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Saturday, September 21, 2019

अमीनाबाद का ऐतिहासिक इंडियन बुक डिपो

हिमांशु वाजपेयी। माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पासआउट। जबान ऐसी कि पुरानी दिल्ली की भारी भरकम तमीजदार उर्दू बोलने वाली खवातीनें भी मुंह में तीन बीड़े पान दबा लें, एक दाहिने, एक बाएं तो एक बीच में- ताकि न अलिफ से लेकर जेड तक कुछ भी न निकल पाए। होता तो अलिफ से काफ तक है लेकिन यहां पर जेड पाकिस्तान वाले मरहूम उस्ताद मोइन अख्तर साहब की जबान से लिया गया है जिसे शब्द दिए थे मशहूर सहाफी अनवर मकसूद साहब ने। इनकी मिठास भरी जबान का मुलायजा फरमाएं...

लखनऊ शहर के सबसे सबसे ख़ास मक़ामात में से एक ये है। हज़ारों किताबों से रौशन एक सादा दयार । 1933 में शुरू हुआ अमीनाबाद का इंडियन बुक डिपो। पढ़ने लिखने में दिलचस्पी रखने वाले बेश्तर लोगों ने यहां की ज़ियारत ज़रूर की होगी। जिन्होंने नहीं की उन्हें ज़रूर करनी चाहिए। बग़ैर इसके उनकी तालीम-ओ-तरबियत अधूरी ही रहेगी। यहां आकर लगता है कि ये जगह आसमान की गर्दिश से आज़ाद है। वक़्त इस पर सितम नहीं ढाता। लगातार नए होते इस शहर में अभी कुछ जगहों पर पुरानेपन का हुस्न महफूज़ है। इन्डियन बुक डिपो उन्ही में से एक है। इसीलिए जब मुझसे कोई पूछता है कि लखनऊ में देखने लायक़ जगहें कौन सी हैं ? तो मैं इमामबाड़े, रेजीडेंसी, चौक, हजरतगंज के साथ इंडियन बुक डिपो का नाम भी ज़रूर लेता हूं।
लखनऊ में हिंदी किताबों के मामले में ये जगह अपना सानी नहीं रखती। यूनिवर्सल कपूरथला भी मेरी पसंदीदा जगह है, मगर इंडियन बुक डिपो अब शहर की धरोहर और शान बन चुका है। मैं हमेशा कहता हूं कि इसी शहर के राम आडवाणी साहब और उनकी किताबों की दुकान पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ख़ूब ख़ूब लिखा है। आडवाणी साहब का ख़ुलूस, प्रतिष्ठा और लियाक़त का अपनी जगह पूरा एहतराम है, मगर उन पर मीडिया के मेहरबां होने की दो बड़ी वजह और रहीं। पहली- उनकी दुकान हजरतगंज में थी, अमीनाबाद चौक या नक्खास में नहीं। दूसरी- उनकी दुकान अंग्रेज़ी किताबों की दुकान थी। अगर सच्चाई और इंसाफ के साथ बात लिखी जाए तो शहर की एक भी किताब की दुकान इंडियन बुक डिपो के आस-पास नहीं होगी। मगर मुझे इस अद्भुत जगह पर लोग उस तरह नहीं लिखते।
1933 में भाषा एवम साहित्य के विलक्षण विद्वान ओंकार सहाय ने इसकी स्थापना की और इसे शुरू से ही एक वक़ार अता किया। हिंदी साहित्य जगत में लखनऊ को जितना अमृतलाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा आदि से पहचाना गया उतना ही इंडियन बुक डिपो से भी। शुरू होने के दौर से बाद तक का शायद ही कोई बड़ा हिंदी लेखक हो जो लखनऊ से गुज़रा हो और यहां न आया हो। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तो इस जगह की स्थायी ज़ीनत थे। सरस्वती के यशस्वी संपादक पद्मभूषण श्रीनारायण चतुर्वेदी जी इंडियन बुक डिपो के सबसे बड़े मुरीदों में थे। नगर जी, यशपाल, भगवती बाबू, मुद्रा राक्षस, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, जैनेन्द्र, धर्मवीर भारती, आदि तमाम नाम हैं जो यहां नियम से आते रहे।
ओंकार सहाय जी को जितना उबूर भाषा एवं साहित्य पर था, वैसा ही प्रिंटिंग, पब्लिशिंग और किताबों के बिज़नेस पर भी। उनके बाद इस दुकान को उनके सुपुत्र सुशील जी ने लंबे वक़्त तक कामयाबी के साथ संभाला। किताबों और इसके व्यवसाय से जुड़ी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारियों के भंडार थे सुशील जी। लखनऊ में हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उनकी अपनी मुस्तनद राय थी। पढ़ने लिखने में एक मेयार और तहज़ीब के क़ायल वो हमेशा रहे और उनके यहां आने वाले लोगों को भी उनके ज़रिए ये मेयार अता होता रहा।
सुशील जी के बाद अब काफ़ी सालों से ये जगह चित्रलेखा आंटी संभाल रही हैं। चित्रलेखा आंटी पर तो एक संस्मरण कभी मैं अलग से विस्तार में लिखूंगा। 70 साल की उम्र में भी इतनी ऐक्टिव, इतनी अनुशासित, इतनी मेहनती, इतनी रौबीली, इतनी गरिमामयी, इतनी सुंदर, इतनी ज़हीन, इतनी पढ़ी लिखी, इतनी आत्मीय, इतनी साफगो... उनके जैसी महिलाएं हमने ज़िन्दगी में बहुत कम देखी हैं। इतनी बड़ी जगह कई साल से चित्रलेखा आंटी अकेले दम पर पूरे जाहो जलाल के साथ संभाल रही हैं। बल्कि अब इस जगह की सारी ख़ूबसूरती, सारा नूर सारी ज़ीनत उन्ही से है।
हमारे यहां लखनऊ में अख़बार वालों को कला-संस्कृति की दुनिया मे फ़र्ज़ी हीरो गढ़ने का रोग है। दो दिन कोई शख़्स किसी 'इवेंट' में नज़र आया तो उसे संस्कृतिकर्मी और तीन इवेंट किसी ने करवा दिए तो वो लखनवी तहज़ीब का उद्धारक बना दिया जाता है। ऐसे में   असली लोगों तक पहुंच पाने की तौफ़ीक़ ही किसे है। इस पर स्टोरी कौन करेगा कि 7000 किताबों वाले इस विशाल प्रतिष्ठान को चित्रलेखा जी किस कमाल के साथ संभालती आयी हैं और संभाल रही हैं। ना जाने कितनी पीढ़ियों को उन्होंने पढ़ने लिखने का शऊर दिया है। मेरे जैसे कितने बच्चों को उन्होंने कितना ज्ञान अता किया है। दुकान में आने वाले हर इंसान से, भले भी वो एक भी किताब न ख़रीदे या 1000 किताब ख़रीद ले, चित्रलेखा आंटी बराबरी के साथ बात करती हैं। किताबों के बारे में ग्राहक से बात करना, उसके कंटेंट का विश्लेषण करना, उसकी रुचि समझना, उसे उसके मिज़ाज, ज़रूरत और बजट के हिसाब से किताब उपलब्ध करवाना ये चित्रलेखा आंटी की अपनी पहचान है।
ऐसा ही हर जगह होना चाहिये मगर ऐसा होता कहीं नहीं है। अब तो किताब की दुकानों में भी मॉल कल्चर आ गया है। किताब उठाओ, बिल कटाओ और चलते बनो। बात करने की ज़रूरत नहीं है। बात करोगे भी किससे क्योंकि किताब की दुकान का जो मालिक है या जो किताब उठाने निकालने वाला सहयोगी है या जो काउंटर पे बैठा है, वो ख़ुद ही नहीं पढ़ता। चित्रलेखा आंटी, यूनिवर्सल कपूरथला के सुरेश पाल जी और न्यू रॉयल बुक कंपनी के फुरकान बेग साहब ज़रूर अपवाद हैं। अख़बार में काला संस्कृति कवर करने वाले इसलिए भी इंडियन बुक डिपो पर नहीं लिखते क्योंकि उन्हें स्टोरी के लिए ऐसे लोग चाहिए होते हैं जो मीडिया वालों से मरऊब होते हों, उनके स्टोरी एंगिल में अपने आपको किसी भी तरह ग़लत सही बोल कर फिट कर लें और उन्हें इंस्टेंट कोट देने के लिए उप्लब्ध रहें।
चित्रलेखा आंटी में इनमें से एक भी खूबी नहीं है, उन्हें छपास और पीआर का रोग नहीं है, वो ग़लत-बयानी नहीं करेंगी आपका एंगिल गया तेल लेने, अगर आप रिसर्च करके नहीं आएंगे तो वो आपको फौरन आईना दिखा देंगी और सबसे बड़ी चीज़ कि इडियॉटिक बातों उन्हें बर्दाश्त नहीं होंगी। यही वजह है कि इडियट्स उनके पास जाते घबराते हैं। कुछ लोग को मैंने कहते सुना कि वो डांटती बहुत हैं। मैं इन लोग से कहता हूं कि उस डांट की गहराई में उतरो वहां आत्मीयता, स्नेह और अधिकार का एक अपार ख़ज़ाना छिपा है, जो सतह से नहीं दिखने वाला। घर के बुज़ुर्गों से समझो कभी इस डांट का मर्म। कितनी एनर्जी लगती है, इस तरह हर ग्राहक से विस्तार में बात करने से, जबकि तय नहीं है कि ग्राहक किताब लेगा या नहीं मगर फिर भी चित्रलेखा जी अपनी रविश नहीं छोड़तीं।
डिस्काउंट वाली बात भी बेकार की है।  रेस्टोरेंट में 500 का खाना खाओगे 700 देके आओगे डिस्काउंट नहीं मांगोगे, 150 की फ़िल्म 50 के पॉपकॉर्न के साथ 500 की हो जाती है, वहां डिस्काउंट नहीं मांगोगे मगर किताब की दुकान में डिस्काउंट मौलिक अधिकार है। जबकि अगर किसी किताब का सस्ता एडिशन अगर उपलब्ध है तो चित्रलेखा जी कभी महँगा वाला नहीं देतीं। कभी पुराने एडिशन के दाम चिप्पी लगाकर नहीं बढ़ातीं। जो किताब पूरे हिंदुस्तान में नहीं मिलेगी वो ढूंढकर ला देती हैं, जो प्रकाशन अब बंद हो चुके या बंद होने की कगार पर हैं, उनकी भी किताबें यहां मिल जाएंगी।
आप अपनी जहानत या अध्ययन से उन्हें प्रभावित कीजिये वो बड़े स्नेह से आपको एक किताब गिफ्ट कर देंगी। फिर भी डिस्काउंट तो इज़्ज़त का सवाल है ना। पोस्ट ज़ियादा लंबी हो रही है। पर मौज़ू ही ऐसा है कि तूल लाज़िम है। कहना सिर्फ ये था कि लखनऊ वालों, इंडियन बुक डिपो की ताज़ीम करो, इस धरोहर का एहतराम करो। अगली बार जब अमीनाबाद जाइए तो यहां ज़रूर जाइए, और पत्रकार भाइयों और उनकी बहनों, यहां बहुत सी स्टोरीज़ दफ़न हैं उनको निकाल लाइए।
शुक्रिया।
- हिमांशु वाजपेयी

Wednesday, December 23, 2015

लकवाग्रस्‍त प्रोफेसर से डरी सरकार और अदालतें: अरुंधति रॉय

व्हीलचेयर पर चलनेवाले इस लकवाग्रस्त अकादमीशियन से सरकार इतनी डरी हुई है, कि उसकी गिरफ्तारी के लिए उसे उसका अपहरण करना पड़ा. आउटलुक में प्रकाशित इस विशेष निबंध में अरुंधति रॉय ऑपरेशन ग्रीन हंट और उसके शहरी अवतार के हवाले से डॉ. जी. एन. साईबाबा की कैद के बारे में बता रही हैं, जिसने उनकी जिंदगी के लिए एक गंभीर खतरा भी पैदा कर दिया है. बजार पर इस लेख को लगाने का उद्देश्‍य यह है कि इसे लि‍खने के लि‍ए कोर्ट ने अरुंधति पर भी केस चलाने का आदेश दि‍या है। कोर्ट से अनुरोध है कि बजार के मॉडरेटर पर भी इसे पब्‍लि‍श करने का केस चलाए। 
अनुवाद: रेयाज उल हक.

9 मई 2015 को एक साल हो जाएगा, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में अंग्रेजी के लेक्चरर, डॉ. जी.एन. साईबाबा को काम से घर लौटते हुए अनजान लोगों ने अगवा कर लिया. जब उनके पति लापता हुए और उनका फोन नहीं लग रहा था तो डॉ. साईबाबा की पत्नी वसंता ने स्थानीय थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई. आगे चल कर उन अनजान लोगों ने अपनी पहचान महाराष्ट्र पुलिस के रूप में जाहिर की और बताया कि वह अपहरण, एक गिरफ्तारी थी.

आखिर उन्हें इस तरह से अगवा क्यों करना पड़ा, जबकि वे उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर सकते थे? उस प्रोफेसर को जो व्हीलचेयर पर चलते हैं क्योंकि पांच बरस की उम्र से अपनी कमर के नीचे लकवे के शिकार हैं. इसकी दो वजहें हैं: पहली कि वे अपने पहले के दौरों की वजह से ये जानते थे कि अगर वे दिल्ली विश्वविद्यालय में उनके घर से उन्हें उठाने जाएंगे तो उन्हें क्रुद्ध लोगों की एक भीड़ से निबटना पड़ेगा - वे प्रोफेसर, कार्यकर्ता और छात्र जो प्रोफेसर साईबाबा से प्यार करते हैं और उन्हें पसंद करते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि वे एक समर्पित शिक्षक थे, बल्कि दुनिया के बारे में उनके बेखौफ राजनीतिक नजरिए की वजह से भी. दूसरी वजह, क्योंकि अपहरण करने पर यह बात ऐसी दिखेगी मानो महज अपनी चतुराई और साहस से लैस होकर, उन्होंने एक खतरनाक आतंकवादी का सुराग लगा लिया हो और उसको पकड़ लिया हो. हालांकि सच्चाई कहीं ज्यादा नीरस है. हममें से अनेक लोग यह लंबे समय से जानते थे कि प्रोफेसर साईबाबा को गिरफ्तार किए जाने की आशंका है. कई महीनों से यह एक खुली चर्चा का मुद्दा था. इन महीनों में कभी भी, उनको अगवा किए जाने के दिन तक यह बात न तो उनके खयाल में आई और न किसी और के, कि उन्हें इसका सामना करने के बजाए कुछ और करना चाहिए. असल में, इस दौरान उन्होंने ज्यादा मेहनत की और पॉलिटिक्स ऑफ द डिसिप्लिन ऑफ इंडियन इंगलिश राइटिंग (भारतीय अंग्रेजी लेखन में अनुशासन की राजनीति) पर अपना पीएच.डी. का काम पूरा किया.

हमें क्यों लगा था कि वे गिरफ्तार कर लिए जाएंगे? उनका जुर्म क्या था?

सितंबर 2009 में, तब के गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने लाल गलियारे (रेड कॉरीडोर) के रूप में जाने जानेवाले इलाके में, ऑपरेशन ग्रीन हंट कही जानेवाली एक जंग का ऐलान किया था. इसका प्रचार किया गया कि यह मध्य भारत के जंगलों में माओवादी 'आतंकवादियों' के खिलाफ अर्धसैनिक बलों का सफाया अभियान है. हकीकत में, यह उस लड़ाई का आधिकारिक नाम था, जो राज्य प्रायोजित हत्यारे दस्तों (बस्तर में सलवा जुडूम और दूसरे राज्यों में कोई नाम नहीं) द्वारा दुश्मन के काम में आने वाली हर चीज को तबाह करने की लड़ाई रही है. उनको दिया गया हुक्म, जंगल को इसके तकलीफदेह निवासियों से खाली करने का था, ताकि खनन और बुनियादी निर्माण के कामों में लगे कॉरपोरेशन अपनी रुकी हुई परियोजनाओं को आगे बढ़ा सकें. इस तथ्य से तब की यूपीए सरकार को कोई परेशानी नहीं हुई कि आदिवासी जमीन को निजी कंपनियों के हाथों बेचना गैरकानूनी और असंवैधानिक है. (मौजूदा सरकार के नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम में उस गैर कानूनियत को कानून में बदलने की पेशकश की गई है.) हत्यारे दस्तों के साथ-साथ हजारों अर्धसैनिक बलों ने हमला किया, गांव जलाए, गांववालों की हत्या की और औरतों का बलात्कार किया. दसियों हजार आदिवासियों को अपने घरों से भाग कर जंगल में खुले आसमान के नीचे पनाह लेने के लिए मजबूर किया गया. इस बेरहमी के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करते हुए सैकड़ों स्थानीय लोग जनमुक्ति छापामार सेना (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) में शामिल हुए, जिसे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने खड़ा किया है. यह वो पार्टी है, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मशहूर तरीके से भारत की 'आंतरिक सुरक्षा का अकेला सबसे बड़ा खतरा' बताया था. अब भी, इस पूरे इलाके में उथल-पुथल बरकरार है, जिसे गृह युद्ध कहा जा सकता है.

जैसा कि किसी भी दीर्घकालिक युद्ध में होता है, हालात सीधे-सरल होने से कहीं दूर हैं. प्रतिरोध में जहां कुछ लोगों ने अच्छी लड़ाई लड़ना जारी रखी है, कुछ दूसरे लोग मौकापरस्त, रंगदारी वसूलनेवाले और मामूली अपराधी बन चुके हैं. दोनों समूहों में फर्क कर पाना हमेशा आसान नहीं होता, और यह उन्हें एक ही रंग में पेश करने को आसान बना देता है. उत्पीड़न की खौफनाक घटनाएं हुई हैं. एक तरह का उत्पीड़न आतंकवाद कहा जाता है और दूसरे को तरक्की.

2010 और 2011 में, जब ऑपरेशन ग्रीन हंट अपने सबसे बेरहम दौर में था, इसके खिलाफ एक अभियान में तेजी आनी शुरू हुई. अनेक शहरों में जनसभाएं और रैलियां हुईं. जैसे जैसे जंगल में होने वाली घटनाओं की खबर फैलने लगी, अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस पर ध्यान देना शुरू किया. डॉ. साईबाबा उन मुख्य लोगों में एक थे, जिन्होंने ऑपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ इस सार्वजनिक और पूरी तरह से गैर-खुफिया अभियान को गोलबंद किया था. कम से कम अस्थायी रूप से ही, वह अभियान सफल रहा था. शर्मिंदगी में सरकार को यह दिखावा करना पड़ा कि ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसी कोई चीज नहीं है, कि यह महज मीडिया की बनाई हुई बात है. (बेशक आदिवासी जमीन पर हमला जारी है, जिसके बारे में ज्यादातर कोई खबर नहीं आती, क्योंकि अब यह एक ऑपरेशन बेनाम है. एक माओवादी हमले में मारे गए सलवा जुडूम के संस्थापक महेंद्र करमा के बेटे छविंद्र करमा ने इस हफ्ते, 5 मई 2015 को सलवा जुडूम-2 की शुरुआत का ऐलान किया. यह सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के बावजूद किया गया, जिसमें अदालत ने सलवा जुडूम-1 को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित किया था और इसे बंद करने का आदेश दिया था.)

ऑपरेशन बे-नाम में, जो कोई भी राज्य की नीति की आलोचना करता है, या उसे लागू करने में बाधा पैदा करता है उसे माओवादी कहा जाता है. इस तरह माओवादी बताए गए हजारों दलित और आदिवासी, देशद्रोह और राज्य के खिलाफ जंग छेड़ने जैसे अपराधों के बे सिर-पैर के आरोपों में आतंकवादी गतिविधि निरोध अधिनियम (यूएपीए) के तहत जेल में बंद हैं. यूएपीए एक ऐसा कानून है कि सिर्फ अगर इसको इस्तेमाल में लाया जाना इतना त्रासदी भरा नहीं होता, तो इससे किसी भी समझदार इंसान की बड़ी जोर की हंसी छूट सकती थी. एक तरफ, जबकि गांव वाले कानूनी मदद और इंसाफ की किसी उम्मीद के बिना बरसों तक जेल में पड़े रहते हैं, अक्सर उन्हें पक्के तौर पर यह तक पता नहीं होता कि उन पर किस अपराध का इल्जाम है, दूसरी तरफ अब सरकार ने अपनी निगाह शहरों में उनकी तरफ फेरी है, जिसे यह 'ओजीडब्ल्यू' यानी खुलेआम काम करनेवाले कार्यकर्ता (ओवरग्राउंड वर्कर्स) कहती है.

इसने पहले जिन हालात में खुद को पाया था, उन्हें नहीं दोहराने पर अडिग गृह मंत्रालय ने 2013 में सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में अपने इरादों को साफ साफ जाहिर किया था. उसमें कहा गया था: 'नगरों और शहरों में भाकपा (माओवादी) के विचारकों और समर्थकों ने राज्य की खराब छवि पेश करने के लिए संगठित और व्यवस्थित प्रचार चलाया हुआ है...ये वे विचारक हैं जिन्होंने माओवादी आंदोलन को जिंदा रखा है और कई तरह से तो पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के कैडरों से ज्यादा खतरनाक हैं.'

डॉ. साईबाबा हाजिर हों.

हम यह जान गए थे कि उनकी निशानदेही की जा चुकी है, जब उनके बारे में साफ तौर पर गढ़ी हुई और बढ़ा चढ़ा कर अनेक खबरें अखबारों में आने लगीं. (जहां उनके पास असली सबूत नहीं थे, उनके पास आजमाया हुआ दूसरा सबसे बेहतर तरीका था कि अपने शिकार के बारे में संदेह का एक माहौल तैयार कर दो.)

12 सितंबर 2013 को उनके घर पर पचास पुलिसकर्मियों ने महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर अहेरी के मजिस्ट्रेट द्वारा चोरी की संपत्ति के लिए जारी किए गए तलाशी वारंट के साथ छापा मारा. उन्हें कोई चोरी की संपत्ति नहीं मिली. बल्कि वे उन्हीं की संपत्ति उठा (चुरा?) ले गए. उनका निजी लैपटॉप, हार्ड डिस्क और पेन ड्राइव्स. दो हफ्ते बाद मामले के तफ्तीश अधिकारी सुहास बवाचे ने डॉ. साईबाबा को फोन किया और हार्ड डिस्क खोलने के लिए उनसे पासवर्ड पूछा. डॉ. साईबाबा ने उन्हें पासवर्ड बताए. 9 जनवरी 2014 को पुलिसकर्मियों के एक दल ने उनके घर पर आकर घंटों उनसे पूछताछ की. और 9 मई को उन्होंने उन्हें अगवा कर लिया. उसी रात वे उन्हें नागपुर लेकर गए जहां से वे उन्हें अहेरी ले गए और फिर नागपुर ले आए, जिस दौरान सैकड़ों पुलिसकर्मी, जीपों और बारूदी सुरंग रोधी गाड़ियों के काफिले के साथ चल रहे थे. उन्हें नागपुर केंद्रीय जेल में, इसकी बदनाम अंडा सेल में कैद किया गया, जहां उनका नाम हमारे देश के जेलों में बंद, सुनवाई का इंतजार कर रहे तीन लाख लोगों की भीड़ में शामिल हो गया. हंगामेभरे इस पूरे नाटक के दौरान उनका व्हीलचेयर टूट गया. डॉ. साईबाबा की जैसी हालत है, उसे '90 फीसदी अशक्त' कहा जाता है. अपनी सेहत को और बदतर होने से बचाने के लिए उन्हें लगातार देखरेख, फिजियोथेरेपी और दवाओं की जरूरत होती है. इसके बावजूद, उन्हें एक खाली सेल में फेंक दिया गया (वे अब भी वहीं हैं), जहां बाथरूम जाने में उनकी मदद करने के लिए भी कोई नहीं है. उन्हें अपने हाथों और पांवों के बल पर रेंगना पड़ता था. इसमें से कुछ भी, यातना के दायरे में नहीं आएगा. एकदम नहीं. राज्य को अपने इस खास कैदी के बारे में एक बड़ी बढ़त इस रूप में हासिल है कि वह बाकी कैदियों के बराबर नहीं है. उसे बेरहमी से यातना दी जा सकती है, शायद उसको मारा भी जा सकता है, और ऐसा करने के लिए किसी को उस पर उंगली तक रखने की जरूरत नहीं है.

अगली सुबह नागपुर के अखबारों के पहले पन्ने पर महाराष्ट्र पुलिस के भारी हथियारबंद दल द्वारा अपनी जीत की निशानी के साथ शान से पोज देते हुए तस्वीरें छपी थीं - अपनी टूटी हुई व्हीलचेयर पर खतरनाक आतंकवादी, प्रोफेसर युद्धबंदी.

उन पर यूएपीए के इन सेक्शनों के तहत आरोप लगाए गए: सेक्शन 13 (गैरकानूनी गतिविधि में भाग लेना/उसकी हिमायत करना/उकसाना/ उसे अमल में लाने के लिए भड़काना), सेक्शन 18 (आतंकवादी कार्रवाई के लिए साजिश/कोशिश करना), सेक्शन 20 (एक आतंकवादी गिरोह या संगठन का सदस्य होना), सेक्शन 38 (एक आतंकवादी संगठन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के इरादे से उससे जुड़ना) और सेक्शन 39 (एक आतंकवादी संगठन के लिए समर्थन को बढ़ावा देने के मकसद से सभाएं करने में मदद करना या उसे संबोधित करना). उन पर भाकपा (माओवादी) के कॉमरेड नर्मदा के पास पहुंचाने की खातिर, जेएनयू के एक छात्र हेम मिश्रा को एक कंप्यूटर चिप देने का आरोप लगाया गया. हेम मिश्रा को अगस्त 2013 में बल्लारशाह रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार किया गया और वे डॉ. साईबाबा के साथ नागपुर जेल में हैं. उनके साथ इस 'साजिश' के अन्य तीनों आरोपी जमानत पर रिहा हो चुके हैं.

आरोपपत्र में गिनाए गए अन्य गंभीर अपराध ये हैं कि डॉ. साईबाबा रिवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ) के संयुक्त सचिव हैं. आरडीएफ उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में एक प्रतिबंधित संगठन हैं, जहां इस पर माओवादी 'फ्रंट [खुला]' संगठन होने का संदेह है. दिल्ली में यह प्रतिबंधित नहीं है. न ही महाराष्ट्र में. आरडीएफ के अध्यक्ष जाने-माने कवि वरवर राव हैं, जो हैदराबाद में रहते हैं.

डॉ. साईबाबा के मामले की सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है. इसको शुरू होने में अगर बरसों नहीं तो महीनों लगने की संभावना है. सवाल है कि 90 फीसदी अशक्तता वाला एक इंसान जेल की उन बेहद खराब दशाओं में कब तक बचा रह पाएगा?

जेल में बिताए गए इस एक साल में, उनकी सेहत खतरनाक रूप से बिगड़ी है. वे लगातार, तकलीफदेह दर्द में रहते हैं. (जेल अधिकारियों ने मददगार बनते हुए, इसे पोलियो पीड़ितों के लिए 'खासा मामूली' बताया.) उनका स्पाइनल कॉर्ड खराब हो चुका है. यह टेढ़ा हो गया है और उनके फेफड़ों में धंस रहा है. उनकी बाईं बांह काम करना बंद कर चुकी है. जिस स्थानीय अस्पताल में जांच के लिए जेल अधिकारी उन्हें ले गए थे, उसके कार्डियोलॉजिस्ट [दिल के डॉक्टर] ने कहा कि फौरन उनकी एंजियोप्लास्टी कराई जाए. अगर वे एंजियोप्लास्टी से गुजरते हैं, तो उनकी मौजूदा दशा और जेल के हालात को देखते हुए, यह इलाज खतरनाक ही होगा. अगर उनका इलाज नहीं हुआ और उनकी कैद जारी रही, तो यह भी खतरनाक होगा. जेल अधिकारियों ने बार बार उन्हें दवाएं देने से इन्कार किया है, जो न सिर्फ उनकी तंदुरुस्ती के लिए, बल्कि उनकी जिंदगी के लिए बेहद जरूरी है. जब वे उन्हें दवाएं लेने की इजाजत देते हैं, तो वे उन्हें वह विशेष आहार लेने की इजाजत नहीं देते, तो उन दवाओं के साथ दी जाती है.

इस तथ्य के बावजूद कि भारत अशक्तता अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय समझौते का हिस्सा है और भारतीय कानून एक ऐसे इंसान को सुनवाई का इंतजार करते हुए (अंडरट्रायल) लंबे समय तक कैद में रखने की साफ तौर पर मनाही करते हैं जो अशक्त है, डॉ. साईबाबा को सत्र अदालत द्वारा दो बार जमानत देने से मना कर दिया गया है. दूसरे मौके पर जमानत की अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी गई कि जेल अधिकारियों ने अदालत के सामने यह दिखाया था कि वे वह जरूरी और खास देखरेख मुहैया करा रहे हैं, जो उनकी जैसी हालत वाले एक इंसान के लिए जरूरी है. (उन्होंने उनके परिवार को इसकी इजाजत दी थी, कि वे उनकी व्हीलचेयर बदल दें.) डॉ. साईबाबा ने जेल से लिखी गई एक चिट्ठी में कहा कि जिस दिन जमानत देने से मना करने वाला फैसला आया, उनकी खास देखभाल वापस ले ली गई. निराश होकर उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की. कुछ दिनों के भीतर वे बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाए गए.

बहस की खातिर, चलिए इसके बारे में फैसले को अदालत पर छोड़ देते हैं कि अपने ऊपर लगाए गए आरोपों में डॉ. साईबाबा कसूरवार हैं या बेकसूर. और महज थोड़ी देर के लिए सिर्फ जमानत के सवाल पर गौर करते हैं, क्योंकि उनके लिए यह हर्फ ब हर्फ जिंदगी और मौत का सवाल है.

उन पर लगाए गए आरोप चाहे जो हों, क्या प्रोफेसर साईबाबा को जमानत मिलनी चाहिए? यहां  उन जानी-मानी सार्वजनिक शख्सियतों और सरकारी कर्मचारियों की एक फेहरिश्त पेश है, जिन्हें जमानत दी जाती रही है.

23 अप्रैल 2015 को बाबू बजरंगी को गुजरात उच्च न्यायालय में 'आंख के एक फौरी ऑपरेशन' के लिए जमानत पर रिहा किया गया, जो 2002 में नरोदा पाटिया कत्लेआम में, जहां दिन दहाड़े 97 लोग मार दिए गए थे, अपनी भूमिका के लिए कसूरवार साबित हो चुके हैं और जिन्हें आजीवन कैद की सजा सुनाई जा चुकी है. यह बाबू बजरंगी हैं, जो खुद अपने शब्दों में अपने किए गए जुर्म के बारे में बता रहे हैं: 'हमने एक भी मुसलमान दुकान को नहीं बख्शा, हमने हर चीज में आग लगा दी, हमने उन्हें जलाया और मार डाला...टुकड़े-टुकड़े किए, जलाया, आग लगा दी...हमारी आस्था उन्हें आग लगाने में है क्योंकि ये हरामी चिता पर जलना नहीं चाहते. वे इससे डरते हैं.' ['आफ्टर किलिंग देम आई फेल्ट लाइक महाराणा प्रताप' तहलका, 1 सितंबर 2007]

आंख का ऑपरेशन, हुह? शायद हम थोड़ा ठहरकर सोचें तो यह एक फौरी जरूरत ही है कि वह जिनसे दुनिया को देखता था, उन हत्यारी आंखों को कुछ कम बेवकूफ और कुछ कम खतरनाक आंखों से बदल दिया जाए.

30 जुलाई 2014 को गुजरात में मोदी सरकार की एक पूर्व मंत्री माया कोडनानी को गुजरात उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी, जो उसी नरोदा पाटिया कत्लेआम में कसूरवार साबित हो चुकी हैं और 28 साल के लिए जेल की सजा भुगत रही हैं. कोडनानी एक मेडिकल डॉक्टर हैं और कहती हैं कि उन्हें आंतों की टीबी है, दिल की बीमारी है, क्लीनिकल अवसाद है और स्पाइन की दिक्कत है. उनकी सजा भी स्थगित कर दी गई है.

गुजरात में मोदी सरकार के एक और पूर्व मंत्री अमित शाह को जुलाई 2010 में तीन लोगों - सोहराबुद्दीन शेख, उनकी बीवी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति की गैर-अदालती हत्या का आदेश देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. सीबीआई ने जो फोन रेकॉर्ड पेश किए वे दिखाते थे कि शाह उन पुलिस अधिकारियों के लगातार संपर्क में थे, जिन्होंने पीड़ितों के मारे जाने के पहले उन्हें गैरकानूनी हिरासत में लिया था. वे यह भी दिखाते थे कि उन दिनों अमित शाह और उन पुलिस अधिकारियों के बीच फोन कॉलों की संख्या तेजी से बढ़ गई थी. (आगे चले कर, परेशान कर देने वाली और रहस्यमय घटनाओं के एक सिलसिले के बाद, वे पूरी तरह से छूट गए हैं). वे अभी भाजपा के अध्यक्ष हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ हैं.

22 मई 1987 को हाशिमपुरा से पुलिस आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (पीएसी) द्वारा पकड़ कर ट्रक में ले जाए गए 42 मुसलमानों को गोली मार कर उनकी लाशें कुछ दूर, एक नहर में फेंक दी गईं. इस मामले में पीएसी के उन्नीस जवान आरोपित बनाए गए. उनमें से सभी सेवा में बने रहे, दूसरों की तरह तरक्की और बोनस हासिल करते रहे. तेरह साल बाद, सन 2000 में उनमें से सोलह ने आत्मसमर्पण किया (तीन मर चुके थे). उन्हें फौरन जमानत दे दी गई. कुछ ही हफ्ते पहले, मार्च 2015 में सभी सोलह जवानों को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया.

दिल्ली विश्वविद्यालय में एक शिक्षक और कमेटी फॉर द डिफेंस एंड रीलीज ऑफ साईबाबा के एक सदस्य हैनी बाबू हाल ही में कुछ मिनटों के लिए अस्पताल में डॉ. साईबाबा से मिलने में कामयाब रहे. 23 अप्रैल 2015 को एक प्रेस सम्मेलन में, जिसकी कमोबेश कोई खबर नहीं छपी, हैनी बाबू ने उस मुलाकात के हालात के बारे में बताया: डॉ. साईबाबा को एक सेलाइन ड्रिप चढ़ रही थी. वे बिस्तर पर उठ कर बैठे और उनसे बात की. उनके सिर की तरफ एके-47 ताने एक सुरक्षाकर्मी उनके पीछे खड़ा रहा. यह उसकी ड्यूटी थी कि वह सुनिश्चित करे कि उसका कैदी अपनी लकवाग्रस्त टांगों से भाग न जाए.

क्या डॉ. साईबाबा नागपुर केंद्रीय जेल से जिंदा बाहर आ सकेंगे? क्या वे चाहते हैं कि साईबाबा बाहर निकलें? बहुत सारी वजहें हैं, जो इशारा करती हैं कि वे ऐसा नहीं चाहते.

यही सब तो है, जिसे हम बर्दाश्त कर रहे हैं, जिसके लिए हम वोट डालते हैं, जिस पर हम राजी हैं.

यही तो हैं हम.

- हाशि‍या से साभार 

Monday, September 9, 2013

भक्‍त पत्रकार और नरेंद्र मोदी की काल्‍पनि‍क मुलाकात

पाठकों की सुवि‍धा के लि‍ए पत्रकार का नाम हम महर्षि रख लेते हैं। महर्षि ने दो दि‍न पहले ही फेसबुक पर घोषणा कर दी थी कि मोदी आ रहे हैं, बहुत दि‍नों बाद उनसे मि‍लना हो रहा है। (हालांकि मोदी की ओर से उन्‍हें टाइम नहीं दि‍या गया था, इसलि‍ए डर भी लग रहा था कि मोदी उनका हाल आसाराम वाला न कर दें)

भाषण के बाद जब मोदी मंच से नीचे उतरे तो महर्षि साहब सीढ़ी की रेलिंग कि‍सी तरह से थामे उड़ रहे थे। (उड़ इसलि‍ए रहे थे क्‍योंकि मोदी के बाकी समर्थकों को भी मोदी का आर्शीवाद लेना था और वो उन्‍हें धकि‍याए जा रहे थे) बहरहाल, जैसे ही मोदी मंच से नीचे उतरे, महर्षि साहब धड़ाम से उनके पैरों में जा गि‍रे। हल्‍ला मच
गया। मोदी का पीआरओ महर्षि जी को पहचानता था, सो तुरंत बाकि‍यों को उनके ऊपर से धक्‍का मार मारकर हटाया और उन्‍हें उठाकर उनकी झाड़ पोंछ की। उन्‍हें बताया कि अरे, आप तो पतकार हैं, आपके मि‍लने का खास इंतजाम कि‍या गया है। वहां ढोकला भी खाने को मि‍लेगा टोमेटो सास और प्‍लास्‍टिक वाली चम्‍मच के साथ। पतकार जी के मुंह में पानी आ गए और चश्‍मा ठीक करते, बटन बंद करते हुए वो फटाफट मीटिंग रूम की तरफ भागे, लेकि‍न भाग नहीं पा रहे थे क्‍योंकि कि‍सी समर्थक ने लंगड़ी मारकर उनकी चप्‍पल तोड़ दी। राम राम करते मीटिंग रूम में पहुंचे और आधा कि‍लो ढोकला मोदी के आने से पहले से सूत दि‍ए। हालांकि बाद में उन्‍हें याद आया कि अरे, उनका तो गणेश चतुर्थी का व्रत है। जीवन में ऐसी भूल उनसे पहली बार हुई। उन्‍होंने सोचा, खैर, आज साक्षात दर्शन हो रहे हैं तो व्रत भंग होना कोई बड़ी बात नहीं। आधा घंटा इंतजार कराने के बाद आखि‍रकार मोदी कमरे में आए। आगे पढ़ें महर्षि मोदी संवाद:-

मोदी के पैरों में गि‍रते हुए महर्षि: नमस्‍कार सर।
मोदी: अरे, उठि‍ए उठि‍ए, आप की जगह तो दि‍ल में है। और नमस्‍कार वैसे भी खड़े होकर कि‍या जाता है।
महर्षि: ही ही ही ही, अरे सर, क्‍या कहें, हम गंगा कि‍नारे वाले हैं ना, तनि‍क नरभसा गए थे। वैसे सर, आपका भासण बहोत अच्‍छा रहा। आपका जो भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों कहने का इस्‍टाइल है, इसपर हम इस्‍पेसल कवरेज करने जा रहे हैं। ऐसे जोसीले तरीके से भासण की सुरुआत कोई नहीं करता। हमने तो ईएनटी इस्‍पेसलि‍स्‍ट को आपके दो दर्जन भासण सुनाकर पता लगाया है कि आपकी 40 फीसदी ऊर्जा मेरे भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों में नि‍कलती है। इसीलि‍ए, वहां से जोस आ जाता है।

मोदी: ह ह ह ह। नाम क्‍या बताया आपने अपना।
महर्षि: सर महर्षि सर।
मोदी: महर्षि या सर महर्षि सर। या फि‍र ये दोनों।
महर्षि: आपके लि‍ए सिर्फ महर्षि। सर वैसे इंटरव्‍यू मैनें लेना है आपका।
मोदी: अरे वो तो हो जाएगा महर्षि जी। और बताइये, घर में सब कुशल मंगल। कहां कहां काम कि‍या है आपने।
महर्षि: बस सर, सब आपकी कृपा है। हमने तो घाट घाट, घर घर का पानी पि‍या है। पढ़ाई यूपी में की तो काम कि‍या एमपी और महाराष्‍ट्र में। ननि‍हाल ठहरा राजस्‍थान में तो सभी जगह की पॉलि‍टि‍क्‍स में हाथ तंग है। सॉरी सॉरी, पॉलि‍टि‍क्‍स में अपना हाथ है।
मोदी: हमारे साथ काम करेंगे महर्षि जी। (क्‍वेश्‍चन मार्क इसलि‍ए नहीं है क्‍योंकि ये आदेश टाइप में दि‍या गया था।)
महर्षि: ही ही ही ही...सरजी। (हीहीहीही करने पर महर्षि जी का थोड़ा थूक भी मोदी के चप्‍पल पर गि‍र गया जि‍से महर्षि ने लपककर अपना कुर्ता फाड़कर साफ कि‍या।)
महर्षि: सर, दि‍न में तो नौकरी करनी होती है। हम रात में आपका सारा प्‍लान बनाकर दे देंगे। और आपको अपने यहां पूरा स्‍पेस भी देंगे सर। ऑल एडीशन। मैं सर लोगों से बात कर लूंगा। पता नहीं क्‍यूं कांग्रेस के पीछे लगे रहते हैं ये लोग।
मोदी: ठीक है, अपना बायोडाटा भेज देना। देखेंगे। नेक्‍स्‍ट.
महर्षि: अरे सर, इंटरव्‍यू...
मोदी: नेक्‍स्‍ट प्‍लीज..
महर्षि: सर, एक ऑटोग्राफ तो दे दीजि‍ए।
मोदी: अरे भगाओ यार इसको। सारा ढोकला खा गया और चप्‍पल खराब कर दी।
कमरे से नि‍कलते हुए महर्षि: ही ही ही ही, सर भी बड़े मजाकि‍या हैं। (संपादक को फोन करते हुए- सर बहोत अच्‍छा इंटरभ्‍यू रहा। मुझे तो उन्‍होंने अपनी पूरी प्‍लानिंग बता दी।)


(डि‍स्‍क्‍लेमर: पूरी वारदात, आई मीन मुलाकात का कि‍सी जीवि‍त या मृत पतकार से कोई लेना देना नहीं है। वैसे जो ले या दे रहे हों, वो दि‍ल पर ले या दे सकते हैं।)

Saturday, April 27, 2013

आलोचना के बहाने



सबसे पहले- ये वही दुनि‍या है, जहां हम और आप साथ-साथ रहते हैं। यही हमारी नियति है। 
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नि‍यति को समझना एक टेढ़ी खीर है। यह किसी एक सिद्धांत पर नहीं चलती कि कैलकुलेशन कि‍या और भूत भवि‍ष्‍य बांच दि‍या। इसे समझना टेढ़ी खीर इसलि‍ए भी है कि कार्य कारण संबंधों का मशीनी मामलों में पता लगाना तो आसान होता है, लेकिन मानवीय मामलों में यह इतनी परतों के नीचे दबे होते हैं कि हर एक परत को पलटना और उसकी जांच करना काफी मुश्‍कि‍ल होता है। फि‍र भी, इसे हमें ही समझना होता है, चाहे जि‍तनी भी मुश्‍कि‍ल हो।

वैचारि‍क व्‍यक्‍ति पर अक्‍सर पथभ्रष्‍टता के आरोप लगते हैं। अगर वि‍चार पूंजीवाद के खि‍लाफ हों तो यह आरोप ठीक वैसे ही लगाए जाते हैं जैसे कि सांप्रदायि‍कता वि‍रोधी लोग सांप्रदायि‍क लोगों पर लगाते हैं। वो पूंजीवाद के खि‍लाफ उठने वाली आवाज और सांप्रदायि‍क मानसि‍कता को इतना मि‍क्‍सअप कर देते हैं कि लोगों को लगने लगता है कि अगर ईश्‍वरीय सत्‍ता दरकि‍नार कर दी जाए तो वामपंथ और सांप्रदायि‍क दक्षि‍णपंथ एक जैसे ही हैं, बल्‍कि एक ही हैं। यहां पर यह बताना उचि‍त होगा कि पूंजीवाद ने अपने वि‍रोधि‍यों के लि‍ए एक ऐसी फसल तैयार कर दी है जो यही करती है। मध्‍य वर्ग में लहलहाती यह फसल कभी कभी सुखद संकेत तो देती है, पर धरातल पर आते ही सारे संकेत न जाने कैसे गायब हो जाते हैं और उनकी जगह पूंजीवादी टि‍प्‍पणि‍यां ले लेती हैं। यह कैसे हो रहा है, इसे समझने की जरूरत है।

वैचारि‍क भटकाव हर जगह होता है। वैचारि‍क मतभेद, टूटन भी हर जगह होती है। यह बात तो समझना आसान है कि एक डॉक्‍टर को अपने मरीज की हत्‍या नहीं करनी चाहि‍ए, उसका इलाज ठीक से करना चाहि‍ए, या फि‍र एक इंजीनि‍यर को ऐसा ही पुल या इमारत बनानी चाहि‍ए जो सालों साल चले। पर यह समझना जरा कठि‍न है कि वि‍चारों में मतभेद या वि‍चारों का त्‍याग कहां से शुरू होता है। आखि‍रकार यह कोई तकनीक नहीं कि जि‍सके लि‍ए बनाई गई है, वही काम करे। पि‍छले कई दशकों से पूंजीवाद ने यही मानसि‍कता लोगों के दि‍माग में भरी है कि डॉक्‍टर है तो सही से ही इलाज करेगा, इंजीनि‍यर है तो मजबूत निर्माण करेगा और वामपंथी है तो क्रांति ही करेगा। अगर ऐसा नहीं होता तो इसे पाप और भ्रष्‍टाचार माना जाता है।

क्‍या हम ऐसी दुनि‍या में रह रहे हैं या फि‍र मानते हैं कि ऐसी ही दुनि‍या है जहां सभी अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं या करेंगे। अगर कि‍सी को नाली साफ करने का काम मि‍ला है तो वह जाले नहीं साफ करेगा। यहां तक कि वह अपने घर के भी जाले नहीं साफ करेगा। क्‍या सचमुच ऐसी दुनि‍या संभव है जहां काम करने वाले कामगार की उस काम से भावनाएं जुड़ती टूटती न हों, जि‍से वह रोजाना कर रहा है। पर नहीं, ऐसी ही दुनि‍या की कल्‍पना सामंती पूंजीवाद पि‍छले कई दशकों से स्‍थापि‍त कर रहा है। चूंकि ऐसा होता नहीं इसलि‍ए स्‍वाभावि‍क रूप से लोग उन चीजों में ज्‍यादा रूचि लेते हैं, जो उस सामंती पूंजीवादी कल्‍पना से हटकर होती हैं।

वैसे इस सवाल का जवाब बताने की जरूरत नहीं कि पूंजीवाद ने ऐसा क्‍यों कि‍या। बल्‍कि यह जानने की जरूरत है कि इस सामंती पूंजीवादी कल्‍पना को स्‍थापि‍त करने में मदद कि‍सकी ली। सामंती पूंजीवाद ने ऐसी फासि‍स्‍ट दुनि‍या का ख्‍याल नई फसल में बोने के लि‍ए उसी पुरानी सामंती वि‍चारधारा का सहारा लि‍या जो मनु स्‍मृति से लेकर रामचरि‍तमानस में पाई जाती है। हिंदू धर्म की कई कि‍ताबों में यह वि‍चार मि‍लते हैं। इसके लि‍ए खासतौर पर ऐसे लोगों को तैयार कि‍या गया जि‍नका चेहरा प्रगति‍शील लगता हो, पर हों वो सामंती पूंजीवाद के पक्षधर। इन लोगों ने नई फसल को बोने से पहले उस खेत में ऐसा मट्ठा डाला कि अब ये फसल दि‍नों दि‍न खट्टी होती जा रही है। क्‍या यह चिंता की बात नहीं कि मशीनी दुनि‍या न होने पर यह फसल आगे उगलने लगती है पर मशीनी दुनि‍या कैसे इंसानों को साथ लेकर चलेगी, उनकी भावनाओं को कैसे पोसेगी, इसका कोई ठोस खाका उनके पास नहीं है। यह लोग हर बात पर चि‍ल्‍लाते तो हैं पर दुनि‍या बनाने के नाम पर चुप हो जाते हैं। यही चीज सामंती पूंजीवाद को चाहि‍ए थी, और पि‍छले कुछ वर्षों में सड़कों पर उमड़ी दि‍शाहीन भीड़ साफ बताती है कि ऐसा हो रहा है। वैसे कभी कभी यह भीड़ रामराज की भी बात करती है।

दंगों से सामंती पूंजीवाद का नुकसान होता है। उस इलाके में मजदूर नहीं मि‍लते और उस इलाके की उत्‍पादन इकाइयां बंद हो जाती हैं और मुनाफा कम होने लगता है। लेकि‍न ऐसा कि‍न्‍हीं जगहों पर होता है इसलि‍ए जि‍तनी गंभीरता से सामंती पूंजीवाद वामपंथ को अपना शत्रु मानता है, दंगाइयों को नहीं। दंगों से असमानता फैलती है जो कहीं न कहीं पूंजीवाद को ही फायदा पहुंचाती है। पर वामपंथ वर्ग की समानता की बात करता है और हक की मजदूरी की बात करता है, इसलि‍ए उससे मुनाफा कहीं ज्‍यादा कम होता है।

यह समझना मुश्‍कि‍ल नहीं है कि सामंती पूंजीवाद वर्ग संघर्ष को दबाने और कुचलने के लि‍ए कैसे कैसे हथकंडे अपनाता होगा। उदाहरण के लि‍ए इनका सबसे आसान टारगेट स्‍त्री पुरुष संबंधों को ही लेते हैं। इन संबंधों में अभी तक सबसे ज्‍यादा फायदा सामंतवाद ने उठाया है। स्‍त्री पुरुष संबंधों की सामंती सोच स्‍त्री पारगमन को पाप मानती है, पुरुषों को भी एक हद तक ही छोड़ती है। इसे तकनीकी हि‍साब से समझें तो जि‍स नट में बोल्‍ट फि‍ट कर दि‍या गया, अब उसी नट में फि‍ट रहेगा। न तो वह खुलेगा और न ही दूसरे नट में फि‍ट होगा, भले ही उसमें कि‍तनी भी जंग लग जाए, वो सड़ जाए। शायद उन्‍हें नहीं पता कि दुनि‍या में एक ही साइज के अनगि‍नत नट बोल्‍ट बनते हैं। बहरहाल, यदि स्‍त्री को परपुरुष से प्रेम होता है या वह अपनी इच्‍छा से परपुरुष से संबंध बनाती है तो सामंती पूंजीवाद की यह फसल तपाक से उसे पाप कहने लगती है। इस मामले में कई प्रगति‍शील साथी भी उनका साथ देते आसानी से देखे जा सकते हैं। लेकि‍न मेरा सवाल है क्‍या हम सचमुच ऐसी दुनि‍या में रह रहे हैं जो नट बोल्‍ट की तरह है। क्‍या भारत में रोजाना होने वाले तलाक के सैकड़ों हजारों मुकदमों में समझौतानामा लग चुका है। जाहि‍र है कि नहीं। स्‍त्री पुरुष संबंध, कार्य संतुष्‍टि, डॉक्‍टर- अच्‍छा इलाज, इंजीनि‍यर-अच्‍छा निर्माण, वामपंथी-क्रांति... क्‍या यह सारी चीजें मशीनी तरीके से समझी जा सकती हैं। जाहि‍र है कि मनुष्‍य मशीन नहीं है और मशीन वि‍चारशील नहीं है। वि‍चार तो बदलते रहते हैं, यही नि‍यति है।

Saturday, April 13, 2013

पुराने झोले से नि‍कलीं बासी लाइनें




ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आवे..
1
जहर भरे खुद को ले जाऊं मैं कहां,
हर तरफ तो तू ही तू दिखाई देता है।

2
मुझे यकीन है तेरे फिर से आने का,
तेरे बिना मेरी तन्हाई अकेली है।

3
तूने फिर किया है साथ देने का वादा,
मैँ फिर से तेरा यकीन करता हूं।

4
कौन कहता है कि गुजरा वक्त नही आता,
यारों आज फिर मैं अकेला हूं।

5
मेरा होना मुश्किल की दो बूंदे ही तो हैं,
फिर मेरे जिबह की राहें इतनी मुश्किल क्यों हैं।

6
ख्यालों में बोलो कि कोई सुन न ले,
ख्वाहिशें तुम्हारी बड़ी बेहिसाब हैँ।

7
रम मिटाए गम,
बेहिसाब पियो रम।

8
प्रेम गले का खूंटा है
जिसने भी दिल लूटा है
सबसे बड़ा वो झूठा है ।

9
मुस्लमां न हुए तो कैसे आएगा,
हुनर तेरी आंखों मे झांकने का।
मुस्लमां हो भी गए तो क्या हुआ,
तेरी आंखे तो कुछ और ही चाहती हैं।

10
मेरे न होने पे ताज्जुब न करना दोस्तों,
इस गली से पहले भी कई गुजरे हैं।

11
मैनें देखा है तुम्हें उमस भरी दोपहरों में,
बासबब बातों पे तुम मन उतारा करते थे,
यूं हंस के गले मिलते थे तुम हमसे,
और तंगहाली में हम हंसी संवारा करते थे।

12
साल दर साल जो बनते रहे अनजान हमसे,
टूटे रास्ते तो मुड़कर पीछे देखते हैं..

13
मतलबी लोगों ने फिर निशाना साधा है,
क्या पता, इस बार क्‍या लूटने का इरादा है।

14
सुना है कि तूने खामोश रहना सीखा है,
कहीं ये तेरे प्यार सा इक धोखा है?

15
जो अपनी दुश्वारियां रखीं उसके सामने,
वो लगा मेरी रूबाइयों की दाद देने।

16
सारी रात बह गई, अकेला दिन थम गया, तुमने तो आने को कहा था, पीठ पे टिक के लंबी सांस भी तो ली थी. . इसे उधार मानूं या दान. ? सूद चुकाऊं या असल या फिर दोनोँ . . .? कितना तो अच्छा होता कि सांसों को मेरी पीठ पर देने से पहले ही बातें साफ हो जातीं। अब उन सांसों को वापस कैसे करूं . . ?

17
उनके चंद रोज के फरेब पे हुआ आशिक मैं,
वो थे कि सालों सूद ही वसूलते रहे।

18
शराबियों में होते हैं कुछ खास शराबी,
वो पीने से पहले ही महक जाते हैं।
प्याले मे मय न हो पानी ही सही ,
गिलास भरा देखकर ही चहक जाते हैँ।

19
धूप का इक टुकड़ा अब मेरे घर भी आता है,
भरी दुपहरी रहता है, शाम तलक खो जाता है।

Sunday, May 2, 2010

सरकारी फरमान - नो असहमति

सरकार का फरमान है कि देश में असहमति की कोई भी आवाज़ उठने नहीं दी जायेगी। साम्राज्यवाद की दलाल सरकार ने कार्पोरेशनों के हित में लोकतंत्र के खिलाफ, जनता के प्रतिरोधों के खिलाफ और ख़ुद देश की व्यापक जनता के खिलाफ अपनी सेना उतार दी है। यह युद्ध भी दो देशों के बीच है। इसमे एक ओर है इंडिया, जिसमें अरबपति कारपोरेट हैं, लालची मध्यवर्ग है, कारपोरेट मीडिया है, साम्राज्यवाद के टुकडों पर पलते बुद्धिजीवी हैं. दूसरी ओर है एक दूसरा देश, जिसमें अस्सी करोड़ के आसपास के आबादी 20 रुपये रोज पर गुजर-बसर करती है। इस आबादी को इस लोकतंत्र ने अब तक प्रताड़ना और अपमान के सिवा कुछ भी नहीं दिया है। अब यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उनसे उनके पास जो कुछ भी है, वह सेना के बल पर उनसे छीन लेनेके अभियान पर निकला है। दो देशों के इस युद्ध में हमने अपनी जगह तय करनी है कि हम किस तरफ़ हैं। एक लेखिका ने यहाँ अपनी जगह तय करने की कोशिश की है।- रियाज़ उल हक



कंपनियों को खजाना और जनता को मौत बांटती सरकार

अरुंधती रॉय

दक्षिणी उड़ीसा की हल्की ऊंची और सपाट चोटी वाली पहाड़ियां डोंगरिया कोंध आदिवासियों के घर हैं। तब से जब उड़ीसा नाम के किसी राज्य और भारत नाम के किसी देश का अस्तित्व भी नहीं था। उन पहाड़ियों ने कोंधों का खयाल रखा। कोंधों ने उन पहाड़ियों को सहेजे रखा। उनकी पूजा की। एक जीवित भगवान की तरह। लेकिन अब बॉक्साइट के कारण उन पहाड़ियों को बेच दिया गया है। कोंध आदिवासियों को लगता है कि उनका भगवान बेच दिया गया है। वो पूछ रहे हैं कि अगर उनके देवता की जगह राम, अल्ला या ईसा मसीह होते तो क्या उन्हें बेचा जाता?

लाल आतंक?: दंतेवाड़ा में अपने बच्‍चों के साथ एक आदिवासी औरत

शायद, कोंधों से अहसानमंद रहने की उम्मीद की जाती है। इसलिए कि नियामगीरी पहाड़ी जो कि उनके देवता नियाम राजा (यूनिवर्सल लॉ के भगवान) का घर है, एक ऐसी कंपनी को बेची गयी है जिसका नाम है वेदांता। वेदांता मतलब हिंदू दर्शनशास्त्र की वो शाखा जो ज्ञान की सर्वोच्च प्रवृति सिखाती है। वेदांता दुनिया की सर्वाधिक बड़ी खनन कंपनियों में से एक है और इसके मालिक हैं अनिल अग्रवाल। भारतीय मूल के अरबपति जो लंदन के एक महल में रहते हैं। वह महल एक जमाने में ईरान के शाह का हुआ करता था। वेदांता उन ढेरों बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से महज एक नाम है, जिन्होंने उड़ीसा की तरफ़ रुख किया है।

अगर सपाट चोटी वाली पहाड़ियां नष्ट हुईं तो उन्हें ढकने वाले जंगल नष्ट हो जाएंगे। उनके साथ ही वहां से निकलने वाली धाराएं और नदियां सूख जाएंगी। मैदानी इलाकों को यही नदियां पानी पहुंचाती हैं। सींचती हैं। उनके सूखने से डोंगरियां कोंध बर्बाद हो जाएंगे। जंगलों में रहने वाले हज़ारों हज़ार आदिवासी ऐसे ही संकट में हैं। उनके वतन पर हमला हुआ है।

धूल और धुएं से भरे सघन आबादी वाले शहरों के कुछ वाशिंदे कहते हैं “तो क्या हुआ? विकास की कीमत किसी को तो चुकानी ही होगी।“ कुछ यह भी कहते हैं कि “इस सच का सामना करो। इन लोगों का वक़्त पूरा हो गया है। किसी भी विकसित देश, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया को देखो – उन सभी का एक अतीत था। यकीनन था। तो हम भी अपने अतीत को दफ़्न क्यों नहीं कर दें?”

इसी विचार को केंद्र में रखते हुए सरकार ने ऑपरेशन ग्रीन हंट का एलान किया है। यह मध्य भारत के जंगलों में छिपे माओवादी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा है। यकीनन, सिर्फ़ और सिर्फ़ माओवादी ही बग़ावत नहीं कर रहे। देशभर में कई स्तरों पर संघर्ष हो रहा है। भूमिहीन, दलित, बेघर, मज़दूर, किसान और बुनकर – आंदोलन कर रहे हैं। वो सभी निरंतर हो रहे अन्याय और तानाशाही से दुखी हैं। वो उन नीतियों से आहत हैं जो कंपनियों को उनकी ज़मीन पर कब्जा करने का हक़ देती हैं। फिर भी सरकार ने सबसे बड़े ख़तरे के तौर पर माओवादियों की ही निशानदेही की है। दो साल पहले प्रधानमंत्री ने माओवादियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया। तब हालात इतने बदतर नहीं थे, जितने आज हैं। मनमोहन सिंह ने शायद सबसे अधिक बार यही बात कही है।

18 जून 2009 को मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की वास्तविक चिंता जाहिर की। संसद में उन्होंने कहा कि “अगर वामपंथी चरमपंथियों को देश के उन हिस्सों में फलने-फूलने दिया गया, जिनमें खनीज पदार्थ और दूसरी प्राकृतिक संपदाएं हैं तो निवेश का माहौल यकीनन बिगड़ेगा।”

माओवादी कौन हैं? वो प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) – सीपीआई (माओवादी) के सदस्य हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) – सीपीआई (एमएल) की कई संतानों में से एक। जिन्होंने 1969 में नक्सलबाड़ी विद्रोह का नेतृत्व किया और बाद में भारतीय सरकार ने जिन्हें ख़त्म कर दिया। माओवादी मानते हैं कि भारतीय समाज में अंतरनीहित संरचनात्मक खामियों को हिंसक विद्रोह के जरिए सरकार को बेदखल करके ही दूर किया जा सकता है। बिहार और झारखंड में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) और आंध्र प्रदेश में पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) के रूप में माओवादियों ने जनसमर्थन हासिल किया। 2004 में जब आंध्र प्रदेश में कुछ समय के लिए उन पर से प्रतिबंध हटाया गया तो वारंगल में हुई उनकी रैली में पांच लाख लोगों ने हिस्सा लिया था। लेकिन आंध्र प्रदेश में समझौते की कोशिश बहुत बुरे मोड़ पर ख़त्म हुई। उसके बाद जो हिंसा का ख़ौफ़नाक दौर शुरू हुआ उसने उनके कई घोर समर्थकों को भी विरोधी बना दिया। आंध्र प्रदेश पुलिस और माओवादियों के बीच हुए ख़ूनी संघर्ष में पीडब्ल्यूजी का लगभग सफाया हो गया। जो बच गये वो पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में दाखिल हो गये। घने जंगलों के बीच वो उन साथी माओवादियों से जा मिले जो उन इलाकों में कई दशकों से सक्रिय थे।

जंगल में चल रहे माओवादी आंदोलन से बाहरी दुनिया के चंद लोगों का ही सीधा परिचय हुआ होगा। हाल ही में ओपन पत्रिका में छपे उनके उनके शीर्ष नेताओं में से एक कॉमरेड गणपति के इंटरव्यू से भी उन लोगों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है जो माओवादियों को तानाशाही सोच रखने वाले दल के तौर पर देखते हैं। एक ऐसा दल जिसे असहमति बर्दाश्त नहीं।

कॉमरेड गणपति ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे यह भरोसा जगे कि अगर कभी वो सत्ता में आये तो जातियों में बंटे भारतीय समाज की उन्मादी अनेकता को संबोधित… सही तरीके से करेंगे। श्रीलंका में चले लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम को अनौपचारिक समर्थन से उनसे घोर सहानुभूति रखने वाले भी कांप उठे होंगे। न केवल इसलिए कि एलटीटीई ने अपनी लड़ाई में क्रूरतम हथकंडों का इस्तेमाल किया बल्कि इसलिए भी कि जिन तमिलों के प्रतिनिधित्व का एलटीटीई दावा करती थी, उन तमिलों पर एलटीटीई की वजह से जो विपदा पड़ी है उसे उसकी कुछ तो जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

इस वक़्त मध्य भारत में, माओवादियों के छापामार दस्ते में ऐसे जरूरतमंद गरीब आदिवासी शामिल हैं जो ऐसी भूखमरी के कगार पर थे, जिसका जिक्र हम अफ्रीकी देशों के संदर्भ में करते हैं। ये सभी वो लोग हैं जिन्हें साठ साल की आज़ादी के बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यायिक जरूरतों से दूर रखा गया। ये वो लोग हैं जिनका बेरहमी से शोषण किया गया। छोटे कारोबारियों और सूदखोरों के द्वारा दोहन किया गया। पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों ने महिलाओं से ऐसे बलात्कार किया जैसे यह कुकर्म उनका अधिकार हो।

चुनाव ’2009: दो बिलियन डॉलर्स का खेल

अगर आदिवासियों ने हथियार उठाया है तो सिर्फ़ इसलिए कि सरकार ने उन्हें हिंसा और उपेक्षा से अधिक कुछ नहीं दिया है। और अब वही सरकार उनसे उनका आखिरी सहारा – उनकी ज़मीन भी छीन लेना चाहती है। साफ़ है कि आदिवासी सरकार के इस कथन पर भरोसा नहीं करते कि वो उनका विकास करना चाहती है। उन्हें इस पर भी भरोसा नहीं कि दंतेवाड़ा में राष्ट्रीय खनीज विकास कॉरपोरेशन (NMDC) ने जंगलों में हवाईपट्टियों जितनी चौड़ी-चौड़ी सड़कें इसलिए बनाई हैं कि उनके बच्चे स्कूल जा सकें। वो मानते हैं कि अगर उन्होंने अपनी भूमि के लिए संघर्ष नहीं किया तो वो ख़त्म हो जाएंगे। यही वजह है कि आज उनके हाथों में हथियार है।

माओवादी आंदोलन के अगुवा भले ही सरकार को सत्ता के बेदखल करने के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन उन्हें अहसास है कि उनकी भूखी और कुपोषित सेना – जिनके ज़्यादातर सदस्यों ने कभी ट्रेन, बस और शहरी ज़िंदगी को क़रीब से नहीं देखा है – के लिए यह केवल अस्तित्व की लड़ाई है।

2008 में योजना आयोग की तरफ़ से नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। उस रिपोर्ट का नाम है – “उग्रवादप्रभावित इलाकों में विकास की चुनौतियां ”। इसमें लिखा है कि – नक्सली आंदोलन को भूमिहीन गरीब किसानों और आदिवासियों के बीच जनाधार वाले एक राजनीतिक आंदोलन के तौर पर मान्यता देनी होगी। स्थानीय लोगों के अनुभवों और सामाजिक हालात के संदर्भों में नक्सली आंदोलन के उत्थान और विस्तार को समझने की ज़रूरत है। राज्य की नीतियों और उन नीतियों पर अमल में मौजूद ग़हरी खाई उन्हीं हालत में से एक है। यह सही है कि इसकी विचारधारा… ताक़त के बल पर सत्ता हासिल करना है, लेकिन रोज़मर्रा के क्रिया कलापों में इसे सामाजिक न्याय, समानता, रक्षा, सुरक्षा और स्थानीय विकास के लिए चल रहे संघर्ष के तौर पर देखना होगा।” यह “आंतरिक सुरक्षा के सबसे बड़े ख़तरे” के सिद्धांत से काफी अलग है।

माओवादी विद्रोही इन दिनों चर्चा का विषय हैं। चमकते हुए अमीर से लेकर सबसे अधिक बिकने वाले अख़बार के सनकी संपादक तक – हर कोई अचानक यह मानने को तैयार हो गया है कि दशकों से हो रहा अन्याय ही इस समस्या की जड़ है। लेकिन उस समस्या को समझने की जगह, जिसका मतलब होगा 21वीं सदी की इस सुनहरी दौड़ का थम जाना, वो इस बहस को एक नया मोड़ देने में जुटे हैं। माओवादी “आतंकवाद” के ख़िलाफ़ भावनात्मक गुस्से का इज़हार करते हुए … चीखते-चिल्लाते हुए। लेकिन वो सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रहे हैं।

जनता जिसने हथियार उठा रखा है, वह टेलिविजन देखने और अख़बार पढ़ने में अपना वक़्त खर्च नहीं करती। “हिंसा सही है या ग़लत? अपने जवाब …. पर एसएमएस करें” – जैसे नैतिक सवालों पर वो अपना दिमाग नहीं खपाती है। वो अपने इलाकों में … अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं। वो मानते हैं कि अपने घर, अपनी ज़मीन को बचाने की लड़ाई लड़ने का उन्हें पूरा अधिकार है। उनका विश्वास है कि उन्हें न्याय मिलना ही चाहिए।

वीटी, 26/11: इस हादसे के बाद भारत सरकार पाकिस्‍तान से बात करने को तैयार है, लेकिन अपने ही देश के ग़रीबों के साथ अछूत बर्ताव कर रही है।

अपने खुशहाल नागरिकों को इन ख़तरनाक लोगों (आदिवासियों) से सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने इनके ख़िलाफ़ युद्ध का एलान कर दिया है। सरकारी बताती है इस युद्ध को जीतने में तीन से पांच साल लग सकते हैं। यह कितना अजीब लगता है कि मुंबई हमले के बाद भी भारत सरकार पाकिस्तान से बात करने के लिए तैयार है? चीन से बात करने के लिए तैयार है, लेकिन अपने ही देश की सर्वाधिक ग़रीब जनता के ख़िलाफ़ युद्ध के बारे में उसका रवैया सख़्त है।

आदिवासी इलाकों में ग्रेहाउंड्स (कुत्ते की एक खूंखार प्रजाति), कोबरा (सांप की सबसे विषैली प्रजातियों में से एक) और स्कॉर्पियन (बिच्छू) जैसे डरावने नामों वाले स्पेशल पुलिस के दस्तों को नरसंहार का लाइसेंस दिया जा चुका है, लेकिन लगता है यह काफी नहीं है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और कुख्यात नगा बैटेलियन ने जंगलों में बसे गांवों में पहले से क़हर बरपा रखा है, लेकिन यह भी काफी नहीं। आदिवासियों को हथियार थमा कर सलवा जुडुम का निर्माण करना भी काफी नहीं। वो सलवा जुडुम जिसने हत्या, बलात्कार और आगजनी के बल पर दंतेवाड़ा के जंगलों में तीन लाख से भी ज़्यादा लोगों को या तो बेघर कर दिया है या फिर भागने पर मजबूर। लेकिन यह सब काफी नहीं।

शायद तभी सरकार ने आईटीबीपी और दूसरे अर्धसैनिक बलों के हज़ारों जवानों को तैनात करने का फैसला लिया है। बिलासपुर में नौ गांवों को विस्थापित करके सरकार एक ब्रिगेड मुख्यालय बनाना चाहती है। और राजनांदगांव में सात गांवों को विस्थापित करके एक एयरबेस बनाने की योजना है। जाहिर है यह फ़ैसले काफी पहले लिए गये होंगे। सर्वे किया गया होगा। जगह का चयन हुआ होगा। लेकिन युद्ध की चर्चा हाल-फिलहाल शुरू की गयी है। और अब भारतीय एयरफोर्स के हेलीकॉप्टरों को आत्मसुरक्षा के नाम पर हमले का अधिकार दे दिया गया है। देश की सर्वाधिक ग़रीब जनता यही आत्मसुरक्षा का अधिकार मांग रही है लेकिन सरकार उसे यह अधिकार नहीं देना चाहती।

गोलीबारी किस पर? कोई यह बताएगा कि सुरक्षाबल… आतंकित हो कर भाग रहे आदिवासियों और माओवादियों में फर्क कैसे करेंगे? सदियों से आदिवासी तीर-कमान के साथ जंगलों में घूमते आये हैं – क्या अब उन्हीं तीर कमान के कारण उन्हें माओवादी घोषित कर दिया जाएगा?

क्या माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले अहिंसक लोग भी निशाने पर होंगे? जब मैं दंतेवाड़ा में थी, पुलिस अधीक्षक ने ऐसे 19 माओवादियों की तस्वीरें दिखाईं, जिन्हें उनके जवानों ने ढेर कर दिया था। मैंने उनसे पूछा कि मैं किस आधार पर कहूं कि ये माओवादी हैं? – उन्होंने जवाब दिया – देखिए मैडम उनके पास मेलेरिया की दवाएं और डिटॉल की बोतलें मिली हैं – ये वो सामान हैं जो यहां बाहर से आते हैं।

हत्‍या का लाइसेंस: वायुसेना को आत्‍मरक्षा के लिए गरीबों पर गोलीबारी का अंधा अंधिकार दे दिया गया, लेकिन गरीबों की आत्‍मरक्षा का क्‍या?

ऑपरेशन ग्रीन हंट आखिर किस तरह का युद्ध होगा? क्या हम कभी जान सकेंगे? पहले से ही जंगलों के भीतर से बहुत कम ख़बरें आती हैं। पश्चिम बंगाल में लालगढ़ को सेना ने घेर लिया था। जो भी वहां जाना चाहता उसे गिरफ़्तार कर लिया जाता और उसकी पिटाई की जाती। माओवादी बता कर। दंतेवाड़ा में वनवासी चेतना आश्रम, एक गांधीवादी आश्रम था। उसे हिमांशु कुमार चलाते थे। कुछ ही घंटों में उस आश्रम को मिट्टी में मिला दिया गया। युद्ध क्षेत्र से ठीक पहले यह एक ऐसी जगह थी जहां पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, शोधार्थी और जांच टीमें ठहरा करती थीं।

इसी बीच भारत सरकार ने अपने सर्वाधिक घातक हथियार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। रातों रात, हमारी इब्बेडिड मीडिया ने “इस्लामी आतंकवाद” के बारे में प्लांटेड, तथ्यहीन, तर्कहीन और पागलपन से भरी ख़बरों की जगह “लाल आतंकवाद” के बारे में प्लांडेट, तथ्यहीन, तर्कहीन और पागलपन भरी खबरें दिखाना शुरू कर दिया। इस रैकेट के बीच, युद्ध मैदान में घोषित और दमघोंटू चुप्पी छाई हुई है। सुरक्षाबलों का घेरा कस दिया गया है। श्रीलंका की तर्ज पर समस्या को हल करने की नीति पर अमल हो रहा है। यह अकारण नहीं है कि तमिल टाइगर्स के ख़िलाफ़ श्रीलंका के युद्ध अपराधों की जांच की मांग से जुड़े यूरोपीय प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र में भारत ने विरोध किया।

इस दिशा में पहला कदम वह प्रचार है जिसके सहारे देश में चल रहे अनगिनत आंदोलनों को एक ही नाल में ठोंक देना है। ठीक अमेरिकी के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के सिद्धांत के तहत कि “अगर तुम हमारे साथ नहीं” तो तुम “माओवादी” हो। सोची-समझी रणनीति के तहत माओवादी ख़तरे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने से सरकार को सैन्यीकरण में मदद मिलती है। (इससे माओवादियों को भी कोई नुकसान नहीं है। आखिर कौन सी राजनीतिक पार्टी ऐसी होगी जो इतनी तवज्जो मिलने पर दुखी हो?)

आतंक के ख़िलाफ़ इस नये युद्ध से राज्य को अपने ख़िलाफ़ सिर उठा रहे सैकड़ों आंदोलनों को एक साथ ख़त्म करने का मौका मिल जाएगा। इस सैन्य अभियान में माओवादियों के शुभचिंतक बता कर सभी आंदोलनकारी साफ़ कर दिये जाएंगे। मैंने भविष्यकाल (फ्यूचर टेंस) का इस्तेमाल किया है, लेकिन यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पश्चिम बंगाल सरकार ने नंदीग्राम और सिंगूर में यही किया। उसे मुंह की खानी पड़ी। लालगढ़ में पुलिस संत्राश बिरोधी जनसाधारणेर कमेटी (पुलिस उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जनसाधारण समिति) – जो कि एक जन आंदोलन है, माओवादी आंदोलन नहीं – को बार-बार सीपीआई (माओवादी) का धड़ा बता दिया जाता है। उसके नेता छत्रधर महतो को गिरफ़्तार किया जा चुका है और माओवादी बता कर ज़मानत नहीं लेने दिया जा रहा।

हम सब पेशे से चिकित्सक और मानवाधिकार कार्यकार्ता डॉक्टर बिनायक सेन की दास्तान जानते हैं। उन्हें दो साल तक माओवादियों को मदद पहुंचाने के झूठे आरोप में दो साल कैद में रखा गया। जब सभी का ध्यान ऑपरेशन ग्रीन हंट पर होगा तब इस युद्ध क्षेत्र से अलग भारत के दूसरे हिस्सों में देश की बेहतरी के नाम पर गरीबों की जमीन के अधिग्रहण कार्रवाई तेज़ हो जाएगी। उनकी पीड़ा बढ़ती जाएगी और उनकी चीखों को सुनने वाला कोई नहीं होगा।

युद्ध शुरू हुआ तो तमाम युद्धों की तरह इसकी अपनी गति, तर्क और अर्थशास्त्र विकसित हो जाएगी। यह ज़िंदगी की ऐसी धारा बन जाएगी, जिसका रुख मोड़ना लगभग नामुमकिन होगा। पुलिस से सेना यानी हत्या की एक क्रूर मशीन की तरह बर्ताव करने की उम्मीद होगी। अर्धसैनिक बल पुलिस की तरह भ्रष्ट और सड़ चुके सुरक्षा बल की तरह बर्ताव करेंगे। नगालैंड, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर में हमने यह सब देखा है।

इस मध्य भारत में एक फर्क यही रहेगा कि चीजे बहुत जल्द साफ़ हो जाएंगे। सुरक्षाबलों को भी यह अहसास हो जाएगा कि उनमें और जिन लोगों के ख़िलाफ़ वो लड़ रहे हैं कोई ख़ास अंतर नहीं है। वक़्त के साथ जनता और कानून लागू करने वालों के बीच खाई गहराती जाएगी। हथियार और गोलाबारूद खरीदे और बेचे जाएंगे। वास्तव में यह अब भी हो रहा है। चाहे वो सुरक्षाबल हों या फिर माओवादी या फिर अहिंसक नागरिक… सबसे गरीब जनता… अमीरों की इस जंग में मारी जा रही है। फिर भी अगर कोई यह मान रहा है कि इस युद्ध से उसकी सेहत पर असर नहीं पड़ेगा तो उसे दोबारा सोचना चाहिए। इस युद्ध में जो भी साधन खर्च होंगे उनका असर देश की अर्थव्यवस्था पर ज़रूर पड़ेगा।

पिछले हफ़्ते, नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने दिल्ली में कई बैठकें की। मुद्दा था कि युद्ध को टालने और तनाव दूर करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है। नागरिक अधिकारों के सबसे अधिक सक्रिय कार्यकर्ता डॉ बालगोपाल की कमी बहुत खली। आंध्र प्रदेश के डॉ बालगोपाल की दो हफ़्ते पहले मृत्यु हो गयी। वो हमारे दौर के सबसे साहसिक और सुलझे हुए राजनीतिक विचारक रहे हैं और उन्होंने हमारा साथ ऐसे दौर में छोड़ा है जब उनकी सबसे अधिक ज़रूरत है। फिर भी, मुझे यकीन है कि अगर वो इन बैठकों में होते और वक्ताओं की समझ, गहराई, अनुभव, ज्ञान, राजनीतिक तीक्ष्णता और मानवीय चेहरे को देखते तो उन्हें संतोष हुआ होता। भारत में नागरिक अधिकारों की हिमायत करने वाले संगठनों में शिक्षक, वकील, जज समेत विविध क्षेत्रों के लोग शामिल हैं। राजधानी में उनकी मौजूदगी से जाहिर हुआ कि हमारे टेलीविजन स्टूडियो की चमक और मीडिया के पागलपन भरे शोर के बीच भी भारतीय मध्य वर्ग का मानवीय दिल धड़कता है। अगर मैं ग़लत नहीं तो, यही वो लोग हैं जिन पर केंद्रीय गृह मंत्री ने आतंकवाद को जायज ठहराने वाला बौद्धिक माहौल तैयार करने का आरोप लगाया था। अगर वह आरोप लोगों को डराने के लिए था तो उसका असर उल्टा हुआ है।

वक्ताओं ने ढेरों मत दिये। उदारवादी से लेकर घोर वामपंथी विचार सामने आये। हालांकि वहां मौजूद किसी भी शख़्स ने खुद को माओवादी नहीं बताया, कुछ तो सैद्धांतिक तौर पर उस विचार के भी ख़िलाफ़ थे कि लोगों को राज्य की हिंसा का प्रतिरोध करने का अधिकार होना चाहिए। बहुत से लोग माओवादियों की हिंसा से असहज नज़र आये, “जनता की अदालत” जैसे सिद्धांत उन्हें हजम नहीं हुए। वो ऐसी तानाशाही के भी ख़िलाफ़ दिखे जो हिंसक विद्रोह की तरफ़ ढकेल दे और उन लोगों को हाशिए पर ठेल दे जिनके पास हथियार नहीं हैं। भले ही उन सभी ने माओवादी हिंसा को लेकर अपनी असहजता जाहिर की, लेकिन सभी इस बात पर सहमत थे कि “जनता की अदालतें” अस्तित्व में इसलिए आईं क्योंकि हमारी अदालतें आम आदमी की पहुंच से बाहर थीं। और मध्य भारत में शुरू हुआ हिंसक विद्रोह कोई पहला विकल्प नहीं है बल्कि आदिवासियों के सामने यह आखिरी विकल्प बचा था, जिनके अस्तित्व को ख़तरे में डाल दिया गया है।

वक्ताओं को यह अहसास था कि युद्ध जैसे बनते हालात में हिंसा के इक्का-दुक्का घृणित वाकयों के आधार पर नैतिकता का सवाल उठाने के अपने ख़तरे हैं। हर कोई सत्ता की तरफ़ से होने वाली संस्थागत हिंसा और हथियारबंद प्रतिरोध की हिंसा का मतलब समझता है। सेवानिवृत जस्टिस पी बी सावंत ने तो जनता के साथ हो रहे घोर अन्याय की तरफ़ सत्ता का ध्यान खींचने के लिए माओवादियों का शुक्रिया अदा किया।

आंध्र प्रदेश के हरगोपाल ने नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ता की हैसियत से राज्य में माओवादी गतिविधियों के दौर में मिला अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि 2002 के गुजरात दंगों में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद की उग्र भीड़ ने जितने लोगों की हत्या कि माओवादियों ने कभी उतने लोगों की हत्या नहीं की – आंध्र प्रदेश के ख़ूनी दौर में भी नहीं।

लालगढ़, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के युद्ध क्षेत्र से पहुंचे लोगों ने अपनी बात रखी। उन्होंने पुलिसिया क़हर, गिरफ़्तारी, हत्या, जुल्म और भ्रष्टाचार के किस्से बयां किए। उड़ीसा जैसी जगहों पर तो पुलिस खनन कंपनियों के अधिकारियों के इशारे पर कार्रवाई करती है। उन्होंने कुछ स्वंयसेवी संस्थाओं के दोहरे चरित्र को भी सामने रखा। बताया कि कैसे वो कंपनियों के हितों को पोषित करने की भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे झारखंड और छत्तीसगढ़ में जो भी इस रैकेट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है उसे माओवादी बता कर जेल में ठूंस दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सत्ता की यह दमनात्मक कार्रवाई लोगों को हथियार उठाने के लिए सबसे अधिक उकसा रही है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जो सरकार विस्थापित हुए पांच करोड़ नागरिकों के एक छोटे से हिस्से को भी पुनर्वासित करने में नाकाम रही है उसने कैसे 300 स्पेशल इकोनोमिक जोन के नाम पर कंपनियों को देने के लिए 1.4 लाख हेक्टेयर जमीन तुरंत चिन्हित कर ली?

उन्होंने पूछा कि यह जानते हुए भी कि सरकार निजी कंपनियों को देने के लिए जनता को जमीन से बेदखल कर रही है, भूमि अधिग्रहण कानून में मौजूद जनहित की परिभाषा की समीक्षा से इनकार करके सुप्रीम कोर्ट ने न्याय की किस अवराधारणा पर अमल किया?

उन्होंने पूछा कि सरकार जब कहती है कि “राज्य आज्ञा का पालन होना चाहिए” तो उसका मतलब यही होता है कि पुलिस स्टेशन खड़े कर दिये जाए। राज्य आज्ञा का मतलब स्कूल और क्लिनिक बनवाना क्यों नहीं है? मकान या फिर साफ पानी मुहैया कराना क्यों नहीं है? जंगल के उत्पादों के लिए उचित कीमत देना क्यों नहीं है? लोगों को पुलिस के भय से मुक्त कराना और उन्हें अकेला छोड़ देना क्यों नहीं होता है – कोई भी ऐसा कदम जिससे लोगों की ज़िंदगी थोड़ी आसान हो। उन्होंने पूछा कि आखिर राज्य आज्ञा का मतलब न्याय क्यों नहीं है?

करीब दस साल पुरानी बात है। ऐसी ही बैठकों में नई आर्थिक नीति से उत्साहित लोग विकास के मॉडल पर बहस किया करते थे। अब उन्होंने नई आर्थिक नीति का विकास मॉडल खारिज कर दिया है। पूर्णत: खारिज। गांधीवादियों से लेकर माओवादियों हर कोई इस पर सहमत है। सब एक ही सवाल से जूझ रहे हैं कि आखिर विकास के इस क्रूर तिलिस्म को तोड़ा कैसे जाए?

एक दोस्त का पुराना कॉलेज मित्र इस अनजान दुनिया के बारे में जानने की उत्सुकता के साथ ऐसी ही एक बैठक में पहुंचा। वो इन दिनों कॉरपोरेट दुनिया का बड़ा नाम है। हालांकि उसने अपनी असलियत फैबइंडिया के कुर्ते में छिपाने की कोशिश की, लेकिन खुद को अमीर दिखने (और महकने) से नहीं रोक सका। एक मौके पर वह मेरी ओर झुका और कहा “कोई इन्हें समझाए कि ये परेशान नहीं हों। यह नहीं जानते कि इनकी लड़ाई किनसे है। कंपनियां मंत्रियों, मीडिया मालिकों और नीतियां बनाने वालों को खरीद सकती हैं। अपना एनजीओ चला सकती हैं। जरूरत पड़ने पर अपनी सेना खड़ी कर सकती हैं.. ये पूरी सरकार खरीद सकती हैं। वो माओवादियों को भी खरीद लेंगे। यहां मौजूद भले लोगों को चाहिए कि वो थोड़ा सुसता कर कुछ बेहतर करने के बारे में सोचें”।

जब लोग क़त्ल किए जा रहे हों तो लड़ने से “बेहतर” क्या कुछ हो सकता है? उनके पास कोई विकल्प बचा ही नहीं है, सिवाए आत्महत्या के। ठीक वैसे ही जैसे देश के 1,80,000 किसानों ने कर्ज में डूबने के बाद अपनी जान दी। ((क्या मैं अकेली हूं जिसे यह महसूस होता है कि अपने हक़ की लड़ाई लड़ने की तुलना में भारतीय व्यवस्था और मीडिया में उसके प्रतिनिधि हताशा और निराशा के माहौल में किसानों की खुदकुशी को लेकर ज़्यादा सहज हैं?))

सेज़ या साज़‍िश: क्‍या यह विकास है?

कई साल तक छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल में लोग – उनमें से कुछ माओवादी – बड़ी कंपनियों को अपने से दूर रखने में कामयाब रहे हैं। अब सवाल उठता है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट से उनके संघर्ष के तरीके पर क्या असर पड़ेगा?

यह सही है कि स्थानीय लोगों से युद्ध में खनन कंपनियों की हमेशा जीत हुई है। यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि हथियार बनाने वाली कंपनियों को छोड़ दें तो तमाम कंपनियों की तुलना में खनन कंपनियों का इतिहास सबसे अधिक हिंसक और क्रूर है। वो सनकी और युद्ध उन्मादी होती हैं। जब लोग कहते हैं कि “जान देंगे पर ज़मीन नहीं देंगे” तो वो उछल पड़ती हैं। हज़ारों अलग-अलग भाषाओं और सैकड़ों देशों में इन कंपनियों ने यही बात सुनी होगी।

भारत में, उनमें से कई अब भी फर्स्ट क्लास यात्री लॉन्ज में हैं। कॉकटेल का आदेश करते हुए, सुस्त शिकारी की तरह पलकें झपकाते हुए और उस वक़्त का इंतज़ार करते हुए जब समझौतों – जिनमें से कुछ 2005 में किए गये थे – से कमाई होने लगेगी। फर्स्ट क्लास लॉन्ज में ही क्यों न हो – चार साल का इंतज़ार किसी की भी सब्र की परीक्षा लेने के लिए काफी है। वह इतना स्पेस ही देने को तैयार थे ताकि लोकतंत्रिक अनुष्ठान के सभी खोखले रीति रिवाज – (फर्जी) जन सुनवाई, (फर्जी) पर्यावरण छति मूल्यांकन, विभिन्न मंत्रालयों से (खरीदी हुई) स्विकृतियां, लंबे चले अदालती मुक़दमे – पूरे किए जा सकें। लोकतंत्र चाहे छद्म क्यों न हो उसमें वक़्त लगता है और उद्योगपतियों के लिए वक़्त का मतलब पैसा है।

आखिर हम किस तरह के पैसे की बात कर रहे हैं? अपने मौलिक और जल्द प्रकाशित होने वाली पुस्तक – आउट ऑप दिस अर्थ: ईस्ट इंडिया आदिवासीज एंड द अल्युमीनियम कार्टेल – में समरेंद्र दास और फेलिक्स पाडेल ने बताया है कि उड़ीसा में मौजूद बॉक्साइट की क़ीमत 2270 अरब डॉलर है। यह रकम भारत के सकल घरेलु उत्पाद से दोगुनी है। यह आंकड़े 2004 की क़ीमत पर आधारित हैं। वर्तमान में उसकी क़ीमत 4000 अरब डॉलर के करीब होगी।

इसमें से आधिकारिक तौर पर सरकार को सात फ़ीसदी से भी कम रॉयल्टी मिलेगी। अक्सर, खनन कंपनी जब चर्चित और मान्यता प्राप्त होती है तो भविष्य के बाज़ार को ध्यान में रखते हुए खनीज पदार्थ को निकाले बगैर पहाड़ियों का सौदा हो जाता है। वो पहाड़ियां तब भी आदिवासियों के लिए जीवन और आस्था के स्रोत और जीवित देवताओं के समान हो सकती हैं, इलाके में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की धूरी हो सकती हैं, लेकिन इन कंपनियों के लिए उनकी हैसियत सस्ते भंडारगृह से अधिक कुछ नहीं। कंपनियों के हिसाब से तो उन पहाड़ियों से बॉक्साइट को हर हाल में निकालना होगा। यह काम शांतिपूर्ण तरीके से नहीं हुआ तो इसे हिंसक तरीके से करना होगा। यही मुक्त बाज़ार की अनिवार्य शर्त है।

यह उड़ीसा में केवल बॉक्साइट की कहानी है। इन 4000 अरब डॉलर में छत्तीसगढ़ और झारखंड से निकलने वाले उच्च कोटि के लौह अयस्क की क़ीमत जोड़ लीजिए। और यूरेनियम, लाइमस्टोन, डोलोमाइट, कोयला, टीन, ग्रैनाइट, संगमरमर, कॉपर, हीरा, सोना, क्वार्टजाइट, कोरंडम, बेरील, अकेक्सेन्ड्राइट, सिलिका, फ्लोराइट और गार्नेट समेत 28 अन्य खनीज स्रोतों की कीमत को भी जोड़िए। इस लिस्ट में पॉवर प्लांट, बड़े-बड़े बांध, हाईवे, स्टील और सीमेंट फैक्टरिया, अल्युमीनियम ढालने वाली फैक्टरियां और आधारभूत ढांचे से जुड़ी तमाम अन्य परियोजनाओं जो कि सैकड़ों समझौतों का हिस्सा हैं उनकी लागत भी जोड़िए (अकेले झारखंड में ऐसी 90 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है)। इससे हमें और आपको वहां होने वाले ऑपरेशन और उससे जुड़ी कंपनियों की बेचैनी का मोटा-मोटी अंदाजा मिल जाएगा।

पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के हिस्सों में फैले जंगल – जिसे दंडकारण्य कहा जाता रहा है – में करोड़ों आदिवासी रहते हैं। मीडिया ने इसे लाल कॉरिडोर या फिर माओइस्ट (Maoist – माओवादी) कॉरिडोर कहना शुरू कर दिया है। कायदे से इसे एमओयूइस्ट (MoUist – MoU का मतलब मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग होता है) कॉरिडोर कहना चाहिए। यह संविधान के पांचवे सिड्यूल में आदिवासियों को दी गयी सुरक्षा के एकदम विपरीत है – जिसके तहत उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि यह क्लॉज संविधान की सुंदरता के लिए जोड़ा गया है। हल्की सी सजावट। हल्का सा मेकअप। आदिवासियों के घरों पर कब्जा करने के लिए बहुतेरी कंपनी – छोटी से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनियां – कतार में लगी हुई हैं। मित्तल, जिंदल, टाटा, एस्सार, पॉस्को, रियो टिंटो, बीएसपी बिलिटॉन और वेदांता – यह फेहरिस्त काफी लंबी है।

यहां हर पर्वत, नदी और जंगल के लिए एक करार किया गया है। हम ऐसी सामाजिक और पर्यावरण इंजीनियरिंग की बात कर रहे हैं जो हमारी कल्पनाओं से परे है। और इसमें से अधिकतर गुप्त भी, जिनके बारे में किसी को कोई भनक नहीं।

किसी भी प्रकार से, मैं यह नहीं सोच रही कि दुनिया के प्राचीनतम जंगलों में एक जंगल और उसमें पलने वाले इकोसिस्टम और रहने वाले लाखों इंसानों को धीरे-धीरे नष्ट करने की इस साज़िश के बारे में कोपेनहेगन की क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में कोई चर्चा होगी। हमारे 24 घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल भी माओवादी हिंसा के बेतुके किस्सों को गढ़ने में और ख़बरों का अकाल पड़ने पर उन्हें चलाने में लगातार व्यस्त रहते हैं। लेकिन इस हिंसा के दूसरे पहलू को लेकर उनका रवैया हमेशा उदासीन बना रहता है। मैं चकित हूं कि ऐसा क्यों है?

शायद इसलिए कि वो विकास की वकालत करने वालों के दास बन गये हैं और विकास की दलील देने वाली यह लॉबी कहती है कि खनन उद्योग से सकल घरेलु उत्पाद की विकास दर में तेज बढ़ोतरी होगी और इससे विस्थापितों को रोजगार मिलेगा। उन्हें पर्यावरण को होने वाली भयावह छति नज़र नहीं आती है। अगर इस छति को रहने दें तो भी उनकी संकीर्ण दलीलों में कोई दम नहीं है। अधिकतर पैसा कंपनियों के मालिकों की तिजोरी में चला जाएगा। सरकार के हिस्से में दस फ़ीसदी से भी कम आएगा। विस्थापितों की तुलना में बहुत कम लोगों को रोजगार मिलेगा। और जिन्हें रोजगार मिलेगा वो बंधुआ मज़दूरी पर कमरतोड़ मेहनत करने के लिए मजबूर रहेंगे। अपने लालच की अंतहीन गुफा खोदते हुए हम अपने पर्यावरण की कीमत पर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था चमका रहे हैं।

जब इस खेल में लगा पैसा इतना अधिक हो तो स्टेकहोल्डर्स (लाभार्थियों) की शिनाख्त हर समय आसान नहीं होती। निजी विमानों में घूमने वाले सीईओ से लेकर सलवा जुडुम जैसे घृणित अभियान में शामिल भोलेभाले आदिवासियों तक – जो चंद हज़ार रुपयों के लिए अपने ही लोगों की हत्या और बलात्कार करते हैं और उनके घरों को जला देते हैं ताकि खनन का काम शुरू हो सके – लाभार्थियों का जाल फैला हुआ है। इन्हें अपना हित जाहिर करने की कोई जरूरत नहीं। इन्हें अपनी जगह लेने की छूट दी जा चुकी है।

क्या कभी हम यह जान पाएंगे कि इस लूट में किस राजनीतिक दल, मंत्री, सांसद, नेता, जज, एनजीओ, विशेषज्ञ और अधिकारी का प्रत्यक्ष या फिर परोक्ष रूप से कितना हित जुटा है?

क्या हम जान सकेंगे कि माओवादी हिंसा के ताज़ा वाकये के बारे में ग्राउंड जीरो (युद्ध क्षेत्र) से सीधी रिपोर्टिंग करने वाले – या साफ़ शब्दों में कहें तो ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग का पाखंड करने वाले – या और अधिक साफ शब्दों में कहें तो ग्राउंड जीरो से झूठ बोलने वाले किस अख़बार और न्यूज़ चैनल का इस लूट में क्या हिस्सा है?

आखिर कैसे और कहां से भारत के चंद नागरिकों ने चोरी छिपे खरबों डॉलर स्विस बैंक में जमा कराए हैं (यह रकम भारतीय जीडीपी से कई गुना है)?

बीते आम चुनाव में खर्च हुए दो अरब डॉलर आखिर कहां से आये? चुनावी पौकेज के नाम पर सियासी दलों और नेताओं ने मीडिया को जो अरबों रुपये बांटे हैं वो कहां से आये? (अगली बार अगर आप किसी टीवी एंकर को एक स्तब्ध स्टूडियो गेस्ट से जबरन, चीखते हुए अंदाज में सवाल करते सुने कि “आखिर माओवादी चुनाव क्यों नहीं लड़ते हैं? मुख्यधारा में क्यों नहीं आते हैं?” तो यह एसएमएस जरूर कीजिएगा – “क्योंकि तुम्हारे दाम (रेट) उनकी (माओवादियों की) पहुंच से बाहर हैं।))

पी चिदंबरम: सीईओ, ऑपरेशन ग्रीन हंट

यह जान कर हम क्या कर सकते हैं कि ऑपरेशन ग्रीन हंट के सीईओ और देश के केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कॉरपोरेट वकील के तौर पर अपने करियर में कई खनन कंपनियों की नुमाइंदगी की है?

यह जान कर हम क्या कर सकते हैं कि चिदंबरम वेदांता के गैर कार्यकारी निदेशक थे और उन्होंने 2004 में उस पद से इस्तीफा ठीक उसी दिन दिया जिस दिन देश के वित्त मंत्री के तौर पर शपथ ली?

यह जान कर भी हम और आप क्या कर सकते हैं कि वित्त मंत्री बनने के बाद चिदंबरम ने सबसे पहले विदेशी निवेश के जिन प्रस्तावों को मंजूरी दी उनमें से एक प्रस्ताव मॉरिशस की कंपनी ट्विस्टार होल्डिंग्स का था जिसने वेदांता ग्रुप की कंपनी स्टरलाइट के शेयर खरीदे?

यह जान कर भी हम क्या कर सकते हैं कि जब उड़ीसा के एक कार्यकर्ता ने वेदांता पर सरकारी नियमों को तोड़ने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया और बताया कि कैसे यह कंपनी मानवाधिकारों का हनन और पर्यावरण से खिलवाड़ कर रही है और उसकी करतूतों के कारण नॉर्वेजियन पेंशन फंड ने निवेश वापस ले लिया, तो जस्टिस कपाडिया ने यह सलाह दी कि वेदांता की जगह यह प्रोजेक्ट उसकी सिस्टर कंपनी स्टरलाइट को दे दी जाए? जस्टिस कपाडिया ने बेपरवाह अंदाज में भरी अदालत में कहा कि उनके पास भी स्टरलाइट कंपनी के शेयर्स हैं। यही नहीं उन्होंने स्टरलाइट कंपनी को जंगल में खनन की इजाजत दे दी – यह जानते हुए भी कि सुप्रीम कोर्ट की विशेषज्ञ समिति ने यह कहते हुए खनन की छूट नहीं देने की सलाह दी थी कि उससे जंगल तबाह हो जाएंगे। पानी के स्रोत सूख जाएंगे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने से वहां का पूरा जनजीवन संकट में पड़ जाएगा। जस्टिस कपाडिया ने यह मंजूरी इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए दी।

सलवा जुडुम: टाटा के साथ एमओयू के थोड़े दिनों बाद बनी सरकारी जनसेना।

हम इस सत्य को जान कर भी क्या कर सकते हैं कि ज़मीन खाली कराने के लिए सलवा जुडुम जैसे हिंसक ऑपरेशन की औपचारिक शुरूआत 2005 में हुई, टाटा के साथ हुए करार के चंद दिनों बाद? और बस्तर में जंगल वेलफेयर ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना भी तभी की गयी?

हम इस सत्य को जान कर भी क्या कर सकते हैं कि अब से दो हफ़्ते पहले, 12 अक्टूबर को लोहनडिगुडा, दंतेवाड़ा में टाटा स्टील के दस हज़ार करोड़ रुपये की परियोजना की मंजूरी के लिए जरूरी जन सुनवाई कलेक्टर के दफ़्तर में हुई। बस्तर से भाड़े पर पचास लोग लाए गये। इलाके को सील कर दिया गया और उसके बाद कलेक्टर ने जन सुनवाई को कामयाब बता दिया और बस्तर की जनता को इस सहयोग के लिए धन्यवाद दिया?

हम यह जानकार भी क्या कर सकते हैं कि जब प्रधानमंत्री ने माओवादियों को सबसे बड़ा आंतरिक ख़तरा बताया तब उस इलाके से जुड़ी कई कंपनियों के शेयरों के भाव अचानक तेजी से चढ़ गये?

खनन कंपनियां हर हाल में यह युद्ध चाहती हैं। यह एक पुराना हथियार है। उन्हें उम्मीद है कि हिंसा का असर इतना व्यापक होगा कि जिन लोगों ने उन्हें इस इलाके में दाखिल होने से रोक रखा है वो अपने घर छोड़ कर जाने को मजबूर हो जाएंगे।

वास्तव में यह होगा या इससे माओवादियों की ताक़त बढ़ जाएगी यह भविष्य में पता चलेगा।

इस तर्क को पलटते हुए पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्त मंत्री डॉ अशोक मित्रा ने एक लेख लिखा है – द फेंटम एनिमी। उसमें डॉ मित्रा ने कहा है कि माओवादी जिन ख़ौफनाक़ सीरीयल हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं वो छापामार युद्ध की किताबों से सीखे गये पुराने हथकंडे हैं। उन्होंने बताया है कि माओवादियों ने अपनी गुरिल्ला सेना का गठन कर लिया है जो भारतीय राज्य से लोहा लेने के लिए तैयार है। माओवादी जो उपद्रव फैला रहे हैं यह राज्य को उकसाने की एक चाल है ताकि गुस्से में सरकार कुछ ऐसे क्रूर कदम उठाए जिससे आदिवासियों का गुस्सा और भड़के। डॉ मित्रा के मुताबिक माओवादी को उम्मीद है कि आदिवासियों का यह गुस्सा एक विद्रोह की शक्ल अख्तियार करेगा। यकीनन यह “दुस्साहसी” बताने का वही घिसापिटा आरोप है जो वामपंथी विचारधारा के कई धड़े पहले से माओवादियों पर मढ़ते रहे हैं।

अशोक मित्रा एक पुराने कम्युनिस्ट हैं। पश्चिम बंगाल में साठ और सत्तर के दशक में नक्सली आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका रही है। उनके मत को सीधे खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह ध्यान में रखना चाहिए कि आदिवासियों के संघर्षों का इतिहास माओवाद के जन्म से बहुत पुराना है। इसलिए उन्हें चंद माओवादी विचारकों की कठपुतली करार देना उन्हें नुकसान पहुंचाने के बराबर है।

अगर हम मान लें कि डॉ मित्रा लालगढ़ लालगढ़ के हालात पर चर्चा कर रहे हैं, अभी तक, उसके खनीज संपदा पर चर्चा नहीं हुई है। ((हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लालगढ़ में हिंसा तब भड़की जब राज्य के मुख्यमंत्री जिंदल स्टील प्लांट की फैक्टरी का उद्घाटन करने पहुंचे। और जहां स्टील की फैक्टरी लगाई जा रही हो क्या लौह अयस्क उससे बहुत दूर होगा?)) लोगों के गुस्से का रिश्ता वहां मौजूद भीषण गरीबी और दशकों से पुलिस और सीपीएम के हथियारबंद गिरोहों की दमनात्मक कार्रवाई से है। पश्चिम बंगाल में तीस साल से अधिक समय से सीपीएम की सरकार है।

तब भी, सिर्फ तार्किक नज़रिये से हम यह सवाल नहीं पूछें कि हजारों हजार की संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल लालगढ़ में क्या कर रहे हैं और यह मान लें कि माओवादी दुस्साहसी हैं – तो भी यह पूरी तस्वीर का एक छोटा सा हिस्सा होगा।

वास्तविक समस्या यह है कि भारत का चमत्कारिक विकास उड़ान अब धरती पर आ गिरा है। इस उड़ान के लिए हमने पर्यावरण और सामाजिक लिहाज से बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। और अब, नदियां सूख रही हैं, जंगल ख़त्म हो रहे हैं, भू जल स्तर गिर रहा है और लोगों को यह अहसास होने लगा है कि उन्होंने प्रकृति के साथ जो किया है अब वही उनके साथ होगा। पूरे देश में उथल-पुथल है। सरकार के दावों पर लोगों को यकीन नहीं। अचानक ऐसा लगने लगा है कि दस फीसदी की विकास दर और लोकतंत्र दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

पहाड़ियों से बॉक्साइट हासिल करने के लिए, जंगल से लौह अयस्क निकालने के लिए, भारत के 85 फीसदी आबादी को गांव से बाहर निकाल कर शहरों में ठूंसने के लिए (चिदंबरम ने कहा है कि यह उनका सपना है कि देश की 85 फीसदी आबादी शहरों में रहे)) भारत को एक पुलिस स्टेट बनना होगा। सरकार को सैन्यीकरण करना होगा। सैन्यीकरण को जायज ठहराने के लिए उसे एक दुश्मन की ज़रूरत है। माओवादी वही दुश्मन हैं। हिंदू कट्टरपंथियों के लिए मुसलमान जो हैसियत रखते हैं, कॉरपोरेट कंट्टरपंथियों के लिए माओवादियों की हैसियत वही है? (अगर कंट्टरपंथियों की कोई जमात होती है तो… शायद यही वजह है कि आरएसएस इन दिनों पी चिदंबरम के गुणगान में जुटा है?)

अगर कोई यह सोच रहा है कि राजनांदगांव एयरफोर्स बेस का निर्माण, बिलासपुर में ब्रिगेड हेडक्वार्टर, गैरकानूनी गतिविधि विरोधी कानून, छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट और ऑपरेशन ग्रीन हंट जंगलों से कुछ हज़ार माओवादियों को बाहर निकालने के लिए हैं तो वह बहुत बड़ी ग़लती कर रहा है। ऑपरेशन ग्रीन हंट से जुड़ी हर बहस में मुझे आपातकाल की आहट नज़र आती है। (यहां बड़ा सवाल यह है कि – अगर कश्मीर की छोटी सी घाटी को कब्जे में रखने के लिए 6 लाख सैनिकों की ज़रूरत पड़ रही है तो दंडकारण्य के विस्तृत पहाड़ी और जंगली इलाकों में कितने सैनिकों की ज़रूरत होगी?))

इसलिए हाल ही में गिरफ़्तार किए गये माओवादी नेता कोबाड गांधी का नार्को टेस्ट कराने की जगह बेहतर होगा कि उनसे बात की जाए।

इस बीच, इस साल के आखिर में कोपेनहेगन में होने वाले क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने जा रहे लोगों में से क्या कोई यह सवाल उठाएगा कि – क्या हम बॉक्साइट को उन्हीं पहाड़ियों में नहीं छोड़ सकते हैं?

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Monday, August 17, 2009

मेरे बहाने पत्रकारिता की मर्यादा पर आत्ममंथन हो- -जरनैल सिंह-

भड़ास फॉर मीडिया से साभार....
सर्वाधिकार भड़ास फॉर मीडिया

मैंने पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन किया था। इसकी मुझे सजा भी मिल गई। मुझे सजा से कोई ऐतराज नहीं है। सजा कितनी होनी चाहिए थी, ये जरूर बहस का विषय हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जो अखबार रिपोर्टर को खुद दलाली करने पर मजबूर करते हैं, पैसा लेकर उम्मीदवारों को चुनाव हराते और जिताते हैं, ईमानदारी से पत्रकारिता करने की सजा देते हैं, नेताओं के दबाव में निर्दोष पत्रकार की नौकरी लेते हैं या दंडित करते हैं, खबरों को सही परिप्रेक्ष्य से हटा कर जानबूझ कर पक्षपाती एंगल देते हैं, पैसे लेकर माफियाओं और अपराधियों को दूध का धुला साबित करते हैं, क्या वह पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन करने में मुझसे बड़े गुनाहगार नहीं है? मेरा तरीका गलत था लेकिन मुद्दा हजारों-लाखों मजबूर दंगा पीड़ितों की आह को आवाज देना था। मैंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई, वह भी 25 साल के इंतजार के बाद। जो अखबार व पत्रकार सिर्फ स्वार्थ के आधार पर पत्रकारिता की मर्यादा को जूतों तले रौद रहे हैं, क्या वह पत्रकारिता की मर्यादा की बात करने के काबिल हैं?

सोचना होगा कि आज कलम की ताकत कम क्यों होती जा रही है? मीडिया की विश्वसनीयता कटघरे में क्यों है? आखिर वह काम जो कलम को करना चाहिए था, वह जूते से कैसे संभव हुआ? अन्याय के खिलाफ विरोध के अप्रत्याशित तरीके अपनाने को लोग क्यों मजबूर हो रहे हैं? आखिर कलम व अखबार उनके उत्पीड़न को स्वर क्यों नही दे पा रहा है? अगर कुछ लिख भी रहे हैं तो उसका प्रभाव क्यों कम हो गया है? ये घटनाएं कलम की घटती विश्वसनीयता, जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने की प्रवृत्ति का ही परिणाम तो नहीं है?

Thursday, August 6, 2009

कार्ड खरोचन मशीन

दफ्तर से वापस लौटकर कही बाहर जाने का मन नही होता है। और अगर थोड़ा सा भी पसर लिए, तब तो अल्लाह ही मालिक है। फ़िर तो चाहे कोई भी आवाज देता रहे, मैं और मेरी तन्हाई पीछा छोड़ने का नाम ही नही लेते। और अगर ऐसे मे अगर मजबूरन कुछ लाने बाहर निकलना हो और जेब मे पैसे न हों तो.... पहले अम्मा याद आती थीं, अब टी एम् या वो कार्ड खरोचने वाली मशीन याद आती है। कुछ ख्याली पुलाव भी मन मे घपर झोल करने लगे। सोचा की काश ऐसा होता की जो समान मांगना है, उसका फोन पर ही ऑर्डर हो जाता और फोन करने पर जो डिलीवरी बॉय आता , वो वही कार्ड खरोचने वाली मशीन भी साथ लाता। अब जब कैश लेस बनने का संकल्प किया ही है तो ससुर सब्जी और बंधानी हींग भी घर पे ही कैश लेस मिले। लेकिन फ़िर सोचे साला ऐसा अगर हो गया तो ससुर पूरे देस की हालत ही पतली हो जायेगी। ब्लैक मनी कहा जायेगी?.......
ब्लैक मनी कहा गई, आगे जानने के लिए चट्काइये..... डेली डायरी

Saturday, July 7, 2007

कौन सी 'रचनात्मकता' हमारे पास है ?

समय की कमी के चलते जिस दिन यू जी की पहली पोस्ट चढाई थी , उसके दो तीन दिन बाद तक अगली पोस्ट नही चढा पायालेकिन इस बार एक साथ दो प्रश्न और उनके उत्तर दे रहा हूँ
प्रकृति मे जो परिवर्तन होते रहते हैं , लगता है कि उनके पीछे कोई खास योजना या प्रयोजन हैआपका क्या ख्याल है ?
मुझे बिल्कुल भी नही लगता कि वहाँ कोई योजना या प्रयोजन है। एक प्रक्रिया चल रही है। जरूरी नही कि मैं इसे विकास की प्रक्रिया कहूँ। जब यह प्रक्रिया धीमी होने लगती है तो क्रान्ति हो जाती है। प्रकृति कुछ चीजों को साथ लाना चाहती है। और सिर्फ नए सृजन के लिए फिर से नए सिरे से शुरुआत करती है। यही एक मात्र वास्तविक सृजनात्मकता या रचनात्मकता है। प्रकृति किसी 'मॉडल' बने बनाए आदर्श या पूर्व प्रसंग को इस्तेमाल नही करती है। इसलिये उसका कला से अपने आप कोई संबंध नही होता।

आपका मतलब है कि कलाकारों ,कवियों, संगीतज्ञों, और मूर्तिकारों की रचनात्मकता मे कोई रचनात्मकता नही है ?
आप कला को कौशल और कारीगरी से ऊपर क्यों मानना चाहते हैं? कलाकार की कलाकृति अगर बाज़ार मे नही बिकती तो उसका धंधा भी बंद हो जाता है। इन तमाम कलात्मक विश्वासों के लिए मात्र बाज़ार जिम्मेदार है। कलाकार सिर्फ कारीगर है- दूसरे कारीगरों की तरह। अपने आपको व्यक्त करने के लिए वह उसी औजार का इस्तेमाल करता है। मानव की सारी रचनात्मकता, एन्द्रिकता और काम भावना से उत्पन्न होती है। मैं एन्द्रिकता और काम भावना के विरुद्ध नही हूँ। सारी कला एक प्रकार की हर्ष-क्रिया है। हर्ष भी सायास। उसके लिए कोशिश करनी होती है। आप ऐसा नही कर सकते तो उस सौन्दर्य और कला यदि आप कृति के बारे , मे प्रश्न करने लगते हैं तो। यदि आप कृति के बारे मे प्रश्न करने लगते हैं तो कलाकार अपने आप को उंचा समझने लगते हैं। वे समझते हैं कि कलात्मकता को समझने की अभिरुचि ही आपमें नही है। अब वे आपको यह सुझाव देते हैं कि आप किसी विद्यालय या इन्स्टीट्यूट मे जाकर उसकी कला की परख की शिक्षा ग्रहण करें। किसी तथाकथित महान कवि की कविता में अगर आपको कोई आनंद नही मिलता तो वे आपको जबरदस्ती इस बात की शिक्षा देंगे कि आप उस कविता का आनंद लें । शिक्षा -संस्थाएं यही सब करती हैं। वे हमे सिखाती रहती हैं कि सौन्दर्य को कैसे ग्रहण करें, संगीत को कैसे समझें , चित्रकारी की कद्र किस प्रकार करें , इत्यादि । इस बीच आपके भरोसे वे अपनी जीविका चलाते रहते हैं। कलाकारों को यह सोचना बहुत अच्छा लगता है कि वे रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। 'रचनात्मक कला' या 'रचनात्मक चिन्तन' , क्या वे कोई मौलिक अभिनव या स्वतंत्र कार्य कर रहे हैं ? बिल्कुल नही। इस अर्थ मे उनमे कोई रचनात्मकता नही है। कलाकार क्या करते हैं ? यहाँ से कुछ उठाते हैं , वहाँ से कुछ उठाते हैं , फिर उसे जोड़कर साथ रख देते हैं और सोचते हैं कि उन्होने किसी महान कृति की रचना कर ली है। किंतु सत्य यह है कि पहले से ही विद्यमान किसी न किसी चीज़ की वे नक़ल कर रहे होते हैं। कौन सी 'रचनात्मकता' हमारे पास है ? नक़ल,शैली, बस और कुछ नही। हममे से हर एक की अपनी शैली होती है। शैली इस बात पर निर्भर करती है कि हमने किस विद्यालय में शिक्षा पाई है , कौन सी भाषा हमे पढ़ाई गई है , कौन सी पुस्तकें हमने पढी हैं , कौन सी परीक्षाएं हमने उत्तीर्ण की हैं । फिर इसी चौखटे के अंदर हमारी अपनी शैली का निर्माण होता है। शैली और तकनीक पर पूर्णधिकार प्राप्त करना ही कलात्मक गतिविधि है। आपको आर्श्चय होगा कि निकट भविष्य मे कम्प्यूटर चित्रकारी करेंगे, संगीत की रचना करेंगे और यह चित्रकारी उन तमाम रचनाओं से कहीँ श्रेष्ठ होगी , जिन्हे दुनिया के सभी चित्रकारो और संगीत कारों ने आज तक जन्म दिया है । हमारे जीवन काल मे शायद यह स्थिति न आये , मगर आएगी जरूर। आप कम्प्यूटर से भिन्न नही हैं। हम इसे मानने के लिए तैयार नही हैं, क्योंकि हमे समझाया गया है कि हम मात्र यन्त्र नही हैं। हमारे अंदर कुछ और है। लेकिन आपको यह स्थिति स्वीकार करनी होगी और मान लेना होगा कि हम यन्त्र मात्र हैं। शिक्षा और तकनीक के मध्यम से हमने जिस बुद्धि का विकास किया है , वह प्रकृति के सामने कही ठहर नही सकती। उन्हें (रचनात्मक कार्यों को ) जो महत्त्व अब तक दिया गया है, वह मात्र इसलिये कि उन्हें आध्यात्मिक, कलात्मक और बौद्धिक मूल्यों की अभिव्यक्ति माना गया है। आत्माभिव्यक्ति की चालना एक प्रकार के नाड़ी रोग का परिणाम है। मानव जाति के आध्यात्मिक गुरुओं पर भी यही बात लागू होती है। प्रत्यक्ष संवेदनात्मक अनुभूति नाम की कोई चीज़ नही है। कला के सभी रुप मात्र एन्द्रिकता की अभिव्यक्ति हैं और कुछ नही है।

देर से आने वालो के लिए .... यू जी के बारे मे यहाँ देखे रचनात्मकता नाम की कोई चीज़ नही है।, यहाँ भी देखें .....इसे चट्काएं ....

Thursday, July 5, 2007

ई ससुर शाखा लगावय वाले

शाखा । संघ की शाखा । संघ वाले देवी देवताओं की तस्वीर बनाए जाने पर दंगा करने लगते हैं और जरा यहाँ देखिए , इनकी हकीकत क्या है .....यहाँ चट्कायिये .....