सबको जज लोया बनाने पर उतारू मोदी-शाह
जज लोया का भूत अभी तक जजों के सिर पर नाच रहा है। जज डर रहे हैं कि कहीं यह सरकार उन्हें ही जज लोया न बना दे। जज लोया की मौत के लगभग दस साल बीतने के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज भी अब ढके छुपे ही सही, लेकिन इस मसले पर आवाज उठाने लगे हैं। एक दो नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन-तीन जजों ने इस मसले पर आवाज उठाई है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम पहले ऐसे जजों की हिफाज़त करने में नाकाम रहा है, जिन्होंने हिम्मत और ईमानदारी दिखाई। उन्होंने जज लोया का नाम तो नहीं लिया, लेकिन जुडिशरी के हालिया इतिहास में अगर हम जज लोया के साथ ऐसा होते नहीं देखते हैं तो क्या जस्टिस रंजन गोगोई, या जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ ऐसा होते हुए देखते हैं।
जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि ऐसी बातों की वजह से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय सही और ईमानदार रास्ता चुनने से पीछे हट सकते हैं। नाम तो नहीं लिया उन्होंने, लेकिन कहने को तो यह कहा ही जा सकता है कि जस्टिस अरुण मिश्रा बन सकते हैं या दीपक मिश्रा भी बन सकते हैं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि कई जजों में बड़े भले के लिए नुकसान उठाने का हौसला और मजबूत यकीन रहा है। लेकिन आज के वक्त में कितने जज अपने करियर की तरक्की के बजाय ईमानदारी को आगे रखेंगे? क्या आप उनसे यह उम्मीद करते हैं कि जो बातें वो दूसरों को समझाते हैं, उन पर खुद भी ईमानदारी से अमल करेंगे? यह एक कड़वी सच्चाई है, जिसे मानना आसान नहीं है। पहले भी कई ऐसे मामले रहे हैं, जहां जो लोग इस रास्ते पर चले, उन्हें कॉलेजियम की तरफ से कोई हिफाज़त नहीं मिली, यानी यह यकीन नहीं दिलाया गया कि उन्हें उनकी ईमानदारी की वजह से परेशान नहीं किया जाएगा।'
जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई सोच' पर हुए 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के लोगों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथ काम करने वाले जजों की हिफाज़त करनी चाहिए। उन्होंने जस्टिस बी.वी. नागरत्ना से भी अपील की, जो मंच पर मौजूद थीं और कॉलेजियम की मेंबर भी हैं। उन्होंने जस्टिस बीवी नागरत्ना से कहा कि 'कॉलेजियम के मेंबर के तौर पर मैं आपसे गुज़ारिश करता हूं कि आप आगे आएं और उन जजों के साथ खड़ी हों और उनकी हिफाज़त करें, जो वही करते हैं जो आपने अपने उस खास भाषण में कहा था।' जस्टिस दत्ता, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में झिझकना नहीं चाहिए, चाहे इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन के रूप में चुकानी पड़े या इससे हुकूमत में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं।
बता दें कि इसी महीने यानी मार्च में केरल हाई कोर्ट में हुए 'दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि 'भले ही जजों को पता हो कि गैर-लोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें बतौर अपने प्रमोशन, या एक्सटेंशन में चुकानी पड़ सकती है, या इससे वो हुकूमत में बैठे लोगों की नजर में नीचे गिर सकते हैं। लेकिन यह बातें उनके फैसलों के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। आखिर में हर जज का अपना मजबूत यकीन, हिम्मत और आज़ादी ही सबसे ज्यादा अहम होती है। जज के तौर पर हमें हमेशा अपने ओहदे की कसम का पालन करना चाहिए, जो उनका 'कानूनी फर्ज' है, और अपने करियर पर पड़ने वाले असर की परवाह किए बिना उस पर खरा उतरना चाहिए।' जस्टिस नागरत्ना की बात से भी कहीं न कहीं ये तो लगता ही है कि जज लोया का भूत आज तक जजों के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। भारत के जज अब मोदी सरकार से क्या पूरी तरह डर चुके हैं, या कुछ जजाों में जस्टिस मुरलीधर या जस्टिस अुतल श्रीधरन जैसी हिम्मत बाकी है?
वैसे जस्टिस दत्ता या जस्टिस नागरत्ना ही नहीं, जस्टिस उज्जवल भुइयां भी इस मसले पर बोले हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को वॉर्निंग दी कि जुडिशरी के कुछ हिस्सों में मौजूद "राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार होने की मानसिकता" के चलते आरोपी व्यक्तियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रवृत्तियों के कारण लोग महीनों और सालों तक जेल में ही रह जाते हैं, खासकर उन मामलों में जहाँ कड़े कानून लागू होते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा “जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। नतीजतन, लोग महीनों-महीनों तक जेलों में सड़ते रहते हैं।” जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। क्या जस्टिस भुइयां का इशारा उमर खालिद की ओर था, जिसे कि सभी जानते हैं कि सिर्फ और सिर्फ मोदी और अमित शाह के चलते जेल में रखा गया है।
बात जब राजा की आ ही गई है, तो देखते हैं कि कैसे जस्टिस नागरत्ना ने मोदी सरकार की वो पोल भी खोली, जिसमें ये भगवा झंडे बार बार अदालत पहुंच जाते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के उस उल्टे रवैये को सामने रखा, जिसमें वो केसों के ढेर पर फिक्र भी जताती है, और खुद ही सबसे ज्यादा केस डालकर उस ढेर को बढ़ाती भी है। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अदालतों में पड़े मुकदमों के ढेर को लेकर सरकार पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि केसों का ढेर बढ़ने के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। उनका कहना था कि सरकार का तरीका सीधा नहीं है। एक तरफ वो कहती है कि केस ज्यादा हो गए हैं, दूसरी तरफ खुद ही सबसे ज्यादा केस डालती है और बार-बार अपील करती है, जिससे मसला और बड़ा हो जाता है। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के केस लड़ने के तरीके पर सख्त सवाल उठाए।
उन्होंने साफ कहा कि सरकार बहुत ज्यादा केस डालती है और हर बात पर अपील करती है, यही सबसे बड़ी वजह है केसों के ढेर की। उन्होंने कहा कि यह अजीब बात है कि सरकार खुद ही ढेर बढ़ाती है और फिर उसी पर चिंता भी जताती है। उन्होंने कहा, "इससे एक अजीब हालत बन जाती है। सरकार खुद ही शिकायत करती है और खुद ही समस्या भी खड़ी करती है।" उन्होंने कहा कि सरकार से उम्मीद होती है कि वो सोच-समझकर केस डाले, लेकिन इसके उलट वो हर केस को आखिर तक खींचती रहती है। उन्होंने कहा, "सरकार से उम्मीद होती है कि वो एक अच्छा वादी बने, लेकिन ऐसा नहीं होता। वो हर केस को आख़िर तक लड़ती रहती है। सरकार सिर्फ एक पक्ष नहीं है, बल्कि सबसे ज्यादा केस पैदा करने वाली भी है।"
वहीं जस्टिस दत्ता ने यह सवाल भी उठाया कि लोग क्यों कहते हैं कि कॉलेजियम सिस्टम नाकाम हो गया है। उन्होंने पूछा: अगर कॉलेजियम सिस्टम शुरू से ही संविधान का हिस्सा होता, तो डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके बारे में क्या कहते? डॉ. अंबेडकर की इस बात का हवाला देते हुए, 'संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह बुरा साबित होगा। और संविधान कितना भी कमजोर क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे हैं, तो वह अच्छा साबित होगा,' जस्टिस दत्ता ने कहा कि आखिर में सही लोगों को चुनने की जिम्मेदारी जजों पर ही होती है। उन्होंने कहा कि जजों का चुनाव सिर्फ योग्यता से नहीं, बल्कि काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत को देखकर होना चाहिए। 'असली फैसला एक साफ और निष्पक्ष सोच पर होना चाहिए, जो पूरी तरह रिकॉर्ड पर मौजूद बातों पर टिका हो। फैसले जजों के दिए गए फैसलों, रिपोर्ट किए गए मामलों, पेशेवर जांच, लिखे गए काम और दस्तावेजों में दर्ज उनके व्यवहार के आधार पर होने चाहिए। और आखिरी बात, दूसरा पॉइंट भी बहुत अहम है।
उन्होंने कहा कि निजी जान-पहचान, सामाजिक करीबियां, लॉबिंग, गैर-औपचारिक सिफारिशें, या हुकूमत में बैठे लोगों के साथ कथित रिश्ते — चाहे वह न्यायिक हों, राजनीतिक हों या किसी और तरह के — इन सबको पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।' अपने भाषण में जस्टिस दत्ता ने यह भी राय दी कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 40 कर दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि आखिरी बार 2019 में जजों की संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी, और उसके बाद से मामलों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कोलेजियम की भी पोल खोली थी। इसी महीने यानी मार्च में उन्होंने कहा था कि कॉलेजियम में साफगोई की इतनी कमी है साफ़गोई में कि खुद जजों को भी अक्सर यह नहीं पता होता कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और कहां बैठकर फैसले करता है। उन्होंने कहा था कि "आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि हमें सिर्फ यह नहीं पता कि क्या चल रहा है... हमें तो यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहां बैठ रहा है।"
दरअसल मौजूदा सीजेआई सूर्यकांत जबसे आए हैं, तभी से कोर्ट कचेहरी के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर कॉलेजियम चला कौन रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट के जज साहबान चला रहे हैं या सरेंडर सिलेंडर मोदी सरकार चला रही है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जस्टिस मुरलीधर के रातोंरात ट्रांसफर को लेकर बदनाम हुए सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर को लेकर फिर से बदनामी का भगवा चोला ओढ़ लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन सीनियॉरिटी में इस वक्त किसी न किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की अहमियत रखते थे। लेकिन मोदी सरकार के कहने पर उनको मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में भेज दिया गया। न सिर्फ भेज दिया गया, बल्कि वहां उनकी सीनियॉरिटी सातवें नंबर पर बना दी गई, ताकि वो हाई कोर्ट के कॉलेजियम में भी न रहने पाएं।
वहीं उनसे जूनियर जज एसए धर्माधिकारी को सरेंडर मोदी के हक में फैसले सुनाने के चलते मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। और सीजेआई संजीव खन्ना के बाद, या कि कहें कि पिछले सीजेआई बीआर गवई के बाद से जबसे ये नए वाले सीजेआई सूर्यकांत आए हैं, सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने अपनी डिटेल वेबसाइट पर डालनी ही बंद कर दी है। मतलब पहले जनता को हक था, और हक तो खैर अब भी है सब कुछ जानने का, लेकिन कॉलेजियम में सीजेआई सूर्यकांत ऐसा क्या कर रहे हैं कि हर चीज में पर्दादारी है। उनकी इसी पर्दादारी के खिलाफ रीढ़ सीधी रखने वाले कुछ जज बोलने लगे हैं। जाहिर है, कि पहले जज लोया, फिर जस्टिस मुरलीधर, फिर जस्टिस अतुल श्रीधरन, यानी जजों को ये मोदी सरकार आजादी से कहीं भी काम न करने देने को जिस तरह से आमादा है, कुछेक जज ही सही, लेकिन आवाज तो उठने ही लगी है।

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