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Sunday, January 24, 2021

एक सुबह जब शाम हुई

दिन निकला। दिन क्या निकला, उसके निकलने से पहले शाम निकली। तड़के से मैं करवटें बदल रहा था कि दिन निकले, उजाला हो तो मैं बिस्तर से निकलूं। काफी देर तक जब दिन की कोई आहट नहीं मिली तो मैंने कंबल फेंका। सर्दी अचानक बढ़ चुकी थी। ठीक वैसी ही, जैसे कि जाती जनवरी की शामें अचानक से गहरी और ठंडी होने लगती हैं। एक पल को मुझे लगा कि कहीं मैं दोपहर के खाने के बाद तो नहीं सोया था। मगर देह पर मौजूद सोने वाले कपड़ों ने मुझे टहोका, कि नहीं, ये सुबह ही है और ये वही सुबह है, जिसका मैं पिछले दो तीन घंटों से इंतजार कर रहा था। ये वही सुबह है, जिसके लिए मैंने अपना वह सपना तोड़ दिया था, जिसमें मैं उड़ीसा के कोर्णाक मंदिर के गलियारे में लड़की से औरत बनने को उतारू किसी लड़की के साथ घूम रहा था। सपने में मंदिर था, मंदिर के पत्थर थे, बुर्ज थे, हवा के अलसाए झोंके थे और सबसे बड़ी बात तो ये कि सपने में गरमी थी। मेरे उस्ताद शम्सुर्रहमान फारुकी साहब एक जगह पर लिखते हैं कि हम हिंदुस्तानियों के लिए गर्मी से ज्यादा सर्दी तकलीफदेह है और ये लिखने से पहले पता नहीं जमानत में या यूं ही वे कैफी आजमी साहब का एक मिसरा नज्र करते हैं- 

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी 

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है। 

सो सपना था, सपने में गर्म हवा भी थी जो शायद इस डर से सपने में डोल रही थी कि बाहर बहुत सर्दी है और सर्दी के डर से हमारे हिंदुस्तान में आज का दिन रोज के दिन की तरह निकलने से इन्कार कर रहा है। आज हिंदुस्तान में आने के लिए उसे कल की शाम का भी साथ चाहिए, भले कल की शाम से ही उसके डर की वजह शुरू हुई हो। मैं सोचने लगा, जीवन में मैंने भी ऐसे लोगों का साथ खूब जोड़ा है, जो मेरा नुकसान करते रहे, जिनसे कहीं न कहीं मैं डरता रहा, फिर भी शायद किसी बड़े डर की वजह से मैंने नुकसान का साथ नहीं छोड़ा और शायद यही वजह है कि आज मैं घाटे में हूं। लोगों को लगता है कि ये बहुत नफा मार रहा है, लेकिन नफा मुझे उस जूते की तरह लगता रहा है, जो मुझे देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, मगर उसे बर्दाश्त करने की काबलियत अपने पास न होने की वजह से मैं उसे देखकर ही संतोष कर लेता रहा हूं। तो क्या यह मेरा संतोष है जो मेरे नुकसान की वजह है? हिंदुओं के धर्मग्रंथों में तो बहुत कहा गया है कि संतोष ही परमधन है, तो क्या मेरा सारा नुकसान मेरे इस परमधन की वजह से हुआ? क्या मुझे संतोष नहीं करना चाहिए? मगर मैं संतोषी कब था? दुनिया की कोई भी चीज मेरे अंदर यह परमधन नहीं भर पाई, और शायद नहीं ही भर पाएगी। मैं संतोषी नहीं हूं। संतोष ने मुझे इतना दिक्क किया कि आखिरकार मैंने कंबल दूर फेंक दिया और उससे चार गज और दूर मैंने संतोष को फेंका। इसलिए भी फेंका कि पिछले दिन भर और आधी रात तक की मेहनत के बाद मैं नींद से संतुष्ट नहीं था। मैं सुबह से भी संतुष्ट नहीं था, जो इतनी मेहनत, इतने इंतजार के बाद आई, मगर शाम से हाथ मिलाकर आई। सुबह ऐसे भी कहीं आती है? भुनभुनाते हुए मैंने बिस्तर छोड़ा, कि आज मैं इस सुबह को नहीं छोड़ूंगा। इसी की खातिर मैंने सपने में बहती गर्म हवा छोड़ी, खुला आंगन छोड़ा, और सबसे बड़ी बात जो रही, वह बताने की नहीं है, कोई कहेगा, तो भी नहीं बताउंगा। 

सुबह मैंने बिस्तर छोड़ा। रात के छोड़े हुए कपड़े कैसे-कैसे करके अपने बदन पर डाले और कमरे से बाहर आया। बाहर शाम होने को थी। बल्कि ये दिन ऐसा दिन था कि दिन निकलने के साथ ही शाम अपने होने की जिद लिए गठरी बनी बैठी थी। शाम को सर्दी बहुत लग रही थी, लेकिन किसी भी मौसम, या किसी भी दिन या किसी भी चीज से ज्यादा बड़ी चीज जिद होती है। शाम सुबह से ही अपनी जिद पर थी। एकबारगी मैंने सोचा कि आज मैं दिन से हार मान लूं क्या? फिर मैंने सोचा कि हर किसी से हारने के बाद अगर मैं दिन से भी हार गया, तो फिर अगले दिन में जाना और फिर उसके भी अगले दिन में जाना मुसीबत हो जाएगा। दिन अपना दरवाजा एक बार किसी के लिए बंद कर लेता है तो जल्दी खुलना मुश्किल हो जाता है। कई लोग तो पूरी उम्र खुद को रात का राही कहते रहे हैं। कई लोग आज तक अवध की शाम से नहीं निकल पाए, उनके जीवन में सुबह हुई ही नहीं। फिर शाम से मेरी उतनी दोस्ती भी नहीं रही, क्योंकि मेरे पेशे सहाफत की कुछ ऐसी मजबूरियां हैं कि हम लोग जब इस पेशे में आते हैं तो अपनी हर शाम मुल्तवी करके आते हैं। जब दुनिया शाम की रंगीनियत से दो चार हुई रहती है, हम लोग दुनिया से उड़ते रंगों की रपट लिखने में मगशूल होते हैं। क्या करें, पेशा ही ऐसा है। दुनिया जब रंग बिगाड़ती है, बदलती है तो हम दुनिया भर को बताने की तैयारी में लगते हैं कि रंग बिगड़ चुका है- बदल चुका है। 

जब भी मैं शाम देखता हूं, एक बार यह जरूर सोचता हूं कि किसी और पेशे में होता तो कम से कम शाम देख लेता। जब तक मैं इस पेशे में नहीं था, या कि यूं कहें कि जब मैं कहीं भी नहीं था तो अपने बारा पत्थर के मैदान शाम का आसमान देख रहा होता था। पहले पीला, फिर नारंगी और फिर लाल होते हुए सबकुछ गाढ़े नीले में तब्दील होते देखता। मैं चित्रकार नहीं हूं और तब भी इसके बारे में नहीं सोचा, जब इतने सारे रंग मेरे सामने खेल रहे होते। बल्कि कभी कभी मुझे खुद से चिढ़ होती है कि मैंने इतने सुंदर सुंदर रंग देखे हैं, फिर भी जब बात रंग चुनने की हो तो मैं हमेशा कोई न कोई वाहियात रंग चुनता हूं। मेरे जीवन की सारी चित्रकारी सिर्फ इसी वजह से धरी रह गई, क्योंकि मुझे रंग देखने तो आते हैं, मगर चुनने नहीं आते। मेरे घर के सामने एक नीम का पेड़ है, जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। मगर क्या मजाल कि मैं कभी भी उसके लिए एकदम सही सब्ज चुन पाऊं। फिर भी मैं रोज शाम का इंतजार किया करता, और अपने आप से शर्त लगाता कि आज वाला लाल कल वाले लाल से ज्यादा लाल होगा। बहुत बाद में जब मैंने पहाड़ देखे, वहां की शाम देखी तो नोट किया कि जितनी लाल, जितनी नर्म और जितनी रोमानी हमारे मैदानों की शाम होती है, उतनी पहाड़ों की शाम नहीं होती। बल्कि अगर कोई मुझे इसके लिए सजा न दे तो मैं ये भी कहूंगा कि पहाड़ों की शाम बेहद खुरदुरी और जकड़न से भरी होती है, जिसमें एक रंग डर का भी होता है। डर यह कि बाहर निकले तो जाने कौन खा जाए, जाने कहां से पैर फिसल जाए या जाने कौन सा कीड़ा-मकोड़ा काट ले। मैदानों की शाम बेखौफ होती है और शायद यही वजह है कि उसमें लाल, पीले और नीले के जितने शेड्स होते हैं, उतने मुझे कहीं भी देखने को नहीं मिले। कुछ लोग समुद्र का जिक्र कर सकते हैं, लेकिन समुद्र भी मैदान में ही होते हैं, पहाड़ों में नहीं होते। रंगों को फैलने के लिए बहुत ढेर सारी जगह चाहिए होती है, जिनमें धरती की सिकुड़न बेवजह शोर मचाती है। 

मगर मैं यह क्या सोच रहा हूं? मैं यह क्या कह रहा हूं और आखिर क्यों कह रहा हूं? मैं तो सुबह के इंतजार में था और भले ही शाम के साथ हुई, मगर सुबह तो हुई ही। फिर मुझे किस चीज से इतनी शिकायत है? और फिर शिकायतों का बंडल तो शाम तले खुलता है, अभी तो सुबह हुई है? सुबह से कैसी शिकायत? वह तो नया दिन लेकर आई है। नया दिन, जिसमें वह सब कुछ होगा, जो उस दिन से पहले कभी नहीं हुआ। नया दिन, जिसमें उस दिन से पहले वह सारी चीजें सामने आएंगी, जो पिछले हजारों हजार दिनों से सामने आने से रह गई हैं। मुझे नए का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं खीझ रहा हूं। मुझे सुबह का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं उससे मुंह फेरकर बैठा हूं। अगर किसी सुबह दिन शाम के साथ आ जाएगा तो क्या मुझे बर्दाश्त नहीं होगा? आखिर मोहल्ले की सारी लड़कियों की शादी हुई, मैंने बर्दाश्त की और आज भी मोहल्ले में वापस जाना नहीं छोड़ा। ना चाहते हुए भी कानून की मोटी मोटी और नीरस किताबें मैं बर्दाश्त करता रहा हूं। बेमन से ही सही, मगर आंकड़ों की फेहरिस्त को घंटों बर्दाश्त करता हूं, फिर एक अदद सुबह मुझसे बर्दाश्त क्यों नहीं हो रही है?   

.... नहीं पता कि जारी या खत्म।

एक सुबह जब शाम हुई

नींद तो यूं ही तमाम हुई

काम न कोई हो पाया

नाक लाल औ जाम हुई।

और ये मिसरे कैफी साहब के नहीं हैं, बल्कि ये मिसरे किसी के भी नहीं हैं। 

Friday, January 3, 2020

सबसे मीठी तो बेहद गुस्सैल भी है उर्दू: संजीव सराफ

उर्दू पर दिल्ली में होने वाला सालाना जलसा जश्न-ए-रेख्ता पिछले दिनों भारी भीड़ के साथ संपन्न हुआ। एक भाषा को लेकर इतने सारे लोगों की मोहब्बत देखकर एकबारगी किसी को भी ताज्जुब हो सकता है। उर्दू की रगें झनझनाने का श्रेय संजीव सराफ को जाता है। उर्दू की मशहूर वेबसाइट रेख्ता डॉट ओआरजी इन्हीं की है और संजीव खुद भी उर्दू के जुनूनी पाठक हैं। पैदाइश नागपुर की है और पढ़ाई-लिखाई मुंबई, ग्वालियर और आईआईटी खड़गपुर की। फैमिली बिजनेस के बाद खुद का बिजनेस किया। पांच-छह मुल्कों में प्लांट्स हैं। सात साल पहले अपने जुनून के लिए सारे काम-धंधे से अलग हो गए। जुनून थी उर्दू, जिसकी महक पिछले दिनों दिल्ली सहित दुनिया भर में फिर से फैली। मैंने संजीव सराफ से बात की। पढ़िये प्रमुख अंश :

वेबसाइट रेख्ता की शुरूआत के बारे में बताएं?
अपने रोज-रोज के काम से उकता गया था। शांति मिल ही नहीं रही थी। शौक कहिए या अपनी रूह के लिए कहिए, मैंने उर्दू में शायरी और दूसरी चीजें पढ़नी-लिखनी शुरू कीं। तब लगा कि मुझ जैसे करोड़ों होंगे जो उर्दू पढ़ना चाहते हैं पर एक्सेस नहीं कर सकते। इसीलिए रेख्ता शुरू की। शुरू में लगभग पचास-एक शायरों के कलाम देवनागरी और रोमन में पेश किए। पर साल भर में उसमें पर लग गए। आज उसमें साढ़े चार हजार शायरों के कलाम हैं, चालीस हजार गजलें हैं, आठ हजार नगमे हैं। ऑडियो-वीडियो, डिक्शनरी के अलावा और भी बहुत कुछ है।

आपने नायाब किताबों को डिजिटली सेफ करने का भी काम किया है। इसके बारे में बताएं।
हम वेबसाइट के लिए कलाम खोज रहे थे, लेकिन उनकी अवेलिबिलिटी नहीं थी। कुछ किताबें लाइब्रेरी में थीं, कुछ लोगों के पर्सनल कलेक्शन में। मेरा मानना था कि धूल, दीमक, पानी या आग में ये सब बरबाद हो जाएंगी। तो हमने बड़े-छोटे पैमाने पर किताबों को स्कैन करके डिजिटली प्रिजर्व करना शुरू किया। फिर देखा कि किताबों की तादाद बहुत ज्यादा थी। तब हमारे पास सिर्फ एक मशीन थी। अब 17 शहरों में हमारी तीस मशीनें लगी हैं। अब तक हमने एक लाख किताबें डिजिटली प्रिजर्व की हैं।

ऐसी कितनी किताबें रहीं जो लगभग खत्म हो चुकी थीं, जिनकी दूसरी कॉपियां नहीं थीं? उनके बारे में बताइए।
ये कहना तो बहुत मुश्किल है। किताबें कहां-कहां हैं, ये किसी को अंदाजा नहीं है। जखीरा इतना बड़ा है, कि कहना मुश्किल है कि कितनी छपीं और कितनी बची हुई हैं? लेकिन नायाब किताबें तो बहुत हैं। सन 1700 से 1800 में छपी किताबें हैं। सन 1860 के बाद मुंशी नवल किशोर ने काफी किताबें छापी थीं, उसमें से भी काफी हैं।

पिछले दिनों दिल्ली में हुए जश्न-ए-रेख्ता में तकरीबन दो लाख लोग आए। यह दिल्ली का सबसे बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम हो चुका है। लेकिन बजरिए रेख्ता वेबसाइट, आप इस जुबान का ज्यादा बड़ा फैलाव देख पा रहे हैं। इसके बारे में बताइए।
ये तो जबान का कमाल है साहब, हम तो सिर्फ अरेंजमेंट करते हैं। इतनी मीठी जुबान दुनिया में कोई है ही नहीं। इसके जरिए ढेरों आर्ट फॉर्म्स बने हैं। गजल सिंगिंग, सूफी सिंगिंग, कव्वाली हो या ड्रामा या दास्तानगोई, इतने आर्ट फॉर्म्स किसी और जुबान में जल्दी नहीं मिलते। दुनिया के डेढ़-पौने दो सौ मुल्कों से रेख्ता वेबसाइट के दो करोड़ यूनीक यूजर्स हैं। जहां-जहां हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग बसे हैं, उनको रेख्ता के अलावा और कहीं भी इतना कंटेंट नहीं मिलता। 40 हजार लोगों ने तो उर्दू सीखने के लिए हमारी वेबसाइट जॉइन की है।

उर्दू क्या सिर्फ शायरी की जुबान है? शेर-ओ-शायरी के अलावा उर्दू को आप कहां देखते हैं?
ये गलत इलजाम है। शायरी की भाषा तो है ही, लेकिन इतनी खूबसूरत जुबान है कि इसमें आप कोई भी गुफ्तगू करें, लगता है कि शायरी कर रहे हैं। ये इजहार का जरिया है। हमारे इंडिपेंडेंट मूवमेंट के पहले से ही इंकलाबी शायरी हुई है। इंकलाब-जिंदाबाद हसरत मोहानी ने लिखा। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है, बिस्मिल अजीमाबादी ने लिखा। शायरी हर जगह इस्तेमाल हुई है। ये बोलचाल जुबान थी। ब्रिटिश ने थोड़ा पर्सनलाइज करके इसे मुसलमानों के लिए कर दिया और थोड़ा संस्कृटाइज करके हिंदुओं के लिए। फिर लिट्रेचर और बोलचाल की जुबान अलग भी होती है। जितना तंज-ओ-मजाह उर्दू में है, मेरे ख्याल से शायद अंग्रेजी के अलावा कहीं नहीं है। सोशल कॉन्टेस्ट में भी खूब लिखा गया है। मंटो की शॉर्ट स्टोरीज हों या इस्मत चुगताई की हों! ऑटोबायोग्राफीज हैं। वैसे ये बेहद गुस्सैल जुबान है, लेकिन ज्यादातर लोग शायरी या नगमे सुनते हैं तो उनके दिमाग में इसका इंप्रेशन वैसा ही है।

शायरी का पाठकों की उम्र से कुछ रिश्ता है? लोग किन शायरों को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं?
लोगों की पसंद होती है। पहले कहते थे कि जब तक कॉलेज में हो, साहिर लुधियानवी को पढ़ो, और बाद में भूल जाओ। साहिर को यों कि वो थोड़े रिवोल्यूशनरी प्रोग्रेसिव मूवमेंट के थे, थोड़ा इश्क भी किया था। लेकिन मैं मानता हूं कि उसी उम्र में रीडर को गालिब भी पसंद आएंगे और वह अर्थ भी अलग लेगा। वही शेर वह बाद में पढ़ेगा तो दूसरा ही मतलब समझ में आएगा। बात कैफियत की है जो बदलती रहती है और उसी हिसाब से अर्थ और शायर भी।

आप के पास उर्दू को देखने की तकनीकी नजर है। आप इस पर लगातार काम भी कर रहे हैं। इस नजर से बताइये कि उर्दू आज से दस साल पहले कहां थी, अब कहां है और आज से दस साल बाद इसे आप कहां देख रहे हैं?
जब हमने शुरू किया था, तब सुनते थे कि उर्दू जुबान पस्त है, मर रही है या कोमा में आ गई है, वगैरह-वगैरह। लेकिन रेख्ता की सक्सेस के बाद अब आप देखेंगे कि इसी तर्ज पर सैकड़ों जश्न होने लगे हैं। सबका नाम जश्न से ही शुरू हो रहा है। दरअसल पब्लिक कॉन्शस हुई और जबरदस्त चेंज आया है। अब ये जुबान मेनस्ट्रीम में आ गई है। अब आपको ये सुनने में नहीं आएगा कि उर्दू मर रही है।

अगर हिंदी से उर्दू निकाल दें तो क्या बचेगा?
सुबह-शाम मुंह से नहीं निकलेगा। प्रात:काल या संध्याकाल यूज करेंगे। या प्यार इश्क मोहब्बत न बोलकर प्रेम या फिर ऐसा ही कोई लफ्ज यूज करेंगे। हिंदी सिनेमा से निकाल के बताइए उर्दू, फिर क्या बचेगा? दूध में से चीनी निकाल दीजिए, फिर क्या बचा? कर लीजिए कोशिश। हमारी बोलचाल हिंदुस्तानी है। उर्दू-हिंदी का ग्रामर एक है। जो निकालना चाहें, निकाल दें, कर लें कोशिश।   

Thursday, March 8, 2018

मैं महुआ बीनता हूं, आपको भी महुआ मिले

यह मेरी सफलता नहीं है। यह बिक चुकी भारतीय पत्रकारिता की असफलता है। लोगों को ताकत चाहिए। ताकत इन्फॉरमेशन से मिलती है, जो इंडियन मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म नहीं दे पा रहा है। इंटरनेट ने ताकत चाहने वालों के सामने खुला खेत खोल दिया है। लोग ताकत ले रहे हैं, खेत जोत रहे हैं। लोग एक लाख घंटे से ज्यादा की ताकत पी चुके, वह भी तीन महीने में। तीन महीने पहले मैं मेनस्ट्रीम मीडिया से बुरी तरह से ऊब गया। टीवी तो वैसे भी नहीं देखता, लेकिन अखबार और इंटरनेट पर दिखते यलो जर्नलिज्म से मन खट्टा हो गया। तय किया कि सबकुछ असांजे की ही तर्ज पर करूंगा। खुद से वादा किया कि जो जैसा है, वैसा ही सामने रखना है, बगैर किसी ड्रामा के। किसी ने पूछा कि तुम बोलते हो या मशीन? उसके सवाल में मुझे मेरा जवाब मिल गया। असांजे गुरु, क्या सिखा दिया बे तुमने? जीवन में कभी वीडियो नहीं बनाई थी। प्रिंट का हूं, कैसे बनाता और क्यों ही बनाता? फिर दस दिन तक वीडियो बनाने वालों का पीछा करता रहा कि कुछ सिखा दें, मगर मुझे सिखाना उन्हें अपनी नौकरी का संकट लगा। फिर दुनिया के पास गया। बोला कि सिखाओ, और दुनिया ने वीडियो बनाना सिखा दिया। दुनिया है ना, सब सिखा देती है। मुझे पता है कि मैं वाहियात वीडियो बनाता हूं। उसमें कला कहीं नहीं होती। कला करनी भी नहीं है मैंने। सूचनाओं में कला होनी भी नहीं चाहिए, उनके अर्थ बदल जाते हैं। सूचनाएं कला करने में स्वयं सक्षम हैं, बशर्ते कोई दे तो सही। कोई बताए तो सही। अगर कहूं कि मैं सूचनाएं देता हूं तो यह पूरी तरह से गलत और झूठ होगा। मैं सिर्फ मैनेजर हूं, कलेक्टर हूं इन्फॉरमेशन का। सूचनाएं हमारे सामने ही होती हैं, बस हम फर्क नहीं कर पाते। सामने की सारी सूचनाएं इसी दुनिया से इकट्ठा करता हूं और इसी को दे देता हूं। जो है, वह सबका है, सबके लिए है। मैं महुआ बीनता हूं। नाक में महुआ बसा है। आपको भी महुआ मिले, मिलता रहे, इसी खुशबू के साथ-

सवा लाख से एक लड़ाऊँ 
चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ 

तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ

MORE POWER TO YOU..
MORE RISING TO YOU..

Wednesday, February 28, 2018

اصلی جادو

کچھ سال پہلے ایودھیا مے ایک شاید کبھی نہ بننے والی فلم کے لئے آڈیشن لے رہا تھا .کلا کی گرمی مے ابلتے لوگو کی کتار
لگی تھی ، پر ہم ٹھنڈے ہوتے جا رہے تھے.بات یہ تھی کی گانے والے سارے کے سارے لوگ کسی نہ کسی کی نکل کر رہے تھے.اپنی نکلی آواز سے وہ ایک مشهور صوفی سنگر کے اسپس پہچنے کی ناکام کوشش کر رہے تھے.یہ نقل ہمارے خواب پر تیزاب ڈال رہی تھی.ہمنے تین چار روز تک آڈیشن لیا .مگر مجال کی ایک بھی سچچی آواز ہم تک پہچی ہو.اس آڈیشن مے کم سے کم دو درجن لوگوں نے گیا مگر ایک بھی آواز ہمرے کانو تک نہ پہچی .

تنگ آکر ہمنے کیمرے کے لینس پر دھککن لگا دیا.ہمی کوئی امید نہیں تھی کی نکل کا جو دھککن گویا بننے کے نے خواہشمندو نے اپنی آواز پر لگا رکھا ہے.اسمے ہمی کوئی مدد مل پیگی.پھر کی دنو تک ان گویوں کا فون آتا رہا.می سمجھتا رہا کی نکل سے کچھ نہیں ہونے والا.ابھی ابھی کچھ دن پہلے فیض احمد فیض کی گزل "دونو جہاں تیری موحبّت مے ہار کے"کے لئے پھر آواز دھندھنی شرو کی.اسمے دو رہے نہیں کی فیض کو چاہنے والے جتنے اپنے معلق مے ہیں اتنے دوسروں ملقوں مے نہیں.لیکن بات جب آواز کی ای تو می اپنے ملک سے ہار گیا.کوئی مہدی حسن بنتا ہے تو کوئی گلام الی .ایک عہدہ کو چھوڈ دن تو اس معاملے مے بھی یہاں کے ناکلچیوں نے ناک کٹوا رکھی ہے -

ہارکر می سیدھا پاکستان پہچا جہاں ایک بینڈ اندھیرے کمرے مے فیض کو اسی حد تک گنتی ہی آواز ملی.جسکے اسپس کوئی موہبّت گلزار ہوتی دیکھتی.آواز شاید سندھ کی تھی اور لہجہ حمد کا تھا.اس آواز کی موحبّت مے می کچھ یوں مبتلا ہوا کی اب تک اسے خود سے چپکے ہوئے ہوں.نہ صرف خود سے بلکی اپنے یہاں کی گلاب باڈی سے بھی اسے چپکا دیا ہے.بگیر کی ساز کے آتی اس آواز کے اپر مہینے ایودھیا فیزآباد کی تصویریں چسپ کے اور وایا انٹرنیٹ اسے واپس پاکستان پہنچا دیا.ایبتآباد کی لبنا اور کراچی کی نور بیگم ان باکس مے اتر این .انکا چپکایا سرقه لال رنگ کا دل میرے ان باکس مے ہمیشہ محفظ رہیگا .فیصلباد مے ان مولوی سحاب کی دوا بھی جو ہماری گلاب باڈی دیکھ برباس نکل پڑی ہوگی "الله تال آپکو ہر نظربد سے محفظ رکھے "یہ اصل آواز کا جادو تھا جو نکل کرنے والے ناکالچی نہیں سمجھیںگے .

Translation- Hafeez Kidwai
Published in Navbharat Times- India

Wednesday, February 21, 2018

शब्द शब्द सांस कहो!

दूर कहो
पास कहो
रंग कहो
रास कहो।

गंध कहो
बास कहो
शब्द शब्द
सांस कहो।

नूर कहो
आस कहो
भरी भरी
टास कहो।

सूर कहो
दास कहो
तृप्ति कहो
प्यास कहो।

गीत कोई
आज कहो
मीत मेरे
साथ कहो।

Sunday, January 31, 2016

3- सूनसान बि‍याबान

बहुत वक्‍त बाद बोलता मि‍ला एक जीवंत इंसान
मैं क्‍या करने नि‍कला था और क्‍या कर रहा था, इसका मुझे ठीक-ठीक कोई अंदाजा नहीं लग पा रहा था। अब तो जो कुछ भी था, सामने का रास्‍ता था, बुलेट की धड़-धड़ के साथ ठंडी हवा की कान के बगल से नि‍कलती खड़खड़ थी। इस लंबे रास्‍ते पर उन सारी जगहों के मील के पत्‍थर लगे हुए थे, जहां मुझे नहीं जाना था लेकि‍न क्‍या मजाल कि जहां जाना था, वहां का एक भी मील का पत्‍थर पूरे रास्‍ते में कहीं मि‍ल जाए। कुछ देर तक तो मैं चि‍ढ़ के साथ मील के पत्‍थरों को खोजता आगे बढ़ता रहा और तकरीबन सौ सवा सौ कि‍लोमीटर चलने के बाद जब उन्‍हें कहीं भी न पाया तो पूरी ऊब के साथ उन्‍हें तलाशता रहा। ये बड़ा अजीब रास्‍ता था। रास्‍ते पर चलने के लि‍ए बहुत कुछ था लेकि‍न चलने वाले थे कि दूर दूर तक नज़र ही नहीं आते थे। बड़ी देर बाद जब मुझे रास्‍ते में कीचड़ में पांव लथेड़े सि‍र पर धान लादे मोबाइल पर जोर जोर से हलो-हलो करता एक आदमी दि‍खा तो मैनें तुरंत उसकी फोटो उतार ली। वो बहुत वक्‍त बाद बोलता मि‍ला एक जीवंत इंसान था जि‍सके लि‍ए धीमे बोलने का कोई खास अर्थ नहीं था।

यूपी में बहुत घनी आबादी है। यहां अगर हर तरफ से बंद सड़क न हो (जैसे मुरादाबाद से दि‍ल्‍ली वाली या लखनऊ से फ़ैज़ाबाद वाली या एक्‍सप्रेस वे) तो साठ के ऊपर कुछ भी चलाना बहुत मुश्‍कि‍ल है। हर दो से तीन कि‍लोमीटर पर दो से तीन गांव पड़ते हैं और गांव में रहने वालों का सड़क पर हर हाल में एक ठीहा होना ही होता है। ठीहा होगा तो कुत्‍ते से लेकर बच्‍चे तक उसपर होंगे तो घंटा स्‍पीड मि‍लेगी। बिहार में भी आबादी है लेकि‍न यूपी जि‍तनी घनी नहीं। खासकर उस सड़क पर तो बि‍लकुल नहीं जो मोहनि‍यां से पटना की तरफ मुड़ती है। ये सड़क मुझे हमेशा याद रहेगी। ठि‍ठुरन, सि‍हरन, सड़न, करन, ऊबन... ऐसे कौन से भाव नहीं थे, जि‍नसे होते हुए मैं इस रास्‍ते से गुजरा। और वैसे भी, गि‍नती के 185 कि‍लोमीटर के रास्‍ते पर अगर पांच घंटे लग जाएं तो इन सारे भावों का आना ग़ैरवाज़ि‍ब नहीं है। वो भी तब, जबकि ये रास्‍ता नब्‍बे फीसद खाली था। कभी कभार कोई बस या जीप दि‍ख जाए तो सही रास्‍ते पर चलते रहने का यकीन होता था, नहीं तो कहां जा रहे हैं, इसका अंदाजा ही लगाना पड़ रहा था और वो भी ठीक-ठीक नहीं लग पा रहा था। इस रास्‍ते की उस रास्‍ते से भी तुलना की जा सकती है जो मुरादाबाद से रामपुर के चावल के कटोरे स्‍वार से होते हुए हल्‍त्द्वानी और फि‍र नैनीताल को जाता है।

जहानाबाद से गया जाते हुए ताड़ के पेड़
रोहतास से नि‍कलते ही शीत लहर ने जोर पकड़ा। हालांकि मैनें इनर के साथ गर्म पायजामा पहना हुआ था लेकि‍न सर्द हवाएं तेज़ हो रही थीं। एक जगह आराम करने के लि‍ए बाइक खड़ी की तो बहुत दि‍न क्‍या बहुत साल पहले कभी देखा हुआ नज़ारा फि‍र से देखा। दाहि‍नी तरफ सूरज छुप रहा था और बाईं तरफ चांद नि‍कल रहा था। यही नज़ारा फि‍र से एकबार जहानाबाद से गया जाते हुए ताड़ के पेड़ों के पार भी दि‍खा। आधे घंटे के अंदर मेरे सामने रात थी, उधड़ा हुआ पूरी तरह से बि‍याबान ऐसा रास्‍ता था जि‍समें 30-30 कि‍लोमीटर तक न तो कोई गांव दि‍खता था न इंसान। गाड़ी घोड़ा भी बहुत कम। भूख बहुत जोर की लगी थी क्‍योंकि दि‍न भर में जो खाने को मि‍ला था वो बक्‍सर में वही काले होंठों वाली स्‍त्री के बनाए दो समोसे थे या नि‍कलने से ठीक पहले मेवा मि‍ली बनारस की ठंडई। कहीं आदमी नहीं दि‍ख रहा था, कुछ ढंग के खाने की दूकान कहां से दि‍खती। बीती ताहि बि‍सारता भूखा पेट बुलेट लि‍ए मैं भागा जा रहा था। ठि‍ठुरता, सि‍हरता, डूबता पाटलि‍पुत्र की ओर।   

Saturday, January 30, 2016

2- काले होठों वाली स्‍त्रि‍यां

- तस्‍वीर में ऐसी ही काली कुपोषि‍त काया वाली बच्‍ची है
जि‍सके पैरों में चांदी की पायल सर्दी की हलकी धुंध में भी चमक रही है
और एक काले होंठों वाला व्‍यक्‍ति उन्‍हें गोलकर फूस में आग जलाने का प्रयत्‍न कर रहा है।
बक्‍सर में जो समोसे खाने को मि‍ले, उनमें आलू के साथ साथ काले चने भी मि‍ले थे। साथ में टमाटर लहसुन और हरी मिर्च की सि‍ल पर पीसी चटनी थी। जि‍स स्‍त्री ने इसे बनाया, उसका रंग सांवला और होंठ काले थे। जौनपुर में जो समोसा खाया, उसके साथ तलकर नमक से लपेटी हरी मिर्च भी मि‍ली, जि‍से मेरे बगल अपने पति के साथ खड़ी स्‍त्री नहीं खा पा रही थी। उसके होंठ भी काले थे जि‍नपर मिर्च से उतरे नमक के महीन दाने शाम की धूप में चमक रहे थे। मोहनि‍यां से पटना तक के दो सौ कि‍लोमीटर के रास्‍ते में मुझे एक भी स्‍त्री ऐसी नहीं दि‍खी, जो कवि‍यों की कुकल्‍पना के मुताबि‍क हो। अब अगर कोई कवि गुलाबी होंठों को केंद्र में रखकर कोई कवि‍ता कहेगा या कह चुका होगा तो मैं उसे कवि‍ता मानने से इन्‍कार करता हूं और उस कवि की समूची कल्‍पना के आगे सर्वकाल के लि‍ए कु शब्‍द स्‍थापि‍त करता हूं।

नहीं हैं गुलाबी होंठों वाली स्‍त्रि‍यां अपने यहां। होंगी तो कहीं एयर कंडि‍शनर या ब्‍लोअर की छांव तले होंगी जि‍नतक भोजपुर बक्‍सर की नंगी उधड़ी सड़क पर भागते हुए मैं नहीं पहुंच सका। जहां भी पहुंचा, फि‍र चाहे वो कमाली बेगम की मज़ार हो या कौआ डोल या राजगीर की खुरदुरी पहाड़ि‍यां, सर्दियों से सूखे काले होंठ और कुपोषि‍त काया वाली स्‍त्रि‍यों को कंडे पाथते या पुआल धरते पाया। बि‍हार में अभी कई जगहों पर गेहूं बोया नहीं गया है नहीं तो खेतों में उनके जीवि‍त कंकाल काले होंठों के पीछे से मोती चमकाते दि‍खाई देते।

वही स्‍त्रि‍यां
राजगि‍र के उड़न खटोलों में भी वही स्‍त्रि‍यां थीं जो दोनों हाथ के अंगूठों को मुट्ठी में भींचकर अभी ठीक ठीक सैलानी बनना सीख रही थीं। मुंह और आंख, दोनों फाड़कर वो हि‍लते हुए वहां की पहाड़ि‍यों को ऐसे देख रही थीं, जैसे आंखों से ही सारी तस्‍वीरें उतार लेना चाह रही हों। कैमरा क्‍या होता है, काले होंठ वाली उन स्‍त्रि‍यों के लि‍ए कल्‍पना मात्र था, हालांकि सैलानी बनने की ज़ि‍द में उन सबने चोटी पर पहुंचकर वहां 34 रुपये की एक फोटो खींचने वाले तस्‍वीरकार से तस्‍वीर जरूर उतरवाई। लौटते वक्‍त सभी के हाथ में मोती पि‍रोती पन्‍नी मढ़ी एक एक तस्‍वीर थी।

Vishva Shanti Stupa, Rajgir
हालांकि मैं भी अभी सीख ही रहा हूं कि ठीक-ठीक सैलानी कैसे बना जाता है और अफ़सोस से कहता हूं कि मेरी अब तक की सभी यात्राएं मुझे पूरी तरह से सैलानी नहीं बना पाई हैं। हो सकता है कि पांच-सात हजार कि‍लोमीटर चल लेने के बाद मुझमें बंगालि‍यों की तरह इसका कोई हुनर डेवलप हो जाए, फि‍र भी उसमें अभी काफी वक्‍त है और तब तक मैं अधूरा सैलानी, भ्रमि‍त यात्री ही बना रहूंगा, ये तय है। कहते हैं कि बंगाली सबसे अच्‍छे सैलानी होते हैं। हालांकि मेरी ही नामाराशि के एक भाईसाब मि‍थकतोड़ इति‍हास बन चुके हैं, मैं उनका सवा ग्‍यारह भी पा जाऊं तो धन्‍य होऊं। गुलाबी होंठ, गुलाबी आंखें, गुलाबी बदन और जो कुछ भी श्रृंगार के झूठे मानक मुझे आज तक बताए गए, वो कहीं नहीं मि‍ले, इसलि‍ए इस बात का मैं दावा करता हूं कि अपने यहां श्रृंगार के झूठे मानक गढ़े गए हैं। श्रृंगार के असली मानक काली कुपोषि‍त काया में दमकते मोती और पूरे चांद की चमक लि‍ए वो आंखें ही हो सकती हैं जि‍नमें से बातें गि‍रती हैं। इस सौंदर्य की मैं तस्‍वीर उतारना चाहता था लेकि‍न पूरे रास्‍ते मुझे ऐसी कोई भी स्‍त्री मेरी कल्‍पनाजनि‍त मुस्‍कान लि‍ए  नहीं मि‍ली। मुझे तस्‍वीर न उतार पाने और स्‍त्रि‍यों के न हंस पाने पर भी अफ़सोस है।  

1- कौन देता है रास्‍ता


-मोहनि‍यां से पाटलि‍पुत्र जाते गड्ढों की एक छवि।
अब ये पुराने जमाने की बात हो चली कि जब बुलेट चले तो दुनि‍या रास्‍ता दे। दुनि‍या में कोई रास्‍ता नहीं देता और न ही देने को तैयार है। बुलेट क्‍या, कार लेकर भी चलि‍एगा तो सड़क पर बैठा कुत्‍ता भी बगैर हौंकाए नहीं हटता, आदमी तो उससे भी ज्‍यादा जि‍द्दी ठैरा। ये बात जि‍तनी जल्‍दी समझ में आ जाए, उतना अच्‍छा। और फि‍र रास्‍ता कोई देगा कैसे। रास्‍ता होगा तब ना देगा। होबे नहीं करेगा तो क्‍या घंटा देगा। जो कुछ भी रास्‍ता होता है वो होने से कहीं ज्‍यादा गड्ढा होता है, तालाब होता है जि‍सके कि‍नारे से हर कोई बस कैसे भी करके नि‍कल जाना चाहता है। सैकड़ों कि‍लोमीटर गड्ढों और तालाब के कि‍नारे कि‍नारे नि‍कलते जब मन मांझी होने लगता है तो पता चलता है कि कि‍तनी भी हि‍म्‍मत बटोर लें, मन ही मन कि‍तने भी पत्‍थर काट लें, गड्ढे में चलना, उसमें पड़े रहना ही हम सबकी नि‍यति बन चुकी है। फि‍र चाहे हम ऊपी में हों या बि‍हार में, अंतत: हम रास्‍तों में बने गड्ढों में ही होते हैं।

वही... 
रास्‍ता कैसे लि‍या जाता है, उससे ज्‍यादा कैसे सामने वाले को एकदम नहीं दि‍या जाता है, ये हम बनारस में अच्‍छी तरह से सीख सकते हैं। थोड़ा बहुत इसका असर पता नहीं कैसे मेरठ वालों पर पड़ा है, लेकि‍न पूरा पड़ने से रह गया है, इसलि‍ए अभी भी मेरठ में दस मि‍नट की ड्राइव में हम दो मि‍नट इधर उधर देख सकते हैं। बनारस में दस मि‍नट गाड़ी चलाएंगे तो पंद्रह मि‍नट सिर्फ सामने से रास्‍ता छीनने को लपलपाते लोगों से ही नि‍पटने में लगेगा। कहने को तो सब लाल बत्‍ती देखकर रुक जाते हैं लेकि‍न बत्‍ती जब हरी होती है तो वो सामने से आते ट्रक को भी नाली कि‍नारे नि‍कलने पर मजबूर कर दें। पटना और मेरठ में रास्‍ता ले लेने वालों में उन्‍नीस बीस का ही फर्क है, फि‍र भी जबरदस्‍ती आपका रास्‍ता छीनकर जि‍स कद़र बनारसी लाज़वाब करते हैं, वो या तो अपना सि‍र पीटने पर मज़बूर करता है या उनका। उनका तो पीट नहीं पाएंगे क्‍योंकि पीटने और पाटने में उन्‍हें ज्‍यादा यकीन है (बनारस से लेकर पुस्‍तक मेले में वो लोगों को इसकी धमकी भी देते रैते हैं।) तो बेहतर यही होगा कि मेरी तरह अपना माथा पीटें और बगैर कि‍सी से पि‍टे घर सुरक्षि‍त वापस लौटने का यकीन कर अपने हाथ पैर टो लीजि‍ए कि सबकुछ सुरक्षि‍त तो है या रास्‍ते के कि‍सी गड्ढे में कुछ गि‍रा तो नहीं आए।

वही... 
वैसे मोहनि‍यां से पटना वाले रास्‍ते पर लोग खूब पास देते हैं। खुद कि‍नारे कि‍नारे जुगत लड़ाकर चलते रहते हैं और पास मांगि‍ए तो झट आगे जाने के लि‍ए हाथ दि‍खा देते हैं। आगे जाने के लि‍ए जो चीज सामने होती है वो घुटने भर जि‍तने बड़े गड्ढे होते हैं। चाहे रोहतास हो, बक्‍सर, भोजपुर या आरा ही हो, यहां के लोग चाहते ही नहीं कि कोई उनके यहां सही सलामत पहुंच जाए। अगर पहुंच जाता है तो खुशी मनाकर चार लोगों से जरूर गाते होंगे कि अरे, ई त एकदमे सुरच्‍छि‍त पहुंच गइली हो। मुझे कोई ताज्‍जुब नहीं होगा अगर सालों से गड्ढे में चलते गि‍रते सुरक्षि‍त घर पहुंचते इन जि‍लों के लोगों ने इसपर कोई लोकगीत भी बना लि‍या हो क्‍योंकि जो भी लोक है, वो गड्ढे में है और जो गड्ढे हैं, एक बार गि‍रकर देखि‍ए, हर लोक का दर्शन होने की सुनि‍श्‍चि‍त गारंटी है।

कइलीं गढ़इयन का पार
अइलीं रमेसर के सार
लवनी फटफटि‍या औ कार
उखड़ा नाहीं एक्‍को बार
चना जोर गरम।

Tuesday, July 22, 2014

A Certificate

कॉमरेड, आप ज्‍यादा कट्टर हैं। 
कॉमरेड, आप कम कट्टर हैं। 
कॉमरेड, आप कॉमरेड नहीं हैं। 
कॉमरेड, आप कॉमरेड होते हुए भी हिंदुस्‍तानी कॉमरेड नहीं हैं।
कॉमरेड, कॉमरेडों की नस्‍ल कुछ दूसरी ही होती है।
कॉमरेड, आप कॉमरेडों की नस्‍ल के नहीं लगते।
कॉमरेड, आप वामपंथी नहीं हैं।
कॉमरेड, आप ढके छुपे संघी हैं।
कॉमरेड, आपके पास हमारा लाल कार्ड नहीं है।
कॉमरेड, बगैर लाल कार्ड के कोई कॉमरेड नहीं हो सकता।
कॉमरेड, आप प्रति‍क्रांति‍कारी हो चुके हैं।
कॉमरेड, आपकी जगह इति‍हास के कूड़ेदान में होगी।
कॉमरेड, आपने पूंजी नहीं पढ़ी।
कॉमरेड, आप द्वंदात्‍मक भौति‍कवाद नहीं जानते।
कॉमरेड, आप अध्‍यात्‍म कैसे पढ़ सकते हैं।
कॉमरेड, आप धर्म ईश्‍वर मानने वालों से बात कैसे कर सकते हैं। 

कॉमरेड, आप जाति पर बात नहीं कर सकते।
कॉमरेड आप जाति जनि‍त समस्‍याओं पर जाति को कोस नहीं सकते।
कॉमरेड, बेसि‍कली आप एक गधे हैं।
कॉमरेड, आप बर्नस्टीन, काउत्स्‍की, मार्तोव, मार्तीनोव, त्रात्‍स्‍की , अलब्राउडर, टीटो, ख्रुश्चोव हैं।
कॉमरेड, आप जनता की क्रांति की आकांक्षाओं को पूरा करने में संघी बन गए।
कॉमरेड, आपके पूंछ क्‍यूं नहीं है?
कॉमरेड, ......
(पाठकगण कॉमरेड की जगह पथ प्रचालक या संघ संचालक भी भर सकते हैं।)

Thursday, October 31, 2013

हमारे युग का नायक

अवि‍नाश मि‍श्र 

हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष राजेंद्र यादव अब सदेह हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं। 28 अक्टूबर की रात उनका देहांत हो गया। वे 84 वर्ष के थे...  इसके आगे और भी बहुत कुछ जोड़ा जाना चाहिए, मसलन मृत्यु की वजह, अब उनके परिवार में उनके पीछे कौन-कौन रह गया है, शिक्षा-दीक्षा, उनका सामाजिक और साहित्यिक अवदान, उनकी कृतियों के नाम, उनके अवसान पर उनके समकालीनों के विचार... वगैरह-वगैरह। ये सब कुछ निश्चित तौर पर इस दुखद खबर के साथ जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन फिर भी बहुत त्रासद ढंग से बहुत कुछ छूट जाएगा। इसलिए यहां केवल यह जोड़ना चाहिए कि समग्र सकारात्मक अर्थों में राजेंद्र यादव की मृत्यु एक क्रांतिकारी सृजक की मृत्यु है। उन्होंने हिंदी साहित्य और समाज में बहुत कुछ बदला। वे एक लोकतांत्रिक, परिवर्तनकामी और युगद्रष्टा व्यक्तित्व थे। उनकी सारी खूबियों और खामियों के साथ अब उन पर बात करते हुए हम उनके लिए ‘थे’ का प्रयोग करेंगे। ‘हैं’ के ‘थे’ में बदल जाने पर हमें यकीन करना होगा।

कथा सम्राट प्रेमचंद की ओर से शुरू की गई साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ का राजेंद्र यादव 1986 से संपादन कर रहे थे। वे अपनी अंतिम सांस तक सक्रिय रहे। ‘हंस’ का संपादन करते और संपादकीय लिखते रहे। उनकी किताबें और उन पर किताबें हाल-हाल तक आती रहीं और अब भी कई प्रकाशन-प्रक्रिया में हैं। मीडिया में उनकी बाइट्स/वर्जन भी बराबर सुनने/पढ़ने को मिलते रहे। 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती और 28 अगस्त को अपना जन्मदिन वे प्रतिवर्ष बहुत लगन और उत्साह से आयोजित करते रहे। मृत्यु से चंद दिनों के फासले पर खड़े और अस्वस्थ होने के बावजूद भी राजेंद्र यादव साहित्यिक आयोजनों में अध्यक्षीय भूमिका निभाते दिखते रहे। उन्होंने कभी किसी एकांत, एकाग्रता और अनंतता की चाह नहीं की। भीड़-भाड़, रंगीनियां, चहल-पहल, साहित्यिक शोर और विवाद उन्हें पसंद थे। बगैर लड़े कोई महान और बड़ा नहीं बनता। वे उम्र भर लड़ते रहे... पाखंड से, जातीयता से, शुद्धतावाद से, हिंदी के प्राचीन और अकादमिक छद्म और षड्यंत्र से, कट्टरता से, सांप्रदायिकता से और सत्ता से भी।  

एक लैटिन अमेरिकी कहावत है कि मृतकों के विषय में अप्रिय नहीं कहना चाहिए। लेकिन राजेंद्र यादव अपने संपादकीयों में कइयों को आहत करते रहे। इसमें जीवित और मृतक दोनों ही रहे। जब कभी इस कहे/लिखे पर फंसने की सूरत आई, उन्होंने अगले ही अंक में माफी भी मांग ली। उन्होंने ‘हंस’ में कई बार अपने मित्रों, करीबियों और साहित्यकारों के अवसान पर बेहद भावपूर्ण और मार्मिक संपादकीय भी लिखे। इस तरह के संपादकीयों में वे दो बातें बहुत जोर देकर कहते रहे। पहली यह कि हमें मृतक की कमियों पर भी बात करनी चाहिए और दूसरी यह कि देह के साथ व्यक्ति से जुड़ी बुराइयां खत्म नहीं होतीं। शेक्सपीयर ने अपने नाटक ‘जूलियस सीजर’ में भी कुछ ऐसा ही कहा है... ‘मनुष्य की बुराइयां उसके बाद भी जीवित रहती हैं, अच्छाइयां अक्सर हड्डियों के साथ दफन हो जाती हैं।’ राजेंद्र यादव अपने अंतिम दिनों में शेक्सपीयर के नाटकों के मुख्य पात्रों की त्रासदियों के नजदीक जाते नजर आते हैं।

‘स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार’ लिखवाने की स्थिति में जब वे पहुंचे तब उनकी विरासत का प्रश्न उनके उत्तराधिकारियों के सम्मुख खड़ा हो गया। आनन-फानन में उनके अंत को  निकट देख ‘हंसाक्षर ट्रस्ट’ में बड़े बदलाव किए गए। राजेंद्र यादव जब अपने ‘अंत’ को पछाड़कर लौटे तब भीड़ से घिरे होने के बावजूद बहुत अकेले और टूटे हुए थे। ‘हंस’ अब उनके सपनों का ‘हंस’ नहीं रह गया था...। उनकी शारीरिक विकलांगता उन्हें लोगों का सहयोग लेने और उन पर भरोसा करने के लिए बाध्य करती थी। उनके कुछ करीबियों, लेखक-लेखिकाओं ने उनकी इस कमजोरी और यकीन का गलत फायदा उठाते हुए अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी कीं।

राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’ का अतीत विमर्शों के पुनर्स्थापन  प्रतिभाओं की खोज और एक बेबाक समझ व सत्य से संबंधित रहा है। ‘हंस’ ने कितनों को कहानीकार, कवि, समीक्षक, विश्लेषक, समाजशास्त्री और संपादक (अतिथि) बना दिया, यह उसके प्रशंसकों और आलोचकों से छुपा हुआ नहीं है। वे प्रतिपक्ष को स्पेस देना और उससे बहस करना पसंद करते थे। हिंदी में एक पूरी की पूरी स्थापित और स्थापित होने की ओर अग्रसर पीढ़ी है जो ‘हंस’ पढ़ते और राजेंद्र यादव से लड़ते हुए बड़ी हुई है। वे असहमतियों को सुनना जानते थे।

‘न लिखने के कारण’ बताते हुए उन्होंने अपने समय और समाज के सवालों से ‘हंस’ के संपादकीय पृष्ठों पर सीधी मुठभेड़ की। ‘मेरी तेरी उसकी बात’ कभी ‘मेरी मेरी मेरी बात’ नहीं लगी, हालांकि ‘कभी-कभार’ ऐसे आरोप जरूर लगे। एक कविता संग्रह के कवि होने के बावजूद उनकी छवि एक कविता-विरोधी व्यक्ति और संपादक की बनी, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब ‘हंस’ के कविता-पृष्ठों पर प्रकाशित होना किसी भी युवा कवि के लिए अपनी पहचान पुख्ता करने का एक माध्यम हुआ करता था। लेकिन गए पांच वर्षों से ‘हंस’ की स्तरीयता में भयानक कमी आई और वह केवल निकलने के लिए ही निकलती रही। ‘मैं हंस नहीं पढ़ता’ यह कहना अज्ञान और अजागरूकता का नहीं बेहतरीन साहित्यिक समझ का परिचायक हो गया। बावजूद इसके ‘हंस’ के ‘अपना मोर्चा’ में दूर-दराज के पाठकों के पत्र बराबर छपते रहे...।

वर्तमान समय का सबसे विराट संकट यदि कुछ है तो यही है- बड़े अध्वसाय से अर्जित की गई गरिमा को अंततः बचाकर रख पाना। इस अर्थ में राजेंद्र यादव के आखिरी दिन उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने वाले रहे। लेकिन अंततः व्यक्ति का काम ही शेष रहता है, तब तो और भी जब यह काम हाशिए पर जी रहे समाज के वंचित वर्ग के पक्ष में खड़ा हो। उन्हें स्वर दे रहा हो, जिनकी आवाज सदियों से कुचली जाती रही हो। स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, किसानों... सबके लिए विमर्श उत्पन्न करने वाले राजेंद्र यादव को उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर ‘हमारे युग का खलनायक’ बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। लेकिन राजेंद्र यादव खलनायक नहीं हैं, वे नायक हैं हमारे युग के नायक। वे जब तक रहे, काम करते हुए विवादों में रहे, अब यादों में रहेंगे...।

झारखण्ड का आदिवासी इतिहास

- डॉ. रोज केरकेट्टा

झारखण्ड विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रदेश है। एक ओर यहां प्रागैतिहासिक सभ्यता के अवशेष और आदिम जीवन की स्वर लहरियां हैं तो दूसरी ओर अति आधुनिक जीवनदृष्टि भी। हजारों वर्षों में हुई भौगोलिक और ऐतिहासिक घटनाओं ने प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति, दोनों ही स्तरों पर इसे समृद्ध बनाया है। यहां सुरम्य घाटियां, झरने, नदियां और नयनाभिराम प्राकृतिक संरचनाएं हैं। रत्नगर्भा धरती है। और हैं सामूहिक एवं समन्वित संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी जीने वाले जनजातीय समुदाय। जीवंत गीतों, नृत्यों और अपार साहस व शौर्य की धरती है यह झारखण्ड। आदिवासी पहचान, संस्कृति और स्वतंत्रता के अंतहीन संघर्ष और अदम्य जिजीविषा का प्रतीक।

ऋगवैदिक काल में झारखण्ड कीकट प्रदेश के नाम से जाना जाता था। उस समय का आदिम समुदाय घुमन्तु था और शिकार, पशुपालन तथा जंगली कंद-मूल पर उसका जीवन निर्भर था। ये लोग कौन थे? कहीं बाहर से आए थे या यहीं के मूल निवासी थे, इस बारे में कहीं कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। झारखण्ड के आदिम निवासियों में जिनके पदचिन्ह सर्वाधिक स्पष्टता से दिखाई पड़ते हैं, वे हैं असुर।

झारखण्ड कुल 30 आदिवासी समुदायों का निवास स्थल है। ये हैं - असुर, मुण्डा, संताल, हो, खड़िया, उरांव, माल एवं सौरिया पहाड़िया, बिरहोर, बैगा, बंजारा, बेदिया, बिंझिया, बिरजिया, बाथूड़ी, भूमिज, चेरी, चीक बड़ाईक, गौड़, गोड़ाइत, करमाली, खरवार, किसान, कोरा, कौरवा, लोहरा, महली, शबर खड़िया, खौंड और परहिया। इनमें संतालों की संख्या सर्वाधिक है और ये भारत के सबसे बड़े आदिवासी समूहों में गिने जाते हैं। झारखण्ड का संताल परगना मुख्यतः इन्हीं से आबाद है जबकि रांची पठार के पूर्वी भाग में मुण्डाओं की बहुलता है। पश्चिम में उरांवों का। नेतरहाट का क्षेत्र असुरों का है तो निम्न पठारीय भागों के उत्तर में भुंइयां, बिरहोर, संताल; पूर्व में संताल, पहाड़िया और भुंइयां; दक्षिण में हो और पश्चिम में चेरो, खरवार,कोरवा आदि।

इतिहासकारों के अनुसार महाभारत काल में झारखण्ड मगध के अंतर्गत था और मगध जरासंध के आधिपत्य में था। अनुमान है कि जरासंध के वंशजों ने लगभग एक हजार सालों तक मगध में एकछत्र शासन किया। जरासंध शैव था और असुर उसकी जाति थी। के. के. ल्युबा का अध्ययन है कि झारखण्ड के वर्तमान असुर महाभारतकालीन असुरों के ही वंशज हैं। झारखण्ड की पुरातात्विक खुदाईयों में मिलने वाली असुरकालीन ईंटों से तथा रांची गजेटियर 1917 में प्रकाशित निष्कर्षों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। असुर मुख्यतः लोहा गलाने का व्यवसाय करते थे और असंदिग्ध रूप से मुण्डा एवं अन्य आदिवासी समुदायों के आने से पहले इस झारखण्ड में उनकी एक विकसित सभ्यता विद्यमान थी।

यह भी तथ्य है कि असुरों के समय में झारखण्ड के कुछ इलाकों में जैनियों का प्रभाव था। खासकर, हजारीबाग और मानभूम आदि इलाके में। पारसनाथ में जैन तीर्थ का होना तथा उस क्षेत्र में सराक जाति की उपस्थिति और उनके रीति-रिवाज इसके जीवंत साक्ष्य हैं। असुरकालीन समाज और सभ्यता के बारे में अब तक हुए अध्ययन कुछ सूत्र ही दे पाते हैं, विस्तृत परिचय नहीं। पर इतना तय है कि असुरों के समय में और उनके पहले भी झारखण्ड का इलाका निरापद नहीं था। हजारीबाग की इस्को गुफाओं में मिले प्रागैतिहासिक शैल चित्रों और वस्तुओं ने इस धारणा को और पुष्ट किया है। दामोदर नदी घाटी तथा समस्त झारखण्ड में पाये जाने वाले अनेक पुरातात्विक अवशेषों के वैज्ञानिक अध्ययन भविष्य में मानव जाति और सभ्यता के नितांत नये इतिहास का उद्घाटन कर सकते हैं।

नृजातीय रूप से झारखण्ड के तमाम आदिवासी समुदायों की पहचान - प्रोटो आस्ट्रेलाइड और द्रविड़, दो समूहों में की जाती है। उरांवों को छोड़कर जो कि द्रविड़ समूह के हैं, अधिकांश जनजातीय समुदाय प्रोटो आस्ट्रेलाइड समूह में आते हैं। झारखण्ड के गैर आदिवासी समुदाय जिन्हें कि यहां सदान कहा जाता है, आर्यन समूह के हैं। हालांकि वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के दबाव में आज अधिकांश सदान अपने आपको अनार्य कहलाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।

भाषायी वर्गीकरण के लिहाज से भाषाविद् झारखण्ड को तीन वर्गों में बांटते हैं। मुण्डा भाषा परिवार, द्रविड़ भाषा परिवार और आर्य भाषा परिवार। उरांव और पहाड़िया जनजातियों की भाषा ‘कुड़ुख’ द्रविड़ है जबकि सदानों की नागपुरी, सादरी, कुरमाली, खोरठा आदि आर्यन। मुण्डा, संताल, खड़िया, हो, बिरहोर आदि मुण्डा भाषा परिवार की भाषाएं बोलते हैं। रांची विश्वविद्यालय भारत का एकमात्र विश्वविद्यालय है जहां क्षेत्रीय एवं आदिवासी भाषाओं के अध्ययन एवं अध्ययापन की व्यवस्था एम. ए. स्तर पर है। फिलहाल झारखण्ड में मुण्डारी, संताली, हो, खड़िया, कुड़ुख, नागपुरी, पंच परगनिया, कुरमाली एवं खोरठा, 9 क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं।

600 ईसा पूर्व जब मुण्डा लोग झारखण्ड आए तो उनका सामना असुरों से हुआ। मुण्डाओं की लोकगाथा ‘सोसोबोंगा’ में उनके आगमन और असुरों से संघर्ष का विस्तार से वर्णन है। भारत के विख्यात मानवशास्त्री शरत चंद्र राय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मुण्डाज एण्ड देयर कंट्री’ में इसका समर्थन करते हैं। मुण्डा जब झारखण्ड आए तो उनकी एक शाखा संताल परगना की ओर गई। इन लोगों को आज हम संताल के नाम से जानते हैं जबकि दूसरी शाखा रांची की पश्चिमी घाटियों में उतरी। रांचीकी ओर आनेवाली शाखा मुण्डा कहलाई। ये मुण्डा लोग ही असुरों से भिड़े।

बाद में, इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1206 ई. में उरांव कर्नाटक की ओर से, नर्मदा के किनारे-किनारे विंध्य एवं सोन की घाटियों से होते हुए रोहतासगढ़ पहुंचे। जहां उन्होंने राज किया और फिर अपना राजपाट खोकर पराजित होने के पश्चात् रांची की ओर आए। तब उनका सामना मुण्डाओं से हुआ। उरांवों के आने के बाद मुण्डा लोग दक्षिण की ओर चले गए। यह इलाका आज का खूंटी क्षेत्र है जहां मुण्डाओं की बहुलता है।

असुर लोग कृषिजीवी नहीं थे और उस समय में झारखण्ड में कृषि प्रधान समाज की उपस्थिति के प्रमाण नहीं मिलते हैं। मुण्डा लोग जब यहां आए तब उन्होंने ही व्यवस्थित कृषि और जीवन-समाज पद्धति की मजबूत नींव डाली। मुण्डा लोग न सिर्फ कृषि कार्यों में कुशल थे बल्कि उनका सामाजिक संगठन और प्रशासन बेहद सुव्यवस्थित था। उनकी सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था गणतांत्रिक थी। गांव का मुखिया मुण्डा कहलाता था और कई गांव के मुण्डाओं का चुना हुआ प्रतिनिधि ‘मानकी’ होता था। वे सामुदायिक जीवन जीते थे और सामुहिकता उनकी प्राण-वायु थी।

पहली शताब्दी में यहां नागवंशियों का आधिपत्य हो गया। अनुमान है कि पहली ईश्वी के शुरूआती दिनों में नाग जाति जो कि जनमेजय के नाग यज्ञ के बाद से कांतिहीन जीवन जी रहे थे, ने अपनी खोयी शक्ति वापस पा ली थी और समूचे मध्यदेश पर इनका प्रभुत्व स्थापित हो गया था। इसी नाग जाति के वंशज फणिमुकुट राय ने 19 वर्ष की अवस्था में 83 ईश्वी में यहां नागवंशी शासन की नींव डाली। सुतियाम्बे उनकी पहली राजधानी थी और मुण्डाओं के गणतंत्र का आखिरी सर्वोच्च केन्द्र।

नागवंशी शासन के बाद समूचे झारखण्ड में आर्य संस्कृति-सभ्यता का विस्तार हुआ। इस विस्तार ने आदिवासी एवं सदान, दोनों ही संस्कृतियों के सम्मिलन में युगांतकारी भूमिका निभायी। सांस्कृतिक सम्मिलन से झारखण्ड में ‘सहिया’ संस्कृति का विकास हुआ जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों के आगमन तक दोनों के संबंध सौहार्द्रपूर्ण बने रहे। सामुदायिक और सामूहिक संस्कृति व जीवनशैली अविच्छिन्न रूप से गतिमान रहा। नागवंशियों का राजतंत्र और आदिवासियों की पारंपरिक गणतांत्रिक परंपरा की समानान्तर धाराएं बिना एक दूसरे को काटे अथवा बाधित किये चलती रही।

इसे छिन्न-भिन्न किया अंग्रेजी राज ने। जिसको यहां के आदिवासी और सदानों ने अपने तीव्र प्रतिरोधों से स्वतंत्रता प्राप्ति तक लगातार चुनौती दी। सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, बाबा तिलका मांझी, बिरसा मुण्डा, जतरा टाना भगत, बुधु भगत, तेलंगा खड़िया, शेख भिखारी जैसे अनेक झारखण्डी नायकों ने। इन्होंने भारत के अंग्रेजी राज में स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए हुए झारखण्डी जनता के जनविद्रोहों को संगठित, संचालित एवं उसका साहसी नेतृत्व किया। अपनी शहादतें दी।

झारखण्ड मूलतः आदिवासी जीवन-दर्शन के मूल सिद्धांतों सह-अस्तित्व, सामुदायिकता, सामूहिकता और सहभागी संस्कृति के विरासत का केन्द्र है। जीवन के उल्लास और इंसानियत के विभिन्न रंगों को यहां के गीतों, नृत्यों, पर्व-त्यौहारों व लोक कलाओं में सहज देखा व अनुभव किया जा सकता है। करमा, सरहुल, मागे, बन्दई मुख्य सामाजिक पर्व हैं। स्वर्णरेखा, कोयलकारो, दामोदर और शंख नदियां जीवनरेखा हैं तो हुण्डरू, दसोंग, हिरनी, पंचघाघ आदि जलप्रपात यहां की प्रकृति, वनस्पति और जीवन की स्थायी धड़कन।

(असुरनेशन.इन से साभार)