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Wednesday, September 25, 2024

ये सांप है या प्रकृति का वरदान?


ये प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर के पास पानी में तैरता आया पनडुब्बी सांप है (पानी में बैरियर वाली)। इलाहाबाद निवासी रवींद्र मिश्रा ने इसे एक जीव विज्ञानी ग्रुप पर शेयर किया है। जीव विज्ञानी इसे चेकर्ड कीलबैक के नाम से बुलाते हैं। लेकिन हम लोग इसे पनडुब्बी कहते थे। इस तस्वीर में इसका सफेद हिस्सा बहुत साफ दिख रहा है और इसपर बने चेक भी एकदम साफ दिख रहे हैं। गांव-गिरांव के तालाबों में यह अक्सर काले या स्लेटी रंग का दिखता है और पानी के बाहर इसकी गरदन बस एकाध फुट ही दिखती है।
हम लोग इसे पनडुब्बी सांप इसलिए कहते थे कि जैसे ही यह हमें आता देख, झट से डुबकी मार दे। अक्सर यह तालाब में कछुए की तरह भी सिर निकाले तैरता दिखता था, लेकिन कछुए की बहुत ही गंदी नकल करता था, तो हम लोग पकड़ पा जाते थे कि पनडुब्बी ही है। वैसे यह तालाब में ही नहीं रहता था। यह पानी से भरे धान के खेतों में भी दिखता था। चूंकि धान के खेत उथले होते हैं तो वहां यह कछुए की तरह ही तैरता था। कभी-कभार हममें से कुछ दोस्त इसकी कछुए वाली चालबाजी में गच्चा भी खा गए, और उन्होंने इसे कछुआ समझकर पकड़ने की कोशिश की। बदले में मिला एक तेज वार। पनडुब्बी काफी कटखन्ना होता है, तुरंत काटता है। बस गनीमत यही होती है कि इसमें जहर नहीं होता और गांव-जुआर के लोग यह बखूबी जानते हैं। माना जाता है कि उनके लार में थोड़ा सा जहर होता है, क्योंकि काटने पर अक्सर खुजली होती है और थोड़ी सूजन होती है।

वैसे तो दुनिया में तरह-तरह के सांप पाए जाते हैं, पानी में रहने वाले भी। समुद्री पानी में जितने भी तरह के सांप पाए जाते हैं, लगभग सभी जहरीले होते हैं। कई तो इतने कि घंटे भर में अगर इलाज ना मिला तो जान निकलने में देर नहीं लगती। लेकिन पनडुब्बी धरती नाम के गोले में बस इसी ओर मिलता है। इसी ओर भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में। थोड़ा बहुत यह जावा, सुमात्रा, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, दक्षिणी चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में भी पाया जाता है, लेकिन थोड़ा बहुत ही।
पनडुब्बी घासफूस नहीं खाता, और वैसे भी कोई सांप घासफूस नहीं खाता। सापों की देह की बुनावट ही कुछ ऐसी है कि उन्हें हाई प्रोटीन आहार चाहिए होता है। तो अपने कीलबैक महाराज मछलियों और मेंढक का सेवन करते हैं, चर्बी सहित। साहब बेहतरीन तैराक हैं और हमला करने में मगरमच्छ की कॉपी करते हैं, मतलब धीमे धीमे चुपचाप आना और अचानक झपट्टा मारना। लेकिन जब इस पर हमला होता है तो यह अपने शरीर को चपटा कर लेता है और फुफकारने जैसी आवाज़ें निकालता है ताकि दुश्मन को डराया जा सके। इसके चपटे शरीर के कारण यह बड़ा और खतरनाक दिखाई देता है, जिससे दुश्मन डर कर पीछे हट जाए। लेकिन अगर कोई इसे अच्छे से जानता हो तो वह शायद ना डरे।
और अगर कोई इससे ना डरे तो ये बेचारा खुद डर जाता है। फिर यह तेजी से भागने की कोशिश करेता है और आमतौर पर पानी में कूद जाता है, जहां यह आसानी से तैर सकता है और शिकारियों से बच सकता है। यह एक नंबर का नाटकबाज होता है और अपने आप को बड़ा दिखाने, फुफकारने और छिपने का प्रयास करता है ताकि खतरे से बच सके। इसमें कोई बेजा बात नहीं है। इंसान भी तो यही करता है, चाहे वो किसी का भी नुकसान ना कर पाए।
चेकर्ड कीलबैक के इवोल्यूशन पर केंद्रित कोई विस्तृत शोध नहीं है। यानी यह सांप कैसे बना, इसकी देह पर चेक्स कैसे बने, इसने पानी में रहना कैसे शुरू किया, इसने चपटा होना कैसे डिवेलप किया- इस तरह की बातों के सीधे-सीधे कोई जवाब हमारे सामने नहीं हैं। अगर किसी को इन सवालों के जवाब चाहिए, तो शायद पूरी एक उम्र लगानी होगी और वो हम भारतीयों के पास है नहीं। हम तो अभी तक कुत्तों को नहीं समझ पाए हैं, सांप तो बहुत दूर की चीज है। भले ये सांप-सपेरों का देश कहा जाता हो दुनिया भर में, लेकिन सांपों को लेकर हमारे यहां किसी भी लेवल की जागरूकता नहीं है।

ये सब तो बतकुच्चन है, असल बात ये है कि एक दूसरा रास्ता है जो कीलबैक चिचा के इवोल्यूशन से जुड़े कुछ मिलते जुलते जवाब दे सकता है। कीलबैक न सिर्फ तालाब के पानी या धान के खेतों में घुलमिल जाता है, बल्कि आप इसे ध्यान से देखेंगे और इससे मुलाकात और मुकालात करने वाले अच्छे से जानते हैं कि ये झाड़-झंखाड़ और घास में भी छुपे हुए होते हैं। ऐसे में हमें चलना होगा सांपों के छलावरण और प्राकृतिक चयन पर हुए शोधों की तरफ, जो इस सांप के इवोल्यूशन की समझ को बेहतर बनाते हैं।
इन अध्ययनों में से एक थोड़ा ध्यान खींचता है और सवाल के सबसे पास पहुंचता है। इसके मुताबिब सांपों का रंग और पैटर्न का कनेक्शन उनकी प्रजनन सफलता के साथ भी है। जिन सांपों के पास बेहतर छलावरण होता है, वे न केवल शिकारियों से बचने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे बेहतर तरीके से शिकार भी कर पाते हैं। यह उन्हें अधिक समय तक जीवित रहने और प्रजनन करने का अवसर देता है, जिससे उनके अनुकूल जीन पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार, चेकर्ड कीलबैक जैसे सांपों का चेक पैटर्न केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता को भी बढ़ाता है​।
चेकर्ड कीलबैक में कई गोल दांत होते हैं, जो फिसलन वाली मछलियों को पकड़ने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, लेकिन आसानी से खून बहने का कारण बन सकते हैं। यह बताता है कि इसका इवोल्यूशन धरती से पानी की ओर भी हो सकता है। वैसे भी सांपों की इवोल्यूशन थ्योरी यह भी इशारा करती ही है कि सांपों के पूर्वज टेट्रापोड्स (चार पैरों वाले सरीसृप) थे, जो जमीन पर चलते थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि सांपों के पूर्वज स्क्वामेट्स (Squamates) नामक सरीसृप वर्ग से थे, जिनमें छिपकलियां और सांप दोनों शामिल हैं। सांपों का विकास समुद्री और जमीन दोनों प्रकार के जीवन से जुड़ा रहा है, और वे धीरे-धीरे अपने चार अंगों को खोते गए और एक लंबा, बिना अंग वाला शरीर विकसित किया।
सांपों के विकास को समझने के लिए कई फॉसिल्स (जीवाश्म) का अध्ययन किया गया है। सबसे पुराने सांपों के फॉसिल्स में अंगों के अवशेष पाए गए हैं, जो बताते हैं कि उनके पूर्वज चार पैरों वाले जीव थे। यह भी देखा गया है कि सांपों का विकास छिपकलियों के समान हुआ है, जिनसे वे अपने शरीर के अंग खोकर अलग हुए। समय के साथ कुछ सांपों ने समुद्र और जलाशयों में जीवन के लिए खुद को अनुकूलित किया, जबकि अन्य ने जमीन पर रहना पसंद किया।
जैसे-जैसे उनके पर्यावरण के अनुसार सांपों की आदतें बदलती गईं, उनके शरीर में भी बदलाव आते गए। जमीन पर रहने वाले सांपों ने अपनी त्वचा के रंग और पैटर्न को इस तरह विकसित किया, जिससे वे अपने परिवेश में छिप सकें और शिकारियों से बच सकें। वहीं पानी में रहने वाले सांपों ने लाखों वर्षों के इवोल्यूशन के दौरान तैरने की क्षमता को विकसित किया। इस अनुकूलन ने उन्हें जल निकायों में शिकार करने और शिकारियों से बचने में मदद की।

भारत में चेकर्ड कीलबैक (Xenochrophis piscator) तो है ही, ओलिव कीलबैक (Atretium schistosum) भी है जो नदियों, तालाबों और झीलों के पास पाया जाता है। इसका आहार मुख्य रूप से जलीय जीव होते हैं, और यह तैरने में कुशल होता है। डार्क-बेलीड मार्श स्नेक (Gerarda prevostiana) भी मिलता है जो मुख्य रूप से पश्चिमी घाट और भारत के तटीय क्षेत्रों में रहता है। यह जलीय शिकारियों से बचने और कीचड़ भरे इलाकों में तैरने में सक्षम होता है। एशियाई वाटर स्नेक (Homalopsis buccata) भी है जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में ताजे पानी के स्रोतों के पास पाया जाता है। यह धीमी गति से बहने वाली नदियों और तालाबों में मछलियों और अन्य छोटे जलीय जीवों का शिकार करता है। फॉरस्टेन्स कैट स्नेक (Boiga forsteni) भी है जो तैरने में सक्षम तो होता ही है, पेड़ों पर चढ़ने में माहिर होता है। यह सांप पानी में भोजन की तलाश में उतर सकता है।
मैं जानता हूं, मगर चलते चलते बस एक आखिरी सवाल। पनडुब्बी इस संसार में है क्यों? चेकर्ड कीलबैक हमारे साथ रह क्यों रह रहा है? दरअसल चेकर्ड कीलबैक सांप प्रकृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके व्यवहार और शिकार संबंधी आदतें इसे पारिस्थितिकी तंत्र का एक आवश्यक हिस्सा बनाती हैं। यह मुख्य रूप से मछलियों, मेंढकों, और छोटे जल जीवों का शिकार करता है। यह इन प्रजातियों की आबादी को नियंत्रित करता है, जिससे पानी के निकायों में शिकार-शृंखला संतुलित रहती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य प्रजातियों को भी जीवित रहने का मौका मिलता है।
इसके बिना, इन प्रजातियों की आबादी अनियंत्रित रूप से बढ़ सकती है, जिससे जल निकायों की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है​। चेकर्ड कीलबैक छोटे जल जनित कीड़ों और उनके लार्वा को खाता है, जो कृषि क्षेत्रों में एक तरह के कीट होते हैं। यह सांप इन कीटों की संख्या कम करता है, जिससे फसलों को नुकसान कम होता है और कीटनाशकों पर निर्भरता घटती है। इस प्रकार, यह सांप प्राकृतिक कीट नियंत्रण के रूप में कार्य करता है और हमारी धान की पैदावार बढ़ाता है। आगे से अगर आप चावल का एक कौर भरें तो एक बार कीलबैक यानी पनडुब्बी चिचा का भी शुक्रिया अदा करें।

सबसे बड़ी बात यह कि सबसे ज्यादा कुर्बानियां भी पनडुब्बी के ही हिस्से में आई हैं। यह सांप न केवल शिकार करता है, बल्कि खुद भी बड़े पक्षियों और अन्य शिकारियों के लिए भोजन का स्रोत है। चील हो, बगुला हो या फिर मगरमच्छ या घड़ियाल ही क्यों न हो, सबको इसका स्वाद पसंद है। यह चक्र है जो कि पारिस्थितिक तंत्र की विविधता को बनाए रखने में मदद करता है, क्योंकि यह अन्य शिकारियों के लिए भोजन के रूप में काम करता है, जिससे उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक संतुलन बना रहता है​।
अंत में, यह हमारा सफाईकर्मी भी है क्योंकि यह वहां भी रहता है, जहां पानी के निकाय होते हैं। यह पानी में रहने वाले छोटे मृत या बीमार जीवों को खाकर पानी को साफ रखने में मदद करता है। इसके परिणामस्वरूप, जलाशयों की स्वास्थ्यवर्धक स्थिति बनी रहती है और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल पर्यावरण सुनिश्चित होता है​। मेरे ख्याल से इतना प्रकृति की इस महान पनडुब्बी को सलाम करने के लिए काफी होगा।

Friday, December 20, 2019

एनआरसी करने के लिए सीएए लाए हैं: कन्नन गोपीनाथन

अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर आईएएस ऑफिसर कन्नन गोपीनाथन ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद से वे देश भर में घूम-घूमकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अपनी बात कहते रहे। इसी बीच नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) आ गया। केंद्र के कई नेताओं ने इसे एनआरसी के साथ जोड़कर लागू करने की बात कही। अब कन्नन देश भर में घूम-घूमकर सीएए और एनआरसी पर जागरूकता सभाएं कर रहे हैं। मैंने उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

अपने बारे में बताइए।
मैं 12वीं तक केरल में पढ़ा। कोट्टयम का रहने वाला हूं। इसके बाद मैंने रांची के बिरला इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की। इसके बाद मैं नोएडा आ गया और नौकरी करने लगा। नोएडा में रहने के दौरान मैं सेक्टर 16 की झुग्गी में बच्चों को पढ़ाता था। कुछ दिन बाद में नोएडा के ही अट्टा मार्केट में भी बच्चों को पढ़ाने लगा। वहां का हाल देखकर समझ में आया कि सिस्टम के अंदर रहकर काम करना होगा- तब कुछ सही होगा, इसलिए मैंने आईएएस का एग्जाम पास किया। 2012 बैच में आईएएस बना, फिर मिजोरम में डीएम रहा, दादरा-नगर हवेली में भी कलेक्टर के साथ-साथ वहां के कई विभागों में कमिश्नर रहा। वहां डिस्कॉम कॉरपोरेशन था जो लगातार लॉस में जा रहा था, उसे एक-डेढ़ साल में प्रॉफिट में ले आया। जम्मू-कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 हटाया गया तो वहां पर प्रशासन ने लोगों की आवाज दबाई। अब भी दबा ही रही है। समस्या 370 हटाने या लगाने से नहीं, बल्कि आवाज दबाने से उपजी। फिर मुझे लगा कि ये सही बात नहीं है और कम से कम मैं लोगों की आवाज दबाने के लिए तो आईएएस में नहीं आया। इसलिए मैंने रिजाइन कर दिया। हालांकि सरकार ने अभी तक मेरा इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है।

इस्तीफा देने के बाद आप क्या कर रहे हैं?
रिजाइन करने के बाद मैंने ठीक से तय नहीं किया था कि किस ओर जाना था। इसी बीच कुछ जगहों पर टॉक के लिए बुलाया। इसी सिलसिले में एक बार चेन्नई गया। वहां एक टॉक में मैं 'बोलने की आजादी' विषय पर बोल रहा था कि बीच में एक लड़की ने मुझे टोक दिया। नॉर्थ ईस्ट की उस 23 साल की लड़की का कहना था कि बोलने की आजादी उसकी समझ से बाहर है क्योंकि अभी तो उसे यही डर है कि वो इस देश में रह पाएगी या नहीं। उसका दादा आईएमए में था और वो कोई सन 1951 का डॉक्यूमेंट खोज रही थी जो उसे मिल नहीं रहा था। उस शो में खड़ी होकर वह रो रही थी और मैं निरुत्तर था। मैंने खुद से यही पूछा तो पता चला कि पेपर्स तो मेरे पास भी पूरे नहीं। बीस साल से ज्यादा पुराने कागज तो मेरे पास भी नहीं है। फिर मैं मुंबई आया और दोस्तों से इस पर चर्चा की, मामले को ठीक से समझा। तब से मैं लोगों को बता रहा हूं कि कैब और एनआरसी किस तरह से हम सभी लोगों के लिए नुकसानदेह हैं।

अब तक आप कहां कहां जा चुके हैं और आगे का क्या प्रोग्राम है?
आगे का तो मैंने नहीं सोचा, लेकिन बिहार के कई जिलों में जा चुका हूं। सीएए और एनआरसी का खौफ देखना हो तो बिहार का दौरा करिए। वहां इस वक्त आधार कार्ड सेंटरों में वही नोटबंदी वाली भीड़ दिख रही है। रात के दो-दो बजे तक आधार कार्ड सेंटरों में लाइन लगी है। लोग अपना आधार कार्ड दुरुस्त करा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई जिलों में मैं लोगों को इसके नुकसान बता चुका हूं। महाराष्ट्र और साउथ में तो लगातार बोल ही रहा हूं। इसके बारे में अभी बहुत जागरुकता फैलानी होगी।

लोगों की क्या प्रतिक्रिया है?
लोग बहुत डरे हुए हैं। सबसे ज्यादा तो गरीब मुसलमान और दलित-आदिवासी डरे हुए हैं। वजह यह कि भारत में किसी के भी कागजात या तो पूरे नहीं हैं और अगर पूरे हैं भी तो उनमें कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी छूटी हुई है। यही वजह है कि बिहार में आधी-आधी रात तक लाइनें लगी हैं। लोगों को लगता है कि आधार करेक्शन से काम हो जाएगा। इससे पता चलता है कि लोगों में कितना ज्यादा डर का माहौल है। वॉट्सएप के मुस्लिम ग्रुप में इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा ट्रेंड में है- डॉक्यमेंट्स कैसे पूरे करें? उनको पता है कि कागजात नहीं होंगे तो ये सीधे डिटेंशन सेंटर भेजेंगे। सबने देखा कि पिछले दिनों कैसे केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को डिटेंशन सेंटर बनाने का लेटर भेजा है।

सीएए और एनआरसी को अलग-अलग देखें या एक साथ?
सीएए इसलिए आया क्योंकि एनआरसी करना चाहते हैं। वरना सीएए नहीं आता। असम में एनआरसी हुआ तो सबसे ज्यादा हिंदू ही डिटेंशन सेंटर पहुंच गए। कागज तो हिंदुओं के पास भी नहीं हैं। ये चीज राजनीतिक रूप से इनके खिलाफ जाती है। हालांकि सरकार उनको वापस लेने के लिए वहां नोटिफिकेशन जारी कर रही थी, लेकिन अब वह इसके लिए कैब ले आई है। एनआरसी और सीएए- दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, सीएए का अकेले कोई खास मतलब नहीं है।

किसे किसे यह प्रभावित कर रहा है और कैसे?
अगर आपके पास करेक्ट डॉक्यूमेंट्स नहीं है तो यह आपको भी प्रभावित करेगा। मुझे लगता है कि सरकार नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के जरिए इसकी शुरुआत करेगी। सरकारी आदमी घर आएगा और हमारे कागजात चेक करेगा। वहां पर अगर कोई कमी हुई तो असम की ही तरह हमारे नाम के आगे संदिग्ध का निशान लग जाएगा और फिर हमें यह साबित करना होगा कि हम यहां के नागरिक हैं या नहीं हैं। पहले यह सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे, लेकिन अब यह उल्टा हो गया है। अब हम सबको साबित करना होगा कि हम भारत के नागरिक हैं या नहीं। कागजात तो बहुत कम लोगों के पूरे हैं, ऐसे में सीन साफ है। जो सबसे गरीब हैं, वो इसे भुगतेंगे। जो बाहर काम कर रहे हैं, यानी जितने कामगार हैं, उन्हें इससे दिक्कत होगी। हर साल देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ और सूखे से प्रभावित होता है, वहां विस्थापन नियमित चलता है, वो भुगतेंगे। आदिवासियों के पास तो कोई कागज ही नहीं होता।

डॉक्यूमेंट्स बनवाने में भ्रष्टाचार सबसे आम शिकायत है। क्या इससे भ्रष्टाचार भी बढ़ सकता है?
बिलकुल। अब जिसका शासन-सत्ता में कनेक्शन नहीं है, जिनका भ्रष्टाचार से कनेक्शन नहीं है, वो इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली में ऐसे हजारों लोग आपको मिल जाएंगे जो सड़क पर रहते हैं, वो कहां जाएंगे। फिर जनता को तो कैसे भी सर्वाइव करना है, वह कैसे भी करके कोशिश करेगी।

आईएएस लॉबी में इसे लेकर क्या कुछ प्रतिक्रिया है?
मुझे आईएएस लॉबी इसे लेकर क्या कर रही है, ये नहीं पता। हम सब इंडीविजुअल्स हैं। ऐसे तो कई सारे हैं जिन्हें लगता है कि इस मुद्दे को अभी छोड़ देना चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोई लॉबी है। अधिकतर तो यही सोचते हैं कि मनपसंद पोस्ट मिल जाए या मनपसंद जगह ट्रांसफर हो जाए। मुझे तो लगता है कि जिस संविधान पर हाथ रखकर इन्होंने शपथ ली है, आधे भी उसका अर्थ ठीक से नहीं जानते होंगे।

अब तो बिल पास हो गया तो अब क्या करें?
बिल तो शुरुआत है। जब संसद फेल होती है तो जनता शुरू होती है। हमें संविधान ने यह अधिकार दिया है कि हम शांतिपूर्वक सभा कर सकते हैं और प्रदर्शन कर सकते हैं। हम यह अधिकार भूल चुके हैं। इसे हमें इस्तेमाल करना होगा, अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे? सरकार हमारी नागरिकता पर सवाल उठा रही है तो हम सरकार ने अब नहीं पूछेंगे तो कब पूछेंगे? नोटबंदी में हमारा पैसा तीन महीने बाद वापस किया, ऐसे ही हमारी नागरिकता ले ली जा रही है जो कब वापस होगी, नहीं पता। 

Wednesday, May 1, 2019

खड़ाऊं चुराकर भागे थे राम, किस मुंह से लड़ेंगे मोदी से चुनाव?

प्रेम प्रकाश जी पेशे से पत्रकार हैं। गाजीपुर के हैं, लेकिन इन दिनों बनारस में हैं और रंग में हैं। बीजेपी से बनारस की सांसदी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मुकाबले में बीएसएफ के तेज बहादुर यादव थे। तब तक तो कुछ नहीं हुआ, जब तक कि तेज बहादुर अकेले थे, लेकिन जैसे समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपनी ओर से उम्मीदवार बनाया, चुनाव आयोग ने उनके सामने कठिन शर्त रख दी और उनकी उम्मीदवारी कैंसिल कर दी। हालांकि इस बीच सेना सेना मोदी मोदी भजने वाले भक्तों का सेना के प्रति आलाप प्रलाप में बदल चुका था। सो प्रेम जी के दिमाग में अचानक प्रकाश हुआ और उसने हम सबको अंधेरे से उस उजाले में खड़ा कर दिया, जहां प्रभु राम हैं। फर्क यही है कि प्रभु राम आज के वक्त में हैं। प्रेम जी ने बेहद शानदार लिखा है। आगे पढ़िए उनकी लिखाई- 

मान लीजिए, अगर पता चले कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम स्वयं महीयसी सीता माता के साथ अकस्मात काशी पधारे और सीधे कलेक्ट्रेट जाकर महामना मोदी जी के खिलाफ पर्चा भर आये, तो क्या सोचते हैं, फेसबुकिया भक्तों की दीवारें कैसे फटेंगी!!

भक्त1- जय श्री राम की ऐसी तैसी, बताइये हम इनका भव्य मंदिर बनवाने में लगे हैं और इनको चुनाव लड़ने की पड़ी है। अरे देशभक्त होते तो टाट में पड़े रहते, लेकिन इनको तो अब संसद की एसी चाहिए। चुनाव लड़ने वाली कौमें क्रांति नही करती। तब क्यो नही लड़े, जब बाप ने देशनिकाला दे दिया था? कौन बाप निकालता है अपने लड़के को ऐसे भरी जवानी में? नाकारा रहे होंगे तभी तो।

भक्त2-पूरे रविवंश में ऐसा कपूत नही हुआ कोई। प्राण जाय पर वचन न जाई वाली परम्परा का तेल निकाल कर रख दिया। माँ बाप ने इनको अकेले वनवास दिया था तो बीवी को भी साथ ले गए। वनवास था कि वनविहार? याद रखियेगा, भाई को भी भाई नही, नौकर बनाकर ले गए थे।

भक्त3- अरे बीवी छोड़नी ही थी तो मोदी जी की तरह छोड़ते, बेचारे धोबी के कंधे पर रखकर बन्दूक चला दी। नाहक बदनाम किया बेचारे गरीब को। यही है, यही है सामंती मानसिकता, साफ पता चलता है कि दलित और पिछड़ा विरोधी आदमी थे। जिस बीवी को छोड़ने के लिए बेचारे धोबी को बदनाम कर दिया, उसी बीवी के लिए ब्राह्मण रावण को मारा बताइये। ये जाति द्रोही आदमी है, इनका तो पर्चा खारिज कर देना चाहिए।

भक्त4- रोज 30 बाण मारते थे। दस सिर और बीस भुजाएं काटते थे। वो सब फिर से उग आता था। देश का धन बरबाद करते रहे, वो तो मोदी जी ने कान में असली राज बताया कि इसकी नाभि में अमृत है। तब जा के 31वाँ बाण नाभि में मारा। तब जा के अमृत सूखा था, लेकिन बिकाऊ मीडिया ये सब नही बताएगा आपको।

भक्त5- मियां बीवी ने मिलकर बेचारे लक्ष्मण को तो मरवा ही डाला था। सोने के मृग वाला इतिहास वामी इतिहासकारों का लिखा इतिहास है। असली इतिहास पढ़िए तो पता चलेगा, मारीच से मिल के लक्ष्मण को मारने का पूरा प्लान था। लक्ष्मण तो समझ भी गए थे पर त्रिया चरित्र भी तो कोई चीज़ होती है।

बीजेपी आईटी सेल- बेकार का, बाप के पैसे पर राज करने का सपना देखने वाला जानकर जब बाप ने देशनिकाला दिया तो हजरत राजसिंहासन का रत्नजड़ित खड़ाऊं चुरा ले गए।भागते भूत की लँगोटी भली। वो तो भरत की पारखी नज़र ने ताड़ लिया और पूरे लाव लश्कर के साथ वो कीमती और ऐतिहासिक खड़ाऊं ले आने वन आये। आप असली इतिहास पढ़ के देखिए, भरत इनको मनाने नही आये थे। वही रत्नजड़ित खड़ाऊं लेने आये थे और पूरे समय वही मांगते रहे, अंत मे लेकर ही माने।

ये है इतिहास इन तथाकथित सूर्यवंशियों का। चुपचाप वही टाट में पड़े रहते तो भव्य क्या, मोदी जी दिव्य मंदिर बनवा देते। लेकिन ये तो देशद्रोही निकले। अब रहिये वहीं।

Wednesday, January 30, 2019

खजुराहो की इस तस्वीर को कैसे देखें


(चेतावनी- अगर आप प्रेम में नहीं हैं, या फिर जीवन में आप कभी प्रेम में नहीं रहे हैं तो इस तस्वीर को न देखें। इसलिए नहीं कि तस्वीर समझ में नहीं आएगी, इसलिए क्योंकि इसके भावों में उतर पाना उसी के लिए मुमकिन है, जो ऐन उसी भाव में रहा है, जिसकी कि यह एक भंगिमा है।) 

संदर्भ : खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर के एक दर्जन से अधिक कोने है और हरएक कोने में स्त्री-पुरुष के प्रगाढ़तम प्रेम की भंगिमाएं बनी हुई हैं। यह तस्वीर प्रेम का उद्दीपक है, बोले तो प्रेम की शुरुआत। खजुराहो में कामकला की प्रत्यक्ष मूर्तियां कामसूत्र से कॉपी की गई हैं, लेकिन इन दर्जन भर कोनों में जो मूर्तियां हैं, वे कामसूत्र को बहुत ज्यादा फॉलो नहीं करतीं। कोने की अधिकतर मूर्तियों में ठीक उसी तरह का झटपट प्रेम दिखता है, जैसा कि हम सभी कोने में घुसकर करते हैं।

प्रसंग : स्त्री सजी हुई है, पुरुष भी। दोनों ने यथासंभव श्रृंगार कर रखा है और एक दूसरे को आकर्षित करने के लिए गले में रत्नजड़ित माला, हाथ में मोटे बाजूबंद पहन रखे हैं। पुरुष ने कमर में रत्नजड़ित कमरबंद बांध रखा है जो शायद हथियार बांधने के भी काम में आता होगा। पुरुष के बाल बड़े हैं जिन्हें उसने सिर के ठीक ऊपर जूड़ा बनाकर बांधा हुआ है। हो सकता है कि उसी जूड़े पर उसने एक मुकुट भी पहना हो। स्त्री ने भी लगभग उसी अंदाज में जूड़ा बांध रखा है। जिस तरह से दोनों तैयार हो रखे हैं, हो सकता है कि दोनों मैटिनी शो देखने जा रहे हों और ये भी हो सकता है कि मैटिनी शो उन्हें दिखने के लिए खुद उनके पास आ रहा हो। स्त्री के जेवर ही उसके वस्त्र हैं, तो पुरुष ने अपनी पीठ पर कपड़े का लंबा लबादा टांग रखा है, जो कुछ-कुछ रोमन साम्राज्य के राजाओं के लबादे से मिलता है। समय के साथ साथ पुरुष का पुरुषत्व टूट चुका है, लेकिन स्त्री का स्त्रीत्व अभी तक कायम है।

भावार्थ : दोनों बहुत खुश हैं। लगभग हजार साल बाद भी दोनों के चेहरे पर प्रेम की वही गर्मी अभी तक बनी हुई है, जो हजार साल पहले उठी थी। प्रेम की इसी गर्मी से स्त्री का चेहरा भर आया है और गाल थोड़े से और गोल हो गए हैं। यही गर्मी पुरुष के भी चेहरे पर है, लेकिन उसमें काम तत्व अधिक दिख रहा है, इसलिए वह प्रेम में स्त्री जितना नहीं  बह रहा, उसका चेहरा गर्म तो है, लेकिन नियंत्रित है और गंभीर भी। दाहिने हाथ की तर्जनी से वह स्त्री की ठोड़ी थोड़ा ऊपर उठा रहा है कि उसके अंदर वह थोड़ा सा और उतर सके और उसे अपने अंदर थोड़ा सा और उतार सके। देखना महज देखना नहीं होता, वह पीना भी होता है, उतरना भी होता है, उतारना भी होता है और जज्ब करना भी होता है। देखा कैसे जाता है, यह हम इस तस्वीर में देखकर आसानी से सीख सकते हैं। पुरुष स्त्री को खुद में जज्ब कर रहा है, जबकि दैहिक रूप से यह काम स्त्री का माना जाता है। लेकिन यही तो प्रेम होता है जो स्त्री पुरुष की सभी मान्य अवधारणाएं तोड़कर छिन्न भिन्न कर देता है। इस तस्वीर में पुरुष भले ही पुरुष दिख रहा है, लेकिन वह पूरी तरह से स्त्री बन चुका है और जो कुछ भी है, सब अपने अंदर भर लेना चाह रहा है। वहीं स्त्री जानती है कि वह इसी रास्ते से पुरुष के अंदर जा रही है, घर बना रही है, विजय पा रही है। विजय के इस आनंद में स्त्री की आंखें बंद हो चुकी हैं, नाक फूल चुकी है और होंठ एक प्रगाढ़ चुंबन के लिए आधे खुलकर ऊपर की ओर उठ चुके हैं। स्त्री जानती है कि चुंबन शुरुआत नहीं, बल्कि देखने का और पुरुष पर विजय पाने का अंत ही होगा क्योंकि फिर देखना खत्म होकर महसूसना शुरू हो जाएगा। लेकिन स्त्री महसूसने तक जाना चाहती है, इसीलिए वह अपनी कमर का दाहिना हिस्सा पुरुष की बाईं टांग से रगड़ रही है। स्त्री के स्तन गोल हैं, कामोत्तेजक हैं, फिर भी पुरुष उसके चेहरे में ही फंसा हुआ है तो इसका एक अर्थ ये भी हो सकता है कि तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती, नजारे हम क्या देखें? ये तस्वीर हमें बताती है कि अंत पंत में हमारी पर्सनालिटी का सबसे बड़ा हिस्सा हमारे गुप्तांग नहीं होते, बल्कि हमारा चेहरा होता है, प्रेम होता है और स्त्री पुरुष के बीच हमेशा बनी रहने वाली गर्मी होती है।

Friday, March 2, 2018

गदर: एक गुलाल कथा (2024)

कनपुरिया गदर: विजय त्रिपाठी
जान पहचान वाले आज अगर पहचान में आ जाएं तो समझिए पहचान पक्की थी, वरना कहीं कोई पेंच ढीला था जो कसे जाने के इंतजार में है। बनाई होगी किसी ने गदर एक प्रेम कथा, मगर आज के दिन तो गदर को अगर किसी ने एक गुलाल कथा के अलावा कुछ बनाया तो हुरियारों- जुट पड़ो! ऐसे जुट पड़ो कि अच्छा भला अपनी बीवी का पति पड़ोसी का देवर बना नजर आए! ऐसे जुट पड़ो कि सात दिन से छज्जे पर छिपकर बैठा चांद अपने गड्ढों में गिरे गुलाल से पूरे साल लाल-लाल दिखे।

इतना रंगो, इतना रंगो कि इतने-जितने की हर हद से बाहर फूट पड़ो। और फूटना तो उस गुब्बारे कि तरह बेपरवाह होकर ही फूटना। निशाना लगे- न लगे, फूटकर फैल जाना ही उसकी नियति है। और निशाना न लगने के बाद सिर फुड़वाना फेंकने वाले की नियति है। यही वक्त है नियति से साक्षात्कार का। यही सबसे सही वक्त है फैलने का। और यही सही वक्त है फूलने का भी। दो गोली भांग और लो। चिलम के चार सुट्टे और मारो। फैल फूलकर अगर कोई सीधे घर की राह पकड़े तो उसके कुर्ते का क्या करना है, ये भी बताना पड़ेगा? पूरे शहर में बिजली वालों ने तार टांग रखे हैं, आज के कुर्ते उनपर न सूखे तो भला कब सूखेंगे? 

हिंदी के प्रफेसरों से आज बदला न लिया तो फिर कब बदला लोगे? साल भर से जितनी भी अंग्रेजी मन में फूली हुई है, एक साथ उनपर फोड़ो। फोड़ने से पहले इसका प्लान रेखागणित में ही बनाना, हिंदी वाले उसे शकुंतला की कमर समझेंगे। हिंदी वाले कमर में उलझे रहेंगे तो बांए हाथ से उन्हें उड़ता कौव्वा दिखाकर उनकी दाहिनी कखरी में दबी कामायनी छीन लो और उसमें कीट्स दबा दो। एक कीट्स से काम नहीं चलेगा। दो चार लेकर जाओ और हिंदी वालों के जहां-जहां दबा सकते हो, लगा सकते हो- लगा दो।

समाजशास्त्र वाले प्रफेसरों, आज बताना कि कहां गया समाज और कहां गया शास्त्र? बाहर आओ, तुम्हें उड़ता कौव्वा दिखाना है। पॉलिटिकल साइंस वाले के पास आज आधार आईडी लेकर जाने की कोई जरूरत नहीं। आज वह तुम्हें तुम्हारे आधार कार्ड वाली फोटो देखे बगैर ही पहचान लेगा। फिर भी वह आईडी मांगेगा। डरना मत। यह उसकी राजनीति का छुद्र छेद है हुरियारों। आज बंद होना मांगता है। राजनीति के सारे छुद्र-अछुद्र छेदों में आज गदर काटकर गुलाल भर दो, विज्ञान के भी। और हां, दांत दिखाना मगर किटकिटाना नहीं। कुछ करने से पहले इनकी आवाज में रंग भरना न भूलना। बड़े घाघ होते हैं। आवाज सुनकर ही जान जाएंगे कि पिछली कॉपी का हिसाब भर रहे हो। 

Monday, February 19, 2018

ये सारे रंग तुम्हारे हैं

दिखाते कुछ हो, सुनाते कुछ हो?
कहते कुछ हो, बताते कुछ हो?
पता है रंग नजदीक है?
रंग आ रहे हैं।
तुम्हारा सुनाना लाल है। चटक लाल।
बुरांश देखा है ना?
खिला और खिलकर आग लगाता बुरांश।
जानते हो कि पहाड़ों में दो चीजें दूर से दिखती हैं?
श्मशान और बुरांश।
दोनों जंगल में लगी आग होती हैं।
एक गर्म तो एक ठंडी।
तुम सुनाते हो तो हिमशैल टकराते हैं। सबकुछ टूटने लगता है। बिखरने लगता है।
तुम्हारी आंख में जो आवाज है, वह सबकुछ पिघला देती है।
सब बिखरकर बूंद बूंद टपकने लगता है। सारी रात टपकता रहता है। दिन भर बहता रहता है।
और कितना हरा है तुम्हारा बताना!
बताते हो या समेटते हो?
उसी बाग में लेकर जाते, जिसका सपना रोपा था।
दूर तक हरा देखते रहने का सपना।
सपने बड़े हो रहे हैं। सपने हरे हो रहे हैं।
बताते हो या खुद में भरते हो?
इतना भरोगे, सब हरा करोगे तो कहीं...
कहीं सपनों में अमलतास न भर जाए।
और फिर सबकुछ बताकर उसमें बुरांश का गुच्छा क्यूं टांकते हो?
बंद करो अपना सुनाना बताना। कहना दिखाना सी दो।
बाग कटते जा रहे हैं। बुरांश का जूस निकाला जाएगा।
न लाल बचा है, न हरा बच पा रहा है।
पीला धूप खा गई।
मगर रंग तो नजदीक हैं।
रंग तो आ रहे हैं।
दिखाना, सुनाना, कहना, बताना तो खर्च हो गया।
फिर? 
मेरी सुनो।
मेरे पास कुछ रंग बचे हैं।
सूख गए हैं।
छू दो, गीले हो जाएंगे।
लगा लो, तुम्हारे हो जाएंगे।
ये सारे रंग तुम्हारे हैं।
तुम्हारे ही तो हैं।
कुंभ, प्रयाग।

















मिलेगा तो देखेंगे- 21 

Thursday, March 23, 2017

काले वाले ठाकुर साहब की कहानी

ठाकुर साहब जब दरभंगा से दिल्‍ली की ट्रेन में बैठे तो उनके मन में बस एक ही विचार रह-रह कर कौंध रहा था और वो ये कि 'जमीन खोद दूंगा-मकान पोत दूंगा।' दिल्‍ली जाकर नाम कमाकर किसी न किसी तरह से दरभंगा को दन्‍न न कर दि‍या तो वह खुद अपने नाम के आगे और पीछे से ठाकुर हटाकर खुद का नाम तिमि‍र कुमार रख देंगे। दरभंगा पुलिस उनको तीसरी बार लड़की छेड़ने में धरी तो बड़ी मुश्‍किल से छूटे थे और नाम वाकई तिमिर कुमार ही होने जा रहा था। एक बार तो मोहल्‍ले के पप्‍पन की नौ साल की बच्‍ची के साथ लबर सबर करते धराए थे। पकड़े गए तो बोले नारीवाद सिखा रहे थे। बहरहाल, राम-राम करते किसी तरह से दिल्‍ली पहुंचे और अपने एक दोस्‍त के कमरे में ढेर हुए। दोस्‍त उनका सीधा सादा कि मकान पोत देने जैसा ख्‍याल उसके सपनों में भी न आए तो वहीं ठाकुर साहब हर दूसरे डायलॉग में डब्‍बा कूची लेकर खुद उसी का मकान पोतने को तैयार रहते।

मोरी गेट से लेकर लक्ष्‍मी नगर और पंजाबी बाग तक चक्‍कर लगा लेने के कई दिनों बाद जब ठाकुर साहब को नौकरी मिली, तब भी उनके मुंह से वही डायलॉग निकला। लेकिन नौकरी ऐसी चीज होती नहीं और कैसी चीज होती है, ये ठाकुर साहब नहीं जानते थे। नौकरी में क्‍या-क्‍या काम करने होते हैं, ये भी उन्‍हें नहीं पता होता। नतीजा ये निकला कि कुछ दि‍न ठाकुर साहब ने कूड़ा नाली खड़ंजा विभाग में काम कि‍या तो विभाग वालों ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दि‍ए कि भई, ठाकुर साहब रहेंगे तो उन लोगों से कुछ न हो पाएगा। दोष ठाकुर साहब का नहीं, पुराने काम करने वालों का ही है, जिनके काम करने के लच्‍छन ही नहीं हैं।

असल में हुआ यह कि जब ठाकुर साहब को कूड़े का खाता दि‍या गया तो उसमें वह खड़ंजा बिछाने लगे और जब नाली वि‍भाग पकड़ाया गया तो उसमें वह कूड़ा भरने लगे। साथ के लोग जब उनसे कहते कि नाली को नाली की ही तरह लो तो वह धमकी देते कि जो कुछ भी वह कर रहे हैं, वह 220 फीसद सही कर रहे हैं। अगर कि‍सी ने बार बार उन्‍हें गलत कहा तो वह मैनेजमेंट से शि‍कायत करेंगे कि उनके साथ रंगभेद कि‍या जा रहा है। उनके बिहार से होने की वजह से उनसे गलत व्‍यवहार किया जा रहा है। अब बाकी के लोगों को अपनी इज्‍जत बचानी थी सो सभी ने समवेत यही कहा कि उन सभी को एकदम काम नहीं आता। खैर, मैनेजमेंट समझदार था सो ठाकुर साहब को दूसरे विभाग में भेजा गया।

इधर ठाकुर साहब बुरी तरह से फुंके हुए थे। 'काम उन्‍हें नहीं आता तो तबादला मेरा क्‍यों' का सवाल उन्‍हें लगातार जलाए जा रहा था। उनका काला रंग दिनों दिन और सुर्ख होता जा रहा था। 'सोफी और उसके संसार' के बारे में उन्‍होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था और 'स्‍लीमेन की अवध डायरी' के बारे में सुना तक नहीं था। फैज और फिराक को वह एक ही मानते थे। बावजूद इसके, उनका पढ़ने लिखने वाले विभाग में तबादला कि‍या गया जो पढ़-पढ़कर अपनी रिपोर्ट ऊपर दि‍या करता था जिससे कंपनी की नीतियां बनती और बि‍गड़ती थीं। पढ़ने लिखने से सख्‍त दुश्‍मनी रखने वाले ठाकुर साहब ने जब देखा कि यहां तो उनकी दाल नहीं गलनी है तो बड़े परेशान हुए। जब उन्‍हें कुछ पढ़ने को दिया जाता तो उनके पेट में दर्द होने लगता और जब लिखने को कहा जाता तो उनकी नाक बहने लगती।

मीटिंग वगैरह में भी जब लोग क्‍या पढ़ें-क्‍यों पढ़ें और क्‍या लिखें-क्‍यों लिखे के सवालों से जूझ रहे होते तो वह व्‍हाट्सएप्‍प पर दरभंगा में सरसों के तेल का भाव पूछ रहे होते। कई दफे तो चप्‍पल के टूटे फीते और लौंग का भी भाव पूछते पकड़े जाते तो बताते कि लौंग को वह रात में अपने बारह दांतों के बीच बनी जगह में फंसाकर सोते हैं। शायद ये रात में दांतों में लौंग फंसाकर सोने का ही नतीजा निकला कि विभाग में उन्‍होंने सभी से सीधे मुंह बात करना बंद कर दी। जि‍ससे भी बात करते, मुंह टेढ़ा करके ही बात करते। इसके चलते कोई भी बात करते, टेढ़ी ही करते। सीधी बात और सीधी चाल उन्‍होंने दरभंगा स्‍थित अपने घर की दुछत्‍ती पर रखकर बंद करके रख दी और भूल गए। आखिरकार यह लोग भी कब तक बर्दाश्‍त करते, सो उन्‍होंने भी मैनेजमेंट को बोल दि‍या कि भई, हमीं लोग नाकाबिल हैं, हमें न तो पढ़ना आता है, न लिखना। इसलि‍ए हमारा ट्रांसफर साफ सफाई विभाग में कर दि‍या जाए।

मैनेजमेंट समझदार था सो चुपचाप ठाकुर साहब को उठाकर डाक-तार विभाग में बैठा दि‍या। वहां बैठकर ठाकुर साहब प्रतिदिन चिट्ठियां पढ़ते। पढ़ते-पढ़ते और भी कुढ़ते जाते। मन ही मन बुदबुदाते कि उनके जैसा महान, हर वाद का वादी, राष्‍ट्रीय रंग से लैस क्‍या दुनि‍या में ये दो कौड़ी की चिट्ठियां पढ़ने आया है। अपनी इसी सुपति‍त कुढ़न के चलते इस बार तो उन्‍होंने नए विभाग में पहुंचते ही सभी काम करने वालों पर रंगभेद का आरोप लगा दि‍या। फि‍र क्‍या था, एक के बाद एक, सभी की पेशियां मैनेजमेंट के सामने होने लगीं। सभी लोग सहम गए क्‍योंकि जहां वह काम करते थे, वहां भले ही झूठ-मूठ ही क्‍यों न लगाया जाए, लेकिन ऐसा आरोप बर्दाश्‍त नहीं कि‍या जाता था। सभी ने अपनी सफाई में अपनी बात रखी। पिछले विभागों में काम करने वालों के बयान भी दर्ज हुए।

मैनेजमेंट समझदार था। सभी लोगों के बयान सुनने और सारे सबूतों को देखने के बाद उसने अपना फैसला खुद ही मुल्‍तवी कर लि‍या। डाक-तार विभाग में काम करने वालों को एक दूसरे कमरे में ले जाया गया और उनसे प्रार्थना की गई कि वह कि‍सी तरह से भी अपना काम चलाएं, लेकिन ठाकुर साहब को बि‍लकुल डिस्‍टर्ब न करें। विभाग वाले भी समझदार थे, मैनेजमेंट का इशारा उन्‍होंने हाथो-हाथ लि‍या। एक वो दिन था और एक आज का दिन है, लगभग सारे विभाग ठाकुर साहब नाम का नाम पूरी तरह से भूल चुके हैं। वह अब इशारों इशारों में उन्‍हें तिमिर कुमार ही बुलाते हैं। एक तो थोड़ा दिमाग का तेज निकला तो उसने तिमि‍र कुमार के नाम से ठाकुर साहब के दरभंगा वाले पते पर तिहत्‍तर चिट्ठियां भेज दीं। बच इसलि‍ए गया क्‍योंकि उनपर कहीं भी उसका नाम नहीं था।

हालांकि वो तो बच गया, लेकिन ठाकुर साहब के कुंठित कोप के भागी आए दि‍न डाक बाबू और तार बाबू बनने लगे। कुछ दिन पहले डाक बाबू ने ठाकुर साहब से सिर्फ यह पूछने की हिमाकत कर दी कि छतरपुर वाली चिट्ठियां कहां रखी हैं, तो हाल ये हुआ कि जैसे पूरे दफ्तर में कोई तीन बैल जोतकर हेंगा चला दे। तार बाबू बड़ी-बड़ी आंख लि‍ए टपर-टपर कभी इधर ताकें, कभी गहरी सांस छोड़ें तो कभी उधर ताकें। बीच-बीच में नाक और कान में उंगली भी करते रहें। उस दिन की बात बताते हुए आज भी तार बाबू बोलते हैं कि 'क्‍या बोलें, बोलती ही बंद हो गई थी भैया। भगवान किसी को कैसा भी दिन दि‍खाए लेकिन ऐसे आदमी के बगल बैठने का दुर्भाग्‍य न दे जैसा कि डाक बाबू को दे रहा है। हमको भी दे ही रहा है, लेकिन अब है तो काट रहे हैं।'

कुछ दिन पहले डाक बाबू ने दफ्तर में बाकायदा घोषणा की कि उनकी आवाज चली गई है। पूछा गया कि कहां चली गई है तो उनका कहना था कि कहां चली गई है पूछने से पहले पता करना होगा कि आ कहां से रही है और आती कहां से है। एक वो दिन है और एक आज का दिन है, क्‍या दिन और क्‍या रात, किसी को नहीं पता कि डाक बाबू की आवाज आती कहां से है। चली जाने का सबको पता है।

वैसे ठाकुर साहब जैसे लोग हर कहीं हर किसी को मिल ही जाते हैं। उनके बारे में बताने से पहले मेरे सामने सवाल था कि उनके बारे में कुछ बताया जाए या न बताया जाए। उनके बारे में कुछ भी बताना उनको चंद चीकट शब्‍दों में ही सही, लेकिन अमर कर देगा। उनके बारे में न बताया तो जाने कितनों की आवाज मर जाएगी या मरी रहेगी। इसलि‍ए मैंने तय किया कि उनके बारे में बता ही दि‍या जाए। इसबीच ठाकुर साहब की तहकीकात में मुझे कुछ एक ऐसी खबरें और पता चलीं, जिनसे यह साबित हुआ कि ठाकुर साहब के दिल पर भी वही रंग चढ़ा है जो उनके अगवाड़े और पि‍छवाड़े चढ़ा हुआ है।

उनके पहले के एक दोस्‍त ने मुझे बताया कि दिल्‍ली आने के तुरंत बाद से ही उनकी नौकरी सेट नहीं हुई। अलबत्‍ता वह कुछ और ही सेट करने लगे। पहले जहां वह काम करते थे, वहां पर उनकी एक बूढ़ी मालकिन हुआ करती थी। साल दो साल तो ठाकुर साहब मालकिन की गोद में ऐसा खेले कि हर आता जाता इंसान मालकिन को इतनी अजीब नजरों से देखना शुरू कर दि‍या। आखिर मालकिन कब तक सहती। वह भी उम्र के इस ढलान पर आकर सहने सुनने की क्षमताएं वैसे भी कम ही होती जा रही हैं। किसी तरह खुदा-खुदा करते हुए उनकी मालकिन ने उनकी नौकरी दूसरी जगह सेट की।

दूसरी जगह आने के बाद ठाकुर साहब ने क्‍या क्‍या किया, उसकी एक भरी पूरी लंबी लिस्‍ट है। काफी कुछ तो पहले बता ही दि‍या, ठाकुर साहब के जो कर्म हैं और जिन कर्मों के चलते वह अब पूरी तरह से तिमि‍र कुमार बनकर प्रसिद्ध हो चुके हैं, वह आइंदा भी बताने पर मजबूर करते ही रहेंगे। तिमि‍र वि‍ल बैक। तिमि‍र इज ऑन।

Saturday, August 27, 2016

अंदर कश्मीरी लाठी खाते हैं, बाहर मैं लात

ये इस देश में मेरे ख्‍याल से सबके साथ सबसे बड़ी समस्‍या है। लोग हंसते हुए घर से नि‍कलते हैं कि वे बड़े सुखी हैं, लेकि‍न दस मि‍नट बाद नर्क की बातें करने लगते हैं। ठेले से एक पर्सेंट ठीक खाना मि‍ल जाता है तो लगने लगता है कि सारा कश्‍मीर मि‍ल गया, कश्‍मीर के सारे बाग मि‍ल गए। दो महीने बाद कोई रि‍श्‍तेदार आके पूछ लेता है कि गुरु, सेहत बना रहे हो क्‍या? बस उतने में ही फूलकर सब अपनी अपनी कंपनी पर लहालोट होने लगते हैं। हालांकि रि‍श्‍तेदार के जाने के बाद ये भी कहते देखे जाते हैं कि कंपनी वंपनी कुछ नहीं, कहीं कोई आजादी नहीं है। दोस्‍त सुनते ही समझाने के मोड में आ जाते हैं कि गुरु, आजादी तो कहीं नहीं है। न कंपनी के अंदर न बाहर। बड़ेघर में भी ठीक ठीक आजादी नहीं मि‍लती।

मैंने सोचा है कि चने का अचार बनाउंगा। लौकी का भी और तुरई का भी। अगर स्‍कॉर्पियन यहां बन सकती है, अगर पर्रिकर रक्षामंत्री बन सकते हैं और अगर फ्रांस बुर्किनी उतार कर चालान कर सकता है तो तुरई का अचार आने वाले सात साल तक सुरक्षि‍त रखकर देखा और मन होने न होने पर खाया भी जा सकता है। देश को नर्क से नि‍कालने के लि‍ए अचार खाना जरूरी है। लि‍खना जरूरी नहीं है, पढ़ना तो बि‍लकुल नहीं। कि‍ताब की बात करना फालतू का काम है। कवि‍ता गरीब की लुगाई है। आजाद तो सिर्फ गोवा है, थोड़ा बहुत युसुफ भाई भी हैं, कुछ दि‍न में पूरे हो जाएंगे। महबूबा... एक बार तो बगैर मुफ्ती के मि‍लो। आई वि‍ल टेक योर ऑल व्‍यू इन माई मर्तबान। यू नो आइ लव अचार। डोंट यू नो? यू मस्‍ट नो!! आफ्टरऑल, आई एम एन आईटीयोआइयन!! यू मस्‍ट मेक एन आईटीओ देयर एट लाल चौक।

भारतीय नामपंथ के वि‍रोध में कौन कौन है। प्‍लीज जल्‍द बताएं। एक स्‍मारि‍का नि‍काल रहा हूं जि‍समें वो सारे होंगे तो नामपंथ के वि‍रोध में हैं, नाम के वि‍रोध में हैं, पंथ के वि‍रोध में हैं, संधि के वि‍रोध में हैं, वि‍च्‍छेदों के वि‍रोध में हैं, छेदों के वि‍रोध में हैं और इन सारे विरोधों के विरोध में हैं। जो भी वि‍रोध में हैं अगर वो नहीं हैं तो वही बता दें जो सिर्फ हैं। जो कहीं नहीं हैं वो मंडी हाउस आकर मुझसे मि‍ल सकते हैं। मैं भी कहीं नहीं हूं। जो है वो बस एक सटकन है!!

कश्‍मीरि‍यों, तुम चिंता न करो। मैं भी नहीं कर रहा। लाठी खाना तुम्‍हारी नि‍यति है और लात खाना मेरी। जैसे तुम्‍हारे साथ कई सारी आत्‍माएं लाठी लेकर चलती रहती हैं, वैसे ही मेरे साथ कई आत्‍माएं लात लेकर चलती रहती हैं। कश्‍मीर में तुम कहीं भी रहोगे, लाठी खाते रहोगे। कश्‍मीर के बाहर मैं कहीं भी रहूंगा, लात खाता रहूंगा। हम दोनों का खाते रहना, खाके बैठे रहना लोगों को ज्‍यादा जरूरी महसूस होता है। हम लोगों का कुछ भी करना, कर लेना वाजि‍ब नहीं। मैं अब चुप होता हूं। तुम तो चुप कर ही दि‍ए गए हो।

Tuesday, March 15, 2016

भसम: भग्‍न संस्‍कृति मंच

आप दि‍ल पर मत लीजि‍ए मैसी जी, आपके लि‍ए नहीं लि‍ख रहा हूं। और आप तो कहीं भी मत लीजि‍एगा साशा जी, आपको कहीं भी कुछ दे देने के लि‍ए तो मैं ये बि‍लकुल भी नहीं लि‍ख रहा हूं। आप तो खुद ही पि‍छले पंद्रह साल से इस पेरि‍स को कुछ नहीं दे पाई हैं तो अभी का जन्‍मा और ऐफि‍ल टॉवर के छोटे ए जि‍तना बड़ा भी न हो पाया मैं आपके लि‍ए क्‍या लि‍ख पाउंगा। वैसे क्‍या लि‍ख पाउंगा से भी महती प्रश्‍न है कि क्‍यों लि‍ख पाउंगा। जबसे पेरि‍स आया हूं, यहां की गलि‍यों से ज्‍यादा तो आपको देने के लि‍ए गालि‍यां ही मन में घूम रही हैं क्‍योंकि आपकी करतूतें देखने के बाद  तो हज़रत आंद्रे आंतोआं को भी अपने थि‍एटर लि‍ब्र पे शरम आ रही होगी।

बहरहाल, पेरि‍स में हूं और यहां पर एक भग्‍न संस्‍कृति मंच बना दि‍या है। अब तक तीन बैच नि‍काल चुका हूं। एक ऐफि‍ल पे कर रहा है तो दूसरा नेशनल म्‍यूजि‍यम के सामने है। तीसरा घंटे वाली गली में अभी हारमोनि‍यम नि‍काल रहा है। हारमोनि‍यम पर आपका ऐतराज खारि‍ज कि‍या जाता है क्‍योंकि थ्‍योरि‍टि‍कली, हमने उसे जन और भस्‍म से अलग करके संस्‍कृति से कनेक्‍ट कर दि‍या है। ऐसा हमने एक पुराने मंच से सीख लेते हुए कि‍या क्‍योंकि वो पुराना मंच जन के नाम पर अभी तक बैठकर हारमोनि‍यम ही बजा रहा है।

वैसे मैसी साहेब, आपने कभी ये नया वाला सिंथेसाइजर इस्‍तेमाल कि‍या क्‍या, इसमें से कई तरह का आवाज़ नि‍कलता है। खैर आपके पास तो ऑलरेडी कई तरह की आवाज नि‍कालने वाले लोग हैं, और पुराने भी हैं और अनुभवी भी हैं। लात खाए लोग भी हैं जि‍नके मुंह से तो अब बस आंद्रे व्रेतॉ, फि‍लि‍प सुपोल, लूई आरागॉ, जॉर्ज हीनि‍ये, रने क्रेव्‍हेल और पॉल एलुआर अइसे झरते हैं कि गुरुजी की सिम्‍फोनी भी पनाह मांगती है। पेरि‍स में आके नया वाला दाढ़ी का कट भी ले लि‍ए हैं।

कल सात्र हारमोनि‍यम फाउंडेशन गया था। हर तरफ हारमोनि‍यम ही हारमोनि‍यम थे। हर तरफ सुर साधे जा रहे थे। हर तरफ शोर था। सुर सध नहीं पा रहे थे। कुछ चालीस साल पुराने हारमोनि‍यम थे तो कुछ साठ। कुछ तो बीस साल से लगातार फाउंडेशन में आ आकर बजते जाने वाले हारमोनि‍यम थे। लात खाए नए रंग में नहाए हारमोनि‍यम भी थे। मैने इसीलि‍ए हारमोनि‍यम को कल्‍चर से जोड़ा है। सब जब एक साथ बजते हैं तो कल्‍चर भी तो बनती है ना।

फ्रेंच के महान नाटककार लि‍ख गए थे कि- कबि‍त बि‍बेक एक नहीं मोरे। सत्‍य कहौं लि‍खि कागर कोरे। इसके आलोक में मैं देखता हूं तो खुद को कहीं टि‍का हुआ पाता ही नहीं हूं। सोचता हूं कि कैसे वो सात्र फाउंडेशन वाले हारमोनि‍यम इतने साल से टि‍के हुए हैं। दरअसल यहां का एफि‍ल दुनि‍या का आश्‍चर्य नहीं है। इतने सालों से नाटक के नाम पर एक न पर टि‍के हुए ये हारमोनि‍यम ही दुनि‍या के सबसे बड़े आश्‍चर्य हैं। सात सुर सबने सुने हैं लेकि‍न न का आठवां सुर इनके हारमोनि‍यम से नि‍कलता है। साशा जी प्‍लीज, अब तो इसे आपको जहां लेना हो, ले लीजि‍ए, आइ डोंट केयर।

कामता प्रसाद हों या कि‍शोरीदास या काशीप्रसाद। श्‍यामसुंदर दास हों चाहे कल्‍लू अल्‍हैत या हीरा डोम.. (इस हिंदी को फ्रेंच ही समझें), इधर पख्‍तूनी भाषा पुरस्‍कारों पर उंगली उठाने वालों को चि‍न्‍हि‍त कि‍या जा रहा है और वो जहां भी होंगे, उन्‍हें खोद नि‍काला जाएगा। ऐसा शीलाजी का फरमान है। कमरे में दर्द भरा पड़ा है तो मजबूरी में मैं बस इतना ही कर सकता था कि बोल दि‍या।

मिस्‍‍सेज पीपी मि‍स्‍टर्र केके
नाउ खुलेंगे सबके ठेके
सि‍ट्टेंगे मग हाथ में लेके
थिंकेंगे कब मरेंगा जेके

Friday, February 12, 2016

इंतजारी हूं, जारी नहीं..

रायता मैं क्‍या बि‍खेरूंगा, मैं खुद में ही इतना बि‍खरा हुआ रायता हूं कि समेटता हूं और फि‍र फि‍र फैल जाता हूं। घबरा जाता हूं लोगों को देखकर और इधर उधर छुपने की कोशि‍श मेरे फैलने को और बि‍खेरती जाती है। सोचता हूं कि इतना फैला दूं इस दुनि‍या में कि अगले दो ढाई सौ सालों तक लोग बस मेरी फैली हुई फि‍सलन को समेटने में सुसहि‍ष्‍णुता से जोर लगा दें, फि‍र भी मेरा फैला हुआ मैं समेट न पाएं। आप कहेंगे कि मैं नकल कर रहा हूं, लेकि‍न असल में मैं क्‍या कर रहा हूं, ठीक ठीक मुझे भी नहीं पता। अच्‍छा होगा कि आप ही कोई बयान जारी कर दें सर ताकि मैं कहीं से तो जारी हो सकूं। अभी जहां हूं, वहां तो सिर्फ फैल ही रहा हूं, जारी नहीं हो पा रहा।

रोज घर से दस गांठ बांधकर चलता हूं और कहीं पहुंचने से पहले ही रास्‍ते में उन्‍हें गुम कर बैठता हूं। कौन कौन सी गांठ कहां कहां से फि‍सल रही है, कौन सी कहां नि‍कल रही है, ईमानदारी से बता रहा हूं, मुझे नहीं पता। पता चल भी नहीं पाता क्‍योंकि फैलना महसूसना इन्‍कार करना है और मैं वाकई फैल रहा हूं। रायता हूं या नहीं, ये भी मुझे ठीक-ठीक नहीं पता, जो पता है वो बस फैलना है। आप लोग घबराते रहि‍ए, अपना लोटा थारी छुपाते रहि‍ए लेकि‍न यकीन भी कि‍ए रहि‍ए मुझपर कि मैं फैल रहा हूं, झूठ बोल रहा हूं।

अब तो जो कुछ भी याद है, वो मेरी फैली हुई फि‍सलन है जहां तक कुछ पहुंचता भी है तो फि‍सलकर फि‍र दूर चला जाता है। बट यू डोंट वरी, यू कैरी ऑन वि‍द स्‍टीफेन किंग। ही इज रि‍यली द किंग ऑफ हॉट एंड सोर रायता यू नो। नो यू डोंट नो। इवेन आइ डोंट नो माईसेल्‍फ एंड आइ डोंट हैव एनी काइंड ऑफ शेल्‍फ। और ये सारी अंग्रेजी भी मुझे समेट नहीं पाती है, ये जानते हुए भी मैं इसे बोलते हुए खुद पर एक डॉट लगाता हूं।

गुनगुनाता हूं वहां कौन है तेरा और खुद को समझाता हूं मुसाफि‍र जाएगा कहां। तेज़ाब वाली माधुरी दीक्षि‍त को मैं सपने में भी नहीं देखता और जिस-जि‍स ने मेरे पैसे मारे हैं, अपनी दाहि‍नी जेब में उनके नाम की लि‍स्‍ट को हर दस मि‍नट बाद उंगली से टहोक लेता हूं। स्‍टीव जॉब्‍स को आज ही मैनें अपने ठेंगे पर रखा है और मार्क जकरबर्ग को ठेठ फ़ैज़ाबादी में तौल के बि‍खेरा है। मिट्टी का नमक मैनें नहीं चखा है और न ही मैनें कोई मरे हुए कवि‍यों का संगठन बनाया है। सुख की तलाश में मैं लौटे हुए घायल को भी देख लेता हूं और एनएसडी में खुश हो होकर जीशान की फोटो के सामने उसकी प्रशंसा भी कर देता हूं।

फि‍र भी, मैं फैल रहा हूं। इंतजारी हूं, जारी नहीं।   

Thursday, January 7, 2016

मेरा मन चंपक होने लगता है

मैं अपना प्रस्‍थान अनदेखा रहने देता हूं। लोग मुझे आते हुए तो देखते हैं लेकि‍न मेरा जाना नहीं देख पाते। मेरी पूरी कोशि‍श रहती है कि मुझे जाते हुए कोई न देख पाए। शुतुरमुर्ग की तरह मैं जाने से पहले गर्दन उठाकर चारों तरफ देखता हूं और जब कोई नहीं देख रहा होता है तो मैं चुपचाप दौड़कर नि‍कल जाता हूं। जो कुछ भी जि‍तने हाहाकारी तरीके से नि‍कल चुका है, उसने मेरे जाने की उन ति‍हत्‍तर अदाओं को चुप कर दि‍या है जि‍नसे मैं कभी कभार बति‍याते चंपि‍याते नि‍कलता था। मेरा मन चंपक होने लगता है जब मैं देखता हूं कि कोई मेरा जाना देख रहा होता है। उम्र बढ़ रही है इसलि‍ए मैं मेरे मन का चंपक होना टॉलरेट नहीं कर सकता और इसीलि‍ए सर्दी की गर्म रातों में मैं नहाने का पानी गर्म करके खुद पर बर्फ उड़ेल लेता हूं। रात भी मैनें यही कि‍या, रात भी मैं यही करने वाला हूं सर...

डायरी-3


गजब हाल है कि अपने होने का सबूत दि‍ए बगैर हम कहीं भाग भी नहीं सकते। रि‍हाई क्‍या होती है, ये मुझे तो ठीक ठीक समझ में आती है, महान और अगर उससे भी ऊपर कोई शब्‍द है तो वो यूज करते हुए मेरे साथ रहने वालों को भी आ जाती तो दुनि‍या की पंचानवे फीसद समस्‍या हल हो गई होती। अभी सुबह मैनें कहीं लि‍खा देख लि‍या कि बहादुर आदमी ही रोते हैं और तबसे मैंने बहुत बहादुर बनने की नाकामयाब कोशि‍श करके भी देख ली। न मेरे कमरे में आलमारि‍यां या कोई ऐसा ताखा है जि‍से बहादुर बनते वक्‍त पकड़ा जा सके और न ही टॉयलेट या बाथरूम में। कि‍चन में कुछएक ताखे हैं जि‍नका मैं खुद को कायर बनाने की सतत प्रक्रि‍या के तहत ही इस्‍तेमाल करता हूं। मैं बहादुर नहीं, अलबत्‍ता जो चाहे पैसे देकर मुझे बहादुर बना सकता है। बहादुर कौन सी भाषा का शब्‍द है, इसके लि‍ए मैं राग भोपाली भी नहीं गाने वाला क्‍योंकि मेरे पास न तो उसकी कैसेट है और न कैसेट नंबर। सीडी और पेनड्राइव भी मेरी बहादुर के नाम पर नहीं हैं। यशवंत सिंह मेरे अच्‍छे दोस्‍त हैं और मैनें उनसे कबीर को सुना है।

डायरी-4

शर्म पर नि‍यंत्रण करने का एक पति‍त प्रयास

मैं मनुष्‍यता के काबि‍ल नहीं, अलबत्‍ता भेड़ों के समूह में भी मुझे लेकर नवक्रांति‍कारी बहस का भी कोई नतीजा नहीं नि‍कलेगा कि क्‍या मैं उनकी जाति के काबि‍ल हूं। तौबाओं को तोड़ते रहने से ऊबा मैं अब तो बस तौबाओं को तीन तकि‍ए दूर से ताड़ता हूं और बचता हूं उनसे आंख मि‍लाने से। वैसे कई सारी आखि‍री तौबाएं मैनें बचा रखी हैं जो न मुझे करनी हैं न ताड़नी।

डायरी-1

नंगई की भी अपनी अदाएं होती हैं जि‍न्‍हें मैं अपने बहुरंगी चश्‍मे से देखता रहता हूं। बदन की सारी नंगई कि‍स तरह के ख्‍यालों में आजाद होती हैं, इसपर आदि अनादिकाल से कि‍सने नहीं लि‍खा। मन की सारी नंगई जो रोज मेरे सामने मुजरा करके मेरे बचे हुए सैंतीस रूपये कैसे छीनने को उतारू है, ये कि‍स बहीखाते के किस मद में दर्ज करूं, बस इसी कश्‍मकश में हूं। हया की ये कैसी दीवार मेरी जबान पर खड़ी हो गई है कि मैं कि‍सी की भी नंगई से फि‍सल पाने में खुद को चुना हुआ पाता हूं। नंगों को देखकर भी शर्म मुझे ही आती है। सोचता हूं कि दि‍ल्‍ली के हर फ्लाईओवर के नीचे मैं सिर्फ काली शर्ट पहनकर नि‍कलूं। अगर कोई पूछे कि नीचे नंगे क्‍यूं तो बोलूं कि कुछ नहीं, बस अपनी शर्म पर नि‍यंत्रण करने का एक पति‍त प्रयास ही तो कर रहा हूं सर..

डायरी-2


Tuesday, December 29, 2015

लड़की से मेरा नैति‍क-अनैति‍क कि‍सी तरह का संबंध!

मैं सुखी हूं। बस रोज नाश्‍ते के वक्‍त मोहनजोदड़ो के वक्‍त का फ्रि‍ज खोलकर उसमें अनंत को देखते हुए पाता हूं कि कल फि‍र अंडा लाना भूल गया। तले गए तेल की तरह खुद खराब करता हुआ कि‍सी तरह से मैं उसका दरवाजा ओटगा देता हूं कि पता चलता है कि धुंआ धुंआ से छाए लोग ऐवें ही धुंआ हो लेते हैं। दिमाग़ ठीक है, नींद आती है। सोने से जगाने और सहलाने के लि‍ए एक ठो बि‍लार भी मि‍ली हुई है। आह मि‍स्‍टर सींग पि‍रोकर मारने वाले मि‍स्‍टर मोद (ओद भी), आप सुन रहे हैं ना मेरे सुख की पराकाष्‍ठा। प्‍लीज कोई संधि और वि‍च्‍छेद न करि‍एगा।

वापसी का कोई संकट कि‍सी भी वि‍कट व अकट रूप में मेरे सामने नहीं है क्‍योंकि अम्‍मा पहि‍ले ही बोल दी हैं कि बच्‍चा फैइजाबाद न आना, आना हो तो कहीं और जाना। मनोरमा मउसी उसमें और धार लगाईं कि बच्‍चा, जहां हो, वहां से भी दस सौ मील दूर चले जाना। तुम्‍हरी परछांई में भी ऊ सहर नहीं नजर आना चहि‍ए। इसका बावजूद मेरे जैइसा माथे से पैदल और दि‍ल से कंगाल आदमी फि‍र औ फि‍र फि‍र से हर दुसरके महीना चहुंप जाता है फैइजाबाद। डेटिंग पे।

सोचता हूं तो लगता है सब गजबे है। शशिभूषण जैसे प्रति‍भाशाली मेरे मि‍त्र हैं जो कभी तीन में उलट जाते हैं तो कभी तेरह में उलझे बलझे रंजनाए पंड़ि‍याए रहते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि बाकायदा भारतवासी को पैइसा देके मेरे अशुभ दि‍नों की अनंत गाथाओं की पराधुनि‍क डायरी छपवानी चाहि‍ए। ऐसी डायरी, जि‍समें मैं महि‍लाओं से पूछ पूछ कर लि‍खूं कि जब वो कुछ नहीं कर्र रही होती हैं तो क्‍या कर्र रही होती हैं..

मेरे दस सुलगते हुए साल जि‍सका निर्मल वर्मा के गद्य से कुछ लेना देना नहीं है, सवाल भी होते तो क्‍या कर लेते। निर्मल वर्मा कौन मुझसे मत पूछि‍ए। मैं जेएनयू में नहीं पढ़ा हूं नहीं तो पंजाबी बोलने वाली कि‍सी लड़की से मेरा नैति‍क-अनैति‍क कि‍सी तरह का संबंध होता।

ज्‍यादातर लोग मुझे अलकतरे का पि‍छवाड़ा मानते दि‍खाते रहते हैं... मुझे लगता है कि वो हांफते नहीं होंगे।

नीलाभ ने तो कह दि‍या था, 'अरे चूति‍ए से बात करनी पड़ेगी'। पंकज हमेशा बात न करने की शि‍कायत कि‍या करते थे।

सि‍कायत फि‍कायत से बस सब पता चलता रहता है। राम जी के रोटी वाले आलू मोहारे के पूरब वाले चबूतरा पे चढ़के कहते हैं कि दस का बड़का वाला गद्य इन्भेन्ट कर के ओस्को पतनसील किम्बा दुर्दिन में खामोसी नाम दिया तो अच्छे किया. अइसा बिधा के ई बिधायक लोग हत्ना ओपकार किया है कि पाखियो में गर्दावाला साहित्त को बिस्वास मूलक छाती का मक्खन लगाने लगा. हम तो बूझे कवनो तो अपना बाती में फैजाबादी अंजाद मारेगा, बलकू देख देख कर रहिये ओझिरा गया. एक लम्बर का इमन्दार भी ई नहीं बोला कि मंगरू मंडी हाउस पे झगेरू का बाहीं उमिठा के मारा तो झगेरू बीमारो थे। जब ज्योनानन्द मर के चल गयले त ओनके बारे में झुट्ठे बतकुच्चन का सागर फैलाया ऊपर से ईहो बोल दिया कि बसेसर बाबू हमारा हतना कर्जा खाके चम्पती हो गया। मरला क बाद सबका मुंह में अपना बात घुसाया, मेहरारू क बात किया अउर भ्रान्ती क लापटे झासख़ास सिया वररामचननर किजै।

(मेरे अशुभ दि‍नों की अनंत गाथाओं की पराधुनि‍क डायरी-3)