Tuesday, August 25, 2026

रंजन गोगोई | पूरा 'रस' पीकर अब पाएंगे पेंशन

 आजाद भारत के सबसे कुख्यात सीजेआई रहे रंजन गोगोई 16 मार्च को कुल 53 फीसदी हाजिरी लगाकर राज्यसभा से रिटायर हो चुके हैं। राज्यसभा में उनको ये सीट मोदी ने बतौर मलाई दी थी। 2020 में जब रंजन गोगोई ने पहली बार राज्यसभा में कदम रखा था, तो उनका स्वागत अभूतपूर्व बेइज्जती से हुआ था। पूरी राज्यसभा में रंजन गोगोई शर्म करो, रंजन गोगोई शर्म करो के नारे वैसे ही गूंज रहे थे, जैसे इन दिनों नरेंदर सरेंडर के नारे गूंजते हैं। जब वो राज्यसभा में आए थे तो विपक्ष ने वाकआउट कर दिया था। मोदी को उन्हें ईनाम देने की इतनी जल्दी थी कि सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद उनके छह महीने के कूलिंग पीरियड का भी इंतजार नहीं किया, और महज 4 महीने में ही उनको राज्यसभा में लाकर सजा दिया। फिर जल्दी क्यों न हो, आखिर भाजपा में जो जितना गंदा होता है, वो उतना ही बड़ा ईनाम पाता है। इन दिनों जो सीजेआई सूर्यकांत हैं, वो इन्हीं के शिष्य हैं। आज भी वहां के वकील बिना नाम बताने की शर्त पर बताते हैं कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में जब गोगोई थे तो कई लोगों ने पाया था कि जस्टिस सूर्यकांत रोज इनके चंडीगढ़ वाले बंगले में दुआ सलाम करने जाते थे।

15 अगस्त 1947 के बाद से आज 17 मार्च 2026 तक रंजन गोगोई इकलौते ऐसे शख्स हैं, जिन पर बतौर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहते हुए अपनी ही असिस्टेंट का यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगा है। उनके इस आरोप की शुरुआत इसके अंत से उपजे एक सवाल से करते हैं, जिसका जवाब आज तक किसी को नहीं मिला है। सवाल यह है कि आखिर में रंजन गोगोई ने पीड़िता को अपनी पत्नी के पैर पर गिरवाकर माफी क्यों मंगवाई? बताते हैं कि बाद में पीड़िता ने नौकरी जॉइन भी कर ली थी और अब सब कुछ सही है। लेकिन ये सवाल तो बना ही रहेगा कि जिसने रंजन गोगोई पर अपने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, उसने गोगोई की पत्नी के पैर पर गिरकर माफी क्यों मांगी। पंजाब से लेकर असम तक के परिवारों में ऐसा कब होता है? ऐसा कब होता है जब जिसके साथ जो गलत या सही जैसा भी करे, फिर उसे पत्नी के पैर पर गिराया जए। ऐसा क्यों होता है, ये कोई कहने वाली बात नहीं है, ये सब जानते ही हैं कि ऐसा क्यों होता है, कैसे होता है, कब होता है। खैर, इस केस में गाजीपुर का गुलाबजल गले में लगाकर अदालत पहुंचने वाले गंदन गोगोई पर ये इकलौता सवाल नहीं है। सवाल यह भी है कि अपनी गंदगी को साफ करने का टिश्यू पेपर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को क्यों बनाया? बता दें कि अपनी पत्नी के पैर पर पीड़िता को गिराकर माफी मंगवाने से पहले रंजन गोगोई ने इसकी अदालत भी खुद लगाई। 

गोगोई ने खुद एक खास बेंच बनाई, जिसमें वो खुद भी शामिल थे। इस बेंच में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना भी थे। कानून का सीधा सा उसूल है कि कोई भी आदमी अपने ही मामले में जज नहीं बन सकता। इस मामले में एक और अहम बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट की अंदरूनी जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी को फौरन एक्टिव नहीं किया गया। अगर ऐसा होता, तो शायद मामला इस हद तक खराब न होता। इसी मामले में एक और अजीब बात सामने आई, सुनवाई से जुड़े ऑर्डर में गोगोई का नाम ही हटा दिया गया, जो इस बेंच की खुद अगुवाई कर रहे थे। यह कदम पहले कभी नहीं देखा गया था। पूर्व जज मदन लोकुर ने इस पर साफ कहा कि किसी ऑर्डर से जज का नाम हटाना गलत है, और ऐसा तभी हो सकता है जब खुद उस जज ने ऐसा करने को कहा हो। इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और अब तक अनसुलझा सवाल वही है, जिससे हमने शुरुआत की थी, आखिर क्यों एक औरत, जिसने इतने गंभीर इल्ज़ाम लगाए, बाद में उसी शख्स के घरवालों के सामने जाकर माफी मांगती है? यह सिर्फ एक घटना का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है, जहां पावर और प्रेशर मिलकर ऐसे नतीजे पैदा करते हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं होता।

लोग कहेंगे कि राम मंदिर, लेकिन हमारा मानना है कि भारतीय जनता पार्टी को अगर रंजन गोगोई से कोई सबसे बड़ा फायदा मिला, तो वह था नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी का अपडेट। एनआरसी हमारे भारत को इन्हीं का दिया कैंसर है। असम पब्लिक वर्क्स नाम की एक संस्था ने अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें बाहर भेजने के लिए याचिका डाली थी। यह याचिका कई बार लिस्ट हुई, लेकिन उस पर ठीक से सुनवाई नहीं हो पाई। करीब चार साल बाद गोगोई ने इस मामले की जिम्मेदारी संभाली। 2 अप्रैल 2013 को इस केस की पहली सुनवाई हुई। गोगोई उस वक्त जस्टिस एच एल गोखले के साथ बेंच में थे। सुनवाई के बाद अगली तारीख अगले ही दिन रख दी गई। अक्टूबर 2013 से लेकर अक्टूबर 2019 तक गोगोई ने एनआरसी से जुड़े कई मामलों की सुनवाई की। 20 अगस्त 2014 को गोगोई ने एनआरसी के स्टेट कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला से हलफनामा मांगा कि क्या यह काम दिसंबर 2016 तक पूरा हो सकता है। बाद में हजेला को कहा कि 18 महीने के अंदर काम खत्म किया जाए। यहीं से एक और अहम चीज शुरू हुई- सीलबंद लिफाफा सिस्टम। अदालत ने कहा कि पूरी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में दी जाए और बिना किसी सरकारी दखल के सीधे अदालत को दी जाए। सरकार भी पूरी जानकारी नहीं देख सकती थी। जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि यह गलत तरीका है और अदालत खुद से ऐसा नहीं कर सकती। फरवरी 2017 में सुप्रीम कोर्ट के बंद कमरे में, बिना किसी की सुने एक और बड़ा फैसला हुआ- “फैमिली ट्री वेरिफिकेशन”। इसमें लोगों को अपने पुरखों का पूरा रिकॉर्ड देना था। यानी इन सुनवाइयों के दौरान उन्होंने असम में विदेशी माने जाने वाले लोगों की पहचान के लिए जो तरीका अपनाया गया, वह बेहद सख्त और टेक्निकल तो था ही, कानूनन भी सही नहीं था। इसके बाद बीजेपी ने इसे लपक लिया, आज तक हर चुनाव में इनके हर भोंपू से सिर्फ एक मंत्र सबसे ज्यादा बजता है, और वो है घुसपैठिया। अभी बंगाल से लेकर पुडुचेरी तक भाजपा यही घुसपैठिया राग अलाप रही है। फिर मोदी हुकूमत CAA लाई, जिसमें गैर-मुस्लिम लोगों के लिए नागरिकता हासिल करना आसान बना दिया गया। सीएए और पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात ने करीब 20 करोड़ मुसलमानों के बीच जो डर का माहौल पैदा किया गया है, उसकी जड़ में यही गोगोई है। 

वैसे अगर गोगोई का पर्सनल बैकग्राउंड देखें, तो 18 नवंबर 1954 को उनकी पैदाइश असम के डिब्रूगढ़ में हुई थी। ताकतवर लोगों का घराना रहा है तो साहब को सामाजिक, आर्थिक और सियासी तौर पर काफी सहूलियतें मिली हुई थीं। उनकी ननिहाल का रिश्ता अहोम राजवंश से था, जिसने करीब 600 साल तक असम पर राज किया। कई लोगों से बातचीत में पता चलता है कि अहोमों के बीच घुसपैठियों को लेकर लंबे समय से घृणा चली आ रही है। दिलचस्प बात यह है कि अहोम खुद भी कभी बाहर से आए थे। माना जाता है कि उनके पहले राजा सुकफा 1215 में चीन के युन्नान इलाके से आए थे और कई साल भटकने के बाद असम में बस गए। 2018 की एक साइंटिफिक स्टडी में अहोम लोगों और आज के थाई लोगों के बीच जैविक रिश्ता भी सामने आया। एडवोकेट प्रशांत भूषण का मानना है एनआरसी और सीएए के पीछे गोगोई में भाजपा की भलाई की जगह यह घृणा ज्यादा निर्णायक हो सकती है। 

गोगोई की जजी के दौर का एक और बड़ा मामला था, राफेल डील। सीधे मोदी को कहा जा रहा था कि चौकीदार चोर है। इस केस में गोगोई ने जमकर सीलबंद लिफाफे उड़ाए। जहाजों की कीमत और बाकी जानकारी सीलबंद लिफाफे में मांगी गई। यहीं एक और अजीब बात हुई। अदालत ने अपने आखिरी फैसले में CAG की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जो उस वक्त तक न संसद में रखी गई थी और न ही लोगों के सामने आई थी। गोगोई के दौर में सीलबंद लिफाफे धीरे-धीरे अदालत में जमकर उड़ने लगे। जनवरी 2019 में पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू ने गोगोई पर गंभीर इल्ज़ाम लगाए। उन्होंने कहा कि गोगोई ने एक निजी मामले में सरकार से बात की थी और किसी मंत्री के आगे गिड़गिड़ाए भी थे। काटजू ने लिखा कि ‘उन्हें सुनने में आया कि जस्टिस गोगोई जब सुप्रीम कोर्ट में सबॉर्डिनेट जज थे तब मोदी या उनके मंत्रिमंडल के किसी बड़े मंत्री से भेंट की और गिड़गिड़ाये कि उनके 'संबंधी' का तबादला न किया जाए.‘ काटजू ने आगे लिखा कि ‘अगर ऐसा है तो गोगोई ने पक्का बीजेपी सरकार का एहसान लिया जिसे उन्हें लौटाना ही था. 

राज्यसभा की वेबसाइट के हिसाब से, अपने पूरे छह साल के दौरान गोगोई ने सिर्फ एक बार बहस में हिस्सा लिया, अगस्त 2023 में, दिल्ली सर्विस बिल पर। उस बहस में उन्होंने बेसिक स्ट्रक्चर वाले उसूल पर सवाल उठाए और कहा कि इसकी कानूनी बुनियाद ही साफ नहीं है। यहीं सबसे बड़ा उलझाव दिखता है। जब वो चीफ जस्टिस थे, तब उन्होंने रोजर मैथ्यू केस में इसी बेसिक स्ट्रक्चर उसूल को सही माना था। और एक और अहम बात, अपने पूरे कार्यकाल में गोगोई ने कई बड़े कानूनों पर कुछ नहीं कहा। चाहे कृषि कानून हों, नए आपराधिक कानून, ट्रिब्यूनल सुधार कानून, वक्फ कानून में बदलाव या महिला आरक्षण बिल, इनमें से किसी पर भी उन्होंने कोई बात नहीं रखी। यह खामोशी भी उतनी ही अहम है, जितनी उनकी एकमात्र बहस। 

बहरहाल, गोगोई का राज्यसभा में जाना इस पूरी कहानी का अहम मोड़ तो है ही। पूर्व जज मदन लोकुर ने उनके जाने पर कहा था कि इससे अदालत की आज़ादी, निष्पक्षता और उसकी साख पर असर पड़ेगा। उन्होंने पूछा भी था कि क्या आखिरी किला भी गिर गया है? दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एपी शाह ने भी उनकी राज्यसभा एंट्री को ताकत के बंटवारे के उसूल के खिलाफ बताया था। उन्होंने कहा था कि यह न्यायपालिका की आज़ादी के लिए मौत की घंटी है। बहरहाल, मौत की ये घंटी संसद में छह साल में सिर्फ एक बार बजी, और यह कहने के लिए बजी कि संविधान का बेसिक स्ट्रक्चर, यानी आत्मा तो होती ही नहीं है।

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