Monday, November 27, 2017

भारतदेश की पुड़िया मंदिर कथा- हाथ जोड़ पालथी मार पढ़ना

तीन चार दशक पहले की कथा है। भारतवर्ष में डकैतों का एक नामी गिरोह हुआ करता था। इस गिरोह की खास बात यह थी कि यह पहले ठगी करता था, फिर ठगे हुए लोगों के घर में घुसकर दिन दहाड़े डकैती डाला करता था। गिरोह के पास ठग विद्या की जो पुड़िया थी, उसमें बस एक ही सुंघनी थी। डकैती लायक कोई भी शख्स जब इन्हें दिखता, फट ये गिरोह या गिरोह का मुखिया वह पुड़िया खोलकर उसे दिखाने लगता।

आरंभ में तो लोग इस पुड़िया को देखते, सूंघते और फिर पुड़िया से निकली ठगी में लसकर उसका गुणगान करते-करते अपना सबकुछ डकैतों के हवाले कर देते। जब डकैतों ने राह चलते लोगों पर पुड़िया का यह असर होते देखा तो उनकी हिम्मत बढ़ी। अब वह पुड़िया लेकर देश के घर घर पहुंचते, पुड़िया दिखाते और डकैती डालकर अगले घर का रुख करते। ऐसा करते करते इन डकैतों ने पुड़िया को भगवान बना दिया और लोगों को पुड़िया मंदिर बनाने का सपना दिखाने लगे। पुड़िया के नशे में झूमते लोगों को भी चहुंओर पुड़िया मंदिर दिखाई देने लगा। इधर डकैतों ने पुड़िया मंदिर का सपना दिखाकर अपना खजाना भर लिया और चुप हो गए।

कुछ दिन बाद डकैतों के मुखिया को उसके सहयोगी ने सूचना दी कि खजाना खाली होने वाला है और स्वर्ण मुद्राएं तो चूहे कुतर गए। यह सुनकर डकैतों का मुखिया हौले से मुस्कराया। उसने जेब से वही पुरानी मुड़ी-तुड़ी पुड़िया निकाली और सहयोगी से बोला- इसे राजप्रासाद के कंगूरे पर चढ़कर लोगों को दिखाओ। जैसे ही लोगों को पुड़िया दिखेगी, उनके मन में उसी पुराने नशे की आकांक्षा प्रबल हो उठेगी और हमारी पुड़िया फिर से काम कर जाएगी।

पुड़िया दिखाकर खजाना भरते-भरते इन डकैतों को तीन दशक बीत गए। तीन दशक तक लोग जब कुछ भी पूछते, कुछ भी कहते तो उन्हें वही पुरानी पुड़िया दिखा दी जाती। तीन दशक के बाद जब लोगों को पुड़िया सूंघने की लत कुछ यूं लगी कि सूंघना या न सूंघना बराबर लगने लगा। इधर डकैतों का खजाना फिर से खाली होने लगा था।

डकैतों के चिंतातुर मुखिया ने यह देख जेब से वही मुड़ी-तुड़ी पुड़िया निकाली तो देखा कि उसमें तो उन ईंटों का मलबा भरा है, जो उसने पुड़िया मंदिर के निर्माण के लिए दान में ठगी थीं। अब मलबे से मंदिर तो नहीं बनने वाला, मगर किसी को यह नहीं पता था कि पुड़िया के अंदर मलबा भरा है। उसने पुड़िया की पुड़िया देने के लिए उसका प्रदर्शन करने के लिए राजधानी से दूर पुड़िया धर्म सभा आयोजित कराई।

इस धर्मसभा में देश भर के डकैतों का आगमन हुआ। मुखिया डकैत द्वारा बहला फुसलाकर घर से भगाई गई स्त्रियों ने सभी डकैतों के चरण कमल धुले, दबाए और डार्शीवाद लिया। देश के सरकारी सेवाओं ने पुड़िया सभा का सीधा प्रसारण किया। बस यहीं पर डकैतों से चूक हो गई। हुआ यूं कि जब डकैत मुखिया ने जेब से मलबों भरी पुड़िया निकाली और दिखाने के लिए दोनों हाथों में रखकर उसे ऊपर किया, ईंट का एक टुकड़ा टप से नीचे गिर पड़ा। भांग के नशे में झूमते दूसरे डकैतों को तो यह नहीं दिखा, मगर सरकारी सेवाओं के कैमरों से भला यह कहां छुपने वाला था।

देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया कि पुड़िया में मंदिर नहीं बल्कि उसका मलबा है। जिन लोगों ने पुड़िया के बारे में सुना भर था, वह मलबा मलबा चिल्लाने लगे और जिन्होंने पुड़िया गलती से भी सूंघ ली थी, वह मंदिर के बहाने बनाने लगे। इस बीच दूसरे राज्य से आए प्रतिगमन मिश्रा ने डकैत मुखिया को पीछे से एक टीप मारी और पूछा- दिखता नहीं क्या गिरा रहे हो? डकैत मुखिया बोला- हमारा काम गिरा देना है, यह देखना नहीं कि क्या गिरा, कौन गिरा और कितना गिरा। संयोग से यह वार्तालाप भी सरकारी चैनल पर प्रसारित हो गया।

अब तो जितने गिरे दबे कुचले लोग थे, उनमें जांबियों की आत्मा आ गई। वह धीमे-धीमे उठने लगे, उठकर खड़े होने लगे, खड़े होकर चलने लगे और चलकर पूछने लगे। सबको पुड़िया चाहिए थी, मगर पुड़िया में मलबा था, यह भी सबको पता था। देखते ही देखते पुड़िया देने वाला डकैत मुखिया जांबियों से घिर गया। उसका क्या हुआ? उसका क्या होगा जैसे सवालों के जवाब उन्हीं जांबियों के पास हैं, जो आज भी पुड़िया मांग रहे हैं।

Friday, November 24, 2017

बेटे के लिए कंडोम बनाने की रेसिपी

सामग्री- 
नाइन जीरो टू एंड अ क्वार्टर कंडोम- पांच पीस
वॉटर जेली-पचास ग्राम 
स्ट्रॉबेरी ऐसेंस- दो 
लाइम ऐसेंस- एक 
चॉकलेट ऐसेंस- पचास ग्राम 
नमक- नमक नहीं डालना है। यूजर अपना अपना नमक लेकर खुद चलते हैं।
टॉपिंग्स के लिए- पांच वियाग्रा
लपेटने के लिए टीश्यू पेपर
विधि- सबसे पहले बाथरूम में रखी बाल्टी उल्टी करके कमोड के सामने रख लें। अपनी चड्ढी पहन लें क्योंकि आपको अपने हाथ से 'वो' नहीं करना, बल्कि 'ये' करना है। अब कंडोम का पैकेट खोलें।
ध्यान रहे, कंडोम खोलने के बाद आपको उत्तेजित नहीं होना है और न ही वापस कमोड की दिशा में ध्यान लगाना है। कमोड से कंडोम तक की इस यात्रा में आपको अपनी निगाह हमेशा कंडोम के उस शिखर पर टिकाए रखनी है, जहां पहुंचने के लिए आप यह डिश बनाने जा रहे हैं।
Photo not for wearing or shaking.
अब बाल्टी की तली में पचास ग्राम वॉटर जेली डालें। अगर अलग अलग स्वाद के कंडोम बनाने हैं तो बाल्टियां भी अलग अलग लगेंगी। जेली में दो बूंद स्ट्रॉबेरी ऐसेंस डालें। अगर आपका बेटा कुछ-कुछ खट्टा और कुछ-कुछ मीठा पसंद करता है तो उसमें लाइम ऐसेंस भी डालें।
अगर बेटे को स्ट्रॉबेरी चॉकलेट फ्लेवर एक साथ देना चाहते हैं तो पहले कंडोम को स्ट्रॉबेरी एसेंस में रैप करना होगा, उसके बाद चॉकलेट में अलग से। इस तरह से पहले चॉकलेट का स्वाद आएगा, उसके बाद स्ट्रॉबेरी का। एंड देन योर सन विल बी फाइनली रेडी टू पॉप द चेरी। बट इफ योर सन इज नॉट सीरियस अबाउट पॉपिंग द चेरी, ही कैन डू समथिंग एल्स। टेल हिम दैट दुनिया का बड़ा हिस्सा बरमूडा ट्रायंगल्स में ही दफन होता रहा है।
अब आपके सामने उल्टी बाल्टी में भरी वॉटर जेली रखी हुई है। एक एक कांडोम निकालें और जेली में डुबो डुबोकर तीन तीन तह लगाकर टीश्यू पेपर पर रखते जाएं। जब पांचो कंडोम हो जाएं तो आप उनपर वियाग्रा की टॉपिंग लगा सकते हैं।
इसके बाद टीश्यू पेपर लपेटकर एक एक कंडोम सिल्वर फ्वाइल में लपेटकर रख दें। दिन भर के लिए पांच कंडोम काफी रहेंगे।
अगले दिन के लिए एक बार फिर से बाथरूम में खुद को बंद कर लें। इस रेसिपी की वीडियो न बनाएं। बस इतना करें कि जब तीन तह के कंडोम पर वियाग्रा की टॉपिंग लगा दें तो एक फोटो मुझे व्हाट्सएप्प कर दें। 

Monday, July 10, 2017

पढ़िए नूर ज़हीर की कहानी बालूचरी

अकरम अली को अपनी आँखों यक़ीन नहीं हो रहा था। उस जैसे ग़रीब तांती के दस्तरखान पर इतने पकवान! इतनी भेंट तो कभी किसी ने नहीं दी; शायद आजतक कोई गाहक, इतना अमीर नहीं आया जितना यह सामने बैठा खरीदार , जो एक हाथ से दाढ़ी सहला रहा था और दूसरे से तस्बीह फेर रहा था। इसे कैसे पता चला? किसने इसे खबर दी होगी ? सवाल दिल में आते ही अकरम अली ने ग़ुस्से से अपने बड़े बेटे शरीफुद्दीन की तरफ देखा जो बाप से आँखे चुराकर उस अरब शेख की चापलूसी में लगा हुआ था. वैसे सुलगते लोबान की खुशबू और नई बालूचरी साड़ी की खबर फैलते देर नहीं लगती. बशीरहाट में सभी जानते थे अकरम ने एक नई बालूचरी साड़ी तैयार की है, लेकिन इसकी खबर कलकत्ता और इस शेख तक पहुंचाने की क्या ज़रूरत थी?
अपनी ही लाइ हुई, आगे बढ़ी मिठाई की प्लेट को इशारे से इंकार करते हुए शेख ने मामूली मलमल में लिपटी हुई बालूचरी की तरफ हाथ बढ़ाया। अकरम अली ने ढंकी हुई साड़ी पर हाथ रखा। उसका सारा जिस्म जैसे झनझना उठा। कितनी आस से उसने इस साड़ी को करघे पर चढ़ाया था । सबसे नज़र बचाकर, अपनी बीवी के ज़ेवर बेचकर मुर्शिदाबाद गया था, रेशम के कोये खरीदने। उसने सोचा था खदीजा को तो मरे चार साल होने को आये, अब उसके ज़ेवर रखने से क्या फ़ायदा ? एक एक रेशम के कोये को उसने अपने सामने बंटवाया था और तार बनवाये थे. जब रेशम के धागे बन गए तब रंगाई में कितनी एहतियात बरती थी उसने। तभी तो ऊपर का मलमल हटाकर, पहली तह खुलते ही जैसे ही पल्लू सामने आया आसपास खड़े लोगो की सांस थम गई और शेख के मुंह से यक ब यक निकला "सुभांनल्लाह।"
अकरम अली के तीनो बेटों की बांछे खिल गई --शेख़ फंस गया!
कांपते हाथों से अकरम अली ने साड़ी की एक एक परत खोलनी शुरू की। हर तह के साथ यादों का एक काफिला जुड़ा हुआ था -- नीले रंग पर उसने कितनी बहस की थी ---आकाश नील, समुन्दर नील, शंख नील या फिरोज़ी नील ! तंग आकर ग़ुलाम नबी रंगरेज़ ने कहा था---अरे बाबा मोर के पंखों में इतने नील होते हैं क्या?
अकरम अली हंस पड़ा था "अरे इतने नील नहीं होते तो मोर नाचता क्यों है ? क्या मोर बादल देखकर नाचता है? बेवकूफ, वो अपने रंग दिखाने लिए इतराता है!"
"तो नाचता मोर बनाना ज़रूरी है क्या?" ग़ुलाम नबी ने आगे हुज्जत की।
"वाह ! जो नाचे न वह मोर काहे का, वह तो कौआ हुआ। "
बालूचरी बनाना कोई ख़ाला जी का घर नहीं है इसीलिए बस दस या बारह साड़ियां ही बनाता है अकरम अली साल भर में। ज़्यादातर साड़ियां दुर्गा पूजा के लिए खरीदी जाती हैं। आस पास की सार्वजनिक पूजा कमिटियों से लेकर कलकत्ता तक की पूजा कमिटियों में होड़ लगी रहती है ; अकरम अली की बनाई बालूचरी हाथ लग जाए और पूजा में स्थापित होने वाली दुर्गा ठाकुर के रूप को चार चाँद लग जायें। पूजा पंडाल में आने वाले लोग भी झट पहचान जाते और एक दुसरे से कहते ---'अकरम अली तांती की साड़ी है ना ?' अकरम का सीना गर्व से फूल जाता I लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं दिल में एक काँटा सा चुभता रहता। उसने तो साड़ी माँ को बेचीं है। भेंट तो उस भक्त ने की जिसने उसके दाम चुकाए। फिर वह दिल को समझाता और वादा करता, एक साड़ी वह ऐसी बनाएगा जो अपने आप में एक मिसाल होगी; बेषकीमती! नायाब! कारीगरी और कला की ऐसी मिसाल जो खुद अकरम अली के हुनर को पार कर जाएगी, वह हाथ की नफासत उसमे दिखेगी जो कला का दर्जा पायेगी। वह साड़ी जो वह देवी को बेचेगा नहीं; देवी को भेंट करेगा !
ढब की आवाज़ से अकरम अली का ध्यान टूटा. सामने एक हज़ार के नोटों का बण्डल पड़ा था। जल्दी जल्दी तीन और बण्डल तख़्त पर गिरे. एक लाख से ज़्यादा साडी का दाम नहीं था। यह तो चार लाख थे। उसके दिल में एक टीस सी उठी। यही रुपये पांच साल पहले मिल गए होते तो खदीजा बच जाती। न उसकी जान बचा पाया न ही उसकी ख्वाहिश पूरी कर पाया। बेचारी दिल में बालूचरी पहनने की आस लिए इस दुनिया से चली गई। शेख ने एक और गद्दी उसकी तरफ बढ़ाई। उसके पास खड़ा उसका सेक्रेटरी बोला "यह तुम्हारी बख्शीश है, तुम्हारे हुनर और मेहनत की दाद दे रहे हैं शेख !"

"लेकिन मोहतरम, आपके देश में तो औरतें साड़ी पहनती नहीं। आप इसका क्या करेंगे ?"
शेख सवाल समझ कर मुस्कुराया "अगले महीने मेरी शादी है; हम लोगों में लड़की के लिए लड़के वालों की तरफ से अबाया भेजा जाता है। इस साड़ी को काटकर अबाया बनेगा; पल्लू से नक़ाब और ऊपर वाला हिस्सा। बहुत खूबसूरत लगेगा इसका अबाया; शायद हमारी बीवी इसे पहली रात को ही पेहेनना चाहे। "

"आप मेरी साड़ी पर कैची चलवाएंगे?"
"काटे बग़ैर तो बुर्का नहीं बन सकता।" शेख अपनी होने वाली बीवी के लिए बहुत से कीमती तोहफे खरीद रहा था। बंगाल की नायाब सोने की नक्काशी के ज़ेवर खरीदने कलकत्ता आया था। वहीं उसे इस साडी की खबर मिली थी और इसी की लालच में इतनी दूर बशीरहाट आया था। सौदा हो गया था अब बेकार बातों में वक़्त गवाना उसे खल रहा था.
अकरम अली खड़ा हो गया। सबको नज़र भरकर देखा और बोला "बुर्का तो तन ढंकने के लिए होता है। "
"सभी कपडा तन ढंकने के लिए होता है." शेख ने दुभाषिये के ज़रिये जवाब दिया।
"सभी का तो मैं नहीं जानता, साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं होती."
"तो फिर किसलिए होती है ?" शेख ने तंज़ से सवाल किया।
"सदियों पहले इंसान जानवर की खाल और पेड़ की छाल से भी तन ढँक लेता था. इतना बेहतरीन सूत और रेशम, ऐसे ऐसे रंग, इतनी कारीगरी, ऐसे नमूने ईजाद करने की क्या ज़रूरत थी? नहीं शेख़ साड़ी तन ढंकने के लिए नहीं, जिस्म का हुस्न उभारने के लिए होती है। साड़ी पल्लू को आँचल करके सिर ढंकते हैं ताकि वह बार बार फिसले और काले बालों की घटा लहरा ये और उसमे खिंची हुई सीधी मांग जैसे बिजली का कौंधा ! पल्लू कंधे पर यूँ डाला जाता है ताकि बार बार ढलक जाये और सामने वाले की नज़रे गले से गुज़रती, छाती के उभार से होती, कमर के ख़म पर रूकती, नितम्बो की गोलाइयों पर से फिसलती धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरे।”

कुछ समझकर कुछ न समझकर शेख हंसा "तुम तो तांती काम और शायर ज़्यादा मालूम होते हो। इसीलिए औरतों के पहनने की चीज़ बनाते हो , आशिकमिजाज जो ठहरे। "
"जी हाँ सुनते हैं पहले यूनान और रोम के मर्द भी साड़ी जैसा लिबास पहनते थे; लेकिन मर्दों का सीधा सपाट, लठ जैसा शरीर साडी की ताब क्या लाता ? मर्दों से साडी कबकी छूट गई, औरतें आजतक पेहेन रही हैं। "
"खैर वह सब मैं नहीं जानता , हाँ तुम्हारी साड़ी बेजोड़ है। मेरी बीवी इसका अबाया पहनकर बहुत खुश होगी। "
"मैं अपनी साड़ी आपको नहीं बेचूंगा! "
अकरम के छोटे से घर का आँगन खचाखच भरा हुआ था। बशीरहाट में कभी मर्सिडीज़ बेन्ज़ देखी नहीं गई थी। अंदर हो रही बातचीत को सब दम साधे सुन रहे थे। जैसे ही अकरम अली ने साड़ी न बेचने का ऐलान किया बाहर जमा भीड़ जैसे अचानक फट पड़ी; जितने मुह उतनी बात। एक पल को तो शेख़ भी हक्का बक्का रह गया फिर संभलते हुए बोला "क्या कीमत हमने काम लगाई है?"
अकरम कुछ पल चुप रहा फिर साड़ी पर हाथ फेर और उसे बहुत संभाल कर मलमल में लपेटते हुए बोला "यह साड़ी मेरी रूह है शेख साहब और रूह को काट फाड़ कर, टुकड़े टुकड़े नहीं किया जाता, सुइयाँ चुभाकर छलनी नहीं करते आत्मा को मोहतरम!"
"क्या कह रहे हो अब्बा ?" अकरम का दूसरा बेटा करीमुद्दीन बोला। "इतना पैसा तो हमने कभी देखा भी नहीं है!"

"चुप रह कूढ़ कहीं के. कितना तुझे अपना हुनर सिखाने की कोशिश की पर रहा तू जानवर का जानवर ही। तांत और रेशम आंकना तो दूर की बात तुझसे तो करघे पर बैठा भी नहीं जाता। आधे घंटे में ही कहता है 'हाय हाय मेरी कमर दुःख रही है ‘ अरे कमर तोड़े और आँखे फोड़े बिना कहीं बालूचरी बनती है ? "
"लेकिन बनाई तो बेचने के लिए है न?" शेख के सेक्रेटरी ने पूछा।
"आजतक जितनी साड़ियां बनाई सब बेचीं; यह नहीं बेचूंगा। यह साड़ी मैंने माँ दुर्गा के लिए बनाई है।”
"यह कौन हैं ?" शेख ने शायद माँ दुर्गा को कोई दूसरा, ज़्यादा मालदार गाहक समझा।
"अब्बा, देवी को पहनाई गई साड़ी भी तो बर्बाद ही होती है न। ठाकुर के साथ ही विसर्जन हो जाता है साड़ी का। "
ज़ोर की तड़ाक की आवाज़ आई और शमसुद्दीन गिरते गिरते बचा "खबरदार जो काफिरों जैसी बाते मुंह से निकाली। बेटी को सजा संवार कर ही तो ससुराल भेझा जाता है। मेरी बनाई हुई साड़ी पहनकर, दस दिन से बिझुड़े शिव को दुर्गा रिझाती है। तभी तो तप भांग होता है महातपस्वी का, सब मेरी बनाई हुई साड़ी के कारण ही तो। "
"इतनी साड़ियां एक साथ पहनती है देवी दुर्गा?' शरीफउद्दीन ने गाल सहलाते हुए पूछा।
"कितनी पहनती है, कैसे पहनती है, क्यों पहनती है यह तो देवी ही जाने। मैं बस इतना जानता हूँ की मेरी बनाई साड़ी बहुत पसंद करती है माँ, इसीलिए तो हर साल से बेहतर साड़ी बन जाती है, देवी माँ की दया से। "
शेख उठ खड़ा हुआ. ग़ुस्से से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। "तुम मुसलमान होकर भी देवी देवता को मानते हो-----ताज्जुब है!"
अकरम अली के चेहरे पर न घुसा था, न नफरत , न नाराज़गी न हिकारत. एक मासूम सी ख़ुशी उसके चेहरे पर खेल रही थी, जैसी कोई बच्चा, अपने घर के रोशनदान में दिए चिड़िया के अण्डों में से बच्चे निकलते, बड़े होते और अंत में पहली उड़ान भरते देख रहा हो। मलमल में लिपटी बालूचरी साड़ी को अपने सीने से लगाते हुए वो पूरे ऐतमाद से बोला "आप इंसान होकर भी कला और फ़न का मर्म नहीं समझते ---ताज्जुब है!"
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यह कहानी मूलरूप से पत्रिका कथादेश में प्रकाशित हुई है। प्रस्तुत कॉपी फेसबुक से ली गई है। नूर जहीर ख्यातिलब्ध साहित्यकार व रंगकर्मी हैं। 

Wednesday, April 19, 2017

A Tune to Delight

Almost a decade and a half ago, one night, a folk song was being telecast on the National Channel of India and it stuck in my mind and on my tongue. Its theme was,”You didn’t have lemon, nor did you have tamarind, what fruit did you eat that your child is so beautiful?"  To keep this song going, one can add the names of all the different fruits that the mother may have eaten. This song is actually a conversation between the mother of a new born and her sister-in- law about the new born child. The fugitive meaning of this song, which isn’t that difficult to decipher, is that the mother didn’t have anything that would make a child beautiful, yet gave birth to this beautiful child, and how? After listening to this song, I would sing it to my Aunty, exactly at a time, when she was among her colony friends and chatting of this and that. When she heard me singing this song, she would take off her slippers and throw them at me, shying away from her friends and saying, as if in explanation, “This kid is very naughty”. Actually it is a folk song and people sing it after the child is born.

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One day, we were all set to start a street play in a village near Ayodhya. The entire village had gathered. It was evening and darkness was dawning upon us, ready to ruin our set up as there was no available electricity connection and we had to arrange lights and everything. We were trying to get electricity from a streetlight pole anyhow, so we could start the show. It was my responsibility to hold the attention of the crowd till we got the electricity and started the play. And then I saw a lady holding her new born tightly to her chest. I don’t know what came in to my mind at that moment that made me pick up my mouth organ and begin singing that song. I kept adding every fruit that came into my mind at that time.  After two or three lines, the entire crowd began singing after me. I was looking at the lady whose cheeks turned pink every time a new line and a new fruit were added.  When the song ended, I saw tears in her eyes, may be because of the joy of becoming the mother of such a beautiful child, maybe I gave her some happiness. When people were dangling me on their shoulders, I was wondering if there’s any pleasure, any joy, better than this.
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Translated by Rahul, Edited by Sweta, Final proof by Scharda

A Tongue for all Terrains

My last biking trip was around 1500 kms long. Alone, being my own sole companion. I went biking from  Ayodhya to Sarnatha  to Baksar-Ara and Patna. And then from Patna to Gaya to Nalanda and Rajgir. My last destination was Bodhgaya, where I went to see the temple of Lord Buddha. Before my journey began, I decided not to speak in Hindi anywhere. I used Awadhi- my mother tongue, to converse. When I shared this experience with my friends, who do not belong to my state, Uttar Pradesh or the one where my trip unfolded- Bihar, they simply wondered. But I found that while I traveled from mountains to the plains of UP-Bihar and also in Madhya Pradesh, that people easily understand Awadhi. At all the places I travelled on my bike last time, no one asked, “What did you say?”.

One of my friends told me that it might be the effect of the Ramcharitmanas (a famous Indian epic), but I don’t think that's true because the language used by Tulsi Das (the man who wrote it) is not pure Awadhi. Or, from a different perspective, we can conclude  that his language has never really been used in the Awadh region by anyone. It is all mixed with Sanskrit. When we talk about epics written in Awadhi, only Malik Mohammad Jayasi used pure and authentic Awadhi. Sometimes I wonder  what must have been in the mind of Mr. Jayasi that he wrote an epic on the Queen of Chittor (now in Rajasthan, the desert part of India),  sitting in Amethi, which belongs to the Indian Northern Plains, far away from Chittor. Surprisingly, not many people know that Awadhi is often used in Pakistan.  And people in Surinam, Holland, Mauritius understand it too! One of my Surinami friends told me that they speak a mix of five north Indian languages and Awadhi is one of them. He doesn’t know the pure Awadhi poet Mr. Jayasi, but he said that Ramcharitmanas of Tulsi is one of the most read books in his country. He thinks that Hindi- the national language of India, is an encroachment. He says that he uses a  mix of five languages and sometimes puts in some Dutch and Creole words for local needs. Putting Hindi words will get quite confusing for people because then that’ll become a whole new language. He was sad about the fact that people in his place have started using Hindi words in his 150 year old language -Surinami Hindustani. After all these experiences, I wonder if I should be sad for my language- Awadhi.
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Translated by Rahul, Edited by Sweta, Final proof by Scharda

Thursday, March 23, 2017

काले वाले ठाकुर साहब की कहानी

ठाकुर साहब जब दरभंगा से दिल्‍ली की ट्रेन में बैठे तो उनके मन में बस एक ही विचार रह-रह कर कौंध रहा था और वो ये कि 'जमीन खोद दूंगा-मकान पोत दूंगा।' दिल्‍ली जाकर नाम कमाकर किसी न किसी तरह से दरभंगा को दन्‍न न कर दि‍या तो वह खुद अपने नाम के आगे और पीछे से ठाकुर हटाकर खुद का नाम तिमि‍र कुमार रख देंगे। दरभंगा पुलिस उनको तीसरी बार लड़की छेड़ने में धरी तो बड़ी मुश्‍किल से छूटे थे और नाम वाकई तिमिर कुमार ही होने जा रहा था। एक बार तो मोहल्‍ले के पप्‍पन की नौ साल की बच्‍ची के साथ लबर सबर करते धराए थे। पकड़े गए तो बोले नारीवाद सिखा रहे थे। बहरहाल, राम-राम करते किसी तरह से दिल्‍ली पहुंचे और अपने एक दोस्‍त के कमरे में ढेर हुए। दोस्‍त उनका सीधा सादा कि मकान पोत देने जैसा ख्‍याल उसके सपनों में भी न आए तो वहीं ठाकुर साहब हर दूसरे डायलॉग में डब्‍बा कूची लेकर खुद उसी का मकान पोतने को तैयार रहते।

मोरी गेट से लेकर लक्ष्‍मी नगर और पंजाबी बाग तक चक्‍कर लगा लेने के कई दिनों बाद जब ठाकुर साहब को नौकरी मिली, तब भी उनके मुंह से वही डायलॉग निकला। लेकिन नौकरी ऐसी चीज होती नहीं और कैसी चीज होती है, ये ठाकुर साहब नहीं जानते थे। नौकरी में क्‍या-क्‍या काम करने होते हैं, ये भी उन्‍हें नहीं पता होता। नतीजा ये निकला कि कुछ दि‍न ठाकुर साहब ने कूड़ा नाली खड़ंजा विभाग में काम कि‍या तो विभाग वालों ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दि‍ए कि भई, ठाकुर साहब रहेंगे तो उन लोगों से कुछ न हो पाएगा। दोष ठाकुर साहब का नहीं, पुराने काम करने वालों का ही है, जिनके काम करने के लच्‍छन ही नहीं हैं।

असल में हुआ यह कि जब ठाकुर साहब को कूड़े का खाता दि‍या गया तो उसमें वह खड़ंजा बिछाने लगे और जब नाली वि‍भाग पकड़ाया गया तो उसमें वह कूड़ा भरने लगे। साथ के लोग जब उनसे कहते कि नाली को नाली की ही तरह लो तो वह धमकी देते कि जो कुछ भी वह कर रहे हैं, वह 220 फीसद सही कर रहे हैं। अगर कि‍सी ने बार बार उन्‍हें गलत कहा तो वह मैनेजमेंट से शि‍कायत करेंगे कि उनके साथ रंगभेद कि‍या जा रहा है। उनके बिहार से होने की वजह से उनसे गलत व्‍यवहार किया जा रहा है। अब बाकी के लोगों को अपनी इज्‍जत बचानी थी सो सभी ने समवेत यही कहा कि उन सभी को एकदम काम नहीं आता। खैर, मैनेजमेंट समझदार था सो ठाकुर साहब को दूसरे विभाग में भेजा गया।

इधर ठाकुर साहब बुरी तरह से फुंके हुए थे। 'काम उन्‍हें नहीं आता तो तबादला मेरा क्‍यों' का सवाल उन्‍हें लगातार जलाए जा रहा था। उनका काला रंग दिनों दिन और सुर्ख होता जा रहा था। 'सोफी और उसके संसार' के बारे में उन्‍होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था और 'स्‍लीमेन की अवध डायरी' के बारे में सुना तक नहीं था। फैज और फिराक को वह एक ही मानते थे। बावजूद इसके, उनका पढ़ने लिखने वाले विभाग में तबादला कि‍या गया जो पढ़-पढ़कर अपनी रिपोर्ट ऊपर दि‍या करता था जिससे कंपनी की नीतियां बनती और बि‍गड़ती थीं। पढ़ने लिखने से सख्‍त दुश्‍मनी रखने वाले ठाकुर साहब ने जब देखा कि यहां तो उनकी दाल नहीं गलनी है तो बड़े परेशान हुए। जब उन्‍हें कुछ पढ़ने को दिया जाता तो उनके पेट में दर्द होने लगता और जब लिखने को कहा जाता तो उनकी नाक बहने लगती।

मीटिंग वगैरह में भी जब लोग क्‍या पढ़ें-क्‍यों पढ़ें और क्‍या लिखें-क्‍यों लिखे के सवालों से जूझ रहे होते तो वह व्‍हाट्सएप्‍प पर दरभंगा में सरसों के तेल का भाव पूछ रहे होते। कई दफे तो चप्‍पल के टूटे फीते और लौंग का भी भाव पूछते पकड़े जाते तो बताते कि लौंग को वह रात में अपने बारह दांतों के बीच बनी जगह में फंसाकर सोते हैं। शायद ये रात में दांतों में लौंग फंसाकर सोने का ही नतीजा निकला कि विभाग में उन्‍होंने सभी से सीधे मुंह बात करना बंद कर दी। जि‍ससे भी बात करते, मुंह टेढ़ा करके ही बात करते। इसके चलते कोई भी बात करते, टेढ़ी ही करते। सीधी बात और सीधी चाल उन्‍होंने दरभंगा स्‍थित अपने घर की दुछत्‍ती पर रखकर बंद करके रख दी और भूल गए। आखिरकार यह लोग भी कब तक बर्दाश्‍त करते, सो उन्‍होंने भी मैनेजमेंट को बोल दि‍या कि भई, हमीं लोग नाकाबिल हैं, हमें न तो पढ़ना आता है, न लिखना। इसलि‍ए हमारा ट्रांसफर साफ सफाई विभाग में कर दि‍या जाए।

मैनेजमेंट समझदार था सो चुपचाप ठाकुर साहब को उठाकर डाक-तार विभाग में बैठा दि‍या। वहां बैठकर ठाकुर साहब प्रतिदिन चिट्ठियां पढ़ते। पढ़ते-पढ़ते और भी कुढ़ते जाते। मन ही मन बुदबुदाते कि उनके जैसा महान, हर वाद का वादी, राष्‍ट्रीय रंग से लैस क्‍या दुनि‍या में ये दो कौड़ी की चिट्ठियां पढ़ने आया है। अपनी इसी सुपति‍त कुढ़न के चलते इस बार तो उन्‍होंने नए विभाग में पहुंचते ही सभी काम करने वालों पर रंगभेद का आरोप लगा दि‍या। फि‍र क्‍या था, एक के बाद एक, सभी की पेशियां मैनेजमेंट के सामने होने लगीं। सभी लोग सहम गए क्‍योंकि जहां वह काम करते थे, वहां भले ही झूठ-मूठ ही क्‍यों न लगाया जाए, लेकिन ऐसा आरोप बर्दाश्‍त नहीं कि‍या जाता था। सभी ने अपनी सफाई में अपनी बात रखी। पिछले विभागों में काम करने वालों के बयान भी दर्ज हुए।

मैनेजमेंट समझदार था। सभी लोगों के बयान सुनने और सारे सबूतों को देखने के बाद उसने अपना फैसला खुद ही मुल्‍तवी कर लि‍या। डाक-तार विभाग में काम करने वालों को एक दूसरे कमरे में ले जाया गया और उनसे प्रार्थना की गई कि वह कि‍सी तरह से भी अपना काम चलाएं, लेकिन ठाकुर साहब को बि‍लकुल डिस्‍टर्ब न करें। विभाग वाले भी समझदार थे, मैनेजमेंट का इशारा उन्‍होंने हाथो-हाथ लि‍या। एक वो दिन था और एक आज का दिन है, लगभग सारे विभाग ठाकुर साहब नाम का नाम पूरी तरह से भूल चुके हैं। वह अब इशारों इशारों में उन्‍हें तिमिर कुमार ही बुलाते हैं। एक तो थोड़ा दिमाग का तेज निकला तो उसने तिमि‍र कुमार के नाम से ठाकुर साहब के दरभंगा वाले पते पर तिहत्‍तर चिट्ठियां भेज दीं। बच इसलि‍ए गया क्‍योंकि उनपर कहीं भी उसका नाम नहीं था।

हालांकि वो तो बच गया, लेकिन ठाकुर साहब के कुंठित कोप के भागी आए दि‍न डाक बाबू और तार बाबू बनने लगे। कुछ दिन पहले डाक बाबू ने ठाकुर साहब से सिर्फ यह पूछने की हिमाकत कर दी कि छतरपुर वाली चिट्ठियां कहां रखी हैं, तो हाल ये हुआ कि जैसे पूरे दफ्तर में कोई तीन बैल जोतकर हेंगा चला दे। तार बाबू बड़ी-बड़ी आंख लि‍ए टपर-टपर कभी इधर ताकें, कभी गहरी सांस छोड़ें तो कभी उधर ताकें। बीच-बीच में नाक और कान में उंगली भी करते रहें। उस दिन की बात बताते हुए आज भी तार बाबू बोलते हैं कि 'क्‍या बोलें, बोलती ही बंद हो गई थी भैया। भगवान किसी को कैसा भी दिन दि‍खाए लेकिन ऐसे आदमी के बगल बैठने का दुर्भाग्‍य न दे जैसा कि डाक बाबू को दे रहा है। हमको भी दे ही रहा है, लेकिन अब है तो काट रहे हैं।'

कुछ दिन पहले डाक बाबू ने दफ्तर में बाकायदा घोषणा की कि उनकी आवाज चली गई है। पूछा गया कि कहां चली गई है तो उनका कहना था कि कहां चली गई है पूछने से पहले पता करना होगा कि आ कहां से रही है और आती कहां से है। एक वो दिन है और एक आज का दिन है, क्‍या दिन और क्‍या रात, किसी को नहीं पता कि डाक बाबू की आवाज आती कहां से है। चली जाने का सबको पता है।

वैसे ठाकुर साहब जैसे लोग हर कहीं हर किसी को मिल ही जाते हैं। उनके बारे में बताने से पहले मेरे सामने सवाल था कि उनके बारे में कुछ बताया जाए या न बताया जाए। उनके बारे में कुछ भी बताना उनको चंद चीकट शब्‍दों में ही सही, लेकिन अमर कर देगा। उनके बारे में न बताया तो जाने कितनों की आवाज मर जाएगी या मरी रहेगी। इसलि‍ए मैंने तय किया कि उनके बारे में बता ही दि‍या जाए। इसबीच ठाकुर साहब की तहकीकात में मुझे कुछ एक ऐसी खबरें और पता चलीं, जिनसे यह साबित हुआ कि ठाकुर साहब के दिल पर भी वही रंग चढ़ा है जो उनके अगवाड़े और पि‍छवाड़े चढ़ा हुआ है।

उनके पहले के एक दोस्‍त ने मुझे बताया कि दिल्‍ली आने के तुरंत बाद से ही उनकी नौकरी सेट नहीं हुई। अलबत्‍ता वह कुछ और ही सेट करने लगे। पहले जहां वह काम करते थे, वहां पर उनकी एक बूढ़ी मालकिन हुआ करती थी। साल दो साल तो ठाकुर साहब मालकिन की गोद में ऐसा खेले कि हर आता जाता इंसान मालकिन को इतनी अजीब नजरों से देखना शुरू कर दि‍या। आखिर मालकिन कब तक सहती। वह भी उम्र के इस ढलान पर आकर सहने सुनने की क्षमताएं वैसे भी कम ही होती जा रही हैं। किसी तरह खुदा-खुदा करते हुए उनकी मालकिन ने उनकी नौकरी दूसरी जगह सेट की।

दूसरी जगह आने के बाद ठाकुर साहब ने क्‍या क्‍या किया, उसकी एक भरी पूरी लंबी लिस्‍ट है। काफी कुछ तो पहले बता ही दि‍या, ठाकुर साहब के जो कर्म हैं और जिन कर्मों के चलते वह अब पूरी तरह से तिमि‍र कुमार बनकर प्रसिद्ध हो चुके हैं, वह आइंदा भी बताने पर मजबूर करते ही रहेंगे। तिमि‍र वि‍ल बैक। तिमि‍र इज ऑन।

Saturday, March 11, 2017

अब तौ फि‍र उधिरइहैं राम, सबका कचर के जइहैं राम

अब तौ फि‍र उधिरइहैं राम
सबका कचर के जइहैं राम
मार पीट दंगा फसाद मा
सबसे उप्‍पर रहि‍हैं राम।

दिसि दिगंत बि‍स भरिहैं राम
बिस-बिस से अब मरिहैं राम
जैदी भइया ना रोवा हो
मंदिर का ना तरिहैं राम।

लाल त कब से हारा बइठा
तब्‍बौ लाल हरइहैं राम
लाल लाल ही बोल बाल के
लालै लाल लगइहैं राम।

भय अंजोर अब भय कै भइया
चलत रेल फुंकवइहैं राम
पकड़ के दाढ़ी दै के गारी
फि‍र चक्‍कू चलवइहैं राम।

-रेजिंग राहुल, हैरिंग्‍टनगंज मिल्‍कीपुर वाले

Friday, March 3, 2017

नतमस्‍तक मोदक की नाजायज औलादें- 49

प्रश्‍न: नारियलपानी माने?
उत्‍तर: अंग्रेजी ना चोदो!
प्रश्‍न: पाइनएप्‍पल का पेड़ देखा है?
उत्‍तर: तुम्‍हारी तरह घर में नहीं बंद रहते बे!
प्रश्‍न: कैसा होता है?
उत्‍तर: खजूर से थोड़ा बड़ा और ताड़ से थोड़ा छोटा.
प्रश्‍न: और उसपर पाइनेप्‍पल लटकता है?
उत्‍तर: नहीं चूतिये, उसी पर चढ़कर बैठा रहता है!
प्रश्‍न: कैसे लटकता है?
उत्‍तर: नारियल का पेड़ देखे हो?
प्रश्‍न: हां, देखा है.
उत्‍तर: तो हरामी, जैसे नारियल लटकता है, वैसे ही लटकता है!
प्रश्‍न: वो नारियल की तरह लटकता है?
उत्‍तर: तुमको लटकाएं तब समझ आएगी?
प्रश्‍न: तो नारियल कहां लटकता है?
उत्‍तर: भो**** के, बोले न, अंग्रेजी ना चोदो!!
प्रश्‍न: मने पेड़ पे लटकता है या जमीन पे उगता है?
उत्‍तर: दोनों होता है.
प्रश्‍न: ऐसा कौन बोला?
उत्‍तर: हम बोले!
प्रश्‍न: आपका बोलना गलत है!
उत्‍तर: हम जो भी बोल दें, सब सही है.
प्रश्‍न: तो फिर गलत क्‍या है?
उत्‍तर: वामपंथी हैं गलत!
प्रश्‍न: बहनजी गलत हैं?
उत्‍तर: -----
प्रश्‍न: बोलि‍ए ना, क्‍या बहनजी गलत हैं?
उत्‍तर: तुम्‍हारी सारी बहनें गलत हैं!
प्रश्‍न: मेरी बहनें क्‍यों?
उत्‍तर: क्‍योंकि वो तुम्‍हारी बहनें हैं.
प्रश्‍न: लेकिन अब तक तो आप उन्‍हें अपनी बहनें कहते थे?
उत्‍तर: कहने से क्‍या होता है?
प्रश्‍न: अभी तो आप कहे..
उत्‍तर: बोले तो नहीं थे ना?
प्रश्‍न: कहना बोलना अलग अलग है?
उत्‍तर: हगना मूतना अलग अलग है कि नहीं?
प्रश्‍न: आपका कहना बोलना क्‍या ऐसा ही है?
उत्‍तर: ये बताओ भो*** के कि पाकिस्‍तान से कितनी बोटी खाई?
प्रश्‍न: उसमें तो आपके लोग उस्‍ताद निकले!
उत्‍तर: जेएनयू में नारा कौन लगाया?
प्रश्‍न: उसमें भी आपके ही लोग निकले!
उत्‍तर: लोगों की पिटाई किसने की, उन्‍हें मारा किसने?
प्रश्‍न: वहां भी तो आप ही थे.
उत्‍तर: तो बहिन*** तुम कहां थे, अपनी बहन के साथ?
प्रश्‍न: मार्च शुरू हो गया है!
उत्‍तर: टांग तोड़ दी जाएगी सबकी!
प्रश्‍न: महीने की टांग कैसे तोड़ेंगे?
उत्‍तर: हम किसी को भी तोड़ सकते हैं!
प्रश्‍न: पाकिस्‍तान को भी?
उत्‍तर: देखे नहीं, तोड़ के दो टुकड़े कर दि‍ए?
प्रश्‍न: वो तो इंदि‍रा गांधी ने कि‍या था?
उत्‍तर: बलूचिस्‍तान अलग होगा.
प्रश्‍न: अलग होके कहां जाएगा?
उत्‍तर: हमारे साथ आएगा.
प्रश्‍न: लेकिन बीच में तो पाकिस्‍तान है?
उत्‍तर: बीच में मेरा लं*** है भो*** के!! 

Wednesday, March 1, 2017

जानते हैं वो क्‍यूं इतना चिढ़ते हैं?

पहले छुपकर नारे लगाते पकड़े गए। फि‍र आईएसआई के लि‍ए जासूसी करते जकड़े गए। पता चला कि कुछ आइसि‍स फाइसि‍स से भी बात चल ही रही थी। फि‍र मारपीट करते पकड़े गए।
जानते हैं वो क्‍यूं इतना चिढ़ते हैं
क्‍योंकि
हम छुपकर नारा नहीं लगाते।
हम आईएसआई के लि‍ए जासूसी नहीं करते।
हमारे दोस्‍त आइसि‍स का खात्‍मा कर रहे हैं।
हम पिट रहे हैं।
हम पिट रहे हैं क्‍योंकि हमें आजादी चाहि‍ए।
एक बार पूरा देश पि‍टा था।
आजादी के लि‍ए पि‍टा था।
वो आजादी से चिढ़ते हैं।
आजादी उनके लि‍ए अति‍क्रमण है।
वह युद्ध चाहते हैं।
क्‍योंकि युद्ध उनका धंधा है।
फि‍र भले वह युद्ध सीमा पर हो या सीमा के अंदर
धंधा चलता रहना चाहि‍ए।
आजादी मांगने वाले, आजादी चाहने वाले
धंधे की राह का रोड़ा हैं
इसलि‍ए वह हर आजाद अमन पसंद को हर बार जान से मार डालने की कोशि‍श करते हैं
पर हम फि‍र भी नहीं मरते
उग आते हैं अपनी ही लाशों पर
हरी दूब बनकर
इसीलि‍ए वह चि‍ढ़ते हैं।
वह डरते हैं
हर नई कोपल से।
I could say on this pic that ABVP... TAKE THIS YOU SKRS!!
 लेकिन मैं ऐसा कुछ कहूंगा नहीं क्‍योंकि इसे न संघी ले पाएंगे और न उनके लड़कपि‍ल्‍लू .
Students against ABVP in New Delhi 28 feb 2017

Tuesday, February 7, 2017

नवयुग में निसपच्छता के पराठे (सिर्फ सहाफि‍यों के लि‍ए)

निसपच्छता नामक एक चीज होती है। यह नामक भी होती है और मानक भी होती है। जो लोग इसे नामक मानते हैं वो इसे नमक की तरह लेते हैं। जो लोग इसे मानक मानते हैं वो इसे मन में बसा लेते हैं। निसपच्छता स्वच्छता की अम्मा भी होती है। अगर कोई निसपच्छ नाली में भी पड़ा होगा, तो भी वह साफ माना जाएगा क्योंकि वो निसपच्छ है। निसपच्छ है इसलिए स्वच्छ है। जो लोग निसपच्छ नहीं होते, वो स्वस्थ नहीं होते। अस्वस्थ लोगों के मन में अस्वस्थ दिमाग का वास होता है। अस्वथ दिमाग में स्वच्छ निसपच्छता नहीं रह सकती क्योंकि वहां पहले से ही पक्षधरता के कीड़े बिलबिला रहे होते हैं। निसपच्छता के लिए दिमाग को धोकर स्वच्छ बनाना होता है। उसके बाद उसमें निसपच्छता भरनी होती है। यह कार्य हमें मंगल, गुरु और शनि की शामों में अगरबत्ती जलाकर करना होता है। सोम, बुध और शुक्र को हम निसपच्छता का स्वच्छता के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इतवार को निसपच्छता की छुट्टी होती है तो वह संडास नहीं जाती।

हमें अपने मन में निसपच्छ रहना चाहिए। फैसला करते हुए हमें अपने मन की नहीं सुननी चाहिए। हमें अपने दिमाग की सुननी चाहिए। मन में निसपच्छता पक्षधारी हो जाती है। इसलिए उसे दिमाग में शिफ्ट कर देना चाहिए। इसके लिए अग्रवाल पैकर्स एंड मूवर्स की मदद लेने में कुछ भी मायूब बात नहीं। निसपच्छ लोगों को चाहिए कि वह अपनी अपनी कुर्सी से उतरकर सावधान खड़े हो जाएं। हिलना डुलना पूरी तरह से मना है क्योंकि इससे किसी एक पक्ष की तरफ गिरने का खतरा है। गिरने पर निसपच्छता टूट जाती है और गंदी भी हो जाती है। वैसे बाद में इसे फेवीक्विक लगाकर जोड़ भी सकते हैं और नए निसपच्छ बनने वालों को सहाफत डे पर गिफ्ट दे सकते हैं। निसपच्छता को आप बाहर से नहीं सीख सकते। इसे आपको अपने अंदर उगाना होता है। यह दिमाग पर उगने वाला आत्मा का हरा पेड़ है जिसकी पत्ती उसी के सिर पर निकली नजर आती है, जो वाकई निसपच्छ होता है।

जब व्यक्ति वाकई निसपच्छ होता है तो वह अपने मन को बराबर के सत्तर-सत्तर खानों में बांटकर उसमें मोजे रख देता है। यह सारे मोजे वक्त आने पर निसपच्छ रहते हुए सभी पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिए जाते हैं। इससे सब खुश हो जाते हैं और निसपच्छता का भी धंधा चलता रहता है। निसपच्छ दिमाग को याद रहना चाहिए कि निसपच्छता का धंधा होता है, न कि धंधे में निसपच्छता। उसे धंधे की पक्षधारिता का सम्मान करते हुए पूरी तरह से निसपच्छ पराठे ही खाने चाहिए, वह भी पत्तागोभी भरे हुए। याद रखिए, अगर आप निसपच्छ रहेंगे तो सब आपसे प्रेम करेंगे, लेकिन अगर आप पक्षधारी होंगे तो कुछ ही आपसे प्रेम करेंगे। धंधा सबके प्यार से चलता है, कुछ के प्यार से नहीं।

Monday, January 16, 2017

अशोक मोची से जिग्नेश मेवानी तक

अशोक मोची के साथ महेंद्र मिश्र
गुजरात में दलित राजनीति एक नये चरण में पहुंच गयी है। गुजरात दंगों में हथियार के तौर पर इस्तेमाल होने वाला ये तबका अब अपनी पूरी पहचान के साथ सामने है। कभी ये सत्ता का औजार हुआ करता था लेकिन आज उसकी लगाम अपने हाथ में लेने को बेताब है। इस कड़ी में उसका चेहरा भी बदला है और एजेंडा भी। अशोक मोची, गुजरात दंगों का चेहरा। रविवार को अहमदाबाद में उनसे मुलाकात हो गयी। कहने को तो ये मुलाकात उनके घर पर हुई। लेकिन ये एक स्कूल था जिसके वरांदे में बिछी चारपाई उनका घर, द्वार और आंगन सब कुछ थी। रात यहां कटती है दिन अपनी दुकान में। जहां वो मोचीगिरी का काम करते हैं। मां-बाप बचपन में गुजर गए थे। संपत्ति के नाम पर महज एक घर था जिसका बड़े भाई से बंटवारा करने की जगह अपना हिस्सा भी उसके हवाले कर दिया और खुद के लिए दर-बदर की जिंदगी चुन ली। न इतना पैसा हुआ कि घर बसा सकें और न अब उसकी कोई चाह रही।

गुजरात दंगों का चेहरा बनने का उन्हें जरूर मलाल है। उनका कहना था कि दंगे इतने भयंकर होंगे इसकी उन्हें उम्मीद ही नहीं थी। उनका मानना था कि हमेशा की तरह छिटपुट पत्थरबाजी और कुछ घटनाएं होंगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा। ये बात सही है कि गोधरा की घटना से उनके भीतर रोष था और चर्चे में आयी तस्वीर भी उसी का नतीजा थी। लेकिन हालात इतने बदतर होंगे ये उनकी सोच और कल्पना से भी परे था। उनका न तो विश्व हिंदू परिषद से कुछ लेना-देना था। न ही किसी दूसरे हिंदू संगठन से कोई वास्ता। उस घटना के 15 सालों बाद भी उनके सीने में एक ही दर्द जज्ब है। वह है जाति व्यवस्था की गुलामी। कुछ दार्शनिक अंदाज में वो कहते हैं कि उन्होंने दलित बस्ती को छोड़ दिया है और अब वो जातिवाद से आजाद हो गए हैं। और इस बात के लिए उन्हें अपने ऊपर गर्व है।

अशोक मोची का दर्द व्यक्तिगत दायरे तक सीमित था जिसे जिग्नेश मेवानी ने एक स्वर दे दिया है जो सामूहिक है। इसकी आवाज बड़े फलक पर जाती है और ये व्यापक हिस्से को प्रभावित करती है। ये आरएसएस द्वारा पोषित परंपरागत हिंदू व्यवस्था से विद्रोह का सुर है। इसमें दलितों के अलग पहचान की दावेदारी है तो रोजी-रोटी और सम्मान की गारंटी के लिए जमीन मालिकाने के हक की मांग भी । जिग्नेश मेवानी उसके प्रतीक बन गए हैं। उना आंदोलन ने ये साबित कर दिया कि दलित अब इस्तेमाल की चीज नहीं रहा । वो अपना रास्ता खुद बनाएगा। दलितों के इस सशक्तिकरण ने उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात को दूसरे नंबर पर खड़ा कर दिया है। ये न केवल अपना अलग रास्ता बनाता दिख रहा है बल्कि पूरे देश के स्तर पर आरएसएस द्वारा पेश किये जा रहे गुजरात के हिंदू माडल को भीतर से खुली चुनौती भी है। हिंदू राष्ट्र के गुब्बारे में गुजरात का दलित आंदोलन एक कारगर पिन साबित हो सकता है। अनायास नहीं उना की घटना के बाद गौरक्षकों को सांप सूंघ गया। और उन्हें रोकने के लिए प्रधानमंत्री को सामने आना पड़ा। इतना ही नहीं गुजरात के दलित आंदोलन को रोहित वेमुला और जेएनयू के नजीब से जोड़कर मेवानी ने इसे नई ऊंचाई दे दी है।

इस कशमकश और रस्साकशी के बीच आरएसएस अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। उसने दलितों को अपना हथियार बनाने के लिए सांस्कृतीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाया है। इसके तहत एक दौर में एकात्मकता यात्रा निकालने से लेकर उनके लिए अलग से देवी-देवताओं को स्थापित करने का काम किया गया। इस कड़ी में कुत्ता, गधा और बकरी की सवारी वाले देवी-देवताओं की खोज की गयी। देवताओं के इस बंटवारे के साथ ही जाति व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी कर दी गयी। संघ एकात्मकता की कितनी बात करे लेकिन सच यही है कि देवताओं तक को वो सभी जातियों के बीच साझा करने के लिए तैयार नहीं है।


लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।