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Friday, February 12, 2016

इंतजारी हूं, जारी नहीं..

रायता मैं क्‍या बि‍खेरूंगा, मैं खुद में ही इतना बि‍खरा हुआ रायता हूं कि समेटता हूं और फि‍र फि‍र फैल जाता हूं। घबरा जाता हूं लोगों को देखकर और इधर उधर छुपने की कोशि‍श मेरे फैलने को और बि‍खेरती जाती है। सोचता हूं कि इतना फैला दूं इस दुनि‍या में कि अगले दो ढाई सौ सालों तक लोग बस मेरी फैली हुई फि‍सलन को समेटने में सुसहि‍ष्‍णुता से जोर लगा दें, फि‍र भी मेरा फैला हुआ मैं समेट न पाएं। आप कहेंगे कि मैं नकल कर रहा हूं, लेकि‍न असल में मैं क्‍या कर रहा हूं, ठीक ठीक मुझे भी नहीं पता। अच्‍छा होगा कि आप ही कोई बयान जारी कर दें सर ताकि मैं कहीं से तो जारी हो सकूं। अभी जहां हूं, वहां तो सिर्फ फैल ही रहा हूं, जारी नहीं हो पा रहा।

रोज घर से दस गांठ बांधकर चलता हूं और कहीं पहुंचने से पहले ही रास्‍ते में उन्‍हें गुम कर बैठता हूं। कौन कौन सी गांठ कहां कहां से फि‍सल रही है, कौन सी कहां नि‍कल रही है, ईमानदारी से बता रहा हूं, मुझे नहीं पता। पता चल भी नहीं पाता क्‍योंकि फैलना महसूसना इन्‍कार करना है और मैं वाकई फैल रहा हूं। रायता हूं या नहीं, ये भी मुझे ठीक-ठीक नहीं पता, जो पता है वो बस फैलना है। आप लोग घबराते रहि‍ए, अपना लोटा थारी छुपाते रहि‍ए लेकि‍न यकीन भी कि‍ए रहि‍ए मुझपर कि मैं फैल रहा हूं, झूठ बोल रहा हूं।

अब तो जो कुछ भी याद है, वो मेरी फैली हुई फि‍सलन है जहां तक कुछ पहुंचता भी है तो फि‍सलकर फि‍र दूर चला जाता है। बट यू डोंट वरी, यू कैरी ऑन वि‍द स्‍टीफेन किंग। ही इज रि‍यली द किंग ऑफ हॉट एंड सोर रायता यू नो। नो यू डोंट नो। इवेन आइ डोंट नो माईसेल्‍फ एंड आइ डोंट हैव एनी काइंड ऑफ शेल्‍फ। और ये सारी अंग्रेजी भी मुझे समेट नहीं पाती है, ये जानते हुए भी मैं इसे बोलते हुए खुद पर एक डॉट लगाता हूं।

गुनगुनाता हूं वहां कौन है तेरा और खुद को समझाता हूं मुसाफि‍र जाएगा कहां। तेज़ाब वाली माधुरी दीक्षि‍त को मैं सपने में भी नहीं देखता और जिस-जि‍स ने मेरे पैसे मारे हैं, अपनी दाहि‍नी जेब में उनके नाम की लि‍स्‍ट को हर दस मि‍नट बाद उंगली से टहोक लेता हूं। स्‍टीव जॉब्‍स को आज ही मैनें अपने ठेंगे पर रखा है और मार्क जकरबर्ग को ठेठ फ़ैज़ाबादी में तौल के बि‍खेरा है। मिट्टी का नमक मैनें नहीं चखा है और न ही मैनें कोई मरे हुए कवि‍यों का संगठन बनाया है। सुख की तलाश में मैं लौटे हुए घायल को भी देख लेता हूं और एनएसडी में खुश हो होकर जीशान की फोटो के सामने उसकी प्रशंसा भी कर देता हूं।

फि‍र भी, मैं फैल रहा हूं। इंतजारी हूं, जारी नहीं।   

Thursday, December 24, 2015

कहानी उस ताखे पर है, जि‍सको घुटना कहते हैं

मेरे लड़कपन का प्रेम मेरी काजोल न होती तो क्‍या होता।
 कहानी मत देखि‍ए, काजोल को देखि‍ए। 
गुलाबी गाड़ी, पीली साड़ी, सूनसान सड़क, बरसात बेधड़क, पलटती लड़की, दि‍ल की खि‍ड़की, धूम धूम धांय धांय, मि‍लना बि‍छड़ना, फि‍र से बि‍गड़ना, बि‍गड़ के मि‍लना... क्‍या नहीं है इस फि‍ल्‍म में। उड़ती रॉल्‍स रॉयस और जुल्‍फों ने फि‍ल्‍म को ऐसा उड़ाया है कि अभी तक उड़ ही रही है, जमीन पर नहीं आई है। शर्म तो नहीं आ रही होगी शेट्टी भाई, थोड़ी बेशर्मी हम सबको भी देते जाओ, तीन सिटिंग में पूरी फि‍ल्‍म देख लेंगे। इतने तो दि‍लवाले हम भी हैं।

काली, राज, किंग, फूल, पत्‍ती, धूल, कार, सवार, प्‍यार, जीत-हार से लेकर संजय मि‍श्रा तक बोर हैं, जॉनी भाई भी चुके हुए लोगों के साथ कितना कर लेंगे। एक धागे में दस सुई डाल के सि‍लाई नहीं होती लेकि‍न पैसे हों तो दि‍लवाले जैसी होती है। अपने अफ्रीका वाले जेमी भाई तो जीवित हैं नहीं, कम से कम उनकी बनाई फि‍ल्‍में देखकर ही सीख लेते मेरे शरम शेट्टी।

नहले पे दहला, सगा सौतेला, सेट अलबेला सब डाल दि‍या और कहानी निकालकर उस ताखे पर रख दी जो घुटने में होती है। मेरे लड़कपन का प्रेम मेरी काजोल न होती तो क्‍या होता। कहानी मत देखि‍ए, काजोल को देखि‍ए। संतोष करि‍ए, असंतोष नहीं। इसे भी फि‍ल्‍म कहते हैं। बस।

इसे ही कभी घुसी कभी कम कहते हैं।

Tuesday, November 3, 2015

जीवन की आदम आस

एकांत की अज़ीब अनमनी उदासी के बीच बने रास्‍ते में जब मैं पूरा दम लगाकर दौड़ लगाता हूं तो कुछ भी पीछे जाता हुआ न लगता है न दौड़ते वक्‍त चीज़ों के पीछे जाने में रत्‍ती भर यकीन हो पाता है। हर बार चलती हवा पर, हर वक्‍त गि‍रती धूप पर और हर पल छपती चीजों पर मैं पूरा यकीन करना चाहता हूं तो हवा में उड़ती नमी हरएक चीज़ को गलाकर बहा देती है। अक्‍स हैं जो उभरते हैं तो दूसरे पल पहाड़ के किसी कोने में जाकर एक गांव बन जाते हैं जि‍सके कतरे महानगरों की जिंदगी में बहते दि‍खते हैं, शायद कि‍सी अभ्‍यस्‍त पहाड़ी की पकड़ में आते होंगे।

मींज मींजकर नशे में डूब मोटी हुई उंगलि‍यों को फोड़ने की कोशि‍शें न तो कि‍सी पहाड़ पर लेकर जाती हैं न कि‍सी तराई में। धान काटकर सूज गई उंगलि‍यां रात सानी लगाते हौदी में घि‍सती कहां कि‍स प्रेम की दरकार करती होंगी, कि‍से पता, खुद उंगलि‍यां भी दरकार का प्रेम महसूसना बंद कर चुकी हैं। कहते हैं कि बाल टूटते रहते हैं। कहते हैं कि हम भी टूटते रहते हैं। जो नहीं कहते वो क्‍या वो कि हम हमारे बाल बराबर भी नहीं।

पहाड़ मैदानों से ज्‍यादा लौटकर न आने का ज़हर ढोते बड़े होते जाते हैं। हम पी-पीकर मैदानों से भी ज्‍यादा फैलते जाते हैं। पाप चीड़ की घास बने हमें उगने देकर मार देते हैं। पुण्‍य कि‍ए नहीं तो वो पाप के नंबर ही बढ़ाते हैं। हि‍साब तो हमेशा चलता रहेगा, जो नहीं चलेगा, वो हम होंगे। हम, जो न समय के ठीक ठीक अपराधी बन पाए न अपने खुद के अच्‍छे जज। अब तो जो फैसला होगा, वो शब्‍द करेंगे। जो सजा होगी, वो बातें फुसफुसाएंगी। जीवि‍त न रहने की आदम आस हमें हर सजा में जीवि‍त रखेगी।

प्रस्‍थान आने की जगह खाली करता है

कौन कि‍धर है, कहां है, क्‍या कर रहा है, क्‍यों क्‍या कर रहा है जान लेने की हद से जि‍तने कदम हो सकते हैं उतना दूर खड़ा मैं बार बार भुलाने को तैयार होता हूं कि कौन आखि‍र कोई है ही क्‍यों जबकि उसे कुछ भी न होना था। प्रस्‍थान एक कुछ भी न होने का स्‍पेस भी तैयार करता है। प्रस्‍थान आने की जगह खाली करता है।

अंदर घुसने पर लगता है कि मैं वही नि‍वाड़ उधड़ी खाली होने को मजबूर कर दी गई कुर्सी हूं जो होते हुए दि‍खते हुए और जगह छेंकते हुए भी नहीं है तो सिर्फ इसलि‍ए कि वो कि‍सी काम की नहीं रह गई है। होती जरूर अगर नि‍वाड़ पूरी बि‍नी होती। उसकी एक एक नि‍वाड़ टूटकर नीचे झांक रही है और कम से कम मुतमईन है कि वो नीचे नहीं पहुंच सकती। उसे अपना टूटकर अलग होकर लटकना और कहीं न पहुंच पाना खूब याद है।

सोचता हूं आज गांजा पि‍यूं। कम पि‍या है, जि‍तना भी पि‍या है, नशा ठीक से याद नहीं। नशे की भी अपनी अलग अलग यादें होती हैं। शराब की अलग तो एल्‍प्रॉक्‍स की अलग। नशे की जि‍तनी गोलि‍यां हैं, उनमें उतनी ही तरह का नशा है। नशा जो गीला कर दे, नशा जो सबकुछ सुखा दे, नशा जो बहा दे, नशा जो तैरा दे, नशा जो उड़ा दे, नशा जो आराम दे। इतना ही नहीं है नशा। नशा है, इसीलि‍ए इतना ही हो भी नहीं सकता।

बस इतना सा होना चाहता हूं। बस इतना सा कि‍ कोई मुझे देख न सके न सुन सके। देखता रहूं सबको। सुबह नींद से उठते बेरुखे चेहरों को। देखकर भी अनदेखी करने वाली आंखों को। रंग में होकर भी बेरंगी दि‍खती परछाइयों को। लय में होती हुई रोती रूबाइयों को। अपने होने को लि‍ख देने से बचना चाहता हूं। इसके लि‍ए मुझे कूकर की सीटी का बहाना काफी है।

वैसे भी भावनामि‍श्राएंडकाल्‍मपुरपब्‍लि‍केशन की सारी रात चलती मशीनें एक भी हर्फ छापकर नहीं नि‍कालतीं, बस चलती रहती हैं।

Saturday, October 17, 2015

आएगी बहार इसी बार... करता हूं इंतजार

ये जो चल रहा है, सोचता हूं उसके चलने के लि‍ए सबसे जरूरी क्‍या होता होगा... सुबह उठे तो पैरों को एक अदद चप्‍पल मि‍ल जाए, फ्रि‍ज में एक बोतल ठंडे पानी से दो घूंट मि‍ल जाए, मंजन करना हो तो ब्रश मि‍ल जाए, रसोई में प्‍याज न सही लेकि‍न आलू शि‍मला मिर्च टमाटर या मीनू का मीट काटने के लि‍ए एक अदद चाकू मि‍ल जाए, खाना बन जाए तो उसे पैक करने के लि‍ए टि‍फि‍न मि‍ल जाए, बाहर जा रहे हों तो बाल काढ़ने को एक कंघी मि‍ल जाए..
आम आदमी के जीवन में अंबानी बनना कोई इच्‍छा है तो उसे भी पता है कि उसका कोई मतलब नहीं है। वो तो बस जैसे तैसे काट देना चाहता है, ऐसे वैसे ही सही लेकि‍न जो चल रहा है, उसे गुजार देना चाहता है। क्‍या चाहि‍ए आखि‍र एक इंसान को चलने के लि‍ए.. चप्‍पल ही तो चाहि‍ए पैरों में। वो भी न हो तो..

चप्‍पल, जब तुम नहीं होती तो मैं जूता पहनकर टॉयलेट जाता हूं, जूता भीग न जाए इसलि‍ए उसे बाथरूम के बाहर उतार देता हूं। खाली डोरमैट पड़ा देख क्‍या बताऊं कि कैसी कैसी तुम्‍हारी याद आती है। तुम थी तो टॉयलेट भी टॉयलेट सा नजर आता था। तुम नहीं हो तो वो भी रेसिंग कोर्स सा लगता है और समझ में नहीं आता कि कर रहा हूं या भाग रहा हूं। बाथरूम में जब तुम भीगती थी, तुम्‍हें अपने भीगे पैरों में डाल कि‍तनी देर तक तो दि‍माग को ठंडा करता रहता था.. चप्‍पल, मेरी प्‍यारी चप्‍पल। जहां भी हो, मेरा प्‍यार हमेशा तुम्‍हारे साथ है।

चाकू... मेरे चमकीले सजीले कंटीले रपटीले तेज चाकू... तुम्‍हारे बि‍ना तो ये रसोई अब रसोई नहीं बल्‍कि सोई हुई है। काटने को कि‍तना कुछ तो है। डोंगी में पड़े मोटे मोटे आलू, उसके ठीक बगल चुन चुन कर लाए गए मोटे सफेद लहसुन। फ्रि‍ज में रखा लाल रसीला टमाटर, शि‍मला मिर्च और बड़े मन से लाई सीजन की पहली गोभी। पता है चाकू, अभी तक वो गोभी वैसे ही पड़ी हुई है। तुम हो नहीं तो वो भी होने नहीं पा रही है.. कि‍तना कुछ तो काटने को पड़ा है लेकि‍न जो नहीं पड़ा है वो तुम हो... तुम ही तो हो।

कंघी.. ओह मेरे बालों से लड़ने को बेताब मेरी पसंदीदा जंगी। मुझ बेकार को कार का लुक देने वाली कंघी। तुम मेरे जीवन और जोबन से कहां चली गई। तुम्‍हें खोजता हूं बार बार, मेज पर फैले बेतरतीब पड़े कागजों डि‍ब्‍बों दवाइयों चूरनों पि‍चकी हुई टूथपेस्‍ट की ट्यूबों, रजनीगंधा के खत्‍म डि‍ब्‍बों के बीच लेकि‍न तुम भी न जाने कहां मुझे छोड़कर चली गई। तुम्‍हारे बारे में मैं थोड़ा सो बेईमान हूं इसलि‍ए तुमको न जाने कहां बोल रहा हूं नहीं तो मुझे पता है कि तुम कि‍स जुल्‍मी के बालों संग खेल रही हो। जल्‍दी आओ नहीं तो तब तक मैं पाजामा तो बना ही हुआ हूं।

और टि‍फि‍न.. याद है तुम्‍हें हर दोपहर तुम कैसे खुलखुल कर खुलते थे मेरे सामने। अब कब खुलोगे.. खुलोगे या नहीं।

आएगी बहार इसी बार... करता हूं इंतजार कि मुझे भी मि‍ले एक चप्‍पल एक चक्‍कू और कंघी टि‍फि‍न..

Saturday, February 21, 2015

कि‍सी शहर में खड़े खड़े

पेरि‍स के कि‍सी स्‍टेशन पर कभी खड़े खड़े
कई बार उस आदमी ने सोचा कि खुद को शहर में कहीं तो खड़ा पाए। न खड़ा पाए तो कम से कम बैठा या लेटा तो पाए। इनमें से कुछ भी न पाए तो खुद से चार गुनी बड़ी कांच की खिड़की से शहर को देखता पाए या फि‍र सर्द कांच के कठोर केबि‍न में कि‍सी कि‍नारे खुद को पाए, लेकि‍न आदमी की इतनी चाहतों के बावजूद, रोज ब रोज की लट्ठमलट्ठे और गुत्‍थमगुत्‍थे के बावजूद आदमी खुद को शहर में खड़ा लेटा बैठा तो दूर, खुद को देख भी नहीं पा रहा था। न फ्लाईओवरों के ऊपर या शॉर्टकट के चक्‍कर में नीचे से गुजरते हुए, न रेड लाइट पर बेशर्मी से भीख मांगती बुढ़ि‍याओं को गरि‍याते हुए, न चाय वाले से नजदीकी बढ़ाते हुए और न ही हर तीसरे महीने एक नया प्रेम करते हुए, आदमी परेशान था कि वो खुद को पा क्‍यों नहीं पा रहा है, कहीं पहुंचा क्‍यों नहीं पा रहा है। साल भर की चार प्रेमि‍काओं और उनके मासि‍क धर्म भी उसे पाने में आखि‍र क्‍यों नहीं कोई मदद कर पा रहे हैं। क्‍या वो आदमी इतना भोथर हो चुका है कि साल भर में चार बार मासि‍क धर्म पूरी तन्‍मयता से नि‍भाने के बावजूद उसके पेट में उठने वाला वो दर्द भी उसे वो रास्‍ता नहीं दि‍खा पा रहा है, जो मुहल्‍ला मोतीबाग की गली नंबर चार से तो कतई होकर नहीं जाता है, भले ही उस गली नंबर चार में चार सौ कि‍लोमीटर साइकि‍ल चल चुकी हो।

हर वक्‍त या तो गांव या फि‍र से गांव में ही खुद को खड़ा, बैठा, लेटा और चढ़ा भी पाने वाला आदमी इन दि‍नों जब खुद को शहर में देखता है तो परेशान हो जाता है कि यहां के पेड़ों की डालि‍यां इतनी कमजोर क्‍यों होती हैं कि उंगली रखने से टूट जाती हैं। क्‍यों नहीं ये डालि‍यां गांव के उन पेड़ों के जि‍तनी मजबूत हैं, जि‍नपर मन भरकर लंफने के बाद भी सटाक से मन नीचे आकर गि‍र जाता था, लेकि‍न डाली मुस्‍कुराती, इठलाती चार पत्‍ती नुचवाकर वहीं पर हि‍लती रहती थी और थोड़ी देर बाद हि‍लनी बंद हो जाती थी। धान तो थोड़ा जिंक, जरा सा नमक या कभी कभी नि‍रमा डालने पर कैसे तो हरा होकर ठठाकर हंसने लगता था, तो क्‍यों यहां के धान इन सबको डालने के साथ-साथ यूरि‍या और पोटाश भी डालने के बाद मुरझाए रहते हैं, और जो दाना देते भी हैं, वो इतना पतला, महीन और अर्थहीन होता है कि आदमी की आर्थिक हालत तक डावांडोल होने लगती है। गांव  में पेड़ लगाता था तो दो दि‍न में ही एक कल्‍ला फोड़ देता था, यहां पर पेड़ लगाता है तो 40-40 दि‍न बाद भी क्‍या मजाल कोई नया कल्‍ला फोड़ें, उल्‍टे गमला जरूर फोड़ देते हैं।


इस शहर में आदमी खुद को खड़ा देखे भी तो कैसे देखे जहां लोग शादी में जाने के लि‍ए न चुकाने वाला उधार तीन-तीन हजार लेकर जाते हैं, लेकि‍न साला कोई हरामखोर अपनी प्रेमि‍का से मि‍लने के लि‍ए चार फूल गुलाब का खरीदने के लि‍ए दो सौ रुपया भी उधार नहीं मांगता।  ठेलों पर चभर चभर हर वक्‍त कुछ न कुछ चबाते चुम्‍हलाते लोगों के चेहरों पर झलकती तफरीह क्‍यों उस शहर को उसके अंदर खड़ा नहीं होने देती या फि‍र तफरीह का सारा मंत्र उस शहर की नींव में घुसकर लगातार खुद को पढ़-पढ़कर भोथरा कर रहा है कि न तो उस आदमी में शहर खड़ा हो पा रहा है और न ही वो आदमी उस शहर में खड़ा हो पा रहा है। होते हुए भी जो छूट गया है, दि‍खते हुए भी जो देखने से रह गया है, वो गांव बार बार क्‍यों उस शहर में आकर बस जा रहा है और आदमी के पैरों को थोड़ा सा और लुंजपुंज बना जा रहा है।

खड़ा होने का सारा ककहरा जि‍स जमीन पर चटाई बि‍छाकर कालि‍ख लगाकर सीखा था, शहर की जमीन उससे कहीं ज्‍यादा चि‍कनी, चमकदार और सलीकादार भी है तो भी वो सीखा ककहरा क्‍यों यहां फि‍सल जा रहा है जो गांव की उबड़खाबड़ जमीन पर इधर उधर उग आई घास या बन आए गड्ढों में पड़ा रहता था और खड़े खड़े पड़ा रहता था। ककहरा कुरेदने के लि‍ए पहले एक गड्ढा था, इस शहर की चिकनी सड़कों पर चप्‍पल घि‍सते घि‍सते
खुद चप्‍पल में एक गड्ढा हो गया और दूसरा ककहरा अपने आप उग आया। दोनों तरफ के शोरों से बेतरतीबी बटोर कर हि‍लते हुए दोनों को उगल देने की आदत से परेशान इस आदमी का ये पैर इन शहरों की चि‍कनी सड़कों पर चप्‍पल और बगल में भी एक गड्ढा लि‍ए खड़ा हो भी तो कैसे हो। गांव की पोली जमीन में पैर धंस जाते थे, चि‍पक जाते थे, आगे उठने का नाम नहीं लेते थे, तब जाकर खड़े होने की और आसपास देखने की बात समझ में आती थी।   आखि‍र ये आदमी शहर में कहीं कि‍सी कोने, कि‍सी फ्लाईओवर, कि‍सी बस, कि‍सी मेट्रो या कि‍सी लोकल में खड़ा हो भी तो कैसे हो जब ये शहर ही उसमें खड़ा होना तो दूर, झांकने भी नहीं आता।

अब तक जो कुछ भी ये आदमी समझा, वो ये समझा कि शहर में खड़ा होना पूरी तरह से बेमानी है। शहर में उड़ना चाहि‍ए, तैरना चाहि‍ए, लेकि‍न खड़ा कभी नहीं होना चाहि‍ए। शहर की छतें बहुत नीची होती हैं, सि‍र फट जाता है, दि‍माग बाहर नि‍कलकर चि‍कनी सड़क पर फैल जाता है। 

Tuesday, February 3, 2015

BREAKING NEWS:: सोगड़ि‍या तीन और खादि‍त्‍यनाथ आठ महीने के गर्भ से

नई दि‍ल्‍ली/अहमदाबाद/गोरखपुर. विश्‍व हिंदुत्‍व परि‍षद के सोगड़ि‍या पि‍छले तीन महीने और मूरखधाम पीठ के खादि‍त्‍यनाथ आठ महीने के गर्भ में हैं। अल्‍ट्रासाउंड रि‍पोर्ट में सामने आया है कि सोगड़ि‍या के गर्भ में तीन और खादि‍त्‍यनाथ के गर्भ में आठ बच्‍चे पल रहे हैं। इस समाचार के बाद देश की कई साध्‍वि‍यों ने हर्ष व्‍यक्‍त कि‍या है। उमा सारथी ने दोनों को सेब और संतरे सरकारी कोटे से भि‍जवाए हैं।

हिंदुत्‍व धर्म की रक्षा के लि‍ए इन दोनो संतों ने इस पुनीत कार्य के लि‍ए हामी भरी। इसके लि‍ए वीर्य वि‍शेष रूप से हिंदुत्‍व स्‍पर्म बैंक से मंगवाया गया। हालांकि परि‍षद के सूत्रों का कहना है कि इस पुनीत कार्य के लि‍ए वीर्य नहीं बल्‍कि सीधे वीर्यदान करने वाले बुलाए गए थे, जि‍न्‍होंने प्राकृति‍क रूप से मंत्रोच्‍चार के साथ इनके मुखद्वार से गर्भाधान कि‍या। जल थल और नभ सहि‍त हिंदुत्‍व का लिंग पकड़कर हि‍लाने वाले सैकड़ों लोग इस पुनीत कर्म के साक्षी बने। खुद भक्षी महाराज ने दोनों को क्रमश: तीन और आठ पुत्रवतू का आर्शीवाद दि‍या।

मुख में हुए गर्भाधान और साथ के साथ भक्षी महाराज के आर्शीवचनों के चलते अब इनके पेट में पल रहे बच्‍चे लात भी मारने लगे हैं। परि‍षद के एक प्रवक्‍ता ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि खादि‍त्‍यनाथ के मलद्वार से कभी-कभी भगवा पानी भी अब रि‍सने लगा है, जि‍सका मतलब है कि डि‍लेवरी अब नजदीक आ रही है। सारे बच्‍चे अठमासे न पैदा हों, इसके लि‍ए उन्‍हें वि‍शेष वाई श्रेणी की भी सुरक्षा दी जा रही है। नाल काटने के लि‍ए संवैधानि‍क ब्‍लेड लेकर शि‍श्‍नसेना पहले से ही तैयार है और सारे औजारों को एक धर्म वि‍शेष के खून में अच्‍छी तरह से स्‍टेरलाइज कर लि‍या गया है।

समाचार लि‍खे जाने तक खादि‍त्‍यनाथ के मलद्वार से भगवा पानी का नि‍कलना जारी था। उनके डॉक्‍टरों के बोर्ड ने उसपर दो रुपये वाला बैंडेड चि‍पका कर उसे रोकने की कोशि‍श की, पर असफल रहे। बहरहाल, उन्‍हें 24 में से 36 घंटे के सुपरवि‍जन में रखा गया है। वहीं सोगड़ि‍या ने गर्भावस्‍था के दौरान दोबारा मुखमैथुन कर लि‍या है, जि‍सकी वजह से उनके गर्भ में पल रहे तीन में से एक बच्‍चे का लिंग गर्भ में ही परि‍वर्तित हो गया है। एक बार फि‍र से नाम ना छापने की शर्त पर परि‍षद के एक प्रवक्‍ता ने बताया कि लाख मना करने पर भी सोगड़ि‍या मुखमैथुन की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं जि‍सके चलते परि‍षद में चिंता है कि गर्भ में पल रहे सभी बच्‍चों का ही लिंग परि‍वर्तन न हो जाए।

Tuesday, November 18, 2014

बात बुझाता नहीं, कान सुनाता नहीं

तस्‍वीर के जनक: नि‍धीश त्‍यागी
लैट जलती नहीं। 
फूल फरता नहीं। 
गमला बढ़ता नहीं। 
बि‍जली आती नहीं। 
ठंड जाती नहीं। 
सरसों फूलती नहीं। 
मछली पि‍चकती नहीं 
प्रेम होता नहीं
बात बुझाता नहीं
कान सुनाता नहीं
आंख देखाता नहीं 
गाल फुलाता नहीं
मुंह बि‍चकाता नहीं
समोसा चलता नहीं 
कबूतर पलता नहीं 
दि‍ल मचलता नहीं  
सुख मि‍लता नहीं
नशा हि‍लता नहीं 
गालि‍ब छि‍लता नहीं
बोतल गाती नहीं
मय हि‍लाती नहीं
बयार आती नहीं
दरार जाती नहीं
ठीक होता नहीं
बोल सोता नहीं
नींद मुड़ती नहीं 
मुंडेर चढ़ती नहीं
दुख होता नहीं
रात छि‍लती नहीं 
बात मि‍लती नहीं 
तुमको बुझाता नहीं 
हमको समझाता नहीं
कोई मनाता नहीं
मन सनाता नहीं। 

Sunday, November 16, 2014

हम पुरुषों का स्‍पेस

हम पुरुषों का भी एक स्‍पेस होता है। पता नहीं महि‍लाएं इस स्‍पेस के बारे में कि‍तना समझती होंगी और कि‍तने पुरुष इसे स्‍वीकार करते हुए भी अस्‍वीकार करना चाहेंगे, पर हकीकत यही है कि हम पुरुषों का भी एक स्‍पेस होता है। हम उस स्‍पेस में अपने दोस्‍तों के साथ कभी गा रहे होते हैं या दूसरे के रोने पर जरा सा स्‍त्रैण होकर उसके सि‍र को अपना कंधा और पीठ को हथेलि‍यों की गर्माहट दे रहे होते हैं। उस स्‍पेस में हम साथ साथ नशा करके एक साथ जोर का ठहाका लगा रहे होते हैं और ठहाकों में मगन हमें इस बात का भी ध्‍यान नहीं रहता कि अगल बगल के लोग हमें अजीब नजरों से देख पागल सा कुछ समझ रहे होते हैं। उस स्‍पेस में कभी कभी रात यूं चुटकी में गुजर जाती है कि दि‍न का होना ही अखरने लगता है। वहां हम पहाड़ों के तीखे मोड़ों पर एक दूसरे के पीछे बाइक लेकर भाग रहे होते हैं या मैदानों में कार के डैशबोर्ड पर पैर टि‍काए कुछ गुनगुना रहे होते हैं। ये इस दीन दुनि‍या से थोड़ा दूर होता है, पर इतना दूर भी नहीं कि दो बोतल बि‍यर के साथ एक पनीर टि‍क्‍का 20 मि‍नट में न मि‍ल सके। हम थोड़े से स्‍वार्थी होते हैं, थोड़े से लालची होते हैं और थोड़े से नकलची भी। थोड़ी देर के लि‍ए अकल का इस्‍तेमाल मुल्‍तवी करके हर कि‍सी के बारे में एकदम पुरुषों की तरह बात करते हैं, हर कि‍सी को एकदम पुरुषों की तरह बरतते हैं। असल में इस स्‍पेस के खत्‍म होने तक हम सब बेतरतीब नशे में सरोबार होते हैं। शायद इसलि‍ए कि एक बार फि‍र से हमें अपने स्‍पेस के खत्‍म होने के दुख के साथ उस सुख भरे समय के वापस लौटने का इंतजार करना होता है। जो फि‍र पता नहीं कब मि‍लता है, पर मि‍लता है कभी कभी।

और जब फि‍र से ये स्‍पेस मि‍लता है तो हम जल्‍दी जल्‍दी पहले तो नए ट्रैक सुनाने लगते हैं, अपनी नई पुरानी गर्लफ्रेंड्स के कि‍स्‍से तो जैसे कि हमारी जबान पर होते हैं। ठीक है, कई लोग शादीशुदा होते हैं पर दुनि‍या ऐसे नहीं न चलती आई है ना। एक जीवन में हर पुरुष के हर कि‍सी से संबंध होते हैं और हर संबंध अपनी अलग तरह की व्‍याख्‍याएं लि‍ए रहते हैं। हम एक दूसरे के साथ शेयर करके एक तरह से खुद को पापमुक्‍त करने की दि‍लासा सा दे रहे होते हैं। पता नहीं कितनी पापमुक्‍ति कराते हैं हम इस स्‍पेस में, कभी गि‍नती न हो पाएगी। पहले पैग में तीन तो दूसरे में पांच और पांचवे में हर सि‍प पर चि‍यर्स करते हैं, ठहाका लगाते हैं, थोड़ी सी अश्‍लील बातें भी करते हैं। और थोड़ी देर बाद अश्‍लील बातें ही करते हैं। फि‍र हम तरह तरह के लोगों की बुराइयां करते हैं और उन्‍हें जमकर गालि‍यां देते हैं, ये भूलकर कि हम उजाले में नारीवाद की बातें करते हैं या उसका वि‍रोध करने वालों का वि‍रोध करते हैं। हमारा ये स्‍पेस या फि‍र स्‍पेस का नशा हमें बहुत ही सुवि‍धाजनक और स्‍वार्थी मोड में ले आता है, जो कि ईमानदारी से, हर कोई होना चाहता है। इस स्‍पेस में हम पकोड़े से लेकर आधी जली सि‍गरेट तक की कसम खाकर और नि‍भाकर भी दि‍खाते हैं। हर जगह आराम से खुजा सकते हैं और जहां हाथ न पहुंच रहा हो, वहां खुजाने को भी कह सकते हैं।

इस स्‍पेस में हम दुनि‍या की सभी वर्जित चीजें करने के लि‍ए पूरी तरह से स्‍वतंत्र होते हैं। हमें पता है कि लोगबाग हमारे इस स्‍पेस  से जलते भुनते और कुढ़ते हैं, पर हमारी ये जगह हमें उनपर भी हंसने ठहाका लगाने पर मजबूर कर देती है, जो ऐसा करते हैं। कुछ लोगों के जीवन में ये स्‍पेस मंगलवार को भी आता है तो कुछ लोग इसे हर गुरुवार में तलाशते हैं। हमें पता होता है कि हम इस स्‍पेस की एक बड़ी कीमत चुकाएंगे, इस पाप को हम ही भुगतेंगे, फि‍र भी चूंकि बेसि‍कली हम सब पापी ही हैं, तो हम पाप करते हैं। हमें पता होता है कि जीवन में ये स्‍पेस न हर मंगलवार आना होता है और न हर गुरुवार। फि‍र भी हम दि‍न का इंतजार करते हैं। हम हर दि‍न अपने उसी स्‍पेस के इंतजार में सि‍गरेट के धुंए के छल्‍ले उड़ा रहे होते हैं, या मेरी तरह पान खा रहे होते हैं। पापी स्‍पेस का इंतजार, पाप करने के लि‍ए। 

Monday, November 3, 2014

रोज थोड़ा सा और लंगड़े हो जाते हैं

कभी कभी सोचता हूं कि आदमी अपनी पूरी जिंदगी में कि‍तनी बार मरता होगा। पानी नहीं है तो प्‍यास से मर जाता होगा, हवा नहीं है तो सांस से मर जाता होगा। जमीन तो जमीन, लोगबाग आसमान में भी जाकर मर जाते होंगे। फि‍र भी, एक अदद जिंदगी अपनी ही कि‍तनी मौतों की जि‍म्‍मेवार होती होगी, इसका हि‍साब लगाना जरा टेढ़ा काम है। सुख की तकलीफदेह पड़ताल में लगे हम लोग रोज ही तो मरते हैं। सुख मि‍ले ना मि‍ले, तकलीफ जरूर मि‍लती है। वास्‍तवि‍क मौत की पीड़ा से दूर हम उसे ही रोज का मरन समझकर खुद को घसीटते रहते हैं, रोज अपनी टांग का एक हि‍स्‍सा काटकर कम कर देते हैं और रोज थोड़ा सा और लंगड़े हो जाते हैं। और फि‍र जब कोई कहता है कि सलीम लंगड़े पर मत रो, तो बेसाख्‍ता हंसी नि‍कल ही जाती है। हम मरते हुए भी हंसते हैं और हंसते हुए भी मर रहे होते हैं। मरते मरते हमें मोबाइल फोन याद आने लगता है, उसके कीपैड पर उंगलि‍यां तो फि‍राते हैं, पर असल में समझ नहीं पाते कि अपनी मौत के वक्‍त हम अपने सबसे पास कि‍से देखना चाहते हैं। दरअसल हम तय न करने की स्‍टेज में हमेशा होते हैं। तय न करने देना खुद को थोड़ा सा और ढीला छोड़ना है, मरने से पहले एक जरा सा आराम करना है, एक लंबी सांस होता है ये तय न करना। सांस नि‍कली और दम छोड़ा। हर सांस के बाद की मृत्‍यु और हर सांस से पहले का जीवन हमें एक ऐसे कुंए में बैठाए रखता है, जहां बस हम ही हम होते हैं। और फि‍र हम कि‍तना भी तय कर लें, कि‍तना भी प्रेम कर लें, कि‍तनी भी घृणा कर लें, कि‍तने भी दुखी हो लें, कि‍तना भी रो लें, कुंए में अकेले पड़े हम खुद को अंतत: जिंदा ही पाते हैं। शायद कि‍सी के पास जवाब हो कि क्‍या सांस चलने का नाम ही जीवन है। शायद कोई ये बता दे कि मुक्‍ति कहां है और इसी एक शायद का जवाब पाने के लि‍ए कहां कहां नहीं भटकते। ज्‍यादा परेशान होते हैं तो कि‍सी मन वाले से बात करके दि‍लासा देते हैं कि हम बोल रहे हैं, हमसे आवाज नि‍कल रही है, हम जिंदा हैं। और ज्‍यादा परेशान हुए तो मनपसंद जगह पर जाकर फि‍र एक बार दि‍लासा देते हैं कि वो पेड़ सुंदर है, पहाड़ सजीव है और फूल महकता है, इसलि‍ए हम जिंदा हैं। पर क्‍या वाकई हमारी दि‍लासा हमको लगती है। क्‍या वाकई दि‍लासा नाम की कोई चीज होती है। क्‍या वाकई जीवन नाम की कोई चीज हम जीते हैं...

महानगरों की दीवारों के बीच कैद हुए हम अपनी टूटी चप्‍पल और जूते के छेद को नि‍हारते हुए बस गुमसुम जिंदगी काटने को जि‍स तरह से अभि‍शप्‍त हैं, वो शाप रोज होने वाली मौतों से भी नहीं टूटता। दीवारें हैं कि चारों तरफ से खि‍सकती हुई खुद को खुद में चुनने के लि‍ए आगे भी नहीं बढ़तीं, उनके आगे बढ़ने के लि‍ए नशे की दरकार होती है। और फि‍र नशे के बाद वही दीवारें काटने को दौड़ती हैं, लहूलुहान कर देती हैं जहां इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो लाल हैं या सफेद या क्रीम कलर की। फर्श धुली हो या गंदी हो, कांच की जो कि‍रचें रोज ब रोज चुभती हैं, उनसे नि‍जात पाने के लि‍ए उन्‍हें चुनचुन कर हटाने की जद्दोजहद कि‍तना घायल कर जाती है, इसे समझने में पूरी एक जिंदगी नि‍कल जाती है और हमें उन्‍हें न समझने के लि‍ए, न सोच पाने के लि‍ए कि‍तने केमि‍कल अपने अंदर डालने होते हैं कि पूरी जिंदगी ही केमि‍कल का लोचा बन जाती है। सुंदरता के सुख को पाने के लि‍ए हम रोज कि‍तने धोखे देने के लि‍ए तैयार रहते हैं, कि‍तने धोखों के जाले अपने दि‍माग में बनाते हैं, इसका कोई पार ही नहीं है। कोई हंसता है, कोई ठठाकर हंसता है, कोई पार्क जाकर हंसता है, कोई यमुना कि‍नारे जाकर हंसता है, बस यही नहीं समझ में आता कि हम हंस रहे हैं या चि‍ल्‍ला रहे हैं। वैसे हंसी आती है तब, जब पता चलता है कि हम अपनी रोज की मौतों से उतना परेशान नहीं होते हैं, जि‍तना दूसरे की लंगड़ी चाल देखकर खुश होते हैं। अजीब हैं हम लोग.. एकदम अजीब। 

Tuesday, July 22, 2014

अंडरलाइन उदासी

फोटो- गार्जियन के लि‍ए एटकिंस भाई साब
आखि‍रीबार वो कब उदास हुआ होगा। अचानक ही ये सवाल उसके जेहन में कौंधा और चूंकि सवाल बावस्‍ता था तो जवाब खोजने की कोशि‍शें शुरू होनी भी लाजमी थीं। पर उदासी से जुड़ा ये सवाल उदास करने की बजाय परेशान ज्‍यादा कर रहा था क्‍योंकि डॉक्‍टर की दी गई गोलि‍यों को लगातार दि‍न में दो बार दो साल तक खाने के बाद उसे कई सारी चीजें भूल गई थीं। दि‍माग की हार्ड डि‍स्‍क से एक तरह से इरेज सी हो गई थीं। फि‍र भी सवाल मुंह बाए सामने खड़ा था और खुद से ही जवाब की दरकार कि‍ए जा रहा था।

कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। इस सवाल का जवाब खोजने में उसने कामवाली को चार बार डांटा और पांचवी बार दोबारा आने से मना कर दि‍या। उदासी का ये सवाल उसे चि‍ड़चि‍ड़ा कर रहा था पर बता के ही नहीं दे रहा था कि कब हुआ होगा वो आखि‍री बार उदास। क्‍यों नहीं उसने अपनी आखि‍री उदासी को अंडरलाइन करके कि‍सी वर्डफाइल में सेव कर रखा था। बोल्‍ड इटैलि‍क भी कर देता तो भी शायद काम चल जाता। पर दवाइयों का जो असर था, उनकी वजह से उसे वर्ड की वो फाइलें ही याद नहीं रह गई थीं जि‍नमें उसने अपनी उदासि‍यों को, अपनी खुशि‍यों को या अपनी कि‍सी भी चीज को अंडरलाइन कि‍या था। मतलब जवाब सामने तो था, पर जवाब सामने रखी कि‍न चीजों में था, ये याद नहीं। गनीमत रही कि सवाल उसे याद रहा।

आखि‍री बार की उदासी को पता लगाने के लि‍ए वो बाकायदा बाजार गया और लाला बैजनाथ की मूढ़ी संग प्‍याज की पकौड़ी जबरदस्‍ती उस लाल वाली चटनी के साथ खाई जो जबान पर आते ही जैसे कारबाइड की गैस बनाती थीं। सोचा कारबाइड से उसे कुछ याद आए। कारबाइड के साथ उसकी खुशी का पुराना रि‍श्‍ता रहा था। चाहे वो दि‍वाली हो या आम या केले का मौसम... कारबाइड उसके लि‍ए हमेशा खुशी लेकर आया था और तब तक उसने भोपाल की त्रासदि‍यां नहीं सुनी थीं, देखने की तो बात दूर की रही। बहरहाल, खुश होने की गैस मि‍लने के बावजूद मुसीबत बढ़ती जा रही थी क्‍योंकि उदासि‍यों की याद के जवाब के लि‍ए कमबख्‍त को ए बी या सी या डी का ऑप्‍शन भी नहीं दे रहा था जि‍ससे कि कम से कम तुक्‍का तो भि‍ड़ाया जा सकता था और वो उस तुक्‍के से संतुष्‍ट भी हो जाता क्‍योंकि कोई भी, सि‍वाय उसके, उस तुक्‍के को गलत नहीं ठहरा सकता था। जाहि‍र है कि ऑप्‍शन नहीं थे इसलि‍ए अब तक उसके पास कोई जवाब नहीं था।

ऐसा नहीं है कि सबकुछ एकसाथ गायब हुआ हो। हो ये रहा था कि एक लाइन याद आती थी फि‍र उसके दो दि‍न या चार महीने के बाद की लाइनें याद आती थीं। दि‍माग में गोले फूट रहे थे तो जीभ पर कभी गोले तो कभी कांटे उगने से परेशान वो बैठे बैठे उठ जाता था तो खड़े खड़े बैठना भी पड़ रहा था। सोचा कि कि‍सी को फोन करे, पर नहीं। सोचा कि शायद फेसबुक के टाइमलाइन पर हो, पर नहीं। सोचा कि शायद ब्‍लॉग में हो पर वहां भी नहीं। ऑरकुट तो पहले ही खत्‍म हो चुका था। उदासी की तलाश थी कि खाए जा रही थी, सि‍र धुने जा रही थी।

अचानक बत्‍ती जली। आखि‍रकार वो ये क्‍यों याद करना चाहता था कि वो आखि‍री बार कब उदास हुआ था। सवाल फि‍र से शुरू हो गए। जीभ पर गोले और कांटे फि‍र से बनने लगे। इस पर तो उंगलि‍यों में झनझनाहट भी हो रही थी। उसने तुरंत अपने साइकैट्रि‍स्‍ट को फोन लगाया। बताया कि एक बार फि‍र से उदास होना चाहता हूं। साइकैट्रि‍स्‍ट हंसा, तुरंत उसने दो दवाइयां नोट कराईं और बोला, ज्‍यादा उदास होने की जरूरत नहीं। अब वो नए तरीके से उदास होने लगा। उसने अभी तक वो दवाइयां नहीं खरीदी थीं। उसके पास उदासी की सबसे बड़ी वजह थी कि वो एक बार फि‍र से उदास होना चाहता था। साथ ही उसके पास अपने लि‍ए एक अच्‍छी खबर भी थी कि उसे उदासि‍यां याद नहीं आ रही थीं। 

Tuesday, May 20, 2014

एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश

सुबह-सुबह कबूतर की गुटरगूं और तेज चलती हवा के साथ आई चमकीली चटीली धूप से जबरदस्‍ती आंख मूंदे रह पाना मुमकि‍न न लगा तो मैं बि‍स्‍तर पर उठकर बैठ गया। आंखें मलीं लेकि‍न उनमें आधी रात के बाद आई नींद का अधूरापन तारी था तो मैनें उठकर अपने बड़े वाले बक्‍से पर रखी रूमाल ले ली। आलमारी घर में एक भी नहीं है इसलि‍ए दान में मि‍ले बक्‍से को ही आलमारी बनाना पड़ रहा है। पता नहीं कैसा तो मेरा मकान मालि‍क है कि कमरे में पूरी चार दीवारें एक छत एक खि‍ड़की और यहां तक कि एक दरवाजा भी लगा दि‍या, लेकि‍न एक अदद आलमारी, जि‍सके बगैर कमरे में रहने वाला अधूरा रहता है, बनवाने की उसे बि‍लकुल भी नहीं सूझी। बक्‍से से रूमाल लेकर मैं फि‍र से बि‍स्‍तर पर आकर बैठ गया और मैनें उस रूमाल से अपनी आंखों से बार बार नि‍कलने वाले आंसू पोंछे। नहीं, मैं रो नहीं रहा था, नींद बजोरी मुझे रुला रही थी। मैनें एक बार रूमाल से अपने आंसू पोंछे तो कुछ देर बाद फि‍र से नि‍कलने लगे तो फि‍र से पोंछे। तीसरी बार आंसू थोड़ी देर में नि‍कले इसलि‍ए थोड़ी देर बाद पोंछे। इस झाड़ू पोंछे के चक्‍कर से नि‍कलने के बाद मैनें दूर रसोई की खि‍ड़की पर रखे च्‍वनप्राश के डि‍ब्‍बे को देखना शुरू कि‍या। थोड़ी देर बाद उसे फि‍र से देखा और उसके थोड़ी देर बाद फि‍र से देखा। इसके बाद मैं अपने बि‍स्‍तर से उठा और खड़ा हो गया और रूमाल वहीं पर छोड़ दी। इस बार मैनें कुछ तय कर लि‍या था। मैं आहि‍स्‍ते आहि‍स्‍ते चला और कमरे से बाहर नि‍कल गया। कमरे से बाहर नि‍कलने के बाद मैनें खुद को अपने आंगन में पाया। आंगन में भी मुझे चलना ही था क्‍योंकि कमरे से तो मैं कुछ तय करके चला था ना। इसके बाद मैं अपनी रसोई के दरवाजे से होता हुआ उसके अंदर पहुंचा और खि‍ड़की के सामने आकर एक बार फि‍र से च्‍यवनप्राश का डि‍ब्‍बा देखा। मैनें एक चम्‍मच लि‍या और डि‍ब्‍बे का ढक्‍कन खोला। मैनें चम्‍मच उसमें डाला और भर चम्‍मच च्‍यवनप्राश नि‍काला। इसके बाद मैनें एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश खाया।

कुल मि‍लाकर मैनें आज सुबह उठकर एक चम्‍मच च्‍यवनप्राश खाया। बस बात इतनी सी ही है।

(हो गई ना दि‍माग की दही... कसम से मेरी भी होती है।)

गनीमत थी कि खटि‍या में पाया था

अबसे मैं बनि‍यान पहनूंगा तो उसके पहनने का तरीका लि‍खूंगा। ये भी लि‍खूंगा कि‍ बनि‍यान पहनने के बाद मैनें बुधवार को लाल रंग की चड्ढी पहनी थी जि‍समें नाड़े की जगह इलास्‍टि‍क लगी थी। ये भी कि‍ इलास्‍टि‍क थोड़ी टाइट थी इसलि‍ए कमर पर रेघारी पड़ गई थी। ये भी कि‍ सुबह कामवाली दाल भात पका के तो गई लेकि‍न दाल में इतना पानी भर गई कि दो बार पानी पसाना पड़ा। हालांकि‍ कोई सुंदर प्‍लेट कटोरी नहीं है मेरे पास, हॉस्‍टल की चुराई तीन थालि‍यां हैं जि‍नमें चार खाने हैं और खाना सज भी नहीं सकता, फि‍र भी मैं अपने बेढंगे ढंग के खाने को जि‍स पचास रुपये के दो सौ ग्राम वाले अचार के साथ खाउंगा तो उसकी फोटो पोस्‍ट करके दो की जगह तीन बार पानी पसाने की बात भले ही झुट्ठे लि‍खूंगा, पर लि‍खूंगा जरूर। चैनल पर रबीस बाबू अगर छींके भी तो उन्‍हें भी बकअप रबीस, का गजब कर गुजरे... भरे स्‍टूडि‍यों में छींक मारे... तुम सच में अलग हो रबीस, ये भी लि‍खूंगा। मैं लि‍खूंगा कि जब मैं घर लौटकर आया तो अरगनी पर टांगी दो तौलि‍या एक चड्डी में से चड्ढी उड़कर खटि‍या के पाए से उलझी पड़ी थी। वो तो गनीमत रही कि‍ खटि‍या में पाया था नहीं तो उड़कर का जनी कहां चली जाती। इकलौती नहीं है फि‍र भी जि‍तनी पुरानी चड्ढि‍यां हैं, सबको करीने से लगाकर फोटो लूंगा और मेरी बात का यकीन मानि‍ए, मैं बड़ा ही मार्मिक लि‍खूंगा कि यही तो वो सामान था... खैर। मैं लि‍खूंगा और अब से हर चीज लि‍खूंगा। आपके दि‍माग का दही होता रहे तो क्‍या, वैसे भी गर्मी का सीजन है, दही की लस्‍सी सबको चाहि‍ए होती है भई....

Monday, September 9, 2013

भक्‍त पत्रकार और नरेंद्र मोदी की काल्‍पनि‍क मुलाकात

पाठकों की सुवि‍धा के लि‍ए पत्रकार का नाम हम महर्षि रख लेते हैं। महर्षि ने दो दि‍न पहले ही फेसबुक पर घोषणा कर दी थी कि मोदी आ रहे हैं, बहुत दि‍नों बाद उनसे मि‍लना हो रहा है। (हालांकि मोदी की ओर से उन्‍हें टाइम नहीं दि‍या गया था, इसलि‍ए डर भी लग रहा था कि मोदी उनका हाल आसाराम वाला न कर दें)

भाषण के बाद जब मोदी मंच से नीचे उतरे तो महर्षि साहब सीढ़ी की रेलिंग कि‍सी तरह से थामे उड़ रहे थे। (उड़ इसलि‍ए रहे थे क्‍योंकि मोदी के बाकी समर्थकों को भी मोदी का आर्शीवाद लेना था और वो उन्‍हें धकि‍याए जा रहे थे) बहरहाल, जैसे ही मोदी मंच से नीचे उतरे, महर्षि साहब धड़ाम से उनके पैरों में जा गि‍रे। हल्‍ला मच
गया। मोदी का पीआरओ महर्षि जी को पहचानता था, सो तुरंत बाकि‍यों को उनके ऊपर से धक्‍का मार मारकर हटाया और उन्‍हें उठाकर उनकी झाड़ पोंछ की। उन्‍हें बताया कि अरे, आप तो पतकार हैं, आपके मि‍लने का खास इंतजाम कि‍या गया है। वहां ढोकला भी खाने को मि‍लेगा टोमेटो सास और प्‍लास्‍टिक वाली चम्‍मच के साथ। पतकार जी के मुंह में पानी आ गए और चश्‍मा ठीक करते, बटन बंद करते हुए वो फटाफट मीटिंग रूम की तरफ भागे, लेकि‍न भाग नहीं पा रहे थे क्‍योंकि कि‍सी समर्थक ने लंगड़ी मारकर उनकी चप्‍पल तोड़ दी। राम राम करते मीटिंग रूम में पहुंचे और आधा कि‍लो ढोकला मोदी के आने से पहले से सूत दि‍ए। हालांकि बाद में उन्‍हें याद आया कि अरे, उनका तो गणेश चतुर्थी का व्रत है। जीवन में ऐसी भूल उनसे पहली बार हुई। उन्‍होंने सोचा, खैर, आज साक्षात दर्शन हो रहे हैं तो व्रत भंग होना कोई बड़ी बात नहीं। आधा घंटा इंतजार कराने के बाद आखि‍रकार मोदी कमरे में आए। आगे पढ़ें महर्षि मोदी संवाद:-

मोदी के पैरों में गि‍रते हुए महर्षि: नमस्‍कार सर।
मोदी: अरे, उठि‍ए उठि‍ए, आप की जगह तो दि‍ल में है। और नमस्‍कार वैसे भी खड़े होकर कि‍या जाता है।
महर्षि: ही ही ही ही, अरे सर, क्‍या कहें, हम गंगा कि‍नारे वाले हैं ना, तनि‍क नरभसा गए थे। वैसे सर, आपका भासण बहोत अच्‍छा रहा। आपका जो भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों कहने का इस्‍टाइल है, इसपर हम इस्‍पेसल कवरेज करने जा रहे हैं। ऐसे जोसीले तरीके से भासण की सुरुआत कोई नहीं करता। हमने तो ईएनटी इस्‍पेसलि‍स्‍ट को आपके दो दर्जन भासण सुनाकर पता लगाया है कि आपकी 40 फीसदी ऊर्जा मेरे भाइयो बहनों और मेरे मि‍त्रों में नि‍कलती है। इसीलि‍ए, वहां से जोस आ जाता है।

मोदी: ह ह ह ह। नाम क्‍या बताया आपने अपना।
महर्षि: सर महर्षि सर।
मोदी: महर्षि या सर महर्षि सर। या फि‍र ये दोनों।
महर्षि: आपके लि‍ए सिर्फ महर्षि। सर वैसे इंटरव्‍यू मैनें लेना है आपका।
मोदी: अरे वो तो हो जाएगा महर्षि जी। और बताइये, घर में सब कुशल मंगल। कहां कहां काम कि‍या है आपने।
महर्षि: बस सर, सब आपकी कृपा है। हमने तो घाट घाट, घर घर का पानी पि‍या है। पढ़ाई यूपी में की तो काम कि‍या एमपी और महाराष्‍ट्र में। ननि‍हाल ठहरा राजस्‍थान में तो सभी जगह की पॉलि‍टि‍क्‍स में हाथ तंग है। सॉरी सॉरी, पॉलि‍टि‍क्‍स में अपना हाथ है।
मोदी: हमारे साथ काम करेंगे महर्षि जी। (क्‍वेश्‍चन मार्क इसलि‍ए नहीं है क्‍योंकि ये आदेश टाइप में दि‍या गया था।)
महर्षि: ही ही ही ही...सरजी। (हीहीहीही करने पर महर्षि जी का थोड़ा थूक भी मोदी के चप्‍पल पर गि‍र गया जि‍से महर्षि ने लपककर अपना कुर्ता फाड़कर साफ कि‍या।)
महर्षि: सर, दि‍न में तो नौकरी करनी होती है। हम रात में आपका सारा प्‍लान बनाकर दे देंगे। और आपको अपने यहां पूरा स्‍पेस भी देंगे सर। ऑल एडीशन। मैं सर लोगों से बात कर लूंगा। पता नहीं क्‍यूं कांग्रेस के पीछे लगे रहते हैं ये लोग।
मोदी: ठीक है, अपना बायोडाटा भेज देना। देखेंगे। नेक्‍स्‍ट.
महर्षि: अरे सर, इंटरव्‍यू...
मोदी: नेक्‍स्‍ट प्‍लीज..
महर्षि: सर, एक ऑटोग्राफ तो दे दीजि‍ए।
मोदी: अरे भगाओ यार इसको। सारा ढोकला खा गया और चप्‍पल खराब कर दी।
कमरे से नि‍कलते हुए महर्षि: ही ही ही ही, सर भी बड़े मजाकि‍या हैं। (संपादक को फोन करते हुए- सर बहोत अच्‍छा इंटरभ्‍यू रहा। मुझे तो उन्‍होंने अपनी पूरी प्‍लानिंग बता दी।)


(डि‍स्‍क्‍लेमर: पूरी वारदात, आई मीन मुलाकात का कि‍सी जीवि‍त या मृत पतकार से कोई लेना देना नहीं है। वैसे जो ले या दे रहे हों, वो दि‍ल पर ले या दे सकते हैं।)

Tuesday, October 23, 2012

सोचने से बंद करने के सलीकों पर...


1
सोचता हूं..
न सोचूं तुम्‍हें,
न सोचूं किसी और को,
न सोचूं खुद को,
न सोचूं न हो कोई सोच, पर...
सोचता हूं
2
सोचता हूं
न सोचूं उस भीड़ को,
न सोचूं उस लोहे को,
न सोचूं उस पीतल को,
न सोचूं, पर ये सोच..
सोचने पर मजबूर करती है..
3
सोचता हूं
न सोचूं उन रास्‍तों को
जो वापस आने में करते हैं मदद
न सोचूं उन तरीकों को..
जो करते हैं नॉर्थ और साउथ पोल का काम
और ये सारे पोल मिलकर..
सोच को जोड़ते रहते हैं, मुसलसल.. 
मुझे नहीं पता कि अमित को ये फोटो कहां से मिली, पर उनके साधू कलेक्‍शन देखने लायक हैं। 
4
सोचता हूं
गाल दबाकर उन न सोचने के तरीकों पर
कि न सोचूं सोचने से बंद करने के सलीकों पर
पर क्‍या करें..इस सोच का
न जाने क्‍या क्‍या
सोचता हूं..
5
वैसे तो सोच को होना चाहिए 
लंबा, मुसलसल और... 
सोचने पर, 
पर फिर भी इससे इतर 
सोचता हूं, 
कि क्‍यों सोचता हूं।