Sunday, January 24, 2021

एक सुबह जब शाम हुई

दिन निकला। दिन क्या निकला, उसके निकलने से पहले शाम निकली। तड़के से मैं करवटें बदल रहा था कि दिन निकले, उजाला हो तो मैं बिस्तर से निकलूं। काफी देर तक जब दिन की कोई आहट नहीं मिली तो मैंने कंबल फेंका। सर्दी अचानक बढ़ चुकी थी। ठीक वैसी ही, जैसे कि जाती जनवरी की शामें अचानक से गहरी और ठंडी होने लगती हैं। एक पल को मुझे लगा कि कहीं मैं दोपहर के खाने के बाद तो नहीं सोया था। मगर देह पर मौजूद सोने वाले कपड़ों ने मुझे टहोका, कि नहीं, ये सुबह ही है और ये वही सुबह है, जिसका मैं पिछले दो तीन घंटों से इंतजार कर रहा था। ये वही सुबह है, जिसके लिए मैंने अपना वह सपना तोड़ दिया था, जिसमें मैं उड़ीसा के कोर्णाक मंदिर के गलियारे में लड़की से औरत बनने को उतारू किसी लड़की के साथ घूम रहा था। सपने में मंदिर था, मंदिर के पत्थर थे, बुर्ज थे, हवा के अलसाए झोंके थे और सबसे बड़ी बात तो ये कि सपने में गरमी थी। मेरे उस्ताद शम्सुर्रहमान फारुकी साहब एक जगह पर लिखते हैं कि हम हिंदुस्तानियों के लिए गर्मी से ज्यादा सर्दी तकलीफदेह है और ये लिखने से पहले पता नहीं जमानत में या यूं ही वे कैफी आजमी साहब का एक मिसरा नज्र करते हैं- 

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी 

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है। 

सो सपना था, सपने में गर्म हवा भी थी जो शायद इस डर से सपने में डोल रही थी कि बाहर बहुत सर्दी है और सर्दी के डर से हमारे हिंदुस्तान में आज का दिन रोज के दिन की तरह निकलने से इन्कार कर रहा है। आज हिंदुस्तान में आने के लिए उसे कल की शाम का भी साथ चाहिए, भले कल की शाम से ही उसके डर की वजह शुरू हुई हो। मैं सोचने लगा, जीवन में मैंने भी ऐसे लोगों का साथ खूब जोड़ा है, जो मेरा नुकसान करते रहे, जिनसे कहीं न कहीं मैं डरता रहा, फिर भी शायद किसी बड़े डर की वजह से मैंने नुकसान का साथ नहीं छोड़ा और शायद यही वजह है कि आज मैं घाटे में हूं। लोगों को लगता है कि ये बहुत नफा मार रहा है, लेकिन नफा मुझे उस जूते की तरह लगता रहा है, जो मुझे देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, मगर उसे बर्दाश्त करने की काबलियत अपने पास न होने की वजह से मैं उसे देखकर ही संतोष कर लेता रहा हूं। तो क्या यह मेरा संतोष है जो मेरे नुकसान की वजह है? हिंदुओं के धर्मग्रंथों में तो बहुत कहा गया है कि संतोष ही परमधन है, तो क्या मेरा सारा नुकसान मेरे इस परमधन की वजह से हुआ? क्या मुझे संतोष नहीं करना चाहिए? मगर मैं संतोषी कब था? दुनिया की कोई भी चीज मेरे अंदर यह परमधन नहीं भर पाई, और शायद नहीं ही भर पाएगी। मैं संतोषी नहीं हूं। संतोष ने मुझे इतना दिक्क किया कि आखिरकार मैंने कंबल दूर फेंक दिया और उससे चार गज और दूर मैंने संतोष को फेंका। इसलिए भी फेंका कि पिछले दिन भर और आधी रात तक की मेहनत के बाद मैं नींद से संतुष्ट नहीं था। मैं सुबह से भी संतुष्ट नहीं था, जो इतनी मेहनत, इतने इंतजार के बाद आई, मगर शाम से हाथ मिलाकर आई। सुबह ऐसे भी कहीं आती है? भुनभुनाते हुए मैंने बिस्तर छोड़ा, कि आज मैं इस सुबह को नहीं छोड़ूंगा। इसी की खातिर मैंने सपने में बहती गर्म हवा छोड़ी, खुला आंगन छोड़ा, और सबसे बड़ी बात जो रही, वह बताने की नहीं है, कोई कहेगा, तो भी नहीं बताउंगा। 

सुबह मैंने बिस्तर छोड़ा। रात के छोड़े हुए कपड़े कैसे-कैसे करके अपने बदन पर डाले और कमरे से बाहर आया। बाहर शाम होने को थी। बल्कि ये दिन ऐसा दिन था कि दिन निकलने के साथ ही शाम अपने होने की जिद लिए गठरी बनी बैठी थी। शाम को सर्दी बहुत लग रही थी, लेकिन किसी भी मौसम, या किसी भी दिन या किसी भी चीज से ज्यादा बड़ी चीज जिद होती है। शाम सुबह से ही अपनी जिद पर थी। एकबारगी मैंने सोचा कि आज मैं दिन से हार मान लूं क्या? फिर मैंने सोचा कि हर किसी से हारने के बाद अगर मैं दिन से भी हार गया, तो फिर अगले दिन में जाना और फिर उसके भी अगले दिन में जाना मुसीबत हो जाएगा। दिन अपना दरवाजा एक बार किसी के लिए बंद कर लेता है तो जल्दी खुलना मुश्किल हो जाता है। कई लोग तो पूरी उम्र खुद को रात का राही कहते रहे हैं। कई लोग आज तक अवध की शाम से नहीं निकल पाए, उनके जीवन में सुबह हुई ही नहीं। फिर शाम से मेरी उतनी दोस्ती भी नहीं रही, क्योंकि मेरे पेशे सहाफत की कुछ ऐसी मजबूरियां हैं कि हम लोग जब इस पेशे में आते हैं तो अपनी हर शाम मुल्तवी करके आते हैं। जब दुनिया शाम की रंगीनियत से दो चार हुई रहती है, हम लोग दुनिया से उड़ते रंगों की रपट लिखने में मगशूल होते हैं। क्या करें, पेशा ही ऐसा है। दुनिया जब रंग बिगाड़ती है, बदलती है तो हम दुनिया भर को बताने की तैयारी में लगते हैं कि रंग बिगड़ चुका है- बदल चुका है। 

जब भी मैं शाम देखता हूं, एक बार यह जरूर सोचता हूं कि किसी और पेशे में होता तो कम से कम शाम देख लेता। जब तक मैं इस पेशे में नहीं था, या कि यूं कहें कि जब मैं कहीं भी नहीं था तो अपने बारा पत्थर के मैदान शाम का आसमान देख रहा होता था। पहले पीला, फिर नारंगी और फिर लाल होते हुए सबकुछ गाढ़े नीले में तब्दील होते देखता। मैं चित्रकार नहीं हूं और तब भी इसके बारे में नहीं सोचा, जब इतने सारे रंग मेरे सामने खेल रहे होते। बल्कि कभी कभी मुझे खुद से चिढ़ होती है कि मैंने इतने सुंदर सुंदर रंग देखे हैं, फिर भी जब बात रंग चुनने की हो तो मैं हमेशा कोई न कोई वाहियात रंग चुनता हूं। मेरे जीवन की सारी चित्रकारी सिर्फ इसी वजह से धरी रह गई, क्योंकि मुझे रंग देखने तो आते हैं, मगर चुनने नहीं आते। मेरे घर के सामने एक नीम का पेड़ है, जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। मगर क्या मजाल कि मैं कभी भी उसके लिए एकदम सही सब्ज चुन पाऊं। फिर भी मैं रोज शाम का इंतजार किया करता, और अपने आप से शर्त लगाता कि आज वाला लाल कल वाले लाल से ज्यादा लाल होगा। बहुत बाद में जब मैंने पहाड़ देखे, वहां की शाम देखी तो नोट किया कि जितनी लाल, जितनी नर्म और जितनी रोमानी हमारे मैदानों की शाम होती है, उतनी पहाड़ों की शाम नहीं होती। बल्कि अगर कोई मुझे इसके लिए सजा न दे तो मैं ये भी कहूंगा कि पहाड़ों की शाम बेहद खुरदुरी और जकड़न से भरी होती है, जिसमें एक रंग डर का भी होता है। डर यह कि बाहर निकले तो जाने कौन खा जाए, जाने कहां से पैर फिसल जाए या जाने कौन सा कीड़ा-मकोड़ा काट ले। मैदानों की शाम बेखौफ होती है और शायद यही वजह है कि उसमें लाल, पीले और नीले के जितने शेड्स होते हैं, उतने मुझे कहीं भी देखने को नहीं मिले। कुछ लोग समुद्र का जिक्र कर सकते हैं, लेकिन समुद्र भी मैदान में ही होते हैं, पहाड़ों में नहीं होते। रंगों को फैलने के लिए बहुत ढेर सारी जगह चाहिए होती है, जिनमें धरती की सिकुड़न बेवजह शोर मचाती है। 

मगर मैं यह क्या सोच रहा हूं? मैं यह क्या कह रहा हूं और आखिर क्यों कह रहा हूं? मैं तो सुबह के इंतजार में था और भले ही शाम के साथ हुई, मगर सुबह तो हुई ही। फिर मुझे किस चीज से इतनी शिकायत है? और फिर शिकायतों का बंडल तो शाम तले खुलता है, अभी तो सुबह हुई है? सुबह से कैसी शिकायत? वह तो नया दिन लेकर आई है। नया दिन, जिसमें वह सब कुछ होगा, जो उस दिन से पहले कभी नहीं हुआ। नया दिन, जिसमें उस दिन से पहले वह सारी चीजें सामने आएंगी, जो पिछले हजारों हजार दिनों से सामने आने से रह गई हैं। मुझे नए का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं खीझ रहा हूं। मुझे सुबह का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं उससे मुंह फेरकर बैठा हूं। अगर किसी सुबह दिन शाम के साथ आ जाएगा तो क्या मुझे बर्दाश्त नहीं होगा? आखिर मोहल्ले की सारी लड़कियों की शादी हुई, मैंने बर्दाश्त की और आज भी मोहल्ले में वापस जाना नहीं छोड़ा। ना चाहते हुए भी कानून की मोटी मोटी और नीरस किताबें मैं बर्दाश्त करता रहा हूं। बेमन से ही सही, मगर आंकड़ों की फेहरिस्त को घंटों बर्दाश्त करता हूं, फिर एक अदद सुबह मुझसे बर्दाश्त क्यों नहीं हो रही है?   

.... नहीं पता कि जारी या खत्म।

एक सुबह जब शाम हुई

नींद तो यूं ही तमाम हुई

काम न कोई हो पाया

नाक लाल औ जाम हुई।

और ये मिसरे कैफी साहब के नहीं हैं, बल्कि ये मिसरे किसी के भी नहीं हैं। 

No comments: