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Monday, March 12, 2018

कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए...

मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश, कि चलो फ्रीलांसिंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे।
दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, सस्‍ते का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।
इसी बीच बीवी ने एक दि‍न खुशखबरी दी तो पत्रकार महोदय ने मंदि‍र में जुगाड़ लगाकर प्रसाद में चढ़े दो तीन कि‍लो लड्डू हथि‍याए और दफ्तर में सबका मुंह मीठा कराया। साथि‍यों ने जै-जै की, पत्रकार महोदय फूले। मैंने भी देखा, बाइचांस वहीं थी। सबकुछ ठीक चल रहा था कि पांचवे हफ्ते डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ भी ठीक नहीं। बीवी को भर्ती कराया, बच्‍चा गंवाया। डॉक्‍टरनी ने तो फीस नहीं ली, मगर साढ़े नौ हजार की दवाइयां लि‍ख दीं।
साथी पत्रकारों  ने मदद की, फि‍र भी साढ़े चार हजार रुपए की कमी थी। पत्रकार महोदय को वही अधि‍कारी याद आए, जि‍न्‍हें उनके बड़े भाई ने सहारनपुर में उनका लोकल गार्जियन बनाया था। ये पहुंचे उनके पास, लेकि‍न मुश्‍किल ये कि बतौर पत्रकार तो उन्‍होंने उस अधि‍कारी की भी बेजा हरकतें अखबार-ए-आम की हुई थीं। अब बोलें तो बोलें कैसे। बड़ी मुश्‍किल से अटक-अटक कर मुसीबत के बारे में बताया। अंत में मदद की दरख्‍वास्‍त की- यह कहकर कि सात तारीख को पूरी रकम चुका देंगे। अधि‍कारी महोदय ने कहा- सोचेंगे।
पत्रकार महोदय के मुताबि‍क उन्‍हें अंदाजा हो गया था, सो अधि‍कारी के यहां से बाइक लेकर नि‍कले और पहुंचे सीधे मि‍स्‍त्री की दूकान पर। बाइक बेच दी और उसकी जगह ली एक और भी सस्‍ती और तीसरे दि‍न खराब रहने वाली बाइक। बचे हुए पैसों से दवा खरीदी और घर पहुंचे।
कुछ समय पहले उनसे बात हो रही थी। बता रहे थे कि लाला ने मजीठि‍या न देने के लि‍ए चार बार साइन कराए हैं। फि‍र उसी अधि‍कारी की याद दि‍लाई। बोले कि दि‍ल्‍ली रोड पर वसूली करते वि‍जलेंस वालों ने पकड़ा। कहने लगे- आप तो वापस चली गई थीं, मगर इस अधि‍कारी ने संपादक के पास लि‍खकर शि‍कायत की थी और मेरी रि‍कॉर्डिंग भी कर ली थी। लेकि‍न रिकॉर्डिंग में भी मैंने कोई गलत बात नहीं की थी, इसलि‍ए संपादक जी ने छोड़ दि‍या। दफ्तर आकर भी उन्‍होंने बहुत हंगामा कि‍या तो संपादक जी ने उनसे कहा कि आप मुकदमा दर्ज कराइए। वो तो पुलि‍स में नहीं गए, मगर अब पुलि‍स उन्‍हें जरूर ले गई।
अब उन्‍हें महीने में साढ़े बारह हजार रुपए तनख्‍वाह, पांच सौ मोबाइल और हजार पेट्रोल के मि‍लने लगे हैं। आलू प्‍याज वैसे ही साथी पत्रकार के गांव से बि‍ला नागा आ जाती है, जैसे आठ दस साल पहले आती थी। पैसे पहले बीस बाइस को खत्‍म होते थे, अब तो 18 तक का भी इंतजार नहीं करते और अगर सात को संडे पड़ गया तो नौ तक ही मि‍लते हैं। हर महीने आधी तनख्‍वाह एडवांस में कटती है। मैंने उनको कई बार कहा कि वि‍चार से जीवन नहीं चलेगा, कुछ कमाई करि‍ए। रि‍पोर्टर हैं तो अधि‍कारि‍यों से या कि‍सी से भी कुछ कमाने की सेटिंग करि‍ए। बोले, एक जगह मैगजीन डि‍जाइन करने का काम मि‍ला है, महीने में दो बार करना है, ढाई दे देंगे। कुल मि‍लाकर वो वैसे कमाने के लि‍ए नहीं मान रहे हैं, जैसे कि मैं कह रही हूं।
बात सहारनपुर के पत्रकार की ही नहीं है, कहानी अकेले एक अखबार की भी नहीं। पहले संपादक भी सबकी सोचते थे, अब तो संपादक वह जीव है जो सबसे ज्‍यादा सैलरी इसलि‍ए लेता है कि पत्रकारों को सबसे कम सैलरी दी जा सके। तुर्रा ये कि पत्रकारि‍ता का त भी न पहचानने वाले जब तब उन्‍हें भ्रष्‍ट कहते रहते हैं। जानते हैं, पत्रकार दुनि‍या का अकेला ऐसा जीव होता है जो दुनि‍याभर के लि‍ए आवाज उठाता है, पर खुद के लि‍ए ऐसे खामोश हो जाता है, जैसे कि‍सी ने जबरदस्‍ती उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर बांध दि‍या हो। याद करि‍ए आखि‍री बार शहर में कब पत्रकारों को अपने लि‍ए आवाज उठाते देखा।
पत्रकार अगर भ्रष्‍ट हैं तो मैं कहती हूं कि‍ उन्‍हें और भी भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए। तब तक पूरी तरह से भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए, जब तक कि उनका और उनके परि‍वार का पेट तीन वक्‍त न भरे। धर्म भी यही कहता है। जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं। उन्‍हें अपनेे ही बच्‍चों की भूख भरी आह लगेगी।
जि‍स कि‍सी को इस भ्रष्‍टाचार से दि‍क्‍कत है, तो पहले वह पत्रकारों की मदद करना शुरू करें, तभी उनकी भी दि‍क्‍कत खत्‍म होगी, पत्रकारों की भी। कुछ नहीं कर सकते तो कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए। जबरदस्‍ती। पत्रकारि‍ता हमेशा समाज के भरोसे ही आगे बढ़ती आई है, न कि सत्‍ता के। सत्‍ता के भरोसे होती तो सत्‍ता उसे कब की मिटा चुकी होती। चीन में देखि‍ए, मि‍टा ही चुकी है। दि‍ल्‍ली, लखनऊ, पटना, कलकत्‍ता का चश्‍मा उतारकर जरा उन शहरों के पत्रकारों की भी खबर लीजि‍ए, जहां से खबरें आती हैं। जोगेंद्र सिंह और राम चंदेर प्रजापति याद हैं या भूल गए?

लेखिका- रोहिणी गुप्ते

Sunday, August 24, 2014

Love Jihad- Myth and Facts: मुझे नहीं चाहि‍ए ऐसा खूंखार देश

अगर मेरा देश कुछ ऐसा हो जाए तो- बड़ी बड़ी लाल सूखी आंखें जि‍नमें से गुस्‍सा टपक रहा हो। कंधों पर जानवरों जैसे बाल, बड़े बड़े दांत, एक हाथ में तलवार और एक हाथ में नाड़ा। और ऐसे देश के सामने एक औरत खड़ी हो जि‍सके सि‍र पर धर्म, लाज, हया के साथ साथ हर वो धार्मिक चीजें लदी हों। एक तरफ देश नरसंहार करना चाहता हो तो दूसरी तरफ बलात्‍कार। अगर देश की सूरत ऐसी हो तो? मुझे ये चीज परेशान कर रही है क्‍योंकि जि‍स देश को मैं अपना खून पसीना दि‍माग, सब कुछ दे रहा हूं, मैं बि‍लकुल भी उसे इस शक्‍ल में नहीं देखना चाहूंगा।

केंद्र की भाजपा सरकार के समर्थन के साथ जि‍स तरह से राष्‍ट्रीय स्‍वंय सेवक संघ लव जि‍हाद के नाम से मेरे देश में एक व्‍यापक हिंसा का इंतजाम कर रहा है, उसकी योजना उस हाथ में नाड़ा लि‍ए देश्‍ा से भी ज्‍यादा भयावह लग रही है। लव जि‍हाद पि‍तृसत्‍ता को मजबूत करने की वो लाठी है, जि‍से संघ के लोग अपने साथ रखकर चल रहे हैं। इस लाठी में कि‍तना दम है, आप खुद जाकर अपने अपने जि‍ले की स्‍थि‍ति पता कर सकते हैं, जैसे कि मैनें मेरठ की पता की। 30 लाख की आबादी वाला ये शहर कई सारे दंगों और सांप्रदायि‍क ध्रुवीकरण से गुजर चुका है। इतनी आबादी में स्‍पेशल मैरि‍ज एक्‍ट के तहत हिंदू मुस्‍लि‍म शादि‍यां औसतन 50 प्रति‍वर्ष से ज्‍यादा नहीं हो पातीं। ये मेरठ का लव जि‍हाद है। ये सालाना होने वाली 50 शादि‍यां आने वाले दि‍नों में मेरठ का कायाकल्‍प कर देंगी, ऐसा मेरठ के आरएसएस या इसकी शाखाओं से जुड़े लोगों का मानना है।

दरअसल लव जि‍हाद का मूल मकसद सिर्फ दो ही है। पहला हिंदू मुस्‍लि‍म एकता और सद्भाव को खंडि‍त करना और दूसरा स्‍त्री को पि‍तृसत्‍ता के चंगुल में कैद कि‍ए रखना। मोहल्‍लों और गांवों तक चल रहा आरएसएस का यह अभि‍यान स्‍वतंत्र भारत के मुंह पर कालि‍ख ही पोत रहा है, क्‍योंकि जब भी हिंसा होगी, मेरा देश दुनि‍या में उसी बलात्‍कारी हैवान की तरह देखा जाएगा और पता नहीं कि तब उसके हाथ में नाड़ा होगा या नहीं, या फि‍र पैजामा उतर चुका होगा। वहीं जब बात की जाती है स्‍त्रि‍यों को बराबरी का आरक्षण देने की, संपत्‍ति में बराबरी का हि‍स्‍सा दि‍ए जाने की, शि‍क्षा-स्‍वास्‍थ्‍य और वेतन के अलावा प्रेम की तो आरएसएस के लोगों को सांप सूंघ जाता है और वो कहने लगते हैं कि महि‍ला को तो धार्मिक होना चाहि‍ए, चुप रहना चाहि‍ए, मंदि‍र जाना चाहि‍ए, पैर छूना चाहि‍ए। बाकी जो है, सब उसी का तो है। हां, शादी के पहले रि‍श्‍तेदारों से तो शादी के बाद पति से चुपचाप बलात्‍कार जरूर कराते रहना चाहि‍ए। (वो थोड़ा घुमाके बोलेंगे, ये मैनें सीधे बोल दि‍या।)

लव जि‍हाद की एक छोटी सी और टेस्‍टिंग की मैनें। इसकी असलि‍यत क्‍या है, इसमें अक्‍सर स्‍मार्टफोन यूज करने वाले मुस्‍लि‍म युवाओं का नाम लि‍या जाता है, तो देखना चाहा कि आखि‍र कौन लोग हैं जो मोबाइल/एसएमएस/एफबी से लव जि‍हाद ऑपरेट करते हैं। आसान सी टेस्‍टिंग है, आप भी कर सकते हैं। मैनें एफबी पर एक हिंदू तो दूसरी मुस्‍लि‍म लड़की की डमी आईडी बनाई। तीन हफ्तों तक बाकायदा उन्‍हें ऑपरेट कि‍या। हिंदू लड़की की आईडी पर 85 प्रति‍शत हिंदू आए और टोटल फ्रेंड नंबर 800 से ज्‍यादा नहीं जा पाया। मुस्‍लि‍म लड़की की आईडी पर भी हिंदू लड़कों का यही प्रति‍शत रहा और फ्रेंड्स नंबर 2500 क्रॉस कर गए। इनमें से कई हिंदू लड़के तो ऐसे भी रहे जि‍न्‍होंने सीधे सेक्‍स करने का ऑफर भेजा।  नंबर्स मुस्‍लि‍म आईडी पर ज्‍यादा रहे और 90 फीसद से ज्‍यादा मुस्‍लि‍मों ने दोनों ही आईडी पर तमीज से बात की शुरुआत की। बात का जवाब नहीं मि‍ला तो पलटकर गालि‍यां नहीं दी।

कुल मि‍लाकर बात इतनी है कि अगर आप इनसे ये कहेंगे कि महंगाई तो ये कहेंगे धर्मांतरण। आप कहेंगे रोजगार तो ये कहेंगे बलात्‍कार। आप कहेंगे अर्थव्‍यवस्‍था तो ये कहेंगे पाकि‍स्‍तान मुर्दाबाद। लव जि‍हाद भी कुछ ऐसा ही है। दि‍लीप मंडल की बात याद आती है कि आपमें दम हो तो आप प्रेम यज्ञ कीजि‍ए। प्रेम करने के लि‍ए कहीं ज्‍यादा बहादुर होना होता है। क्‍या एक ऐसे देश की परि‍कल्‍पना नहीं की जा सकती जि‍सके सभी नि‍वासी प्रेम करते हों। लेकि‍न.. पूंजीवाद और फासीवाद का ये गठजोड़...जबतक इसका सड़कों सहि‍त हर घर की चौखट पर इसका वि‍रोध नहीं होगा, तब तक शांति के ये हत्‍यारे गांव गांव जाकर अशांति का बीज बोते रहेंगे। (कमीने लाल रंग का धागा भी बांध रहे हैं।)

इनका यही इलाज है कि इन्‍हें दरवाजे से ही बगैर सुने चलता कर दें। अपने आसपास के लोगों को शांति, प्रेम और भाईचारे का फ्रेंडशि‍प बैंड बांधें। शांति को नजर लग गई है। देश के कई हि‍स्‍से घायल हैं। कराह रहे हैं।

Friday, August 15, 2014

Letter to the mike of Red Fort: लालकि‍ले के माइक को पत्र

प्रि‍य लालकि‍ले के माइक,

 आज तुम्‍हें देखा। कि‍तने दुबले हो गए हो तुम। एकदम मेरे देश की तरह कुपोषणग्रस्‍त। हो सकता है तकनीक ने तुम्‍हें ऐसा बना दि‍या हो, वैसे भी तकनीक हम लोगों में से 30 फीसद लोगों को कुपोषणग्रस्‍त बना ही चुकी है। चाहे वो दि‍मागी कुपोषण ही रहा हो जि‍सने आज तुम्‍हारी ये हालत कर दी। आज तुम अपने पूरे कुनबे के साथ लालकि‍ले पर दि‍खे तो लगा कि चलो, कि‍सी के तो 2020 तक जिंदा रहने की उम्‍मीद है, भले ही वो तुम हो। वैसे तो हमारे प्रधानमंत्री महोदय के भक्‍तगण गली गली हर बैठकी में यह कहते देखे-सुने जा सकते हैं कि 2020 तक वो ''हिंदुस्‍तान'' से कि‍सी एक नस्‍ल को संपूर्ण रूप से मि‍टा देने वाले हैं। उम्‍मीद थी कि आज बरास्‍ते तुम उस योजना का भी खुलासा वो भगवान कर देते, जि‍ससे कि यह सारी घोषणाएं उनके भक्‍तगण कर रहे हैं, लगातार करते जा रहे हैं। 

माइक, कि‍तनी अच्‍छी बात है (डोंट मांइड माइकजी प्‍लीज) कि तुम बोल नहीं सकते। बोल सकते होते तो आज कम से कम हमें उस लफ्फाजी से तो नि‍जात मि‍लती जो बुद्ध की भूमि नेपाल बता रही थी। पता नहीं क्‍यों मेरे मन के तार बार बार इस बात से जुड़ रहे हैं कि जो बुद्ध को मानते हैं, उनका देश नेपाल होने का फतवा बहुत जल्‍द आने वाला है। अल्‍लाह को मानने वालों का फतवा तो नरेंद्र मोदी के कारिंदे कई बार दे ही चुके हैं कि उनका देश पाकि‍स्‍तान/बांग्‍लादेश है। मेरे सामने से इति‍हास का वह मंजर हूबहू गुजर रहा है जब दक्षि‍ण भारत के रामानंद संप्रदाय के लोगों ने बौद्ध धर्म को मानने वालों को उत्‍तर भारत से काफी दूर खदेड़ दि‍या था। माना कि उस वक्‍त भारत वारत का कोई अस्‍ति‍त्‍व नहीं था, पर बात क्षेत्र के मौजूदा भौगोलि‍क पहचान की है। यानि कि अगर बार बार बुद्ध की भूमि नेपाल बोली जा रही है, तो मैं से लंबी अवधि की साजि‍श (लांग टर्म कांस्‍पि‍रेसी) मान सकता हूं। माइक, सच्‍ची कहता हुं, तुम उस वक्‍त थोड़ा सा तो खराब हुए होते। मगर ये तकनीक मुई जो है ना, ये तुम्‍हारा खून चूसकर ही मानेगी, ठीक वैसे ही, जैसे कि देश के 35 साल के लोगों का चूस रही है। उन्‍हें कुपोषि‍त बना रही है।

तुम्‍हें प्रि‍य लि‍खना मेरी कोई मजबूरी नहीं है, सिर्फ इसलि‍ए तुम्‍हें प्रि‍य लि‍खा क्‍योंकि तुम्‍हें प्रि‍य न लि‍खने का मेरे पास कोई ठोस कारण नहीं था और आमतौर पर मैं चीजों को प्रेम के साथ ही शुरू करना चाहता हूं, शुरू करता भी हूं। और प्रेम करना भी चाहि‍ए। मैनें सुना माइक कि तुमने भी सुना कि महि‍लाओं की घटती संख्‍या पर तुम्‍हारे मुंह में अपनी आवाज ठूंसने वाला पि‍तृसत्‍तात्‍मक फासि‍स्‍ट चिंति‍त था। मुझे इस चिंता ने और भी चिंता में डाल दि‍या है क्‍योंकि मैं जानता हूं कि संघ की सनातनी पि‍तृसत्‍ता कैसे काम करती है। इसी तरह से मां बेटि‍यों बहुओं बेटों में उलझाकर कि‍स तरह से ब्‍लैकमेल करती है महि‍लाओं को, यह समझना कोई मुश्‍कि‍ल काम नहीं है। चिंता ने चिंता जताई पर हि‍स्‍सा देने से पूरी तरह निश्‍चिंत रही। अगर आज बजरि‍ए तुम, मुझे यह सुनने को मि‍लता कि देश की आधी आबादी को उसका हक मि‍लेगा और वो जीरो टॉलरेंस के लेवल पर मि‍लेगा तो शायद मेरी चिंता को और चिंता नहीं होती पर चूंकि चिंता ये नहीं थी, इसलि‍ए हो रही है। एक तरफ महि‍लाओं के प्रेम के खि‍लाफ आरएसएस और भाजपा अभि‍यान चलाती हैं, खाप पंचायत का समर्थन करती हैं, लव जि‍हाद जैसे फर्जी नारे देकर दंगे कराए जाते हैं जि‍समें कि‍तनी महि‍लाओं की अस्‍मत लूट जाती है और दूसरी तरफ उनकी रक्षा की जो लफ्फाजी की जाती है... तुम फि‍र से क्‍यूं नहीं खराब हो गए थे माइक। क्‍या तुम्‍हें उस वक्‍त जसोदा बेन की भी याद न आई।

माइक, तुमको तब भी खराब होना था, जब आतंकवादि‍यों और माओवादि‍यों को एक तराजू में तौला जा रहा था और उनके द्वारा की जाने वाली हत्‍याएं निर्दोषों की हत्‍याएं कही जा रही थीं। क्‍या महेंद्र कर्मा निर्दोष थे। ठीक है, मैं मानता हूं कि कानून व्‍यवस्‍था का शासन होना चाहि‍ए, पर क्‍या सिर्फ एकपक्षीय। क्‍या सिर्फ 35 वर्ष के टैलेंटेड युवाओं की ही बात होनी चाहि‍ए, क्‍या सिर्फ मेड इन इंडि‍या की ही बात होनी चाहि‍ए। कि‍तना बड़ा तबका तो ऐसा है जो अनप्रोफेशनल है। पर तुम्‍हारे मुंह में बोलने वाले को शायद यह नहीं पता क्‍योंकि वह जहां से आए हैं, उसकी खि‍ड़की फेसबुक और ट्वि‍टर पर भी खुलती है। और यहां से अगर वो हमें इति‍हास बताती है तो सिर्फ वैदि‍क काल का इति‍हास बताती है। वैदि‍क काल में भी वह बड़े चूजी हैं। अब काल की बात चली है तो काश तुम बताते कि तुम कि‍स काल से आए हो। कहीं चुनाव के ठीक पहले वाले उस काल के नहीं जब बड़े बड़े प्‍लास्‍टि‍क के लालकि‍ले बनाए जाते थे?

वैसे कहने को तो बहुत कुछ मन कर रहा है माइक अंकल, पर चूंकि साहेब ने तुम्‍हारे एक बच्‍चे का सि‍र वहीं मौके पर ही कलम कर दि‍या था तो मैं समझ सकता हूं कि तुम गमजदा होगे। इसलि‍ए चलते चलते उन लोगों के लि‍ए कबीर का ये एक दोहा कहे जा रहा हूं जो लोग अब गुस्‍से में लाल पीले होंगे-
''यह कलि‍युग आयो अबै, साधु न मानै कोय।
कामी क्रोधी मसखरा, ति‍नकी पूजा होय।।''

तुम्‍हारा तो कभी नहीं
खाद भंडार वाला राहुल 

Thursday, October 31, 2013

असुरों का ज्ञान सहेजने में जुटीं सुषमा

झारखंड में असुर आदिम जनजाति नेतरहाट के आसपास मिलते हैं. वैसे इनका निवास स्थान नेतरहाट से छत्तीसगढ. को जोड़ने वाली पट्टी तक फैला है. लेकिन , आज इनका अस्तित्व खतरे में है. ऐसे में एक असुर की बेटी ने इस जनजाति के संरक्षण का बीड़ा उठाकर मिसाल पेश की है. इनका नाम सुषमा असुर है. इनके पिता खंभीला असुर लातेहार जिला के नेतरहाट के रहने वाले हैं. इस जनजाति को बचाने के लिए जो काम सरकार को करनी चाहिए वह सुषमा कर रही हैं. बकौल सुषमा अगर असुर का अस्तित्व समाप्त हो गया तो झारखंड से एक इतिहास का अंत हो जायेगा. उनके मुताबिक 1872 में देश में पहली जनगणना हुई थी. उस समय 18 जनजातियों को मूल आदिवासी की श्रेणी में रखा गया था. इसमें असुर पहले नंबर पर थे. लेकिन, इन 150 वर्षों में जैसे सरकार ने इस आदिवासी समुदाय को भुला दिया है. नेतरहाट क्षेत्र में जहां इनका निवास स्थान है, वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं जैसे चिकित्सा, पेयजल, बिजली, सड़क आदि का आभाव है. शिक्षा के नाम पर इनके पास प्राथमिक विद्यालय तो है पर शिक्षक नहीं. दसवीं कक्षा पास आदिम जनजाति के लोगों को सीधे सरकारी नौकरी देने का प्रावधान है. लेकिन, कईलोग ऐसे हैं जो दसवीं पास हैं और नौकरी नहीं है. जिस इलाके में असुर जनजाति रहते हैं वह एक पठारी इलाका है. निचली जगह से उपर की ओर चढ.ने में दिक्कत होती है. उपरी इलाके में चढ.ने के लिए इन्हें बॉक्साइट लदे ट्रक का सहारा लेना पड़ता है. इन ट्रकों में इनके साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है. ऐसा परिवहन की सुविधा नहीं होने के कारण होता है.

सुषमा बताती हैं कि असुर समुदाय के लोग अपने कला-कौशल के कारण जाने जाते थे. लेकिन, अब इनकी कला कौशल को बचाये रखना मुश्किल होता जा रहा है. अब लगता है असुर जाति केवल हमें किस्से-कहानियों में ही सुनने को मिलेंगे. कभी प्रचीन काल में दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने वाले असुर आज की तारीख में अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं. असुरों की संख्या अब महज 10000 से भी कम बची है. ऐसे में इनके कला कौशल के संरक्षण की जरूरत है.

सुषमा असुर अपने जनजाति के ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की कोशिश में लगी हैं. इसके तहत वे वीडियो फुटेज बनाकर रखना चाहती हैं ताकि आने वाली पीढ.ियों को इस ज्ञान की संपदा हासिल हो सके. सुषमा के इस प्रयास को हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार उदय प्रकाश का सर्मथन और सहयोग मिला है. रांची से साहित्यकार अश्‍विनी कुमार पंकज लगातार उनके संपर्क में हैं और उनके काम को आगे बढ.ाने में हर तरह का सहयोग कर रहे हैं.

असुरों का महत्व

साहित्यकार अश्‍विनी पंकज के मुताबिक झारखंड के लोकगीतों में असुरों का उल्लेख मिलता है. इनमें असुरों की वीरता और उनके कार्यों की जानकारी मिलती है. ऐसा माना जाता है कि महाभारत के लिए हथियारों का निर्माण असुरों के द्वारा ही हुआ था. ये सारी बातें सादरी और कुड़ुख भाषा के लोकगीतों में सुनने को मिलती है. रामायण में भी इन असुरों का उल्लेख मिलता है. असुरों को इस काल में युद्ध करने वाला बताया जाता है. ये शारीरिक रूप से सृदृढ. होते थे. असुर दुनिया के सबसे पुराने बाशिंदे और धातुविज्ञानी हैं. ऐसा माना जाता है कि असुरों ने ही लोहा बनाने की विधि का अविष्कार किया जिससे स्टील बनाया जा सका. अध्ययनकर्ताओं और इतिहासकारों के मुताबिक एशिया व यूरोप में और कोई इंसानी समुदाय ऐसा नहीं बचा है जो यह प्राचीन धातुविज्ञान जानता हो. शायद अफ्रीका में एक-दो आदिवासी समुदाय हैं जिन्हें यह कला आती है.

खतरे में असुर 

नेतरहाट क्षेत्र में असुरों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. इनकी जमीन पर बॉक्साइट खनन का काम होने से आजीविका का मूल स्रोत छिन गया है. इनके पास आजीविका का साधन नहीं होने के कारण ये भूखे रहने को मजबूर हैं. खेतों में बॉक्साईट के अपशिष्ट जमा हो जाने के कारण खेत उपजाऊ नहीं रहे. खेतो की उर्वरा शक्ति कम हो गई है. सरकार भी इनके लिए कुछ नहीं कर रही. सरकार की जितनी भी योजना इनके लिए बनी वह केवल कागजों में ही दब कर रह गई. पिछले कुछ सालों में इनकी आबादी लगातार कम होती जा रही है. जाहिर है, जिस रफ्तार के साथ असुरों की आबादी सिमट रही है, उसमें अब ये सवाल खड़ा होने लगा है कि क्या असुरों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा?

मदद को आगे आये 

असुर जनजातियों के कला एवं कौशल के संरक्षण के लिए सुषमा को तकनीक की जरूरत थीा. इसके लिए इन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया है. फेसबुक पर इन्होंने असुरों के आदि ज्ञान एवं सामुदायिक ज्ञान के संग्रह के लिए एक वीडियो एचडी कैमरा, एक ऑडियो रिकॉर्डर, कार्यक्षेत्र में स्टोरेज के लिए एक लैपटाप, ऑडियो, वीडिया एवं फोटो के व्यविस्थत संग्रहण व संपादन के सबटाइटलिंग के लिए एक मैक पीसी की डिमांड की. जिससे वे अपने विलुप्त होते ज्ञान को संरक्षित कर सकें.

इसके बाद असुरों की पीड़ा और विषय की गंभीरता को समझते हुये भारत के सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश ने एक मिनी डीवी कैमरा इन्हें भेंट किया. इंग्लैंड के एक विश्‍वविद्यालय के छात्र तथागत नियोगी ने उन्हें कैनन का एक डिजिटल कैमरा दिया है. यह उनके लिए बहुत उपयोगी साबित हो रहा है.

तथागत का कहना है कि ‘असुरों के पास जो ज्ञान है अब वह कम से कम एशिया के किसी इंसानी समाज के पास नहीं बचा है. खासकर, धातुविज्ञान की प्राचीनतम परंपरा. एशिया से बाहर अफ्रीका के दो-तीन आदिवासी समाज में भी अभी यह ज्ञान परंपरा बची हुई है.’ असुरों के अनुसार उनकी संस्कृती को बचाने के लिए उन्हें और भी संसाधन की अवश्यकता है. असुर झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखडा संगठन ने भी इन असुरों की आवाज उठाई और इनका सर्मथन किया है.

असुरों का पर्व

हर आदिम जनजाति का अपना एक विशेष पर्व होता है. इसी प्रकार असुरों का भी अपना एक पर्व है. यह फागुन के महीने में मनाया जाता है. इसे ये लोग सड़सी कुटासी के नाम से मनाते हैं. इस पर्व में ये लोग अपने पुराने औजारों के साथ-साथ उस भट्ठी की भी पूजा करते हैं जिसमें ये औजार बनाते थे. इनके समुदाय में एक नेत्रहीन बुजुर्ग आज भी हैं जो कच्ची धातु को हाथ में उठा कर यह बता देते हैं कि इसमें धातु की कितनी मात्रा है.

Wednesday, July 18, 2012

काका ने कैंसर की पीड़ा साझा की थी मुमताज से



राजेश खन्ना के निधन की खबर मिलने पर उनके साथ दस सुपरहिट फिल्‍में देने वाली अदाकारा मुमताज खासी भावुक हो उठीं। मुमताज ने कहा है कि दूसरों के साथ बहुत ज्यादा नहीं घुलने-मिलने वाले काका उनके बेहद करीब थे। फिल्मी पर्दे की सबसे हिट जोड़ी के तौर पर दोनों ने आपकी कसम, रोटी, अपना देश, सच्चा झूठा समेत दस सुपरहिट फिल्में दीं। 
अपने परिवार के साथ लंदन में रह रही मुमताज ने बताया कि उन्हें इस बात का संतोष है कि वह पिछले महीने उनसे मिली थीं। उस दौरान दोनों ने कैंसर से अपनी-अपनी लड़ाई की बात की। हालांकि खन्ना के परिवार ने कभी उनकी बीमारी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।
स्तन कैंसर से अपनी लड़ाई जीतने वाली मुमताज ने कहा, "उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं बहुत मजबूत हूं और वह जानते थे कि कीमोथेरेपी के दौरान मैं किस पीड़ा से गुजरी थी। उनके लिए ऑर्डर किए गए  बहुत सारे व्यंजनों के बारे में मजाक करने पर उन्होंने कहा था कि उन्हें भूख महसूस नहीं होती। उस दिन सभी ने खाया, लेकिन काका ने नहीं।"
मुमताज ने बताया कि बीमारी की हालत में भी राजेश जिंदादिल थे। मजाक करना, ठहाके लगाकर हंसना उनकी आदत थी जो उस समय भी कायम थी। मुमताज कहती हैं कि उनके लिए यह गर्व की बात है कि जिन फिल्मों में उन्होंने साथ काम किया वे सभी सुपरहिट रहीं। राजेश के साथ मेरी कई यादें हैं। रोटी फिल्म की शूटिंग के दौरान बर्फ में मुझे उठाकर चलना उनके लिए कठिन काम था। उस एक सप्ताह के दौरान जब भी हम शूटिंग करते मैं उनसे   मजाक करती थी कि अब आपको 100 किलोग्राम का वजन उठाना होगा और वह कहते थे कि नहीं इतनी भी भारी नहीं हो। पर मुझे मालूम है मैं कभी भी दुबली नहीं थी। पिछले हफ्ते दारा सिंह की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान बॉलीवुड के कई दिग्गजों ने दुनिया छोड़ दी। राजेश के करोड़ों चाहने वालों के लिए यह एक मुश्किल समय है। नियति पर किसी का कोई वश नहीं है। राजेश के जाने से मैं बेहद दुखी हूं.....देखी जमाने की यारी बिछड़े सभी बारी-बारी.....।

प्रेस ट्रस्‍ट आफ इंडिया से साभार....

Thursday, July 12, 2012

कविता में व्याधि या कविता की व्याधि


एक विषय. दो कवि. दो अलग अलग तरह की कविताएं. लेकिन संवेदना की जमीन पर दोनों कैसे एक ही जगह पहुंचती हैं जहां वे समान रूप से अमानवीय और स्त्रीविरोधी हैं, जबकि एक कविता एक महिला द्वारा लिखी गई है और दूसरी एक पुरुष द्वारा. अपनी अब तक चर्चित हो चुकी इस आलोचना में शालिनी माथुर एक तरह से दोनों कविताओं का और उनके रचनाकारों के अंतर्मन का, उनकी वास्तविक राजनीति का उत्खनन करती हैं और दिखाती हैं कि कैसे खुद के नारीवादी होने का दावा करने वाली कविता या कवि-रचनाकार भी भीतर से कितने स्त्रीविरोधी, पितृसत्तात्मक हैं. घोषित रूप से स्त्रियों के पक्ष में लिखी गई इन कविताओं की यह आलोचना इसे भी दिखाती है कि किस तरह ये दोनों रचनाकार पूंजीवादी बाजारपरस्ती के नमूने के बतौर सामने आते हैं, जो अपने बुनियादी चरित्र में ही स्त्रीविरोधी और पितृसत्तात्मक है. शालिनी ने यहां आलोचना के नए तौर तरीके और मानक गढ़ने की भी कोशिश की है और इस रचना ने इसे भी साबित किया है आलोचना पर अकादमियों और हिंदी विभागों का एकाधिकार नहीं है बल्कि बेहतर, जन पक्षधर और सार्थक रचना तथा आलोचना इनसे बाहर, रोज बरोज के संघर्षों के बीच से, जनता के बीच से निकलती है. यह आलेख कथादेश के जून (2012) अंक में प्रकाशित हुआ है और यहां थोड़े संपादन के साथ पोस्ट किया जा रहा है. 

साहित्य का कोई प्रयोजन तो होता ही होगा, लोकसंग्रह, आत्माभिव्यक्ति, संस्कृति को समृद्ध करना या फिर हिन्दी की फ़िल्म डर्टी पिक्चर  की भांति एन्टरटेन्मेन्ट, एन्टरटेन्मेन्ट एंड एन्टरटेन्मेन्ट। कविता करने वालों को कहानीकारों, नाटककारों, और निबन्धकारों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता है। कविता भाव प्रधान हो सकती है, भावना प्रधान हो सकती है, अर्थवान भी और निरर्थक भी । कविता एब्सर्ड भी होती है पर कविता को कुछ न कुछ तो निरूपित करना होगा चाहे वह निरर्थकता या एब्सर्डिटी ही क्यों न हो। कविता ने शिल्प के अनुशासन से तो स्वयं को मुक्त कर लिया है- न छंद, न लय, न अलंकार, न छवियाँ, न बिम्ब। कविता अब गाई भी नहीं जाती, पढ़ ली जाती है। तो क्या पढ़ कर समझी भी न जाए? पाठक कविता से क्या अपेक्षा करे? खास कर जब कवि कवयित्री स्वयं को नारीवाद जैसे मानवीय विषय का प्रवक्ता बताते हुए अमानवीय रचनाएँ करें, निरन्तर करते रहें और  करते ही चले जाएँ। वे व्याधि पर कविता करें, इस चेतना के बग़ैर कि व्याधि से जूझ रहे मानव समाज को कैसा लगता होगा?

बीमारी एक खास किस्म का रूपक बनाती है- अंधता, हैज़ा, कुष्ठ, प्लेग, टी.बी., कैंसर और अब एड्स। अबे अंधा है क्या, कोढ़ की तरह सड़ना, प्लेग की तरह फैलना, टी.बी. या राजरोग से गलना, कैंसर की तरह जड़ जमाना यह सारे शब्द और मुहावरे मनुष्य की हृदयहीनता प्रदर्शित करते है। बातचीत और बतकहियों में रोग को मुहावरे की तरह इस्तेमाल करना एक प्रकार की क्रूरता है जिसे लोग बिना विचारे करते रहते हैं। सूसन सॉन्टैग जो स्वयं कैंसर से पीड़ित होकर इलाज से ठीक हुई थीं अपनी पुस्तक `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' में कहती है कि ऐसे प्रयोगों से रोग ही नहीं रोगी भी कलंकित होता है। वह निरूत्साहित हो जाता है, चुप्पी साध लेता है और शर्मिन्दा हो कर इलाज कराने से झिझकने लगता है। व्याधि को रूपक बनाते ही हम व्याधि को ख़तरनाक और असाध्य बना देते हैं। इससे रोगियों का एक अलग वर्ग तैयार हो जाता है- आइसोलेटेड - अलग-थलग अपने कर्मों का फल भोगते हुए, अपने अंत की प्रतीक्षा करते हुए।

सूसन सॉन्टैग  का लेख `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर'  1978 में छपा और बहुत चर्चित हुआ। स्वयं कैंसर का इलाज करवाते समय उन्होंने पाया कि किस प्रकार बीमारी को रूपकों और मिथकों से जोड़ने से उत्पन्न मानसिक दबाव अनेक मरीजों की मौत का कारण बनता है। वे कहती हैं कैंसर केवल एक बीमारी है- (जस्ट अ डिज़ीज) अभिशाप नहीं, सज़ा नहीं, शर्मिन्दगी नहीं। इसका इलाज हो जाए तो यह ठीक हो जाता है।

साहित्य में क्या स्त्री दृष्टि और पुरुष दृष्टि अलग-अलग होती होगी ? यह प्रश्न अक्सर हमारे सामने आ खड़ा होता है। आज स्तन के कैंसर पर लिखी गई पवन करण की कविता ’स्तन’ और अनामिका की कविता ‘ब्रेस्ट कैंसर’ की समीक्षा करते समय उत्तर ढूंढ़ने का प्रयास कर लेते हैं। क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से अलग है? क्या अनामिका की दृष्टि पवन करण की दृष्टि से इसलिए अलग होनी चाहिए, क्योंकि अनामिका स्त्री हैं ? क्या पुरुष के पास पुरुष दृष्टि और स्त्री के पास स्त्री दृष्टि होती है? या कवि चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो, दृष्टियाँ दो प्रकार की होती हैं मर्दवादी और नारीवादी, या फिर मानवीय और अमानवीय।
स्त्री का वक्षस्थल पुरुष कवियों का प्रिय विषय रहा है। उसका वर्णन सामान्यतः सौन्दर्य वर्णन के लिए  शृंगारिक भाव से किया जाता रहा है। स्त्री शरीर के उतार-चढ़ावों को निरूपित करने के लिए अनेक उपमाएँ दी जाती रहीं हैं। क्या किसी पुरुष ने अपने किसी अंग के बारे में इस प्रकार का वर्णन या निरूपण किया है? शायद नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ ही वर्ष पूर्व तक कविता लेखन पूरी तरह पुरुष वर्चस्व के अधीन था पर आज हमारे सामने जो कविताएँ हैं वे इसी सदी में लिखी गई हैं। ये कविताएँ उन समयों में लिखी गई हैं जिन समयों में जॉन स्टुअर्ट मिल और मैरी वोल्टसन क्राफ्ट स्वतंत्रता तथा स्त्री-पुरुष समकक्षता के सिद्धान्त प्रतिपादित कर चुके थे। ये कविताएँ घोषित रूप से स्वयं को स्त्री का पक्षधर कहने वाले नारीवादी कवियों की हैं। ये स़्त्री के ‘ब्रेस्ट कैंसर’ पर लिखी गई कविताएँ हैं।

इस विषय पर द ब्यूटी मिथ में नाओमी वुल्फ़ ने गम्भीर चर्चा की है। वे बताती हैं कि किस प्रकार पुरुष के शरीर के नग्न निरूपण को अश्लील समझा जाता है और उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है चाहे वह एड्स जैसी बीमारियों के विषय में जागरूकता हेतु ही क्यों न किया गया हो, और किस प्रकार स्त्री के वक्षस्थल का सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शन के लिए प्रयोग होता रहा है, कभी विज्ञापन के रूप में, कभी फिल्म के रूप में, कभी गीतों के रूप में । इस प्रकार पुरुष का शरीर बेहद सम्भ्रान्त तरीक़े से ढका रहता है जिससे वह शालीन बना रहता है,  और स्त्री का शरीर और उसकी चोली विज्ञापन और पर्दे पर थिरकती रहती है , जिससे उसका शरीर बाज़ारू बनता है। जो संस्कृतियाँ स्त्रियों को सामान्यतः नग्न निरूपित करती हैं और पुरुष को नहीं, वे लगातार धीरे-धीरे असमानता सिखाती हैं।

भारत में भी राई नर्तकियाँ, बेड़िनें और नौटंकी में नाचने वाली ग़रीब औरतें भी अपने चेहरे पर घूँघट ढककर और छाती खोलकर दो पैसों की ख़ातिर नाचती रही हैं और बेशऊर मर्द उन पर चवन्नियाँ लुटाते रहे हैं। नौटंकी देखने औरतें नहीं आतीं-नौटंकी  मर्दां का तमाशा है। इन बेचेहरा औरतों की कोई पहचान नहीं। वे औरत ज़ात हैं, उनका वक्षस्थल ही उनकी पहचान है। चवन्नी उसी पर न्योछावर की जाती है।
पवन करण ने भी इसी विषय पर कविता लिखी है, कविता का शीर्षक  है ‘स्तन’

"इच्छा होती तब वह धंसा लेता उनके बीच अपना सिर ... /और तब तक उन पर आंखें गड़ाये रखता,  जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से /...या लजा कर अपने हाथों से छुपा नहीं लेती उन्हें... अंतरंग क्षणों में उन दोनों को हाथों में थाम कर उससे कहता/ यह दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियॉ/ इन्हें संभाल कर रखना/ वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता/“ ... ” वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के / इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती “....“मगर रोग ऐसा घुसा उसके भीतर/ कि उनमें से एक को ले कर  ही हटा देह से। कोई उपाय भी न था सिवा इसके/ उपचार ने उदास होते हुए समझाया/... अब वह इस बचे हुए एक के बारे में/ कुछ नहीं कहता उससे, / वह उसकी तरफ देखता है।/ और रह जाता है कसमसा कर। /.... मगर उसे हर समय महसूस होता है।/ उसकी देह पर घूमते उसके हाथ।/ क्या ढूंढ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” ...."उस खो चुके एक के बारे में भले ही एक दूसरे से न कहते हों वह कुछ, मगर वह विवश जानती है/उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से।"

कवि पवन करण उक्त गद्यात्मक पंक्तियों को स्तन शीर्षक वाली कविता के रूप में ’स्त्री मेरे भीतर’ नामक संग्रह में संग्रहीत करते हैं।

पवन करण की कविता में स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है, पुरुष के रमण के लिए, देखें वह स्त्री देह के लिए किस प्रकार के उपमान प्रयोग करते हैं-  "वह इन दोनों को कभी शहद के छत्ते/ तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता"। पवन करण की कविता स्त्री देह को गोश्त  के टुकड़े के रूप में निरूपित करती है जिसे पुरुष लालची निगाहों से देखता है "और तब तक उन पर आँखें गड़ाये रखता, जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से"।  पवन करण की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है "वह भी जब कभी खड़ी होकर आगे आईने के /  इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती"।
पोर्नोग्राफर शरीर को मनविहीन, हृदयविहीन वस्तु के रूप में निरूपित करता है आत्मीयता (इंटिमेसी) और सम्बन्ध (कनेक्शन) रहित।
-सूसन ग्रिफिन

पवन करण की एक यही कविता नहीं अधिकांश कविताएँ पोर्नाग्राफी की श्रेणी में आती है क्योंकि उनमें शरीर (बाडी) को मन(माइंड) से अलग करके देखा गया है तथा स्त्री शरीर को पुरुष के अधिपत्य की भूमि माना गया है। पवन करण के पुरुष के हाथों में स्त्री शरीर ही नहीं उसके अलग-अलग अंग एक खिलौना हैं।

कविता में निरूपित पुरुष स्त्री को केवल देह के रूप में ही नहीं देह के केवल रमणीय अंगों के रूप में देख सका।  देह भी ऐसी जो कैंसर से ग्रस्त है, कैंसर  भी ऐसा जिससे शरीर का पूरा एक अंग काट कर निकालना पड़ा। दुःखद तो यह है कि कविता का समर्पण नाम लेकर किया गया, "संगीता रंजन के लिए जिसे छाती के कैंसर के कारण अपना एक स्तन गंवाना पड़ा।"  सभ्य समाज में एक आँखवाले, एक टाँगवाले, एक हाथवाले व्यक्ति की विकलांगता को द्योतित करने वाले शब्द कहना उचित नहीं समझा जाता, वहाँ स्त्री के एक ब्रेस्ट को कैंसर के कारण काट दिये जाने पर ऐसी कविता लिखी गई और नाम लेकर व्याधिग्रस्त स्त्री को समर्पित की गई ।
स्त्री पुरुष से हीनतर है, वह पुरुष के अधीन है, इस बात को पोर्नोग्राफ़र इतनी बार कहता है कि लोग इस बात पर यकीन करने लगते हैं।
-सूसन ग्रिफ़िन

पवन करण की स्त्री भी अपने शरीर को पुरुष की दृष्टि से देखती है। वह आब्जेक्टिफ़ाइड है (वस्तुकृत), कंट्रोल्ड (विवश) और ह्यूमिलिएटेड (अपमानित) कि उसे कैंसर से मरने से बचने के लिए स्तन गंवाना पड़ा। "उस खो चुके एक के बारे में भले ही/ एक दूसरे से न कहते हो वह कुछ/ मगर वह विवश जानती है/ उसकी देह से उस एक के हट जाने से/ कितना कुछ हट गया उनके बीच से "। स्त्री विवश है, पोर्नाग्राफी की क्लासिकल स्त्री छवि।

पवन करण के पुरुष को इस बात का संतोष नहीं कि सर्जरी से उसकी सहचरी को जीवन के कई नए वर्ष मिल गए। मगर उसे हर समय महसूस होता है। उसकी देह पर घूमते उसके हाथ/क्या ढूँढ़ रहे है कि उस वक्त वे/ उसके मन से भी अधिक मायूस हैं।” पवन करण को संदेह का लाभ दें तब भी पाएँगे कि कवि की सहानुभूति स्त्री के नहीं पुरुष के प्रति है जिसका खिलौना शल्य चिकित्सा से कट गया। पुरुष  के पास शरीर भी है और मन भी क्योंकि खिलौना टूट जाने से उसका मन मायूस है और हाथ भी। पवन करण कहते हैं कि शरीर के विरूपित हो जाने से स्त्री को हानि हो न हो पुरुष को होती है क्यों कि वह स्त्री शरीर से उस तरह से नहीं खेल सकता जिस तरह खेलना चाहता है और पुरुष यदि स्त्री में रुचि लेना बंद कर दे तो स्त्री का जीवन निरर्थक है क्यों कि स्त्री की प्रसन्नता इसी में है कि पुरुष का हाथ उसकी देह से खेले।
पोर्नोग्राफर स्त्री की हीनता ( इन्फीरियोरिटी ) में पूरा यकीन रखता है। वह इस बात में इतना गहरा विश्वास  रखता है कि वह इसे सिद्धान्त ( डॉक्ट्रिन ) के रूप में नहीं कहता। वह इसे एक सच्चे तथ्य (फैक्ट) के रूप में कहता है। वह यह नहीं कहता कि मुझे यह कहना है कि स्त्री हीन होती है। स्त्री कमतर है, सामान्यतः इस बात को वह इतनी  बार कहता जाता है- इशारों से, और वाक्यों से, कि इस प्रश्न पर बहस की कोई गुंजायश ही नहीं रह जाती।
-सूसन ग्रिफिन

उक्त परिभाषा पर पवन करण शत प्रतिशत सही उतरते हैं।

पवन करण अपवाद को नियम के रूप में स्थापित करते हैं। उनकी कविता दुःख क्षोभ या खेद से नहीं लिखी गई है, न ही ऐसा सोचने वाले पुरुष के प्रति हिकारत से। वह कविता यकीन के साथ लिखी गई है। पाठक देख सकते है कि पवन करण यह नहीं मानते कि स्त्री को इस रूप में देखना गलत है, उन्हें यकीन है कि स्त्री शरीर की यही उपयोगिता है। संभव है डेविल्ज़ एडवोकेट बन कर कोई कहे कि कुछ पुरुषों  की यही धारणा होती होगी,  परन्तु यूँ तो कुछ पुरुष  पेडोफ़ैलिक भी होते हैं। क्या हम उन मानसिक व्याधिग्रस्त पुरुषों को छोटे बच्चों का यौनिक और कामुकतापूर्ण नखशिख वर्णन करने की अनुमति देंगे और पुरस्कृत करेंगे?
पोर्नोग्राफर डिटर्मिनिस्टिक होते हैं, वे सोचते हैं, ठीक है, लोग ऐसे ही होते हैं, और हम उन्हें वह ही दे रहे हैं जो वे चाहते हैं पर यह सच नहीं है। सच यह है कि संस्कृति का निर्माण हम स्वयं करते है।
-सूसन ग्रिफ़िन

पवन करण के पात्र कीचड़ से सने हैं और यह कीचड़ भी उन्होंने खुद ही तैयार किया है। शल्य क्रिया के बाद एक स्तन वाली स्त्री पवन करण के पुरुष का प्रेम नहीं पा सकती। पवन करण की स्त्री पुरुष के हाथों विवश है और अपमानित, उस पुरूष  के हाथों, जो उसके शरीर का मालिक था। पोर्नोग्राफी का मकसद है- दूसरे के शरीर पर कब्ज़ा (मास्ट्री ऑफ़ दीज़ अदर्स) ।

पवन करण की इस कविता को वीभत्स कहना भी वीभत्स रस का अपमान करना है क्योंकि वीभत्स भी एक रस है जो सामान्यीकृत हो कर पाठकों तक पहुँचता है। पोर्नोग्राफी में नग्नता और पीड़ा पहुँचाना शामिल हो यह ज़रूरी नहीं। उनकी कविता हृदयहीन और अमानवीय है, जिसमें स्त्री  विवश, वस्तुकृत और अपमानित है। यह पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचना है- हैवानियत से भरी। (मैं पाशविकता की जगह हैवानियत शब्द का प्रयोग कर रही हूँ, चूंकि पशु जगत में ऐसी नृशंसता अकल्पनीय है।)

इसी वर्ष 2012 में प्रतिष्ठित साहित्यकार और नारीवादी चिंतक एड्रियन रिच का निधन हो गया। 1880 में लिखे अपने लेख ’’ कम्पलसरी हेट्रोसेक्सुअलिटी एंड लेस्बियन एक्ज़िस्टेंस’’ में वे पितृसत्ता  को पुरुष द्वारा स्त्री के शरीर, पैसे और भावना पर आधिपत्य (मेल राइट ऑफ फ़िज़िकल, इकोनामिक एंड इमोशनल एक्सेस टु वुमन) स्थापित करने का एक हिंसक राजनीतिक उपकरण सिद्ध करती हैं । पवन करण कहते हैं  "उन दोनों को हाथों में थामकर उससे कहता / ये दोनों तुम्हारे पास अमानत है मेरी / मेरी खुशियाँ / इन्हें संभाल कर रखना।’’  स्त्री का वक्षस्थल स्त्री के अंग है या पुरुष की अमानत और आधिपत्य क्षेत्र?  एड्रियन रिच ने विस्तार से विचार किया है कि किस प्रकार मर्दवादी विवरणों और छवियों के कारण स्त्रियाँ स्वयं अपने ही शरीर को अपनी दृष्टि से देख पाने में असमर्थ रहती हैं।

उधर पत्रिका पाखी के फरवरी 2012 के स्त्री लेखन विशेषांक  में ‘‘हिन्दी की समकालीन कवयित्रियों  में  शीर्ष  पर विराजमान ’’ कवयित्री अनामिका की कविता प्रकाशित हुई है, ब्रेस्ट कैंसर। वे कहती हैं-

‘दुनिया की सारी स्मृतियों को / दूध पिलाया मैंने, / हाँ, बहा दीं दूध की नदियाँ!, तब जाकर / मेरे इन उन्नत पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  / जाले लगे! कहते हैं महावैद्य / खा रहे हैं मुझको ये जाले / और मौत की चुहिया / मेरे पहाड़ों में / इस तरह छिप कर बैठी है कि यह निकलेगी तभी जब पहाड़ खोदेगा कोई! निकलेगी चुहिया तो देखूँगी मैं भी, सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे-फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहूँगी - हलो कहो कैसी रही ? अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! दस बरस की उम्र से तुम मेरे पीछे पड़े थे, /  अंग संग मेरे लगे ऐसे, दूभर हुआ सड़क पर चलना ! बुलबुले अच्छा हुआ फूटे! कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम से बाहर! / मेरे ब्लाउज़ में छिपे मेरी तकलीफों के हीरे, हलो / कहो कैसे हो?"

“जैसे निर्मूल आशंका  के सताए / एक कोख के जाए / तोड़ लेते हैं सम्बन्ध / और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है! / जाने दो जो होता है सो होता है, मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया, /  दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैने! / , हाँ,  बहा दीं दूध की नदियाँ! / तब जाकर / जाले लगे मेरे इन उन्नत  पहाड़ों की / गहरी गुफाओं में  ! / लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”
 

कवयित्री ने यह कविता उत्तमपुरुष (फर्स्ट पर्सन) यानी "मैं’’ इस्तेमाल करते हुए लिखी है, यद्यपि कविता किसी अन्य स्त्री की व्याधि पर लिखी गई है और उन्हीं वनिता टोपो को निवेदित की  है।

ब्रेस्ट कैंसर शीर्षकवाली कविता में ब्रेस्ट के लिए "उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं’’ वाला उपमान कितना उपयुक्त है? पहाड़ों और गुफाओं का दूध से तो दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध है ही नहीं पर क्या व्याधिग्रस्त अंगों के लिए सौन्दर्य वर्णन के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपमानों का प्रयोग उचित प्रतीत हो रहा है? उत्तम पुरुष में लिखी इस कविता में, मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं का प्रयोग स्त्री द्वारा स्वयं अपना नखशिख वर्णन करने के लिए किया गया है। हिन्दी की इस कविता में स्त्री स्वयं अपनी देह के सौन्दर्य का वर्णन करके अपनी देह को स्वयं ही अनावृत्त कर रही है। यहाँ प्रश्न अनावरण का नहीं निरूपण का है।

अश्लीलता निर्वस्त्रता में नहीं होती। सड़क पर पत्थर फोड़ती हुई स्त्री जब बच्चे को सार्वजनिक स्थान पर दूध पिलाती है, कभी-कभी मध्य तथा उच्च आय वर्ग की स्त्री भी बस या ट्रेन में ऐसा करती देखी जा सकती हैं, तब अश्लीलता का अहसास नहीं होता पर जब कोई स्त्री बेध्यानी का अभिनय करती हुई जान-बूझकर सबके सामने पल्ला सरकाती है, और ध्यान से चारों ओर देखती है कि सबने उसे ध्यान से देखा या नहीं तब वह अश्लील हरकत कर रही होती है। लम्पट पुरुष  इस हरकत पर मस्त हो सकते हैं पर ऐसा करते समय वह उन स्त्रियों को भी निर्वस्त्र कर रही होती है जो निर्वस्त्र नहीं होना चाहतीं। ठीक उसी तरह जिस तरह पोस्टर पर बनी नग्न और अपमानित स्त्री की छवि वहाँ से गुज़रने वाली हर स्त्री को नग्न अनुभव कराती है। इसमें पूरी स्त्री जाति के वे सदस्य भी नग्न हो जाते हैं जो नग्न नहीं होना चाहते ।

कवयित्री ‘‘संसार की स्मृतियों को दूध पिलाया’’, ‘‘बहा दीं दूध की नदियाँ’’, पदों का प्रयोग करती हैं। संसार की स्मृतियों का ब्रेस्ट कैंसर नामक व्याधि से क्या लेना देना? `इलनेस एज़ मेटाफ़ोर' नामक पुस्तक में इस विषय पर गहन चिन्तन है। चिकित्सक इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि इस व्याधि का इंसान के व्यक्तित्व से कोई ताल्लुक नहीं है, न स्वभाव से न स्मृति से । यह व्याधि नवजात शिशुओं तक को हो जाती है। यदि स्मृतियों का कोई अर्थ लगाना भी चाहें तो कह सकते हैं कि स्मृतियों  को वक्षस्थल में सहेजा जा सकता है, पर तब वक्षस्थल का अर्थ मन होता है। यहाँ पर कवयित्री मन नहीं स्तन के बारे में बात कर रही हैं।

इसके बाद का पद है "तब जाकर’’। हम लोग हिन्दी भाषा  में कहते हैं, "हमने कटरा से तेरह किलोमीटर चढ़ाई की तब जाकर वैष्णों  देवी के दर्शन  हुए’’, "पार्वती ने पर्वत पर वर्षों तप किया तब जाकर शिव जैसा पति पाया’’, "सिद्धार्थ ने वर्षों तक साधना की तब जाकर ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध कहलाए ’’, या "मैं रिज़र्वेशन कराने के लिए `वृद्धों विकलांगों तथा महिलाओं ’ वाली टिकट खिड़की के सामने एक घंटा पंक्ति में खड़ी रही तब जाकर रेल का टिकट मिला’’। स्पष्ट है ' तब जाकर ’ पद का प्रयोग तब किया जाता है जब हम किसी वस्तु या अवस्था को प्राप्त करना चाहें और उसके लिए कठिन प्रयास करें `तब जाकर’ वह वस्तु या अवस्था प्राप्त हो। अनामिका अपनी कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों में कहती हैं, "बहा दीं दूध की नदियाँ तब जाकर मेरे उन्नत पहाड़ों की गहरी गुफाओं में जाले लगे" और यही रूपक आरम्भ से अन्त तक चलता रहता है।

वे फैले हुए कैंसर के लिए जाले लगने का रूपक इस्तेमाल करती हैं। क्या वे जाले लगवाना चाहती थीं ? क्या वे जाले लगवाने के लिए प्रयासरत थीं ‘‘मेरे किए जो हो सकता था - मैंने किया,’’ ? दृष्टव्य  है वे किसी छोटी-मोटी बीमारी या दुःख-दर्द की बात नहीं कर रहीं, वे कैंसर की बात कर रहीं हैं, वैसा कैंसर जो इतना फैल चुका हो कि पूरा अंग काटकर शरीर से अलग करना पडे़। व्याधि यथार्थ होती है रूपक नहीं।

वे निर्मूल आशंका पद का प्रयोग करती हैं, जैसे दो भाई निर्मूल आशंका से पुराना सम्बन्ध तोड़ लेते है वैसे ही स्त्री ने अपने स्तनों से सम्बन्ध तोड़ लिया। कैंसर के पूरी तरह फैल जाने के बाद ही ऐसी सर्जरी होती है। डाक्टर किसी भी अंग का रिमूवल तभी करता है जब और कोई उपाय नहीं रहता। ऐसी सर्जरी निर्मूल आशंका से नहीं होती।

प्रसिद्ध कहानीकार मार्क ट्वेन का कथन है कि शब्द के सही प्रयोग (करेक्ट यूज़) और लगभग सही प्रयोग (आलमोस्ट करेक्ट यूज़) के बीच उतना ही बड़ा अन्तर है जितना आसमान में कड़कने वाली बिजली और जुगनू में। उन्नत पहाड़, नन्हें पहाड़, तकलीफों के हीरे, मौत की चुहिया, बुलबुले,शरीर के एक ही अंग के लिये इतने सारे परस्पर विरोधाभासी उपमान? “स्मृतियों को दूध पिलाया,’’ ‘‘तब जाकर जाले लगे’’, ‘‘लगे तो लगे’’ ‘‘दूधों नहाए पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ’’ यह सब पदों और शब्दों का सही प्रयोग है या लगभग सही प्रयोग? ’’

कवयित्री को इस व्याधि के ख़तरे का पूरा ज्ञान है परन्तु कवयित्री को मुहावरे इस्तेमाल करने का इतना शौक है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया की तर्ज़ पर वे कैंसर को मौत की चुहिया बताती हैं, जिसे महावैद्य ने बाहर निकाला। वे यह भूल जाती कि महावैद्य ने जिन्हें बाहर निकाला वह चुहिया नहीं थी पूरे पहाड़ ही थे जिनमें जाले लग गये थे। वे यह भी भूल गर्इं कि जिन्हें वे उन्नत पहाड़ बता रही थीं, उन्हें वे सर्जरी की प्लेट में रखे नन्हें पहाड़ कहने लगीं जबकि सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि शरीर से बाहर निकाल दिए जाने पर शरीर के अंग कई गुना बड़े दिखाई देते हैं क्योंकि वातावरण के प्रभाव से वे फूल जाते हैं।

मेरा उद्देश्य चीरफाड़ पर लिखी गई कविता की चीरफाड़ करना नहीं है,  मेरा उद्देश्य इस ओर संकेत करना है कि अपने समय की सबसे ख़तरनाक बीमारी पर इतनी निर्दयता, क्रूरता और संवेदनहीनता से खिलवाड़ करती हुई कविता लिखते हुए एक कवयित्री को ज़रा भी संकोच का अनुभव नहीं हुआ ।

अंग्रेज़ी के प्रख्यात कवि कीट्स की टी.बी. के कारण हुई मौत इतनी रोमांटिक मानी गई, कि अनेक लोग जवानी में वैसी मौत पाने की चाहत करने लगे। पच्चीस वर्ष की आयु में वास्तविक जीवन में व्याधि और मौत दर्दनाक होती है। तब टी.बी. असाध्य रोग था। दर्द की असहनीयता के कारण कीट्स अफी़म खाते थे। मरने से कुछ पहले तो उन्होंने अफ़ीम की पूरी बोतल मंगा ली थी और उनके मित्र को भय लगने लगा था कि दर्द से छुटकारा पाने के लिए वे कहीं पूरी बोतल खा कर खुदखुशी न कर लें। कीट्स को अपने जीवन की क्षण भंगुरता का दुःख था, उन्हें अपनी बीमारी से तकलीफ़ थी। उन्होंने अपनी समाधि के पत्थर पर लिखे जाने वाले हर्फ़ खुद ही लिखे थे, "यहाँ सो रहा है वह व्यक्ति, जिसका नाम पानी पर लिखा था’’ (हियर लाइज़ ही हूज़ नेम वाज़ रिट इन वाटर्स)। आज उमड़ने और कल मिट जाने का उन्हें दुःख था। व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। जवानी में बीमार होकर तपेदिक से मर जाना तमाशबीनों के लिए रूमानी हो सकता बीमार के लिए नहीं। मौत चुहिया नहीं होती ।

हम अनामिका की इस कविता का सहानुभूति पूर्ण पाठ करें और उन्हें इस बात का श्रेय देना भी चाहें तो नहीं दे सकते कि वे यह यह कह रही हैं कि हिंसक दृष्टिवाले पुरुषों से दस वर्ष की बच्ची भी त्रस्त है और स्त्री को अपने वक्षस्थल के कारण अपमानित और जोखिम ग्रस्त (वल्नरेबल) होना पड़ता है, इसलिए बेहतर है कि वह अंग हो ही न परन्तु वे यह नहीं कह रहीं। वे प्रारम्भ से अन्त तक वक्षस्थल का वर्णन सौन्दर्य बोधक उपमानों के साथ करती हैं और अन्त में उल्लास से भर उठती हैं‘‘बुलबुले अच्छा हुआ फूटे’’, कि अंग काट दिए गए तो अच्छा हुआ। शरीर के अंग का कटना दारूण दुःख होता है। क्या कोई भी स्त्री या पुरुष  अपने शरीर को कटवाना चाह सकता है, और कटवा डालना भी व्याधि से ग्रस्त होकर जिसे पाने के लिए स्त्री ने दूध की नदियाँ बहा दीं, और व्याधि भी ऐसी जो जाले की तरह फैल गई और अंग काटकर ही ठीक हो सकी क्योंकि यदि नहीं काटा जाता तो व्यक्ति की मृत्यु हो हो सकती थी। अन्तिम हृदयहीन पंक्तियाँ हैं  - "लगे तो लगे उससे क्या ! / दूधों नहाएँ और पूतों फलें मेरी स्मृतियाँ ”। मुहावरे इस्तेमाल करने को उतावली कवयित्री यह बताना भूल गईं कि ऐसी कौन सी स्मृतियाँ है जो मन का नहीं स्तन का दूध पीती हैं । अनामिका की कविता रोगी का मनोबल बढ़ाने का केवल नाटक करती है। दरअसल अनामिका भी स्त्री शरीर को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से ही देखती हैं।
पोर्नोग्राफर शरीर और मन का द्वैत स्थापित करता है। पोर्नोग्राफ़र असामान्य होता है, वह स्त्री को अपने शरीर से नफ़रत करना सिखाता है।
-सूसन ग्रिफ़िन

क्या कोई भी सामान्य बुद्धि वाला स्त्री पुरुष  या बच्ची-बच्चा अपने शरीर को कटवा डालने पर खुश हो सकता है? अनामिका की कविता में स्त्री बहुत खुश है, वह सर्जरी की प्लेट में रखे अपने कटे हुए अंगों से हँसकर बातें कर रही है - हलो कहो कैसी रही? पवन करण का पुरुष  स्त्री को पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित कर रहा है और अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफ़र की दृष्टि से निरूपित हो रही है।

सूसन ग्रिफिन का कहना है कि पोर्नोग्राफी सैडिज्म है। 

"एक औरत जब ऐसी सड़क या मुहल्ले में प्रवेश करती है जहाँ स्त्री शरीर की पोर्नोग्राफ़िक छवियाँ प्रर्दशित की गई हों, वह तुरन्त शर्मिन्दा हो जाती है। पोर्नोग्राफिक छवियों की वीथि में प्रवेश करते ही वह स्वयं ही उनमें से एक छवि हो जाती है कि वह उसका शरीर है जो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लगाया गया है। यदि वह स्वयं भी पोर्नोग्राफी में रूचि रखती है तो वह पोर्नोग्राफिक स्पेक्युलेशन का विषय बनती है। यदि वह दहशत में आ जाती है और ऐसी छवि के प्रति घृणा से विमुख हो जाती है, तो वह पोर्नोग्राफी की शिकार (विक्टिम) बन जाती है। इस प्रकार बिना अपमानित हुए वह पोर्नोग्राफी से बच नहीं सकती। इस तरह पोर्नोग्राफी सारी महिलाओं के प्रति सेडिज्म का उपकरण बनती है।’’

नाओमी वुल्फ़ भी पोर्नोग्राफी की पत्रिकाओं के सार्वजनिक पोस्टरों में पीटी जाती हुई, खून से सराबोर, हाथ-पाँव बंधी हुई स्त्री की छवियों का उदाहरण देती हैं। अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफी की विक्टिम है।

पवन करण और अनामिका ने व्याधि पर ही कविता नहीं लिखी हैं उन्होंने  स्तन की व्याधि पर कविता लिखी है। स्तन एग्ज़ॉटिक है। क्या वे किसी अन्य अंग के रिमूवल पर ऐसी कविता लिखते? क्या वे एम्प्यूटेशन से काटी गई टाँगों से पूछतीं कहो कैसी हो प्यारी बहनों, अच्छा हुआ कट गर्इं। क्या वे किसी बीमारी से निकाली गई आँखों की पुतलियों से पूछतीं, कैसी हो प्यारी कौड़ियों, अच्छा हुआ निकाल दी गर्इं, बहुत दुखती थीं, चश्मा पहनना पड़ता था। इन दोनों में से एक कवि की कविताएँ कदाचित् बी.ए. के पाठ्यक्रम में चलती हैं, और दूसरी कवयित्री शायद बी. ए. को पढ़ाती हैं।

एक विशेषता यह है कि पवन करण और अनामिका इन दोनों ने नाम लेकर उन स्त्रियों पर कविता लिखी है, जिनको ब्रेस्ट कैंसर हुआ। बिग बॉस नामक सबसे घटिया टी.वी. सीरियल में ब्रिटेन की जेड गुडी आई थीं, जिन्होंने  भारतीय प्रतिभागी शिल्पा शेट्टी को डॉग (कुत्ता) कह कर तमाशा खड़ा किया था। जेड गुडी की भी कैंसर से ही मृत्यु हुई थी। उन्होंने अपनी मौत को टी.वी. पर प्रर्दशित करने के अधिकार बेचे थे। इन दोनों कवियों ने भी शायद इन स्त्रियों से अधिकार खरीदे होंगे। बाजा़र में बेचने के लिए बीमारी और मौत भी बहुत बड़ा तमाशा है।

इन कवियों ने भले ही कैंसर पीड़ित स्त्रियों से अनुमति ले ली होगी पर हजारों लाखों लोग ऐसे हैं जो इस व्याधि से जूझ रहे हैं। व्याधि लाइलाज नहीं, पर इलाज कष्टसाध्य है। इसके कारण का पता नहीं है, इसलिए इसके साथ रहस्यमयता और दहशत जुड़ी हुई है। व्याधि पर ऐसी कविता पढ़ कर हजारों पीड़ितों का मन दहशत से भर जाता है।

सिल्विया प्लाथ नामक एक महान नारीवादी कवयित्री हुई हैं। उन्होंने एक कवि से विवाह किया। उनकी दो संताने हुई। सिल्विया प्लाथ की कविताओं को उनके जीवन काल में ही बड़ी सराहना मिली थी। बत्तीस साल की उम्र में अवसाद ग्रस्त होकर सिल्विया प्लाथ ने ओवन में अपना सिर डालकर आत्महत्या कर ली थी। जब उन पर फिल्म बनाने की पेशकश हुई, सिल्विया प्लाथ  की पुत्री इस पर बहुत व्यथित हुई और उन्होंने अपनी मृत माँ की अस्वाभाविक असामयिक मृत्यु पर फिल्म बनाने को मूँगफली चबाती हुई जनता को एक परिवार की त्रासदी पर गुदगुदाने  का गिरावट भरा प्रयास बताया। सिल्विया प्लाथ की मृत्यु के समय उनकी पुत्री फ्रीडा ह्यूज़ चार वर्ष की थी,बड़ी होकर वे कवयित्री बनीं। फ्रीडा ह्यूज़ की कविता है-

‘‘और अब,
वे एक फिल्म बनाना चाहते हैं,
जिस-तिस के लिए ,
जिसमें इतनी भी क्षमता नहीं,
कि स्वयं कल्पना कर सकें उस शरीर की
जिसका सिर तंदूर में पड़ा हो,
वह शरीर जो अपने बच्चों को अनाथ छोड़ कर जा रहा हो।
वे सोचते हैं, मैं उन्हें अपने माँ के शब्द दे दूँ,
जिन्हें वे अपने बनाए हुए हैवान पुतले के मुँह में ठूँस सकें-
उनकी सिल्विया- आत्मघाती कठपुतली।’’


सिल्विया प्लाथ की बेटी की कविता उन “मानवभक्षी लोगों पर प्रहार करती है जिन्हें जानने की उत्सुकता और लालसा है कि ओवन में पड़े सिरवाला" मानव कैसा लगता है- वे आत्महत्या को चित्रित करने को लालायित हैं। खतरनाक बीमारी को रूपक के रूप में प्रयोग करते हुए अंग-भंग के मरीज़ पर कविता लिखना और नाम लेकर समर्पित करना वैसा ही है।

यह आलेख नग्नता के खिलाफ नहीं है। यह आलेख स्त्री शरीर के पोर्नाग्राफिक निरूपण के खिलाफ है और व्याधि के हृदयहीन क्रूर निरूपण के खिलाफ भी। ऐसी कविताएँ पोर्नोग्राफी के उपभोक्ताओं के लिए लिखी जाती है। ऐसी कविताओं से पोर्नोग्राफी के नए-नए उपभोक्ता भी बनते हैं। यह एक फायदेमंद व्यवसाय है।

पवन करण की कविताओं से मेरा परिचय भले ही पहली बार पिछले ही वर्ष हुआ जब मैंने उनकी पुस्तक ‘‘स्त्री मेरे भीतर’’ पढ़ी, परन्तु पुस्तक में उल्लेख है कि उन्हें अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। ‘‘स्त्री मेरे भीतर" में संग्रहीत पवन करण की एक यही कविता नहीं, अनेक अन्य कविताएँ भी पोर्नोग्राफी की शास्त्रीय रचनाएँ  है जिनमें स्त्री विवश, वस्तूकृत और अपमानित है।

यह समय कुछ ज़रूरी सवाल उठाने का है। स्त्री के शरीर के पोर्नोग्राफिक निरूपण और व्याधि पर अनुत्तरदायित्वपूर्ण अमानवीय और क्रूर कविता के विषय में औचित्य का प्रश्न उठाना मैं ज़रूरी समझती हूँ । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या केवल कवियों के पास ही है? पाठकों के पास भी तो कोई अधिकार होंगे? मैं पाठकों के अधिकार का प्रयोग करते हुए यह प्रश्न उठा रही हूँ।

शेयर मार्केट में एक फिनॉमिना होता है, इसमें कुछ दलाल मिलकर एक समूह बना लेते हैं जिसको कार्टेल कहते हैं। वे लोग मिलकर किसी भी बेहद घटिया कम्पनी के शेयर खरीदते जाते हैं जिससे उसका मूल्य अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। इससे घटिया कम्पनी को लाभ होता है। वे ही लोग मिलकर कम्पनियों के शेयरों के दाम अस्वाभाविक रूप से घटाते-बढ़ाते रहते हैं। कार्टेल बनाना हमारे देश में आर्थिक अपराध माना जाता है। आपको याद होगा कि केतन पारेख आदि दलाल एक बार इसी अपराध में जेल भी गए थे। कार्टेल को इस सब से भले ही लाभ होता हो पर इससे देश की अर्थव्यवस्था  नष्ट हो जाती है।

हिन्दी के कवियों के कार्टेल ने पवन करण पर दाँव खेला है। कार्टेल के लाभ- हानि के बारे में नहीं कह सकती, पर इससे साहित्य की हानि तो हुई ही है। साहित्य में इस अपराध की कोई सज़ा नहीं। यह एक खुला खेल है। इस बाजा़र में स्त्री शरीर सबसे ज्यादा बिकाऊ चीज़ है। पर क्या व्याधियाँ भी इसमें बेची जाएँगीं ? मेरे प्रश्न स्त्री शरीर के बारे में ही नहीं व्याधि के बारे में भी हैं। ये व्याधि पर लिखी कविताएँ हैं या ये व्याधि ग्रस्त कविताएँ हैं, उन कवियों द्वारा लिखी हुई हृदयहीन कविताएँ जिन्हें कविताएँ लिखते चले जाने की व्याधि है ?

हिन्दी साहित्य में स्त्री की इस दशा का ज़िम्मेदार कौन है?
इस  प्रश्न के उत्तर में हमारे कवियों का कार्टेल मौन है।
(कवि धूमिल की कविता पर आधारित)


व्याधियाँ यथार्थ होती हैं रूपक नहीं। बीमारी की गम्भीरता, बीमारी के साथ जुड़ी तकलीफ़, असहनीय दर्द, दुर्बलता, जीर्ण होते हुए शरीर, बिस्तर पर पड़े रहने की मजबूरी, अंगों के कट जाने, शरीर के विरूपित हो जाने और अपने परिवारजनों और हमदर्दो की आँखों से बरसती सहानुभूति और उनके चेहरों पर लिखे ख़ौफ से आँकी जाती है। बीमारी को इतनी बेदर्दी बेरहमी और गै़रजिम्मेदारी से निरूपित करने वाले हिन्दी के शीर्षस्थ माने जाने वाले ये कवि कवयित्री नृशंसता की हद तक संवेदनहीन हैं।

अंग्रेज़ी में वश्यावृत्ति करवाने को फ़्लेश ट्रेड कहते हैं जिसमें स्त्री एक व्यक्ति न हो कर गोश्त होती है केवल गोश्त। पवन करण और अनामिका दोनों स्त्री शरीर के लिए ऐसे उपमानों और रूपक का प्रयोग करते है कि वे स्त्री को व्यक्ति की जगह फ़्लेश बना देते है। अनामिका की कविता शरीर के प्रति अनसेल्फ़कांशस बनानेवाली कविता नहीं है यह शरीर के प्रति अतिरिक्त सजगता मिटानेवाली कविता भी नहीं है। अनामिका की कविता की स्त्री भी स्वयं को  गोश्त का टुकड़ा ही समझती है अन्तर यह है कि पवन करण की कविता की ‘‘वह विवश जानती है / उसकी देह से उस एक के हट जाने से / कितना कुछ हट गया उनके बीच से।’’ और अनामिका की कविता की स्त्री ‘‘सर्जरी की प्लेट में रखे खुदे फुदे नन्हें पहाड़ों से हँस कर कहती है...अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी! ’’ गोश्त का टुकड़ा हट जाने से वह उल्लास से भर जाती है। उल्लास का अन्दाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अनेक कहावतों और मुहावरों से युक्त इस कविता में बारह विस्मयादिबोधक चिह्न हैं।

आज से सौ वर्ष पहले जन्मे लेखक मंटो ने एक कहानी लिखी थी ‘ठंडा गोश्त’। चर्चित होने की लालसा से प्रेरित हो कर पोर्नोग्राफिक माइंड से लिखनेवाले अनेक अन्य रचनाकार अपने घटियापन को न्यायसंगत ठहराने के लिए आजकल यह कहते पाए जाते हैं कि अश्लीलता का आरोप तो मंटो पर भी लगाया गया था। ऐसे लोगों को यह अहसास ही नहीं, कि मंटो की उस मार्मिक कहानी का ध्वन्यार्थ था कि मानव शरीर को गोश्त समझकर व्यवहार करनेवाला व्यक्ति निर्वीर्य हो जाता है। उस कहानी में यह ध्वनि इतनी प्रखर थी कि पाठक उस ध्वनि को आज भी नहीं भूले। (स्तन तथा ब्रेस्ट कैंसर इन दोनों गृहणीय कविताओं के साथ मंटो की उस हृदय स्पर्शी रचना का उल्लेख मात्र करने का भी मुझे खेद है।) मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि यह टिप्पणी स्तन और ब्रेस्ट कैंसर इन दो कविताओं पर है, इन कवियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर नहीं।

बचपन में अध्यापिकाएँ हमसे कहती थीं- गाय पर निबन्ध लिखो। बच्चे लिखते थे- गाय के दो सींग होते हैं, चार टाँगें होती है, एक पूँछ होती है, चार थन होते हैं। गाय हमें दूध देती है। गाय हमारी माता है। कुछ बडे़ हो गए तो हमने एक चुटकुला सुना। अध्यापिका ने बच्चों से गाय पर निबन्ध लिखने को कहा। सब बच्चे लिखने लगे। दो बच्चे कक्षा से बाहर चले गए। थोड़ी देर में वे कक्षा में लौटे। उनके साथ एक गाय थी । वे गाय के शरीर के ऊपर कलम और स्याही से निबन्ध लिखकर गाय को कक्षा में हाँक लाये थे। अध्यापक के पूछने पर उन्होंने ढिठाई से कहा आप ही ने तो कहा था कि गाय पर निबन्ध लिखो। चुटकुला सुनकर हम हँस पड़ते थे।

आज कहा जा रहा है, स्त्री को चर्चा से केन्द्र में लाओ। स्त्री पर कुछ लिखो। स्त्री के शरीर पर लिखी कविताएँ हैं  -  "स्त्री के दो स्तन होते हैं /  वे पर्वत के समान होते हैं / वे दशहरी आम के समान होते हैं/ उनमें से दूध की नदियाँ बहती हैं / उनसे पुरुष  खेल सकता है / यदि उनमें से एक कट जाए तो पुरुष  के हाथ मायूस हो जाते हैं /  यदि दोनों ही कट जाएँ तो स्त्री उल्लास से भर जाती है / " आदि।

पवन करण और अनामिका ने व्याधि से ग्रस्त , दर्द से दुखते हुए, मृत्यु के भय से आक्रान्त, शल्य चिकित्सा के कारण विरूपीकृत स्त्री के शरीर पर नश्तर से कविताएँ उकेर दीं और स्त्री के रक्त स्नात अनावृत शरीर को हम सब के बीच ला खड़ा किया मगर इस बार इन दोनों कवियों के इस क्रूर, हिंसक, बर्बर और निहायत ग़लीज़ मजाक़ पर हँस पाना भी हमारे लिए मुमकिन नहीं।

जेल में सितारों के बिना एक दुनिया

सीमा आजाद: साथी तुम संघर्ष करो। 

सबसे पहला धन्‍यवाद हाशिया वाले रेयाज भाई का कि उन्‍होंने न जाने कैसे सीमा जी का यह आलेख जुगाड किया। दूसरा अनुरोध अंधी-गूंगी-बहरी हो चुकी सरकार से कि एक बार फिर से सीमा आजाद के बारे में विचार करे। सीमा हमारे समय की महत्‍वपूर्ण मील का पत्‍थर हैं और इस विश्‍वास के साथ उनका यह आलेख यहां प्रस्‍तुत कि एक पत्‍थर तो तबियत से उछाला हमने... 

याद करें बचपन की. वे कौन सी यादें हैं जो हमें अभी भी रोमांचित करती हैं- गर्मी की उमस भरी रात में छत पर लेटना और अपनी ज़मीनी दुनिया भूल कर चांद-सितारों की दुनिया की सैर करना. सच, ये तारों भरा आकाश हम सब को आश्‍चर्य से भर देता था. जब गर्मी के बाद बरसात के आगमन की पूर्व सूचना देने वाले बादल के टुकड़े इस काले-काले आसमान में चक्‍कर लगाते हों तो यह और भी रहस्‍यमय हो जाता था. इन बादलों में हम न जाने कितनी आकृतियां देखा करते थे. आसमान में कभी-कभी इंद्रधनुष दिख जाता था तो हमारे लिए बहुत बड़ा कौतूहल हो जाता.


पर क्या आप कल्‍पना कर सकते हैं कि एक ऐसी दुनिया है जहां के बच्‍चे रात के आसमान व चांद-तारों की चमक से अनजान हैं. इंद्रधनुष ही नहीं चांद का दर्शन भी उनके लिए एक आश्‍चर्यजनक घटना है. जी हां, ऐसी भी एक दुनिया है. यह दुनिया है जेल की. यहां बच्‍चे शाम ढलते अपनी माताओं के साथ बैरक के अंदर बंद कर दिए जाते हैं. फिर सुबह सूरज निकलने के बाद ही इन्‍हें बैरक से बाहर निकाला जाता है. मेरा ध्‍यान इस बात की ओर तब गया जब एक दिन सुबह बैरक खुलने पर जेल में ही पैदा हुई ढाई साल की 'खुशी' बहुत तेज़ी से दौड़ते हुए मेरे पास आई. उसके छोटे से चेहरे की आंखें आश्‍चर्य से फैली हुई थीं. होंठ गोल हो गए थे और उसके नन्‍हे हाथ जिस ओर इशारा कर रहे थे वहां पश्चिम के आसमान में गोल सा चांद डूब रहा था. उसने तो न कभी सूरज देखा था न चांद. इसलिए उसके लिए ये बेहद आश्‍चर्यजनक चीज़ थी. मैंने उसे बताया कि वह चंदा मामा हैं. फिर वह हमेशा आकाश की ओर हाथ उठा कर पूछती है 'छीमा मामा'? सामान्‍य तौर पर जो बात वह रोज़ के अनुभव से जान सकती थी वह मेरे लिए समझाना असंभव था.



ये जेल के बच्‍चे हैं. इनकी माताएं किसी न किसी आरोप में जेल काट रही हैं. इनकी दुनिया इतनी सिमटी है जिसकी कल्‍पना बाहर की दुनिया के लोग तो नहीं ही कर सकते. जेल के अधिकारी भी नहीं करते. इसी कारण उन्‍हें इसका अहसास नहीं होता कि वे इन बच्‍चों का कितना महत्‍वपूर्ण समय छीन रहे हैं. थोड़ा बहुत समझने वाला कोई भी व्‍यक्ति यह समझ सकता है कि बच्‍चों को स्‍वस्‍थ तरीके से विकसित होने के लिए उसका उसके आसपास की दुनिया से संपर्क कितना ज़रूरी है. यह संपर्क उस बच्‍चे के स्‍कूल जाने से भी कई गुना ज्‍यादा ज़रूरी है. बाहरी दुनिया से संपर्क कितना ज़रूरी है. क्‍योंकि यही अनुभव संसार, उससे उपजी कल्‍पनाएं किसी बच्‍चे के दिमाग के विकास के लिए बेहद ज़रूरी है. पर जेल में बच्‍चों से इस अनुभव संसार को छीन कर उनके साथ जुर्म किया जा रहा है. मैं आपको कुछ उदाहरण देती हूं जिससे आपको भी इसका अहसास होगा.



जेल में रहने वाला किशन जो 6 साल का होने पर मां के साथ जेल आया था, वह चिन्‍टू (जो जन्म से ही जेल में है) से बता रहा था कि माता-पिता भगवान से बड़े होते हैं. चिन्‍टू ने पूछा कि माता-पिता क्‍या होते हैं? किशन ने बताया- 'मम्‍मी और पापा'. चिन्‍टू ने थोड़ा शर्माते हुए पूछा- 'पापा क्‍या होते हैं?' किशन ने उसे डांटते हुए कहा- 'धत् साले, पापा नहीं जानते?' चिन्‍टू चुप हो गया. यह सुन कर उसके बड़े भाई पिन्‍टू (उम्र 8 वर्ष) ने कहा, 'हमें पता है कि पापा क्‍या होता है. जो लोग मर्दाने में रहते हैं यानी मर्द लोग. न सीमा दीदी?' आप कल्‍पना कर सकते हैं कि मुझे यह समझाने में कितनी मुश्किल आई होगी कि पापा क्‍या होते हैं.



जेल में रहने के कारण ये बच्‍चे बिल्‍ली-चूहा के अलावा किसी जानवर के बारे में नहीं जानते. कभी-कभी ये बच्‍चे अदालत जाने के लिए या मुलाकात के लिए जाने के लिए बाहर निकलते हैं तो रास्‍ते में दिखने वाले कुत्‍ता, गाय, भैंस, घोड़ा हर जानवर को आश्‍चर्य से देखते हैं और सबको बिल्‍ली ही बताते हैं.



हम बचपन से अपनी मां को खाना बनाते हुए देखते आए हैं. उन्‍हें सब्‍ज़ी काटते देखना बहुत सामान्‍य सी बात है. बल्कि जब हम थोड़ा बड़े हुए तो मां की तरह खाना बनाने का खेल भी खेला करते थे. पर महिला जेल में चूंकि खाना पुरुष बैरक से बन कर आता है इसलिए बच्‍चे इस स्‍वाभाविक घरेलू काम के बारे में कुछ भी नहीं जानते. थोड़ा बड़े बच्‍चे यहां गिरफ्तारी, अदालत और रिहाई का खेल खेलते हैं. जो बच्‍चा जज बनता है वह सभी को रिहाई दे देता है. इस खेल में सिपाही या पुलिस का चित्रण बहुत खराब होता है और कोई बच्‍चा सिपाही नहीं बनना चाहता.



इससे भी ज्‍यादा बुरा यह है कि ये बच्‍चे सब्जि़यों को नहीं पहचान सकते. जेल में सब्‍ज़ी में आलू की सब्‍ज़ी, मूली का साग, चौलाई और शलजम की सब्‍ज़ी ही बन कर आती है. इसलिए ये बच्‍चे इनके अलावा किसी दूसरी सब्‍ज़ी का स्‍वाद नहीं जानते. न ही किसी साबुत सब्‍ज़ी को पहचानते हैं. इन बच्‍चों ने चूंकि काम के नाम पर अपनी माताओं को केवल झाड़ू लगाते ही देखा है, इसलिए ये बच्‍चे नीम की टहनी बटोर कर उसका झाड़ू बना कर झाड़ू लगाने का खेल खेलते हैं.



नैनी सेंट्रल जेल में दो तरह के बच्‍चे हैं. एक वे जो जन्‍म से ही अंदर हैं या जब से उन्‍होंने होश संभाला है वे अंदर हैं. दूसरी तरह के बच्‍चे वो हैं जो बाहर की दुनिया से वाकिफ़ हैं. इन दोनों तरह के बच्‍चों के बीच होने वाली बातचीत कभी-कभी बहुत रोचक होती है. जैसे पिन्‍टू एक दिन अपने छोटे भाई को छोले-भटूरे के बारे में बता रहा था. उसने उसे लखनऊ की आदर्श जेल में कभी खाया था. वास्‍तव में, चिन्‍टू-पिन्‍टू की मां पहले लखनऊ की आदर्श जेल में थीं. यहां बच्‍चों को पढ़ने के लिए बाहर स्‍कूल भेजा जाता था. पिन्‍टू भी स्‍कूल जाता था इसलिए उसका अनुभव संसार थोड़ा ज्‍यादा बड़ा है. पिन्‍टू, चिन्‍टू को बता रहा था कि भटूरा बड़ा गोल और मुलायम होता है जो खाने में बहुत अच्‍छा होता है. उसने बताया कि उसने वहां पराठा भी खाया है. चिन्‍टू उसकी ओर ऐसे देख रहा था जैसे उसका भाई कितनी बड़ी बात बता रहा हो.



अभी एक महीना हुआ जब चिन्‍टू-पिन्‍टू के बाबा उन दोनों को अपने साथ लिवा ले गए. मैं कई दिन तक मानसिक रूप से उनके साथ खास तौर पर चिन्‍टू के साथ रही. क्‍योंकि जन्‍म के बाद सात साल का होने के बाद उसने बाहर की दुनिया में कदम रखा था. उसे तो अदालत के बहाने भी बाहर आने-जाने का मौका नहीं मिलता था. मैं कल्‍पना करती रही कि कैसे चिन्‍टू पहली बार अपने बाबा की उंगली पकड़े ट्रेन में बैठा होगा. पहली बार उसने सड़क पर भागती-दौड़ती मोटरगाड़ी देखी होगी. खेत-खलिहान देखा होगा. घर पर हर तरह के व्‍यंजन आश्‍चर्य के साथ खा रहा होगा और रात में छत पर लेट कर तारों भरा आसमान देख रहा होगा. जन्‍म के पूरे सात साल बाद!



नैनी सेंट्रल जेल में ऐसे बच्‍चों की कुल संख्‍या 15 से 25 के बीच है. यह संख्‍या घटती-बढ़ती रहती है. इन बच्‍चों से इनका बचपन, इनका अनुभव संसार छीन लिया गया है क्‍योंकि इनकी मां ने कोई जुर्म किया है या झूठे आरोप में फंसी हैं. सरकार भले ही सबको अनिवार्य शिक्षा का दावा करती हो पर इन बच्‍चों के लिए कोई शिक्षा व्‍यवस्‍था नहीं है. तिहाड़ जेल के बारे में मैंने पढ़ा है कि वहां बच्‍चों के क्रेच हैं. लखनऊ की आदर्श जेल के बारे में मैंने पिन्‍टू से सुना कि वहां बच्‍चे स्‍कूल जाते हैं. पर नैनी सेंट्रल जेल के बारे में ऐसी कोई व्‍यवस्‍था नहीं है. इन बच्‍चों की दुनिया इतनी छोटी है कि ये जिस तरफ भी देखते हैं एक ऊंची सी दीवार सामने दिखती है. ऊपर जो छोटा सा आसमान है उसे भी बड़े-बड़े पेड़ों ने ढंक लिया है. ऐसा लगता है कि जैसे ये बच्‍चे भी हमारे साथ एक बड़े से कुएं में कैद हैं. रात में ये कुआं और भी संकरा हो जाता है. बच्‍चों की कल्‍पना को उड़ान देने वाले, उनमें रंग भरने वाले उद्दीपक इस दुनिया से नदारद हैं. फिर ये बच्‍चे ही हैं जो हर हाल में खेलते हैं, खिलखिलाते हैं और हमें भी हंसने के लिए मजबूर करते हैं.

Thursday, March 1, 2012

साहस -2


कोई तीस साल पहले बसंत के दिनों में जब अपूर्वा का जन्म हुआ तो घर में खिचड़ी बनी थी। कठोर सर्दी के दिन खत्म हो रहे थे और हवा में तैरता गुलाबीपन अपूर्वा की मां के गालों से झलक रहा था। जन्म देने के बाद पीले पड़े चेहरे के साथ जब अपूर्वा की मां ने उसे देखा तो अनजाने में ही अपूर्वा नाम निकल गया। बस जन्म के दो घंटे बाद ही नाम अपूर्वा पड़ गया जो सात साल बाद से ही अपूर्वा को सख्त नापसंद आने लगा। उसने कई बार अपनी मां से पूछा भी कि मेरा नाम इतना कठिन यों रखा कि लोग बुलाने में भी झिझकें? कोई आसान सा नाम नहीं मिल पा रहा था? अब उसकी पत्रकार मां को आसान नाम सूझा नहीं और न ही अपूर्वा के इस आसान से सवाल का कोई जवाब। तीस सालों से एक नाम ढो रही अपूर्वा की जिंदगी फिसलती चली गई। हां, दो बार संभालने की कोशिश तो की, पर संभली नहीं। एक बार बीस साल की उम्र में तो एक बार छब्बीस साल की उम्र में। लय क्या होती है, ये गाने गाकर भी अपूर्वा नहीं जान पाई। कभी कभी अपूर्वा को लगता है कि उसे शराब पीनी चाहिए, साथ में सिगरेट भी...
आज खाना क्या बनाना है? काम वाली बाई ने पूछा।
कुछ भी बना दो..अच्छा ऐसा करो कि आलू मटर की सब्जी और ज्यादा सा चावल ही बना दो। सजी में टमाटर जरूर डाल देना। थोडा सा खांसते हुए अपूर्वा ने काम वाली बाई को बताया। एक बार फिर से फेसबुक पर अपना स्टेटस चेक करने में लग गई। कोई कमेंट नहीं। शुक्र है। आज किसी ने उसे नहीं देखा। कितनी अजीब चीज होती है ये कि हम चाहते हैं कि सब हमें देखें लेकिन कोई हमें देख न ले। कहीं से छू न ले। उस दिन जब आकाश ने उसे छुआ था...
छह साल पहले दतर में काम करते हुए एक दिन आकाश ने अचानक उससे पूछ लिया कि उसका नाम अपूर्वा क्यो? बस, यहीं से अपूर्वा को लगने लगा कि शायद आकाश उसे इस सवाल का जवाब दे सके कि उसका नाम अपूर्वा क्यो है। वो न चाहते हुए उसके पास जाने लगी। उससे बातें करने लगी। बातें बढ़ीं तो घर तक पहुंच गईं। अपूर्वा के अकेले कमरे में एक आकाश सजने लगा। तारे टिमटिमाए तो पेट में बवाल मच गया। अपूर्वा ने ये बात आकाश को बताई। आकाश ने उसे दो हजार रुपये दिए और प्यार से उसके माथे पर आई लटें उलझाते हुए बताने लगा कि उसे चंडीगढ़ में बीस हजार ज्यादा तन्ख्वाह पर नौकरी मिल रही है। क्या करे? ये सही वक्त नहीं है। आखिरकार अपूर्वा डाक्टर के पास गई और दो दिन काम वाली बाई से खिचड़ी और सूप बनवाकर पिया। आकाश चला गया। तारे टिमटिमाना बंद हो गए। स्याह काली रातें अल्प्राजोलम के सहारे गुजरने लगीं। ये दवाइयां भी कितनी अजीब चीज होती हैं। हमें जरूरत पर मिल जाती हैं लेकिन खत्म कर देती हैं।
प्वाइंट फ़ाइव की तीन गोल अल्प्रॉक्स ली और सोचने लगी। आखिर मुझे क्यो आकाश से प्यार हुआ? नहीं नहीं....ये प्यार नहीं था। ये तो जरूरत थी, प्यार होने जैसी किसी अनुभूति की। उस वक्त मेरी देह जल रही थी। मुझे छुअन की असीम इच्छा थी। ये मायने नहीं रखता था कि कौन छू रहा है, पर ये भी देखना होता था कि कम से कम वो गोरा हो या फ़िर स्मार्ट हो, या फ़िर किसी अच्छे खान्दान का दिखता हो। तुम सोचना बंद यों नहीं कर देती हो... उस दिन आकाश ने कहा था। मुझे लगा कि वो सही कह रहा है। सारी समस्याएं यहीं से पैदा होती हैं। सोच से...विचारों से। अगर हम सोचना बंद कर दें तो एक झटके में सारी समस्याओं से बाहर आ जाएंगे। या यों सोचना कि समस्याएं खत्म हुई हैं या नहीं। समस्याओं को छोड़ना ज्यादा इपॉर्टेंट है या उन्हें सॉल्व करना?

Tuesday, January 26, 2010

दूध सी सफेदी ....

प्रचार ऐसा माध्यम है जो किसी भी समाज की मानसिकता को पकड़ने का सबसे आसान जरिया होता है। प्रचार के कई तरीके होते हैं, लेकिन प्रचार की सभ्यता का सबसे शशक्त माध्यम दृश्य श्रव्य यानि कि रुपहला पर्दा ही है- चाहे वो छोटा हो या बड़ा। ये सोचना आसान है कि परदे पर तैरती चीजों की परिकल्पना आसान रही होगी लेकिन उन परिकल्पनाओ मे या उनके द्वारा दिखाया क्या जाय, ये सोचना कदरन मुश्किल रहा होगा। जिसे देखना काफी आसान लगता है, और उससे भी ज्यादा आसान रिमोट से उसे बदल देना, उसके पीछे एक जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिकता जुडी हुई है। और इस काम मे डॉक्टर से लेकर इंजिनियर, कलाकार से लेकर अंतरिक्ष की टेक्नॉलोजी जुडी हुई है। इतना ही नहीं, इस काम मे वो सारे आर्थिक सामाजिक सर्वे, अध्ययन भी जुड़े हुए हैं, जो अपने को पूरा करके अपने बौद्धिकता का जबरदस्ती ढोल पिटते हैं। लेकिन उन ढोलों की आवाज से छनकर जो चीज बाहर आती है, वो देखने,समझने मे इतनी आसान होती है, कि उसकी एक एक मामूली सी चीज भी किसी प्रोडक्ट को अरबो रुपयों, डॉलरों का फायदा पहुचती है। इसका मतलब तो ये हुआ कि मानव जीवन के सारे क्रियाकलाप उसे आसान बनाने के लिए हैं, न कि उसे रास्ता दिखने के लिए। खैर, मैं ये मानता हू कि न तो कुछ आसान है और न ही कुछ मुश्किल-क्योकि ये एक प्रक्रिया मात्र है, जीवन की सतत प्रक्रिया। प्रचार विज्ञापनों के माध्यम से किया जाता है और विज्ञापन अमुक वस्तु की विशेषता बताते हुए उसे दर्शक को उसकी तरफ इतना आकर्षित करते हैं की दर्शक उसे खरीदने के लिए मजबूर हो जाये। ध्यान नहीं आता कि पहला सचल विज्ञापन क्या रहा होगा, लेकिन जबसे होश संभाला है, निरमा वाशिंग पावडर का विज्ञापन ही सबसे ज्यादा और पुराना याद आता है। पंच लाइन थी- दूध सी सफेदी, निरमा से आये, इसके साथ गृहणियों के हाथ और कपड़ो के रंग की भी चंद लाइने थी। मध्यम वर्ग की घरेलू मुश्किलात से निकला ये विज्ञापन आज भी सुपर हिट है, भले ही इसमें काम करने वाले लोग बदल गए हो। मजे की बात की पंच लाइन भी वही है। यही से इसी तरह के उत्पाद बनाने वाली दूसरी कम्पनियों ने भी भारतीय माध्यम वर्ग की इस मानसिकता को पकड़ा। गजब की बात तो ये की पिछले तीस सालों मे इस मानसिकता मे जरा सा भी परिवर्तन नहीं आया है। अभी भी तक़रीबन सारे कपडे धोने वाले विज्ञापनों मे हाथ और रंग की ही बात होती रही है। क्यों न इसका ये मतलब निकला जाय की उदारीकरण के तकरीबन डेढ़ दशक से ज्यादा बीतने के बाद भी अभी तक उस माध्यम वर्ग के पास, जिसके पास टी वी तो है, लेकिन वाशिंग मशीन नहीं आ पाई है। क्या वाशिंग पावडर के ये प्रचार अभी तक उस भारतीय निचले माध्यम वर्ग का आइना नहीं बन रहे, जिनके बारे मे सरकार कहती रहती है कि उदारीकरण का सबसे ज्यादा फायदा ये वर्ग उठा रहा है। कम से कम जब तक हाथो को ठीक रखने का दावा करने वाले विज्ञापन आ रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि सरकार के प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के दावों मे कोई दम है। अगर है, तो जो आय बढ़ी है, वो जा कहा रही है? बड़ा साधारण सा जवाब है की आय के साथ साथ महगाई भी बढ़ी है। तो ऐसे मे आय बढ़ने का मतलब क्या रह जाता है? क्या जेब मे कागज के कुछ नोटों का भर बढ़ जाना ही आय मे होने वाली बढ़ोत्तरी है? इसका मतलब तो ये हुआ, कि भारत का एक खास वर्ग आज भी वही जिंदगी गुजर रहा है, जो आज से तीस साल पहले गुजरता था। फर्क इतना आया है कि ब्लैक एंड व्हाईट टी वी कि जगह रंगीन और रिमोट वाले टी वी ने ले ली है। बाकी बदला क्या है पिछले तीस सालों मे? घरेलू महिलाएं आज भी हाथ से ही कपडा धो रही हैं, पावडर मे कपडा भिगो कर साबुन की बट्टी से शर्ट की कोलर रगड़ रही हैं। मजे की बात तो ये कि मॉस प्रोडक्शन के इस काम मे अभी तक प्रति व्यक्ति प्रोडक्शन अलग थलग पड़ा हुआ है। चाहे वो गाव का तालाब हो या शहर का बाथरूम। सब कुछ एक साथ हो रहा है, लेकिन सब कुछ अलग अलग भी हो रहा है। और ये बदलना काफी मुश्किल भी है। इसका सिर्फ एक ही तोड़ है-वाशिंग मशीन। लेकिन वो तो अभी सबके पास आती दिखाई नहीं डे रही है। तो ये मानकर चलें, कि जब तक दूध सी सफेदी का विज्ञापन आता रहेगा, भारतीय मध्यम वर्ग की तकदीर रत्ती भर नहीं बदलने वाली। हालाँकि कुछ लोग मेरे इस लिखे पर मुझे बुजुर्वा होने की बात कह सकते हैं।

Wednesday, April 2, 2008

सोचा न था ....

मेरठ मे एक गुमनाम सी शख्सियत हैं मिथलेश आत्रे। और आइन्दा के दिनों मे गुमनाम ही रहना चाहती हैं। ऐसा इसलिए नही कि उन्हें नाम से कोई परेशानी होती हो, दरअसल वो अभी तक नाम के फायदे नही जान पाई हैं। मिथलेश से मिलने के बाद, खासकर उनके कारनामो के बारे मे जानने के बाद मेरे मन मे जो पहला सवाल आया वो ये कि मेरठ मे आत्रे कहाँ से ? पूछताछ की तो पता चला कि मेरठ मे कुल मिलकर २२ परिवार आत्रे हैं। ये लोग तकरीबन डेढ़ सौ या दो सौ साल पहले महाराष्ट्र से यह पर आकर बसे थे। आजादी की लड़ाई मे इन सभी लोगों ने हिस्सा लिया, शहर के साथ कदम से कदम मिलकर चले और शहर की धड़कन यानि कि घंटाघर पर भी इनका ठिकाना रहा और अब भी है। ये जानकारी मुझे जागरण मे काम करने वाले एक सीनिअर रिपोर्टर ने दी जो ख़ुद आत्रे हैं। बहरहाल, लौट कर मिथलेश के ही पास आते हैं। मिथलेश कुल मिलाकर आठवीं पास हैं। बुजुर्ग महिला हैं इसलिए उनका आठवीं पास होना या पढ़ा लिखा न होना एक बराबर है। हो सकता है कि उन्होंने घर पर ही पढ़ लिया हो, लेकिन इस बारे मे मुझे रत्ती भर भी शक नही कि मिथलेश ने जो कुछ भी पढ़ा , वो अब सबके काम आ रहा है। मिथलेश शताब्दी नगर मे रहती हैं और मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा बनाये गए एक मकान मे स्कूल चलाती हैं। वो मकान भी ऐसा मकान है, जिसके बनने के बाद अब तक कोई कब्ज़ा लेने नही आया। उसमे न तो खिड़की है और न ही कोई दरवाजा। बिजली का तो सवाल ही नही पैदा होता। एक तरह से वो खँडहर है। इसी खँडहर मे मिथलेश ने झुग्गी के ३५ बच्चों को पढाया है। सभी ने पहली क्लास का इम्तेहान दिया और रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा है। और ये सौ प्रतिशत रिजल्ट भी किस तरह से? ना तो इन बच्चो को बैठने के लिए टाट पट्टी मिली है , ना ही पढ़ना सीखने के लिए ब्लैक बोर्ड। जमीन पर बैठ कर इन बच्चों ने पढ़ाई की है और दिवार को ही ब्लैक बोर्ड बनाया है। कमाल है। ऐसे जज्बे वाली महिला को मैं सलाम करता हूँ।
मिथलेश का स्कूल यह पर देखें - फोटो बजार

Thursday, September 20, 2007

मुम्बई से लौटते उदास चेहरों की दास्ताँ

प्रभात
बीस साल हुए जब प्रभात बरेली मे अमर उजाला के दफ्तर गए फोटोग्राफर बनने और बन गए अखबारनवीस । बरेली संस्करण मे सम्पादकीय के सभी विभागों मे काम किया, रिपोर्टिंग से लेकर रविवारीय पन्ने के संपादन तक। लेकिन, फोटोग्राफी की लत थी कि बढती ही गई । जितना घूमा या फिर लिखा, उसके मूल मे वजह तसवीरें उतारना ही रहा। आजकल दैनिक जागरण के नए अखबार आई नेक्स्ट के लिए काम कर रहे हैं । बजार के लिए उन्होने ये लेख अपनी किताब "आज के दौर की अखबारनवीसी " से दिया है ।



मुम्बई से आने वाली रेलगाड़ियों मे इन दिनों फैज़ाबादियों की तादाद बढ़ गई है। गर्मियों की शुरुआत के साथ पूर्वांचल लौटने वाले यों भी ज्यादा होते हैं। ब्याह - गौने के दिन जो शुरू होने वाले हैं। मगर इन चेहरों पर उत्साह का कोई उल्लास नही, सफ़र की थकान भी नही, सब कुछ छीन लिए जाने की उदासी दिखती है। मुम्बई पुलिस इन दिनों नाईट क्लबों -बियर बार को लेकर अचानक सख्त हो गई है। रोज़ रोज़ छापे , गिरफ्तारियां , नए नए कायदे-निर्देश। इन बंधनों ने उनसे उनकी रोज़ी छीन ली। तारून के बेलगरा, तकमीनगंज,मामगंज, और रसूलाबाद जैसे इलाकों से मुम्बई गए तमाम कुनबे लॉट आये हैं। मुम्बई के नई 'नैतिकता' के मारे इंसानी चहरे , नाचने गाने के बहाने सनातन इंसानी फितरत मे अपनी बेहतरी तलाशते चिचुक गए चहरे। हाथ, गले और उँगलियों की सुनहरी चमक उनकी पेशानी की रेखाओं पर कोई असर नही डालती। कल क्या होगा, किसी को अंदाज़ नही। अब देखा जाएगा दो चार महीने बाद।

बेलगरा बाज़ार से आगे जाती सड़क के किनारे खडे सेमल के उंचे पेड़ों से उतरकर आँचल फैलाती शाम , साईकिल के कैरियर पर बैठी वह युवती एक झटके से उतरकर घर के सामने पडी चारपाई पर बैठ जाती है। सवालिया निगाहों से ताकती है और फिर दूसरी तरफ मुह करके पान की पीक थूकती है। उस घर को देखकर एकबारगी किसी को अंदाज़ नही होगा कि मुम्बई की चकाचौंध भरी दुनिया से भी इसका कोई नाता हो सकता है। मगर सच तो यही है। माया मुम्बई मे रहती हैं अपनी बेटी खुशबु के साथ। गहनों से लदी स्थूलकाय महिला मीना हैं, उनकी बहन। थोड़े संकोच के साथ शुरू हुई पूरी बातचीत मे मुम्बई के कारोबार की असलियत अप्रत्यक्ष रुप से बनी रही। शुरुआत की माया की बुआ रामवती ने जो एक जमाने मे थियेटर कम्पनी मे अभिनय करती और गाती भी थी। बनारस मे बाकायदा उस्ताद शुकरुल्ला से तालीम और फिर थियेटर की बाइज़्ज़त नौकरी। मगर तब का ज़माना और था, रियासतें थीं , जमींदार थे सो ऎसी तंगी नही थी। माया मुम्बई मे हाजी अली के पास एक बियर बार मे काम करती थी। काम यानी डांस। पिछले महीने किसी होटल मे किसी नेता को पीट दिया गया और फिर तो ख़ूब हंगामा हुआ। कार्निवल बार, जहाँ वह काम करती थी, बंद हो गया। काम के बारे मे पूछने पर बताती हैं कि नाच गाना और क्या। कभी किसी ने पूछ लिया कि जूस पीने चलोगी तो चले जाते हैं। वहीँ हज़ार पांच सौ दे देता है। फिर होटल मे बुलाता है। यही है कुल जिंदगी। फारस रोड पर चिक्कलबाड़ा की एक चाल, जिसमे एक ही कमरे मे बाथरूम और रसोई सब कुछ और बार की जगमग रातें। यहाँ लौट आने पर मुम्बई बहुत याद आता है उन्हें। क्या मुम्बई की सुबह ! 'कहॉ का सवेरा बाबू। रात भर तो हाड तोड़ते -जागते हैं , कब सुबह हो जाती है पता ही नही चलता। फिर लौटकर दिन भर सोते हैं' बताती हैं माया। उन्हें अफ़सोस है कि अपनी बेटी के लिए कुछ नही कर पाई । फिरोजी रंग की पोशाक मे घर के अन्दर बाहर घूमती वह किशोरी भी उनके साथ बार मे जाने लगी थी। हाव भाव मे ग्राम्य परिवेश से अलग होने की अभिजात किस्म की झलक। पुलिस ने कह दिया है कि २१ साल से कम की युवतियाँ अब बार मे डांस नही करेंगी। सो उसका आसरा भी गया। यों और करे भी तो क्या, उसे पढ लिखा नही पाई। बेटा है जो यहीं रहकर पढता है।

बताती हैं कि एक भाई को पढ़ाया लिखाया , दूसरे भाई-भाभी और बहन को भी देखती है। ये सब यहीं गाँव मे ही रहते हैं। कई बार मन करता है कि कुछ और जमीन खरीदकर यहीं गाँव मे ही रह जाएँ मगर हो नही पाता। यह मुम्बई की कशिश है जो बार बार खींच ले जाती है। माया को पछतावा है , मुम्बई से लौट आने का नही, इस पेशे मे आने का। कहती हैं कि अब न तो पैसा है और ना ही इज़्ज़त रह गई है इस पेशे मे। फिर भी यही क्यों ! माया का जवाब बाक़ी सारे सवालो को खामोश कर देता है। ' इस पेशे मे सबको तलाश है एक एसे शख्स की जो अपना लेगा, ढ़ेर सारा पैसा देगा और अपना नाम भी। इज़्ज़त की इसी जिंदगी की तलाश मे जाने कितनी जिंदगियां गर्क हो जाती हैं। मगर आस है कि पीछा ही नही छोडती।' यह सेलयुलायड का 'चांदनी बार' नही, जिंदगी है, जहाँ विडम्बनाएँ हैं , विद्रूपता है और विरोधाभास ऐसे कि फिल्मी कहानी फिस्स हो जाए ।

Saturday, June 16, 2007

कुछ देर आज़ादी

श्रुति मिश्र
अभी परसों ही इलाहाबाद से आई हूँ। मेरे भांजे का जन्मदिन था वहाँ। चिलचिलाती गरमी मे हम (यानी मैं और मेरे ये) किसी तरह इलाहाबाद पंहुचे तो सारे भाई बहनों को देख जीं जुडा गया। इनकी नौकरी के कारण समय की कमी थी , सो बहनों से बतियाने का कोई भी मौका मैं छोड़ना नही चाहती थी। यहाँ तक कि अगर एक गुसलखाने मे होती तो दूसरी उससे गुसलखाने के दरवाज़े पर खडी होकर बतियाये जा रही थी। शाम को जन्मदिन मनाया जाने वाला था। भइया बाहर खडे होकर भुन भुना रहे थे कि ये लोग तो बहुत टाइम् वेस्ट करती हैं। पता नही का इत्ती देर से गिटिर पिटिर किये जा रही हैं।
अब ये क्या बात हुई ? इत्ते दिन बाद मिले हैं तो क्या बतियायें भी ना ? एक तो वैसे ही टाइम् कम और उसपे भी कईयों लोगों की चुगली तो छूटी ही जा रही थी। जल्दी जल्दी मे कब शाम हो गयी , पता ही नही चला। नहाने धोने के बाद अब बारी थी सबके तैयार होने की। सो हम तीनो बहने एक कमरे मे आकर तैयार होने लगे। पहले तो दौर चला "तुम क्या पहनोगी " का और सबमें अपनी अपनी साड़ियों गहनों को दिखने की होड़ लग गई ।
"हाय दीदी ! तुम्हारा बुन्दा तो बड़ा सुन्दर है। " "अरे तेरी साडी का पल्लू तो बड़ा अच्छा है रे ! कहॉ से ली ? "
मेरी मितु दी की नज़र बड़ी खराब है। वो कैसे ? बचपन से आज तक मुझे किसी ने सुन्दर नही कहा सिंवाय उनके। इसीलिये उनकी नज़र मे नुक्स है।
खैर, देखने दिखाने के बारी आई उनको पहनने की । पहन वहन के तैयार हुए तो मुझसे बेध्यानी मे बिंदी गिर गई या मैंने लगाई नही , बड़ी दीदी ने टोक दिया, "तू तो बिना बिंदी बड़ी अच्छी दिखती है। " मैं बोली, " इनका (मेरे ये) भी यही ख़याल है। ये कम्युनिस्ट हैं , कहते हैं कि जो मरजी वो पहनो , इनके लिए तो इंदी -बिंदी , अंगल मंगल सूत्र का कुछ मतलब ही नही। " दीदी की आंखें कटोरा। बोलीं , "सच्ची !! ये कम्युनिस्ट ऐसे होते हैं ? वैसे तो हमे भी ये बिंदी टिकुली लगना बड़ा खराब लगता है, लेकिन इन्हें पसंद है तो पहनते हैं। अच्छा चल एक काम करते हैं, आज कम्युनिस्ट ही क्यों ना बन जाया जाय। कुछ देर तो आज़ादी मिलेगी। " यह कहकर दीदी ने अपनी बिंदी भी उतार दी। लेकिन जब उनकी सास ने टोका कि का रे , बिंदी काहे नाही पहनी है , तो दीदी चुपचाप अन्दर गयी और बिंदी पहन ली।