Tuesday, April 16, 2019

पतझड़ से पहले और बाद की एक बकवास



सबसे पहले शहतूत छोड़ता है अपनी पत्तियां 
और लगभग एक साथ ही हो जाता है नंगा 
डालें, टहनियां सब की सब नंगी 
हवा चलती है तो सर्र से गुजर जाती है 
एक भी टहनी नहीं हिलती शहतूत की 
फिर आती है बारी नीम की 
शहतूत के बाद नीम को नंगा होते देखना 
इतना आसान नहीं है 
वो एक साथ नंगा भी नहीं होता 
धीमे-धीमे मरता है नीम 
और रोज हमें पता चलता है कि 
नीम कितनी तकलीफ में है 
जैसे कि ट्रॉमा सेंटर में बेहोश पड़ा कोई मरीज 
जिसकी रुक-रुक कर सांस चलती है 
जैसे सड़क पर हुआ कोई एक्सीडेंट 
जिसमें भीड़ तो होती है, बस जान नहीं होती 
एक हिस्सा छोड़ने के बाद 
दूसरा हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं होता नीम
लेकिन मौसम उसे नंगा करके ही छोड़ता है। 
जब शहतूत पकने लगती है 
और नीम में आते हैं नए फूल 
तो चलाचली की बेला में होता है बेल 
चार छह बच गए सूखे बेल लटकाए यह पेड़ 
हर हरे के बीच ठूंठ सा खड़ा रहता है 
जैसे कोई बूढ़ा जर्जर खेलता हो बच्चों के साथ 
जैसे समुद्र मे कोई तालाब सा हो 
या फिर बहती नदी के बगल ठहरा हुआ हरा पानी
फिर एक दिन बूंदे बरसती हैं
और बढ़ता है नदी में पानी 
और ले जाता है अपने साथ 
नीम, शहतूत और बेल को भी। 

Tuesday, February 19, 2019

इंसानियत का तकाजा

शंभु रैगर याद है? वही, जिसने एक मासूम मजूदर को कुल्हाड़ी से सिर्फ इसलिए काट डाला, क्योंकि वह मुसलमान था। उस वक्त उसके जैसे कुछ एक लोगों ने दम भरने की कोशिश की, लेकिन वे चुप इसलिए हो गए, क्योंकि हममें से किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया। हम ऐसे लोगों का साथ दे भी नहीं सकते। कैसे दे सकते हैं? क्या हमारे संस्कार ऐसे हैं? क्या हमारे मां-बाप ने हमें हत्या करना या हत्यारों का साथ देना सिखाया है या फिर क्या हममें से किसी का भी धर्म ये करना सिखाता है? फिर कोई शंभु रैगर न बने, इसलिए उस वारदात के बाद बहुत सारे मां-बाप ने अपने बच्चों को लेकर अतिरिक्त सावधानी भी बरतनी शुरू कर दी। एक हत्या ने समूचा देश हिला दिया था, लेकिन हममें से किसी ने उसके परिवार के बारे में गलत नहीं सोचा।
अखलाक याद है? वही, जिसे दादरी में गोरक्षक होने का झूठा दावा करने वाले लोगों ने घर में घुसकर जान से मार डाला था। गुंसाई इंसान नहीं मारते। हम उन हत्यारों का नाम और गांव जानते हैं। हममें से किसी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा कि उनका गांव खत्म कर देंगे। सभी सुरक्षित हैं, पूरा गांव वहीं है और सभी उतने ही भारतीय हैं, जितने कि हम-आप हैं। बुलंदशहर वाले शहीद इंस्पेक्टर सुबोध कुमार याद हैं? हमें पता है कि हत्यारे कौन हैं और यह भी कि हत्याएं करते जाने की यह अक्ल कौन दे रहा है। लेकिन क्या हमने सबको खत्म करना शुरू कर दिया? नहीं। हम ऐसा कभी भी नहीं कर सकते। संविधान तो है ही, लेकिन संविधान के पहले तो हम सब इंसान हैं। हम सभी इंसानियत के रास्ते ही आगे बढ़ते आए हैं। हैवानियत तो हमारी तरक्की तोड़ देती है।
अभी पुलवामा में आतंकी हमला हुआ और हमारे बच्चे बेमौत मारे गए। हम सब बेहद दुखी हैं। हमें प्रतिकार चाहिए। कुछ भटके लोग मासूम कश्मीरी बच्चों पर हमला कर रहे हैं। चीखते हैं कि सारे कश्मीरी आतंकवादी हैं। फिर अगर कोई पूछे कि शंभू रैगर या दादरी का वह पूरा गांव आतंकवादी है? या बुलंदशहर में जिसने इंस्पेक्टर सुबोध को मारा, वह तो पूरा गांव लेकर आया था- सारे आंतकवादी हैं? नहीं। एक की वजह से गांव बदनाम तो होता है, पर खराब नहीं होता। उत्तर प्रदेश और राजस्थान की ही तरह भटके लोग कश्मीर में भी हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सबको खत्म कर देंगे। दुख की इस बेला में वैसे तो अक्ल की बात करना बेमानी है, लेकिन इंसानियत की बात हर हाल में कही जाएगी। कश्मीरियों पर हमले बंद करिए। तुरंत। वे हमारे अपने हैं। और कोई भी कश्मीरी अगर दुख में पागल हो चुके किसी दूसरे भारतीय से डर रहा है, मेरे घर आए। मैं नोएडा में रहता हूं। 

Wednesday, January 30, 2019

खजुराहो की इस तस्वीर को कैसे देखें


(चेतावनी- अगर आप प्रेम में नहीं हैं, या फिर जीवन में आप कभी प्रेम में नहीं रहे हैं तो इस तस्वीर को न देखें। इसलिए नहीं कि तस्वीर समझ में नहीं आएगी, इसलिए क्योंकि इसके भावों में उतर पाना उसी के लिए मुमकिन है, जो ऐन उसी भाव में रहा है, जिसकी कि यह एक भंगिमा है।) 

संदर्भ : खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर के एक दर्जन से अधिक कोने है और हरएक कोने में स्त्री-पुरुष के प्रगाढ़तम प्रेम की भंगिमाएं बनी हुई हैं। यह तस्वीर प्रेम का उद्दीपक है, बोले तो प्रेम की शुरुआत। खजुराहो में कामकला की प्रत्यक्ष मूर्तियां कामसूत्र से कॉपी की गई हैं, लेकिन इन दर्जन भर कोनों में जो मूर्तियां हैं, वे कामसूत्र को बहुत ज्यादा फॉलो नहीं करतीं। कोने की अधिकतर मूर्तियों में ठीक उसी तरह का झटपट प्रेम दिखता है, जैसा कि हम सभी कोने में घुसकर करते हैं।

प्रसंग : स्त्री सजी हुई है, पुरुष भी। दोनों ने यथासंभव श्रृंगार कर रखा है और एक दूसरे को आकर्षित करने के लिए गले में रत्नजड़ित माला, हाथ में मोटे बाजूबंद पहन रखे हैं। पुरुष ने कमर में रत्नजड़ित कमरबंद बांध रखा है जो शायद हथियार बांधने के भी काम में आता होगा। पुरुष के बाल बड़े हैं जिन्हें उसने सिर के ठीक ऊपर जूड़ा बनाकर बांधा हुआ है। हो सकता है कि उसी जूड़े पर उसने एक मुकुट भी पहना हो। स्त्री ने भी लगभग उसी अंदाज में जूड़ा बांध रखा है। जिस तरह से दोनों तैयार हो रखे हैं, हो सकता है कि दोनों मैटिनी शो देखने जा रहे हों और ये भी हो सकता है कि मैटिनी शो उन्हें दिखने के लिए खुद उनके पास आ रहा हो। स्त्री के जेवर ही उसके वस्त्र हैं, तो पुरुष ने अपनी पीठ पर कपड़े का लंबा लबादा टांग रखा है, जो कुछ-कुछ रोमन साम्राज्य के राजाओं के लबादे से मिलता है। समय के साथ साथ पुरुष का पुरुषत्व टूट चुका है, लेकिन स्त्री का स्त्रीत्व अभी तक कायम है।

भावार्थ : दोनों बहुत खुश हैं। लगभग हजार साल बाद भी दोनों के चेहरे पर प्रेम की वही गर्मी अभी तक बनी हुई है, जो हजार साल पहले उठी थी। प्रेम की इसी गर्मी से स्त्री का चेहरा भर आया है और गाल थोड़े से और गोल हो गए हैं। यही गर्मी पुरुष के भी चेहरे पर है, लेकिन उसमें काम तत्व अधिक दिख रहा है, इसलिए वह प्रेम में स्त्री जितना नहीं  बह रहा, उसका चेहरा गर्म तो है, लेकिन नियंत्रित है और गंभीर भी। दाहिने हाथ की तर्जनी से वह स्त्री की ठोड़ी थोड़ा ऊपर उठा रहा है कि उसके अंदर वह थोड़ा सा और उतर सके और उसे अपने अंदर थोड़ा सा और उतार सके। देखना महज देखना नहीं होता, वह पीना भी होता है, उतरना भी होता है, उतारना भी होता है और जज्ब करना भी होता है। देखा कैसे जाता है, यह हम इस तस्वीर में देखकर आसानी से सीख सकते हैं। पुरुष स्त्री को खुद में जज्ब कर रहा है, जबकि दैहिक रूप से यह काम स्त्री का माना जाता है। लेकिन यही तो प्रेम होता है जो स्त्री पुरुष की सभी मान्य अवधारणाएं तोड़कर छिन्न भिन्न कर देता है। इस तस्वीर में पुरुष भले ही पुरुष दिख रहा है, लेकिन वह पूरी तरह से स्त्री बन चुका है और जो कुछ भी है, सब अपने अंदर भर लेना चाह रहा है। वहीं स्त्री जानती है कि वह इसी रास्ते से पुरुष के अंदर जा रही है, घर बना रही है, विजय पा रही है। विजय के इस आनंद में स्त्री की आंखें बंद हो चुकी हैं, नाक फूल चुकी है और होंठ एक प्रगाढ़ चुंबन के लिए आधे खुलकर ऊपर की ओर उठ चुके हैं। स्त्री जानती है कि चुंबन शुरुआत नहीं, बल्कि देखने का और पुरुष पर विजय पाने का अंत ही होगा क्योंकि फिर देखना खत्म होकर महसूसना शुरू हो जाएगा। लेकिन स्त्री महसूसने तक जाना चाहती है, इसीलिए वह अपनी कमर का दाहिना हिस्सा पुरुष की बाईं टांग से रगड़ रही है। स्त्री के स्तन गोल हैं, कामोत्तेजक हैं, फिर भी पुरुष उसके चेहरे में ही फंसा हुआ है तो इसका एक अर्थ ये भी हो सकता है कि तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती, नजारे हम क्या देखें? ये तस्वीर हमें बताती है कि अंत पंत में हमारी पर्सनालिटी का सबसे बड़ा हिस्सा हमारे गुप्तांग नहीं होते, बल्कि हमारा चेहरा होता है, प्रेम होता है और स्त्री पुरुष के बीच हमेशा बनी रहने वाली गर्मी होती है।

Wednesday, December 12, 2018

एक रात की बेबात

रोज की तरह रात आ तो गई
लेकिन रोज की तरह गई नहीं
रात जमकर बवाल काटा
सालों पुरानी प्रेमिका से भिड़ा
दाहिने गई तो दाहिने जाने पर चिल्लाया
बाएं गई तो बाएं जाने पर भी
चुप रही तो चुप्पी पर भड़का
बोली तो बोलने पर तड़का
दो सेकेंड में ब्रेकप करके दो घंटे बकवास की
फिर ठंड लगी
कंबल ओढ़ा, टोपी पहनी
और चला आया
उससे भी पुरानी प्रेमिका के पास
हर बार की तरह फिर से उसे
मीठा सा एक प्रपोज मारा
प्रेमिका मुदित हुई
उसकी आंखों से गरमी निकली
मैं तर हुआ
और तुरंत हस्तमैथुन करके
खुद को शांत किया
पुरानी प्रेमिका की तस्वीर बगल रखी
और तकिये से सटकर सो गया।
सुबह उठा
पैताने पर पहुंची तकिया सिराहने रखी
पहले पुरानी प्रेमिका की तस्वीर देखी
फिर लैपी पर एक्सवीडियोज लगाया
खुरचकर कमरे की दीवार पर एक निशान बनाया
और फ्रेश होकर हाथ धुलकर
फिर एक बार हस्तमैथुन किया
फिर भी ट्रैफिक की लाल बत्ती पर
सिर पर सवार थी पुरानी लाश
और पीछे सीना सटाकर बैठी रही
उससे भी पुरानी तकिया
कार वाले बूढ़े को गालियां दीं
भीख मांगने वाली बच्ची को भी
रिक्शे वाले को डांटा
फ्लाईओवर पर चलती ठंडी हवा को कोसा
तीन बार स्कूटी से गिरते गिरते बचा
कई बार पैदल चलते हुए लड़खड़ाया
भूख नहीं लगी, फिर भी जबरदस्ती
दो समोसे दो बाटी कोक के साथ गटके
दो डिब्बी सिगरेट फूंक गया
और धुंए में उड़ा दिया ब्रेकप के बाद याद आता रेशम
पी गया अपना सारा पानी
एक व्यंग लिखा, सामने बैठने वाली स्त्री की बुराई की
चिल्लाने वाले कर्मचारी पर पहली बार चिल्लाया
और पूरी कर दी नौकरी
रास्ते की सारी लाल बत्तियां तोड़ीं
और घर वापस आया
रात फिर से शुरू थी
और एक्सवीडियोज भी
तीन बजे रात तक चैट की हरी बत्ती जलाए रखी
मगर वो सोती रही
फिर फोन में सबको ब्लॉक मारा, उसे भी
नट्टी तक भरकर पी शराब
फेफड़ों में भरा ढेर सारा धुंआ
और तय किया कि
अब बाल कलर करा ही लूंगा,
बस बहुत हुआ।


Friday, October 26, 2018

25 आईपीएस जिनका मोदी ने कैरियर और जीवन तबाह किया

संस्थाओं की तोड़फोड़ करके किनारे लगा देने की आदत नरेंद्र मोदी एंड पार्टी की आज की नहीं है, बल्कि काफी से भी काफी पुरानी है। सीबीआई में फिलहाल उनके खास रहे आईपीएस तो अब भुगत रहे हैं, गुजरात में तो दर्जनों आईएएस इस पार्टी का शिकार बन चुके हैं और इस्तीफा तक दे चुके हैं। कितने ही आईएएस और आईपीएस का कैरियर और पूरा जीवन ही इस पार्टी ने खराब कर दिया है। जिसने हर काले गोरे में साथ दिया, उसे पीके मिश्रा और वाईसी मोदी बना दिया, और जब खुद पर आंच आई तो साथ देने वाले को ही डीजी वंजारा बनाकर मक्खन में से बाल की तरह निकाल फेंका। आइए देखते हैं नरेंद्र मोदी एंड पार्टी ने कितने आईएएस आईपीएस का जीवन चौपट किया है। हालांकि लिस्ट बहुत बहुत और वाकई बहुत लंबी है, इसलिए हमने चुने हुए दर्जन भी ऐसे अधिकारी लिए हैं, जो वाकई इस गुजराती पार्टी के सताए हुए हैं।

नंबर एक पर आते हैं आईएएस प्रदीप शर्मा। प्रदीप शर्मा ने गुजरात दंगों में एसआईटी को लिखा था कि उन्हें मुख्यमंत्री के दफ्तर से फोन आया था और कहा गया था कि वो अपने भाई कुलदीप शर्मा को जो कि उस वक्त अहमदाबाद रेंज के आईजी थे, उन्हें समझाएं कि वो अल्पसंख्यकों को बचाने के लिए सक्रिय कदम ना उठाए। शर्मा का नाम स्नूपगेट यानि की जिस महिला की जासूसी के आरोप नरेंद्र मोदी एंड पार्टी पर लगे थे, उसमें भी आया। इनपर उस मामले में एफआईआर कराने के लिए शर्मा जी हाईकोर्ट तक लड़े, लेकिन तब तक मोदी जी प्रधानमंत्री बन चुके थे और शर्मा जी यह सब कुछ सस्पेंशन में रहकर कर रहे थे। सन 2014 की शुरुआत में नरेंद्र मोदी एंड पार्टी पर एफआईआर दर्ज करने से हाई कोर्ट ने इन्कार किया और उसी साल के अंत में यानी कि 30 सितंबर को एसीबी ने प्रदीप शर्मा को गिरफ्तार कर लिया। अब जाकर वे अगस्त में जमानत से जेल पर बाहर आए हैं।

नंबर दो पर आते हैं आईपीएस संजीव भट्ट। 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी संजीव को सेवा से ‘अनधिकृत रूप से अनुपस्थित’ रहने के आधार पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अगस्त 2015 में बर्खास्त कर दिया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था कि वह गांधीनगर स्थित मोदी के आवास पर 27 फरवरी 2002 को आयोजित बैठक में शामिल थे। उन्होंने दावा किया था कि बैठक में मुख्यमंत्री ने सभी शीर्ष पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया था कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाने की घटना के बाद आक्रोशित हिंदुओं को अपना बदला पूरा करने दें। इसका बदला उन्हें खूब चुकाना पड़ा है। फर्जी मामलों में गिरफ्तारी से लेकर उनका घर पर अहमदाबाद नगर निगम बुलडोजर तक चढ़ा चुका है।

नंबर तीन पर आते हैं आईपीएस राहुल शर्मा। गुजरात दंगों के दौरान भावनगर के एसपी रहे राहुल उन चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने दंगे रोकने का भरसक प्रयास किया। शर्मा ने कथित तौर पर चार्जशीट में दर्ज 'आधिकारिक' बयान पर असहमति जताई थी। उस दौरान शर्मा का प्रमोशन भी रोक दिया गया था और उनका तबादला कर दिया गया। 2004 में शर्मा ने नानावती कमिशन को एक सीडी सौंपी थी, जिसमें नेताओं, पुलिसकर्मियों और दंगे के आरोपियों की 5 लाख कॉल रिकॉर्ड थीं। 2011 में दुराचार के केस की चार्जशीट में राहुल का भी नाम था। इन्होंने भी इस्तीफा दे दिया है और पिछले साल यानी कि 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले बताया था कि वे अपनी राजनीतिक पार्टी लाने जा रहे हैं. हालांकि वो आ नहीं पाई। फिलहाल वे गुजरात हाईकोर्ट में बतौर वकील प्रेक्टिस कर रहे हैं.

नंबर चार पर आते हैं आईपीएस समीउल्लाह अंसारी। कहते हैं कि जनाब यूपी के फैजाबाद से हैं, लेकिन इस बारे में हम कन्फर्म नहीं हैं। गोधरा कांड व गुजरात दंगों के दौरान वे अहमदाबाद यातायात पुलिस में उपायुक्त के पद पर तैनात थे, इसी दौरान सेंट्रल आइबी की ओरसे रिकार्ड किए गए थे। इसमें प्रदेश के कई मुस्लिम धार्मिक, सामाजिक नेताओं की ओर से समीउल्लाह को फोन करने का खुलासा हुआ था। इसकी सीडी बाद में गुजरात सरकार को भी उपलब्ध कराई गई थी। आइपीएस समीउल्लाह अंसारी ने अमेरिका से अपना इस्तीफा सरकार को भेजा था। अंसारी अक्टूबर 2010 से स्वास्थ्य कारणों से अवकाश पर थे। इन्होंने अपना इस्तीफा दंगों व फर्जी मुठभेड मामलों के चलते नाराज होकर भेजा। मीउल्लाह अंसारी वर्ष 1992 बैच के अधिकारी हैं तथा एमए व आइआइएम बैंगलोर से एमबीए किया है।

नंबर पांच पर डीजी वंजारा को रखा जा सकता है। सितंबर 2014 में मुंबई की एक अदालत ने वंज़ारा को सोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति के फर्जी मुठभेड़ मामले में ज़मानत दे दी थी. साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने जब सोहराबुद्दीन केस को ट्रायल के लिए गुजरात से महाराष्ट्र स्थानांतरित किया, तब से वंज़ारा मुंबई जेल में थे. माना जाता है कि मुंबई जेल में रहने के कारण वंज़ारा काफ़ी निराश हो गए थे और इसी कारण उन्होंने सितंबर 2013 में इस्तीफ़ा दे दिया. हालाँकि सरकार ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए कहा है कि जब तक वंजारा पर केस चल रहा है, तब तक वह इस्तीफा नहीं दे सकते.

नंबर छह पर आते हैं आईपीएस ऑफिसर जी एल सिंघल। इशरत एनकाउंटर मामले में शामिल जीएल सिंघल ने भी पत्र लिखकर इस्तीफ़ा दे दिया था. अपने पत्र में जीएल सिंघल ने भी यही कहा था कि सरकार उनका बचाव नहीं कर रही है और उन्होंने जो भी काम क्राइम ब्रांच में अपनी नौकरी के दौरान किए, वे सब सरकार के दिशा-निर्देशन पर किए. हालांकि नरेंद्र मोदी की सरकार बनने ही आसपास उन्हें बहाल कर दिया गया और उन्हें गांधीनगर में स्टेट रिजर्व पुलिस में ग्रुप कमांडेंट बना दिया गया। एक निजी वेबसाइट ने अमित शाह और सिंघल के बीच की निजी बातचीत को सार्वजनिक किया था. यह बातचीत अन्य कई दस्तावेज़ों के साथ सीबीआई के छापे में सिंघल के घर से बरामद हुई थी. स्नूपगेट' में मिस्टर मोदी एंड पार्टी पर जिस महिला की जासूसी का आरोप लगा था, उस मामले के केंद्र में भी सिंघल ही थे. इस मामले को लेकर मोदी सरकार पर काफ़ी तीखे हमले हुए थे

सातवें नंबर पर आते हैं गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी रजनीश राय। इसी साल यानी कि 2018 में तंग आकर आखिरकार इन्होंने भी इस्तीफा दे ही दिया। इन्होंने सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में डीजी वंजारा और दूसरे पुलिसकर्मियों को ऑन ड्यूटी गिरफ्तार किया था।  गुजरात में रजनीश राय, राहुल शर्मा और सतीश वर्मा ये तीन ऐसे आईपीएस अधिकारी हैं जिन्होंने 2001 में मोदी सरकार के आने के बाद सरकार के काम का खुलकर विरोध किया था. 2014 में मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद रजनीश राय का ट्रांसफर आंध्र प्रदेश में सीआरपीएफ में कर दिया गया था. मोदी सरकार के आने के बाद रजनीश पिछले साल उस समय चर्चा में आए जब उन्होंने सीआरपीएफ के शीर्ष अधिकारियों को अपनी एक रिपोर्ट दी जिसमें बताया था कि कैसे सेना, अर्द्धसैनिक बल और असम पुलिस ने 29-30 मार्च चिरांग जिले के सिमालगुड़ी इलाके में फर्जी मुठभेड़ को अंजाम दिया और दो व्यक्तियों को एनडीएफबी (एस) का सदस्य बताकर मार डाला था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, डिफें मिनिस्ट्री, असम सरकार और सीआरपीएफ से जवाब-तलब किया था. जिसके बाद बिना किसी वजह इस साल जून में रजनीश राय का ट्रांसफर आंध्र प्रदेश कर दिया गया.

आईपीएस पीपी पाण्डेय को पहले ही आ जाना था, लेकिन वह आए हैं आठवें नंबर पर। आजकल पाण्डेय जी आईएएस मेंस क्लियर करने वालों को इंटरव्यू की तैयारी कराते हैं। यह भी इशरत जहां सहित तीन दूसरे लोगों के फर्जी एनकाउंटर में फंसे थे, लेकिन सीबीआई की विशेष अदालत ने इन्हें बरी कर दिया।

नवें नंबर पर आते हैं आरबी श्री कुमार जो गुजरात में एडीजी (इंटेलिजेंस) थे। श्री कुमार का तबादला गुजरात दंगों के दौरान संजीव भट्ट के साथ ही किया गया था। कुमार का तबादला इसलिए किया गया, क्योंकि उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग को मोदी के उस भाषण की क्लिप सौंप दी थी, जिसमें कथित तौर पर मोदी ने मुस्लिम समुदाय के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी।कुमार ने मोदी और बीजेपी के कई नेताओं के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियान शुरू करने का आरोप लगाते हुए मानहानि और साजिश रचने का केस भी दर्ज कराया था।

10वें नंबर पर आते हैं गुजरात के पूर्व आईएएस कुलदीप शर्मा। कुलदीप शर्मा के खिलाफ पुलिस ने गुजरात भेड़ और ऊन विकास निगम (जीएसडब्ल्यूडीस) का महाप्रबंधक रहते हुए बिना उपयोग किया अनुदान वापस नहीं करने के आरोप में सन 2015 में चार्जशीट फाइल की थी। मामला 2010 11 का है। आईएएस रहते शर्मा और राज्य सरकार के बीच रिश्ता काफी खराब था। शर्मा ने वर्ष 2005 में सीआईडी (अपराध) के प्रमुख के तौर पर गुजरात के तत्कालीन मुख्य सचिव सुधीर मांकड को लिखे पत्र में गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह पर माधवपुरा मर्केंटाइल कोऑपरेटिव बैंक धोखाधड़ी मामले के अभियुक्त केतन पारिख से रिश्वत लेने का आरोप लगाया था. पदोन्नति न दिए जाने के खिलाफ शर्मा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसके चलते राज्य सरकार के साथ उनके रिश्ते और खराब हुए थे। पिछले विधानसभा चुनावों में कुलदीप शर्मा ने कांग्रेस के बूथ मैनेजमेंट की कमान संभाली थी।

11वें नंबर पर आते हैं राजकुमार पांडियान। राजकुमार पांडियान भी सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ में मौत के मामले में फंसे थे जिन्हें सीबीआई की विशेष अदालत ने बरी कर दिया है। इंटेलिजेंस ब्यूरो में तैनात आईपीएस अधिकारी राजकुमार पांडियन को सोहराबुद्दीन केस में अप्रैल, 2007 में गिरफ्तार किया गया था. सात साल जेल में रहने वाले पांडियन को मई, 2014 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी लेकिन उन्हें मुंबई छोड़ने की इजाजत नहीं मिली. इसके बाद गुजरात सरकार ने मुंबई स्थित गुजरात औद्योगिक विकास निगम पांडियन को संपर्क अधिकारी बनाया है. विशेष सीबीआई न्यायाधीश एमबी गोसावी ने इस आधार पर पांडियन को आरोपमुक्त किया कि उनके खिलाफ (अभियोजन के लिए) मंजूरी नहीं है. इसलिए उनके खिलाफ अभियोजन नहीं चलाया जा सकता. सीबीआई के अनुसार, पांडियान गुजरात एटीएस की उस टीम का हिस्सा थे, जिसने सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी को पकड़ा था. सीबीआई ने कहा कि उसने शुरुआती चरण से ही साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई थी.

12वें नंबर पर आती हैं आईपीएस नीरजा गोत्रू। अहमदाबाद में एसपी (प्रोहिबिशन) नीरजा गोत्रू ने दाहोद और पंचमहल में हुए दंगों के केस की दोबारा जांच के लिए खुलवाया था। सितंबर, 2004 में उन्हें अपनी जांच बंद करने का आदेश देकर सीबीआई (डेप्युटेशन) में भेज दिया गया था। नीरजा से सितंबर 2004 में जांच खत्म करने को कहा गया था। जब नीरजा ने अंबिका सोसायटी नरसंहार मामले में 13 लोगों की बॉडी जलाने के आरोपी सब इंस्पेक्टर की गिरफ्तारी का ऑर्डर दिया तो सूबूत मिटाने के लिए उन्हें ही सीबीआई डेप्युटेशन पर भेज दिया गया।

13वें हैं आईपीएस सतीश चंद्र वर्मा। बीजेपी विधायक शंकर चौधरी की गिरफ्तारी का आदेश देने के बाद भुज के पूर्व डीआईजी वर्मा का तबादला हो गया था। चौधरी पर दंगों के दौरान दो मुस्लिम लड़कों की हत्या में शामिल होने का आरोप था। वर्मा ने गुजरात हाई कोर्ट में 80 पन्नो का एक ऐफिडेविट भी दिया था, जिसमें इशरत जहां एनकाउंटर केस को फर्जी बताया गया। सतीश ने भी प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाते हुए कैट का दरवाजा खटखटाया था।

14वें हैं आईपीएस एमडी अंतानी। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भरूच के एसपी रहते हुए अंतानी वीएचपी और बीजेपी ऐक्टिविस्टों से काफी मुश्किल से निपटे थे। उनका जल्द ही नर्मदा जिले में तबादला कर दिया गया। इसके बाद गोधरा और आखिर में उनकी नियुक्ति स्थानीय पासपोर्ट ऑफिसर के तौर पर कर दी गई, जहां उन्होंने कई साल काम किया।

15वें नंबर पर आते हैं आईपीएस विवेक श्रीवास्तव। दंगों के दौरान विवेक कच्छ के एसपी थे और मुख्यमंत्री कार्यालय से मिले निर्देशों को नजरअंदाज करते हुए वीएचपी नेता को गिरफ्तार करना उनके लिए परेशानी का सबब बन गया। उन्हें रातों-रात जिले से बाहर शिफ्ट कर दिया गया था और फिर उन्हें डेप्युटेशन पर दिल्ली जाने के लिए बाध्य होना पड़ा।

16वें नंबर पर हैं अनुपम गहलोत। रिपोर्ट्स के मुताबिक मेहसाना के एसपी रहते हुए अनुपम ने दंगों के दौरान लगभग एक हजार लोगों की जान बचाई, जिसके बाद मेहसाना से उनका ट्रांसफर कर दिया गया था। इसके बाद लगातार गहलोत को दरकिनार किया जाता रहा और मुश्किल जगहों पर पोस्टिंग दी गई।

17वें नंबर पर हैं सीबीआई वाले आईपीएस एके शर्मा। कभी नरेंद्र मोदी एंड पार्टी के खास रहे एके शर्मा अब उनकी आंख की किरकिरी बन चुके हैं। हाल ही में मोदी सरकार ने आलोक श्रीवास्तव के साथ ही एके शर्मा पर भी अपना अवैध हथौड़ा चलाया है। एके शर्मा पर विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी को देश से भगाने के आरोप हैं। सूत्रों के मुताबिक जब राकेश अस्थाना को एके शर्मा का वरिष्ठ बनाकर बैठा दिया गया, तभी से वह अस्थाना की अपोजिट लॉबी में चले गए। पिछले दिनों जो रातों रात पीएमओ के जरिए तुगलकी फरमान निकला, उसके तहत सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण शर्मा को जेडी पॉलिसी और जेडी एंटी करप्शन हेडक्वार्टर से हटा दिया गया है।

18वें हैं अजय बस्सी। अजय बस्सी दिल्ली हेडक्वार्टर में डिप्टी एसपी के पद पर तैनात थे और राकेश अस्थाना घूसकांड की जांच कर रही टीम का नेतृत्व कर रहे थे. बस्सी का ट्रांसफर पोर्ट ब्लेयर किया गया है.

19वें हैं एसएस ग्रूम- सीबीआई के एडिशनल एसपी एसएस ग्रूम का ट्रांसफर जबलपुर किया गया है. इन पर डिप्टी एसपी देवेंद्र कुमार की गिरफ्तारी और उनसे जबरदस्ती कोरे कागज पर दस्तखत कराने का आरोप है.

20वें हैं ए साई मनोहर- सीबीआई में तैनात आईपीएस मनोहर को राकेश अस्थाना का करीबी कहा जाता है और इन्हें चंडीगढ़ में पोस्ट किया गया है.

21वें नंबर पर हैं वी मुरुगेसन। सीबीआई में तैनात आईपीएस वी मुरुगेसन को चंडीगढ़ में नियुक्त किया गया है.

22वें हैं अमित कुमार- अमित कुमार सीबीआई में डीआईजी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे जिन्हें मोदी सरकार के बैठाए सीबीआई के कार्यवाहक निदेशक ने JD, AC-1 में ट्रांसफर कर दिया है।

23वें नंबर पर हैं मनीष सिन्हा- मनीष सिन्हा सीबीआई में डीआईजी का पद संभाल रहे थे और इनका ट्रांसफर नागपुर किया गया है.

24वें हैं जसबीर सिंह- ये सीबीआई में डीआईजी हैं और इन्हें बैंक धोखाधड़ी विंग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है.

25वें हैं सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा। आलोक वर्मा भी कभी नरेंद्र मोदी एंड पार्टी के खास माने जाते हैं, लेकिन अब हालात यह हैं कि नरेंद्र मोदी अजित डोवाल की मदद से उनके घर आईबी के लोगों को भेजकर जासूसी करा रहे हैं तो आलोक वर्मा के लोग भी कम नहीं हैं। वे नरेंद्र मोदी और अजीत डोवाल के भेजे जासूसों को सड़क पर घसीट घसीटकर पीट रहे हैं। अभी नरेंद्र मोदी एंड पार्टी और सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा के बीच रस्साकसी जारी है, जिसमें आलोक वर्मा का पलड़ा भारी पड़ता दिख रहा है। अगर आईपीएस लॉबी ठीक से काम करने लगे तो पिछले 17-18 सालों से जो नरेंद्र मोदी ने आईपीएस लॉबी का जीना दुश्वार कर रखा है, इसी एक मामले से उसे कुछ राहत मिल सकती है। आखिरकार आलोक वर्मा के पास जो फाइलें हैं, तोते की जान तो उसी में है।