Monday, March 30, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 10 (फुटकर नोट्स)


1-
हमने नशा नहीं कि‍या था, पर नशे में थे। उनने नशा भी कि‍या था और ज्‍यादा नशा करने के उनके पास ज्‍यादा कारण थे। वो शोर मचा रहे थे, संगीत बजा रहे थे। शोर और संगीत हममें भी खूब मच और बज रहा था। वो दि‍ल्‍ली जीत लेने पर आह्लादि‍त थे, हम खुद को हार जाने पर... हमारे सामने ये ति‍रंगा मंद हवा में अलट पलट रहा था। और भी बहुत कुछ अलट पलट रहा था। शोर था, संगीत था, नशा था और ति‍रंगा भी था। बस ये हवा ही कुछ धीमी हो चली थी...। अब शायद कई लोगों के लि‍ए सांसों को लंबा करके छोड़ने का वक्‍त आ गया है।
2-
कॉफी लेंगे सर। पानीदार प्‍लास्‍टि‍क की ट्रे में थर्माकोल के ग्‍लास में फूली हुई कॉफी दि‍खाकर उसने पूछा। हमने कहा नहीं। उसने कहा केजरीवाल की कॉफी है। हमने कहा नहीं, हम चाय पीते हैं। उसने कहा चाय का जमाना गया, अब आपका वक्‍त है। हमने फि‍र भी कहा कि नहीं, हमने चाय ही पीनी है। वो हमारे बीच कॉफी का ट्रे ढक्‍कन लगवाकर रखकर चाय लाने चला गया। हमने कॉफी के कपों के साथ दूरि‍यां बरतकर रखीं। ति‍रंगा अब भी लहराकर फैलने की पुरजोर कोशि‍श कर रहा था। कॉफी के पानीदार प्‍लास्‍टि‍क के ढक्‍कन पर पांच साल केजरीवाल का स्‍टीकर लगा था। हम आज शाम ही आइंदा के सालों का वायदा ले लेना चाह रहे थे... वहां साल लि‍मि‍टेड थे, यहां अनलि‍मि‍टेड। पॉलि‍टि‍क्‍स अभी भी लि‍मि‍टेशंस तोड़ देती है।
3-
हम दया करते हैं तो प्रेम नहीं कर सकते। उसने कहा। हम प्रेम करते होंगे तो शायद दया नहीं कर सकते। मैने सोचा। इस बार हवा जरा सी तेज चली और तिरंगा उड़कर आधा हो गया। उसने कहा- यू सक्‍स। उधर संगीत और नारों का शोर दोबाला हो गया। इधर संगीत का वॉल्‍यूम धीमा होता गया और शोर बढ़ता गया। थककर कई सारे चरसी मैदान में औंधे पड़े थे और हम एक बाउंड़ी वॉल पर। हम सब थके थे। हम सब सीमाओं में बंधे थे। हम सब बंधन तोड़ने की लंबे अर्से से कोशि‍श कर रहे थे। हम सब बंधन तोड़ चुके थे... या फि‍र हमें बस लग रहा था कि हम सबकुछ तोड़ चुके हैं।
4-
हम जीत चुके हैं, इसलि‍ए बाद में बात करेंगे। आप ने कहा। हम हारकर थक चुके हैं, इसलि‍ए बात नहीं करेंगे। उसने कहा। हमारे पास बहुत सारे अधूरे काम हैं। आप ने कहा। हमारे पास बहुत से अधूरे काम हैं। उसने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍ए। आप ने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍एं। उसने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। आप ने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। उसने कहा। पालि‍का बाजार की उन अचानक तंग होती सीढ़ि‍यां में अपना पैर कि‍सी की एड़ि‍यों तले दबवाते मैं सोचता रहा... मैं कहां कि‍सके तले इस वक्‍त होउंगा।
5-
कल खुशी की रात थी। कि‍सी को नींद नहीं आई। आज वि‍जय की रात है, जीतने वाले चैन की नींद सोएंगे। हारने वालों की बैटरी बार बार लो होगी, फि‍र भी वो उसे चार्ज नहीं करेंगे। बैटरी चार्ज करने के बावजूद हारने वालों को जीतने में कोई मदद नहीं मि‍लने की, भले ही बैटरी फुल चार्ज हो। एफबी पर फोटो मैसेज दि‍खा- जीत हार में बस हार जीत जि‍तना ही फर्क होता है।

Sunday, March 29, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-9

तुम परेशान होगे, बार बार तुम्‍हारा मन कभी कुछ करने को तो कभी कुछ कहने को कचोटेगा, लेकि‍न कह नहीं पाओगे। सांसें अंदर जाएंगी तो सवाल के साथ जाएंगी कि जा क्‍यों रहीं हैं और जाने से पहले रुक क्‍यों न गईं, इन दो सवालों के साथ-साथ तुम्‍हारी सांसें ही तुम्‍हारी सजा होंगी। हर सुबह तुमसे अपना हि‍साब लि‍खवाएगी, पलक का हर झपकना तुमसे पानी की दरख्‍वास्‍त करेगा, लेकि‍न न तो तुम अपना हि‍साब पूरा कर पाओगे और न ही पानी की कोई दरख्‍वास्‍त। तुम अपना सबकुछ मुझे बताना चाहोगे, फि‍र भी न बता पाओगे और अगर बताओगे, तो भी मैं उनमें से कोई भी बात नहीं सुनने वाली, समझना तो उतनी दूर की बात है जि‍तना तुम्‍हारा हि‍साब और दरख्‍वास्‍त के नजदीक जाकर उन्‍हें वैसे सहलाने की हि‍म्‍मत करना। तुम अक्‍सर चौंकोगे, अपने चौंकने को अपनी नि‍यति न मानने की जि‍द में बार बार फि‍र से वैसे ही चौंकना चाहोगे और कभी कभार शायद तुम्‍हारा चाहना पूरा हो भी जाए, लेकि‍न याद रखना, तुम्‍हारा चाहने की हद सिर्फ तुम्‍हारे चौंकने तक ही खुदी हुई है। और हां, ये दरार इतनी चौड़ी है कि इ‍समें मैं अपने उसी मुखौटे के साथ अंदर तक पैवस्‍त हूं, जि‍से पार करने की हि‍म्‍मत तुम्‍हारे अंदर के मैं में तो नहीं है, नहीं ही है।

मुझे पता है कि मेरा मन कचोटेगा, लेकि‍न आखि‍र है तो मेरा ही मन। सीधी सच्‍ची बात ये है कि मेरे मन में क्‍या चल रहा है, इससे वाकई दुनि‍या को या फि‍र तुम्‍हें भी कोई खास मतलब नहीं है, अगर होगा भी तो मैं ये अच्‍छी तरह से जानता हूं कि तुम तो मुझे कभी नहीं बताओगी और दुनि‍या अव्‍वल तो आदतन नहीं बताएगी और अक्‍सर इरादतन नहीं। सांसों का सवाल भी कोई नया नहीं है और नया न होने के बावजूद बस इस सजा को कुछ देर के लि‍ए भूलने की कोशि‍श करने में न तो कोई बेजा बात है और न कोई बेइमानी, इसलि‍ए सजा को अगर कुछ देर के लि‍ए भी भूला रह गया तो ये मेरी अपनी सांसों के साथ कुछ गनीमत होगी, जि‍सका शायद सि‍वाय मेरे और कि‍सी से कुछ लेना देना नहीं है। मुझे ये भी पता है कि दुश्‍वारि‍यों की दरख्‍वास्‍त बड़े ही कमजोर पन्‍नों और बड़ी ही फीकी स्‍याही से लि‍खी होती है। पन्‍ना हाथ में लेते ही चि‍टककर टूट जाता है और हर्फ बेपढ़े ही उसी पन्‍ने में गीले होकर जज्‍ब हो जाते हैं। मैं ये भी जानता हूं कि मेरे चौंकने से न तो दुनि‍या चौंकती है, न तुम चौंकती हो और तुम्‍हारा वो मुखौटा तो बि‍लकुल भी नहीं चौंकता जो चौंकने से लेकर ऊपर से नीचे तक की सारी दरख्‍वास्‍तों को सांसों से जुड़ी एक तफरीह मानता है। 

Saturday, March 14, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-8

और फि‍र ऐसा वक्‍त आया जब हर गलत पर दोनों एक दूसरे की दाद देने लगे। आदमी ने सबसे पहले गलत बोलना शुरू कि‍या और औरत ने सबसे पहले उस गलत पर वाह की दाद दी। आदमी मुसलसल गलत बयान करता जाता था। भाषा और उसकी खूबसूरती को पूरी दुर्दांतता से नष्‍ट करता जाता था और जब जब जि‍तना भी क्रूर हुआ, हर क्रूरता के स्‍वागत में एक दाद बड़ी खामोशी से कि‍सी पुल से उसे नि‍हारते सबसे ऊंचे सुर में सराहती सहलाती हुई मि‍ली। दोनों के हाथों में बस औरत की ही पकड़ मजबूत थी जो पूरे जोर के साथ हथेलि‍यों को पकड़ती थी, दबाती थी और तफरीहन एक अंगूठे से दो उंगलि‍यों के बीच सहलाती थी। मुख्‍तसर में अगर इसे समेट दें तो दोनों एक दूसरे के साथ बेहद क्रूर होने की कोशि‍श करने की जद्दोजहद में हर गलत को दाद देते देते कुछ इस कदर मुलायम होते जा रहे थे कि उनका आने वाला वक्‍त चि‍ल्‍ला चि‍ल्‍लाकर उनके न हो पाने की बात बता रहा था, पर दाद के शोर में और अंगूठे के जोर में न तो वो सुनाई दे पा रहा था और न ही उसका अहसास हो पा रहा था। ये वो वक्‍त था जब दोनों उस हरी बेंच पर बैठकर हवाओं के चलने और सामने लगे झंडे का लहराकर और बलखाकर भी उड़ने का इंतजार करते हुए एक दूसरे से हवाओं के न चलने की शि‍कायत कि‍या करते थे, लेकि‍न उनकी लाख शि‍कायतों के बीच गलति‍यों का एक बीज फूटकर अपनी हरी पत्‍ति‍यां बाहर फेंक चुका था और हर पत्‍ती के साथ एक मनमोहना फूल जानबूझकर नजरअंदाज की जाने वाली गलति‍यों के साथ खि‍ल रहा था। उन्‍हें बि‍लकुल भी इसकी परवाह नहीं थी और जो होनी भी नहीं थी क्‍योंकि जो हो रहा था वो सबकुछ अपने आप बस होता ही जा रहा था। उसे होने से रोकना चाहते हुए भी, जि‍समें कि‍सी को कुछ साबि‍त नहीं करना था या कि‍सी को उसे होने के बारे में सोचना भी नहीं था, वो दोनों कुछ ऐसे लम्‍हों की बुनावट में लगे थे, जि‍नकी सलाइयों ने पहले के आठ फंदे ही इस कदर उलझा दि‍ए कि उन्‍हें सुलझाते सुलझाते दोनों को कब ये लगने लगा कि दोनों पुराने हो गए हैं, पता नही नहीं चला। इस पता न चलने या पता न चलने देने की जबरदस्‍ती ने दोनों को कब उस बेंच से उठाकर हरे मैदान में बैठा दि‍या, कब दोनों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जि‍द में बाजार ने उन्‍हें हाथोहाथ लि‍या, इसका जि‍क्र बेकार है। बल्‍कि बेकार वो सबकुछ ही है, जो है और जो होने से बचा हुआ है, वो भी। 

हिंदी के चि‍रकुट धनी

फोटोकार: इरफ़ान 
हिंदी समाज कैसा तो धन्‍यभाव होकर अपनी अहमन्‍यता में नहाया चूति‍यानंदनकानन संसार है, अरे अरे अरे? फि‍राक की कि‍ताब (उर्दू भाषा और साहि‍त्‍य-हिंदी समि‍ति‍-1962) तो आपने पढ़ी नहीं होगी, कहां से पढ़ते घंटा, फेसबुक को अपने सूप से चालने से दम भर की फुरसत होती, तब ना पढ़ते! (मैत्रेयी जी गुप्‍ता जी के सौजन्‍य से हासि‍ल घटना से सीखकर उनकी चरण वंदना करते हुए) भाषा का गहरा अंधेरा, उसे जान और पहचान लेने की समझ होती, तब ना पढ़ते! हिंदी के चि‍रकुट धनी, ससुर मुंह खुलवाकर गंद मचवाने पर मुझे मजबूर मत करो, हालांकि मैं मजबूर हो रहा हूं। अबे दोजख में फंसे हुए धंसे नीचता के अंधेरे प्रति‍मूर्ति (शि‍वमूर्ति नहीं-वो जो लखनऊ वाले हैं- आपको नहीं कह रहा हूं सर), अबे तुमको कौन रास्‍ता दि‍खाएगा? हाइडलबर्ग दि‍खाएगा या न्‍यूयॉर्क? अबे तुम तो करोलबाग के भी काबि‍ल नहीं हो, रोहि‍णी में ही क्‍यों नहीं रहते रहे? आह, आह, ओ मेरे अल्‍ला, ओ मेरे मौला!! (जि‍नको अल्‍ला पढ़ना हो पढ़ें, घंटा मुझे कोई परवाह नहीं।) बि‍ना अयोध्‍या उर्दू मंडल खुले कुछ भी अच्‍छा नहीं होने वाला है। अयोध्‍या, तुम चिंता ना करो, उर्दू का मैदान बनाने मैं आ रहा हूं। मगर वो कौन चूति‍या थे ससुर जो दोजख को कबीर का मैदान बनाने पर आमादा हुए। अबे क्‍यूं रह रहे हो दि‍ल्‍ली वालों, शहर छोड़कर चले क्‍यूं नहीं जाते? माले की मीटिंग भी हो रही है, क्‍या उतना बहाना दि‍ल्‍ली से भागने के लि‍ए काफी नहीं? इंतजार हुसैन साहब, पूरी जिंदगी नि‍कल गई आपकी इंतजार करते-करते... (रेख्‍ता वाली मीटिंग में ही रहि‍एगा, माले वाली में मत चले जाइयेगा) राधे, तुम कहां हो? भारत किंबा अल्‍बर्ट पिंटो , क्‍या मजाल जो तुमने अभी मुंह खोला, बहुत पीटूंगा हरामी!! मसाला मुंह में रखे हूं इसका ये मतलब नहीं कि तुम मेरा जब चाहे गोड़ खींच लो। मर्द का बच्‍चा हो तो क्‍या मजाल कि तुम नरक देखने जाओ। नरक देखने जाओगे तो वापस सि‍नेमाहाल से बाहर नहीं आ पाओगे। कबीर के भजन की ऐसी कलात्‍मक दर्दनाक दुर्गत करने की हि‍म्‍मत तो डेवि‍ड धवन या कुमार सानू भी नहीं कर पाए। ऐसी दुर्दांत फि‍ल्‍मकारी कर दि‍ए कि सि‍द्धांत मोहन ति‍वारी तक उसकी समीक्षा नहीं कर पाए। और भावना, अगर तुम ये फि‍ल्‍म देखने गई तो बकबक का फ्रेंच और किर्गीज में अनुवाद करना भूल जाओगी, कानपुर का स्‍टेशन तक भूल जाओगी।

राधा, तुम कहां हो? तुमको सचमुच मन बहुत मि‍स कर रहा है। क्‍या सचमुच बंगाल भाग गई हो या कि‍सी मलयाली के साथ भागी हो? अब क्‍या बंगाली के साथ साथ मलयाली से भी नफरत करना शुरू कर दूं? वैसे तुम्‍हारे उस तफरीह वाले जीजा से सेपरेटली करने की गारंटी करने वाला कोश भी तैयार हो रहा है जो सुयश के कथित जुंबा और टि‍टिंबा कोश में इजाफा करेगा। (कोश को कोश ही समझें, ज्‍यादा सेंटीमेंटाने की जरूरत नहीं है)

माले की मीटिंग कल से है, कौन-कौन कामरेड आ रहे हैं? फि‍राक सत्र का संचालन मैं करूंगा।

Thursday, March 12, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 7

आखि‍रकार उसकी जिंदगी में एक ऐसा वक्‍त आया, जब उसे लगने लगा कि इस दुनि‍या में जो कुछ भी बाकी बचा रह गया है, वह सबकुछ एकसाथ मि‍लकर उसके सि‍र पर एक दि‍न कुछ यूं गि‍रेगा कि उसकी और उस जहाज की तबाही में कोई खास अंतर न रह जाएगा, जो एक दि‍न कहीं जाने को तो नि‍कला था, लेकि‍न उसका आखि‍री पुर्जा भी कि‍नारों तक पहुंचने में सि‍रे से नाकामयाब रहा। उसे लगने लगा कि सारा दोष उसकी शक्‍ल का है, उसे यकीन होने लगा कि उसके बालों से सि‍तारे बार बार उलझ जाते हैं और उसे ये भी लगने लगा कि अगर इस शक्‍ल को जल्‍द हटाया न गया तो दुनि‍या के उस बोझ से उसे मुक्‍ति नहीं मि‍लने वाली। मुक्‍ति की उसने नई नई परि‍भाषाएं गढ़नी शुरू कर दीं जि‍समें से एक उस मासूम के चेहरे से भी होकर गुजरती थी जि‍सकी मासूमि‍यत को वो ढाल बनाकर दुनि‍या के आगे आकर खड़ी होती थी, बगैर ये सोचे कि मासूम चीजें ढाल नहीं हुआ करतीं। कुछ ऐसी भी परि‍भाषाएं बनीं जो अपनी जगह ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थीं पर इतनी लि‍जलि‍जी थीं कि दूसरों पर वो रोज ब रोज चि‍पकाई जाने लगीं। वो सोचना चाहती थी या नहीं, ये बात ज्‍यादा सोचने की नहीं, असल बात ये है कि वो करती क्‍या थी और उसका दुनि‍या पर फर्क क्‍या पड़ता था। खुद को छुपाने और बेखुद को दि‍खाने के अलावा भी दुनि‍या थी कि बहुत कुछ देखना चाहती थी और कमोबेश देख भी लेती थी। औरत के मन की रातें तक दुनि‍या के सामने कुछ यूं उजली बि‍खरी पड़ी थीं ज्‍यूं कि खुले काले आसमान में सारे सि‍तारे छि‍तराए रहते हैं। उसके भीतर का आदमी जि‍स रास्‍ते पर जा रहा था, गि‍रते पड़ते और अक्‍सर तो लड़ते लड़ते वो भी उसी रास्‍ते पर कदम बढ़ा रही थी जो आगे से बंद था, जि‍स रास्‍ते से आगे जाने का सि‍लसि‍ला शुरू होने के साथ ही अपने अंत की भवि‍ष्‍यवाणी लेकर उस औरत की मुट्ठी में बंद था। लेकि‍न ये औरत ही थी जो मुट्ठी खोलने को तैयार नहीं थी। आदमी था कि आगे बंद रास्‍ते की तरफ बढ़ा जा रहा था। औरत दूर से आदमी का पीछा कर रही थी, बड़बड़ाते, गालि‍यां देते और बार बार मुखौटे बदल बदलकर।  

Wednesday, March 11, 2015

पीर उठे जो जावैं राम, घाव रि‍से जो आवैं राम

पीर उठे जो जावैं राम
घाव रि‍से जो आवैं राम
चोट के ई का चक्‍कर है
हमका भी समझावैं राम।

कनक बि‍हारी के होय आरती
सबका सुबे जगावैं राम
हम तो कबसे जागा बैइठा
हमका भी त सोवावैं राम।

काट करेजवा देहे हो भइया
बकि‍या त अब बचावैं राम
गुड़ के डली ससुराल चली
दि‍ल त अब धड़कावैं राम।

धोय रगड़ के साफ करी हम
छि‍न छि‍न गंद मचावैं राम
हर सुफेद मा करि‍या धब्‍बा
यहि बि‍धि देस देखावैं राम।

मना करे जौ मान जांय यै
कइसे फि‍र कहि‍लावैं राम
कवि कै मन कब स्‍थि‍र होए
फि‍रि-फि‍रि चंवर डोलावैं राम। 

Friday, March 6, 2015

मैनें उससे ये कहा/ मुर्शिद/ हबीब जालि‍ब

क्‍या चचा गालि‍ब अल्‍ला ताला को प्‍यारे हो गए ? क्‍या मियां मीर नूर खानम की याद में नहर का बर्फ जैसा पानी पी-पीक गला इतना खराब कर लि‍ए कि उनकी आवाज अब कि‍सी को सुनाई नहीं देती है ? खैर, वो दौर और था वो वक्‍त और था.. 

मरहूम हबीब जालि‍ब हों या पाश, हालि‍या ना गुजरने वाले गुजरे वक्‍त के जरि‍ए बहुत कम आवाजें सुनाई देती हैं, दोनों उन्‍हीं आवाजों में हैं। बाअदब माफ करने वाली गुस्‍ताखी के साथ मैं ये अर्ज करना चाहता हूं कि हर दौर की तरह इन्‍हें भी वो खि‍ताब मि‍लना चाहि‍ए, ये उस वक्‍त का सम्‍मान होगा, जि‍समें इन्‍होंने कहने के लि‍ए जलते हुए हर्फों का हल उठाया। वरना अंगुलि‍माल वाजपेयी भी आप हो सकते हैं और दो सौ चालीस रि‍सर्च खुदपर कराकर चश्‍मा पेट पे उगती नाक पर लगाकर एक पेट तक लटकता चेहरा पैदा करने में महारत हासि‍ल कर खि‍ताब और कि‍ताब, दोनों की ले सकते हैं।  

मैंने उससे ये कहा
            ये जो दस करोड़ हैं
            जेहल का निचोड़ हैं
         
            इनकी फ़िक्र सो गई
            हर उम्मीद की किरण
            ज़ुल्मतों में खो गई

            ये खबर दुरुस्त है
            इनकी मौत हो गई
            बे शऊर लोग हैं
            ज़िन्दगी का रोग हैं
            और तेरे पास है
            इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा

            तू ख़ुदा का नूर है
            अक्ल है शऊर है
            क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये शर पसंद हैं
इनकी खींच ले ज़बाँ
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा

            जिनको था ज़बाँ पे नाज़
            चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़
            चैन है समाज में
            वे मिसाल फ़र्क है
            कल में और आज में
            अपने खर्च पर हैं क़ैद
            लोग तेरे राज में
            आदमी है वो बड़ा
            दर पे जो रहे पड़ा
            जो पनाह माँग ले
            उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा

            हर वज़ीर हर सफ़ीर
            बेनज़ीर है मुशीर
            वाह क्या जवाब है
            तेरे जेहन की क़सम
            ख़ूब इंतेख़ाब है
            जागती है अफ़सरी
            क़ौम महवे ख़ाब है
            ये तेरा वज़ीर खाँ
            दे रहा है जो बयाँ
            पढ़ के इनको हर कोई
            कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा

            चीन अपना यार है
            उस पे जाँ निसार है
            पर वहाँ है जो निज़ाम
            उस तरफ़ न जाइयो
            उसको दूर से सलाम
            दस करोड़ ये गधे
           जिनका नाम है अवाम
            क्या बनेंगे हुक्मराँ
            तू "चक़ीं" ये "गुमाँ"
            अपनी तो दुआ है ये
            सद्र तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा

Tuesday, March 3, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-6

आदमी का मन है कि मन से बाहर बस यूं ही नि‍कल जाता है, पर मन सी बात कहीं पाता है-नहीं पाता है इसकी खबर लि‍ए बगैर ही मन से बाहर नि‍कलता और अक्‍सर तो बहता चला जाता है। औरत का मन है कि मन ही मन सि‍मटा और बगलों में चि‍पका कभी कभी सड़कों पर बेतरतीब घि‍सटता चला जाता है। आदमी फूटना चाहता है और औरत महसूस करना चाहती है। आदमी मन में बात करते करते बीत जाना चाहता है, औरत एक मजबूत जकड़न में जकड़े जकड़े रीतती जाती है। आदमी सामने लगे झंडे की बात करता है, औरत उसे उड़ाने वाली हवा की। आदमी को भूख भी लगी है, औरत को चाय की इच्‍छा है। आदमी रोना चाहकर भी नहीं रो सकता, औरत न चाहते हुए भी बार बार रो देती है। आदमी का मन, मन से जैसे ही बाहर आना चाहता है, औरत का मन झट से कहीं छुप जाता है। इस बीच हवा थोड़ी सी तेज चलती है, आदमी जैकेट पहन लेता है। औरत एक और वादा चाहती है, आदमी मन ही मन मुस्‍कुरा देता है। आदमी सपने देखता है, औरत कहती है कि वो सपनों से घबराती है क्‍योंकि उसे अकेले मरने के सपने आते हैं और यकीनन ये एक सार्वभौम सपना होगा जो ति‍रछी नजरों से नहीं देखा जाता होगा, जो बेइमानी के साथ कभी न बरता गया होगा। एक दिन आदमी ने औरत को एक सपना बताया। इसमें न आप था, न तुम था। जो था वो बस एक शायद था। ठीक दूसरे दि‍न औरत ने भी वही सपना देखा। दोनों अपने अपने सपनों में घि‍सट रहे थे, लोग दोनों को दोनों तरफ से खींच खींचकर आधा कर देना चाहते थे। पहले से ही दोनों की आधी जान और पूरा मन सपनों में ही जज्‍ब हो रहे थे, उसपर ये शायद के बाद की दुनि‍या, जि‍से कोई भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहा था। सपनों में घसीटे जाने से ऊबकर दोनों ने एक दूसरे पर शर्तें लादने का नया दौर शुरू कर दि‍या। असल में ये दौर नहीं बल्‍कि शुरुआती मुफलि‍सी का मन में दायर वो मुकदमा था जि‍समें न तो मुद्दई था और न गवाह। न वकील था और न ही कोई मुंशी। दोनों जज थे और वो भी दोनों की तरफ पीठ कि‍ए हुए। कैसी अजीब पीठ थी उस मुकदमे की जि‍सके जज ही शायद की दुनि‍या में आकर एक दूसरे पर शर्त दर शर्त दुश्‍मन बने जाते थे। आदमी हंसता है कि वि‍दा का गीत दोनों ने शुरुआत से ही पढ़ा था। आंगन में बच्‍चा खि‍ला लेने की ख्‍वाहि‍श से लेकर जांघों की मछलि‍यों को एक साथ बरता था।
(जारी...)

मि‍लेगा तो देखेंगे-इंट्रो- विपुमेले में हि‍ले हुए को कैसे देखें

हि‍लते-हि‍लते शुरू होता है। क्‍या मजाल दि‍न कि‍सी भी दि‍न चैन से शुरू हो। कैसी उम्‍मीद भरी नजरों से देखता हूं, मायूसि‍यों के डूबे समंदर में बेहयाई से इस हि‍लन को थामकर सुस्‍थि‍रता की तरकीब हासि‍ल करने को हाथ पैर पटकता हूं, मगर दि‍न की तो कोई क्‍या कहे, हरामखोर डोंगल तक जो अपनी जगह सुस्‍थि‍र रहे, कनेक्‍ट होता नहीं कि डि‍स्‍कनेक्‍ट होता हूं। ओह... कैसा हिलता हुआ डोंगल है और कैसे हि‍ले हुए दि‍न। बेवकूफ लोग क्‍या जानें, क्‍या हमारी हसरत थी, खूब थी कि हम भी तीन नई कि‍ताबों के कवर के साथ फोटो खिंचाएं। मगर क्‍या मजाल कि फोटो चैन से खिंच जाए, वह भी साली मि‍ली, तो हि‍ली हि‍ली। एक प्रेम था ठहरा हुआ, चल रहा सा, मगर आज खबर हुई कि वह भी अपनी जगह था हि‍ला-हि‍ला सा। सन्‍न हूं... यह कैसा दौर है? कैसा समय है? कैसे लोग हैं? और कैसा मैं हूं? इतने हैं फोटो लहरा रहे, क्‍या क्‍या हि‍ला रहे, फि‍र ऐसा क्‍यों है कि मैं ही हि‍ला हि‍ला हुआ हूं? दि‍खता हूं कभी कभी पुस्‍तक मेलों में खुद को, मगर वह सुस्‍थि‍र मैं नहीं, 'मेरा मैं' हि‍ला हुआ है।

मेरे महबूब तुम्‍हारा शुक्रि‍या कि तुमने ऐसा हि‍लाया।

Monday, March 2, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 5

जब भी आदमी अपने मन को माशूक कर थोड़ा सा भी मुलायम होने की सोचता, मन के सारे कोने कमरे की हर ओर से नि‍कलकर एक साथ आ खड़े होते और शोर करने लगते। ये लालसा भी आदमी को उस शोर से बाहर न नि‍काल पाती जो कोने दर कोने उसके मन में पैवस्‍त हुए जाते थे। औरत बार बार भरोसा दि‍लाती थी, आंखों में मन को उतारती थी, हवाओं को बि‍छा देती थी, पहाड़ों में लहलहा उठती थी और टटोलने पर फूटकर बहने भी लगती थी। आदमी कुछ और कमजोर होकर कहता था कि वो यूं ही फूटकर बह जाएगी और उसके लब एक एक कतरा आब को यूं ही तरसते रहेंगे, बजाय इसके भी मन उस आब का माशूक है और आइंदा भी बना रहेगा। पहाड़ी नदी ने पत्‍थर पर कई कतरे बना डाले थे जि‍नमें से बूंद बूंद पानी पत्‍थर और उस नदी के होने तक रि‍सता रहेगा। ये एक सोची समझी नि‍यति थी जो लाख मुफलि‍स वक्‍तों के होते हुए तय हो चुकी थी। आदमी को गुमान था कि वो होनी को टाल सकता है, औरत को यकीन था कि वो होनी को पलट सकती है। दोनों के मन का शोर उस मैदान में होते शोर के साथ बढ़ता जा रहा था, जो कई तारीखों का नया गवाह हुआ होना चाहता था। उस तनहा झंडे के साथ फैलता जा रहा था जो खुद ब खुद चमकने में नाकामयाब था, जि‍स दि‍न में दि‍न की तो रात में बि‍जली सी रोशनी की हर वक्‍त जरूरत थी, जो खुद लहराने या फहरने में भी कि‍सी काम का न था अगर हवा न चले। कोने थे कि चुपके से कैसे आकर कमरे में खड़े हो जाते थे, शोर की उस डूब में पता ही न चलता था, लेकि‍न जब झिंझोड़ते थे तो दोनों उठ-उठकर अलग अलग या एक ही दि‍शा में बगैर एक दूसरे को देखे भागने लगते थे। इन सब के बीच कठोर हाथों में जो हाथ था, वो अपनी मुलायमि‍यत न खोने के लि‍ए दूसरे हाथ से लड़ रहा था, पर बार बार हारकर मायूस बैठ जाता था या कान में कुछ बुदबुदाने लगता था। कहीं भी न जाने का ये वक्‍त दोनों को बेंच से लगातार उठने को मजबूर कर रहा था और दोनों ने खुद भी कहीं न पहुंचने का शाप अपनी अपनी मर्जी से चुना। दोनों भागने के लि‍ए बैठे रहे। इस बीच हाथ उन सारी खुशबुओं को याद करने के लि‍ए उनके कोनों में दुबका रहा, जो अभी तक नि‍कलकर कमरे में आने की हि‍म्‍मत नहीं कर पाए हैं, पर जि‍नका आना होना है और होना ही आ जाना।

Sunday, March 1, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 4

कि‍तनी बार तो उसने औरत से कहा कि वो उसके मन सी नहीं थी और उसका मन भी उसके मन सा नहीं था, इसीलि‍ए जो था, वो मन नहीं था और जो नहीं था, वो अरगनी पर लटकी आस्‍था की मानिंद चि‍ढ़ा रही थी। जाने कैसा वो वक्‍त था, जाने कैसी वो हवा थी, जाने कैसा वो खोल था और जाने कैसे वो आदमी-औरत थे जो बार बार अपने मन मुताबि‍क मरने का वादा लेकर अपनी बेहूदी आस्‍थानुमा मायूसि‍यों को थोड़ा और पुख्‍ता कर लेना चाहते थे। ये पत्‍थर पर जबरदस्‍ती उगती काई जैसी को अनचाही इच्‍छा ही रही होगी जि‍सपर फि‍सल कर जबरस्‍ती की आस्‍थाएं और मायूसि‍यां अपने पूरी होने की ताकत के साथ आत्‍मा पर गि‍रती हैं और अपने आने को ही खोते हुए एक दरार पैदा करके आगे बढ़ जाती हैं। आदमी बार बार उससे कहकर बगैर नाप का एक और गड्ढा खोदता था कि तुम जिंदा रहना ताकि मुझे मरते हुए देख सको या मेरे मरने की खबर तो पा सको। औरत फि‍र से डर जाती थी कि मरने पर, मन से मरने की एकाधि‍कृत आस्‍था उसी की है, जो गड्ढा उसने खुद बाकायदा नाप के साथ खोदा है, वो कि‍सी और का कैसे हो सकता है। अगर मायूसि‍यों की प्रमेय हर कोई सिद्ध करने लगे तो वो पाइथागोरस का नंगा बदन जली कोठी के कूड़ेदान में ही फेंक दि‍ए जाने काबि‍ल है। बाद में भले ही कोई जेसीबी उसे कूड़े के साथ उठाकर डंपिंग ग्राउंड में फेंक आए, जहां वो टनों कूड़े के नीचे अनगि‍नत सालों तक के लि‍ए दबा रहे और दबा दबा एकदि‍न यूं ही खाद बनकर मि‍ट्टी में मि‍ल जाए। पर उससे भी मुसीबत का अंत न होना था क्‍योंकि डंपिंग ग्राउंड में भी गाहे बगाहे हरी दूब उग ही आती है। कभी कि‍सी से भी खफा न होने वाली दूब, कभी कि‍सी का भी अहि‍त न करने वाली दूब, हमेशा दूसरों का पेट भरने वाली आत्‍मा पर उगी वो दूब आत्‍मा के डंपिग ग्राउंड में हमेशा खाकर खत्‍म कर दी जाती है, लेकि‍न कभी मरती नहीं, हरी होकर उग ही आती है। इंसान की मुसीबतें हरी दूब की तरह हर कहीं उग आने को बेताब हैं। मायूसि‍यों की फि‍सलन हर काठ पर फंफूद की तरह फूटती रहती हैं। आस्‍थाओं की काई हर पत्‍थर पर जमी पसरी है और इनमें से कोई भी ऐसा सुचालक नहीं, जो एक रात को कि‍सी एक दि‍न से भी जोड़े या जो हवाओं का मन बताकर आत्‍मा में एक बि‍जली कौंधा सके। ये सब तो बस एक मुफलि‍सी थी जो दोनों के मन में बराबरी में दायर थी। जज दो थे, अदालत एक थी।  
(जारी...)