदी सरकार से क्या पूरी तरह डर चुके हैं, या कुछ जजाों में जस्टिस मुरलीधर या जस्टिस अुतल श्रीधरन जैसी हिम्मत बाकी है? 

वैसे जस्टिस दत्ता या जस्टिस नागरत्ना ही नहीं, जस्टिस उज्जवल भुइयां भी इस मसले पर बोले हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को वॉर्निंग दी कि जुडिशरी के कुछ हिस्सों में मौजूद "राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार होने की मानसिकता" के चलते आरोपी व्यक्तियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रवृत्तियों के कारण लोग महीनों और सालों तक जेल में ही रह जाते हैं, खासकर उन मामलों में जहाँ कड़े कानून लागू होते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा “जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। नतीजतन, लोग महीनों-महीनों तक जेलों में सड़ते रहते हैं।” जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। क्या जस्टिस भुइयां का इशारा उमर खालिद की ओर था, जिसे कि सभी जानते हैं कि सिर्फ और सिर्फ मोदी और अमित शाह के चलते जेल में रखा गया है। 

बात जब राजा की आ ही गई है, तो देखते हैं कि कैसे जस्टिस नागरत्ना ने मोदी सरकार की वो पोल भी खोली, जिसमें ये भगवा झंडे बार बार अदालत पहुंच जाते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के उस उल्टे रवैये को सामने रखा, जिसमें वो केसों के ढेर पर फिक्र भी जताती है, और खुद ही सबसे ज्यादा केस डालकर उस ढेर को बढ़ाती भी है। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अदालतों में पड़े मुकदमों के ढेर को लेकर सरकार पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि केसों का ढेर बढ़ने के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। उनका कहना था कि सरकार का तरीका सीधा नहीं है। एक तरफ वो कहती है कि केस ज्यादा हो गए हैं, दूसरी तरफ खुद ही सबसे ज्यादा केस डालती है और बार-बार अपील करती है, जिससे मसला और बड़ा हो जाता है। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के केस लड़ने के तरीके पर सख्त सवाल उठाए। 

उन्होंने साफ कहा कि सरकार बहुत ज्यादा केस डालती है और हर बात पर अपील करती है, यही सबसे बड़ी वजह है केसों के ढेर की। उन्होंने कहा कि यह अजीब बात है कि सरकार खुद ही ढेर बढ़ाती है और फिर उसी पर चिंता भी जताती है। उन्होंने कहा, "इससे एक अजीब हालत बन जाती है। सरकार खुद ही शिकायत करती है और खुद ही समस्या भी खड़ी करती है।" उन्होंने कहा कि सरकार से उम्मीद होती है कि वो सोच-समझकर केस डाले, लेकिन इसके उलट वो हर केस को आखिर तक खींचती रहती है। उन्होंने कहा, "सरकार से उम्मीद होती है कि वो एक अच्छा वादी बने, लेकिन ऐसा नहीं होता। वो हर केस को आख़िर तक लड़ती रहती है। सरकार सिर्फ एक पक्ष नहीं है, बल्कि सबसे ज्यादा केस पैदा करने वाली भी है।"

वहीं जस्टिस दत्ता ने यह सवाल भी उठाया कि लोग क्यों कहते हैं कि कॉलेजियम सिस्टम नाकाम हो गया है। उन्होंने पूछा: अगर कॉलेजियम सिस्टम शुरू से ही संविधान का हिस्सा होता, तो डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके बारे में क्या कहते? डॉ. अंबेडकर की इस बात का हवाला देते हुए, 'संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह बुरा साबित होगा। और संविधान कितना भी कमजोर क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे हैं, तो वह अच्छा साबित होगा,' जस्टिस दत्ता ने कहा कि आखिर में सही लोगों को चुनने की जिम्मेदारी जजों पर ही होती है। उन्होंने कहा कि जजों का चुनाव सिर्फ योग्यता से नहीं, बल्कि काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत को देखकर होना चाहिए। 'असली फैसला एक साफ और निष्पक्ष सोच पर होना चाहिए, जो पूरी तरह रिकॉर्ड पर मौजूद बातों पर टिका हो। फैसले जजों के दिए गए फैसलों, रिपोर्ट किए गए मामलों, पेशेवर जांच, लिखे गए काम और दस्तावेजों में दर्ज उनके व्यवहार के आधार पर होने चाहिए। और आखिरी बात, दूसरा पॉइंट भी बहुत अहम है। 

उन्होंने कहा कि निजी जान-पहचान, सामाजिक करीबियां, लॉबिंग, गैर-औपचारिक सिफारिशें, या हुकूमत में बैठे लोगों के साथ कथित रिश्ते — चाहे वह न्यायिक हों, राजनीतिक हों या किसी और तरह के — इन सबको पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।' अपने भाषण में जस्टिस दत्ता ने यह भी राय दी कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 40 कर दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि आखिरी बार 2019 में जजों की संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी, और उसके बाद से मामलों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कोलेजियम की भी पोल खोली थी। इसी महीने यानी मार्च में उन्होंने कहा था कि कॉलेजियम में साफगोई की इतनी कमी है साफ़गोई में कि खुद जजों को भी अक्सर यह नहीं पता होता कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और कहां बैठकर फैसले करता है। उन्होंने कहा था कि "आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि हमें सिर्फ यह नहीं पता कि क्या चल रहा है... हमें तो यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहां बैठ रहा है।"

दरअसल मौजूदा सीजेआई सूर्यकांत जबसे आए हैं, तभी से कोर्ट कचेहरी के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर कॉलेजियम चला कौन रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट के जज साहबान चला रहे हैं या सरेंडर सिलेंडर मोदी सरकार चला रही है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जस्टिस मुरलीधर के रातोंरात ट्रांसफर को लेकर बदनाम हुए सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर को लेकर फिर से बदनामी का भगवा चोला ओढ़ लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन सीनियॉरिटी में इस वक्त किसी न किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की अहमियत रखते थे। लेकिन मोदी सरकार के कहने पर उनको मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में भेज दिया गया। न सिर्फ भेज दिया गया, बल्कि वहां उनकी सीनियॉरिटी सातवें नंबर पर बना दी गई, ताकि वो हाई कोर्ट के कॉलेजियम में भी न रहने पाएं। 

वहीं उनसे जूनियर जज एसए धर्माधिकारी को सरेंडर मोदी के हक में फैसले सुनाने के चलते मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। और सीजेआई संजीव खन्ना के बाद, या कि कहें कि पिछले सीजेआई बीआर गवई के बाद से जबसे ये नए वाले सीजेआई सूर्यकांत आए हैं, सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने अपनी डिटेल वेबसाइट पर डालनी ही बंद कर दी है। मतलब पहले जनता को हक था, और हक तो खैर अब भी है सब कुछ जानने का, लेकिन कॉलेजियम में सीजेआई सूर्यकांत ऐसा क्या कर रहे हैं कि हर चीज में पर्दादारी है। उनकी इसी पर्दादारी के खिलाफ रीढ़ सीधी रखने वाले कुछ जज बोलने लगे हैं। जाहिर है, कि पहले जज लोया, फिर जस्टिस मुरलीधर, फिर जस्टिस अतुल श्रीधरन, यानी जजों को ये मोदी सरकार आजादी से कहीं भी काम न करने देने को जिस तरह से आमादा है, कुछेक जज ही सही, लेकिन आवाज तो उठने ही लगी है।