Sunday, January 24, 2021

एक सुबह जब शाम हुई

दिन निकला। दिन क्या निकला, उसके निकलने से पहले शाम निकली। तड़के से मैं करवटें बदल रहा था कि दिन निकले, उजाला हो तो मैं बिस्तर से निकलूं। काफी देर तक जब दिन की कोई आहट नहीं मिली तो मैंने कंबल फेंका। सर्दी अचानक बढ़ चुकी थी। ठीक वैसी ही, जैसे कि जाती जनवरी की शामें अचानक से गहरी और ठंडी होने लगती हैं। एक पल को मुझे लगा कि कहीं मैं दोपहर के खाने के बाद तो नहीं सोया था। मगर देह पर मौजूद सोने वाले कपड़ों ने मुझे टहोका, कि नहीं, ये सुबह ही है और ये वही सुबह है, जिसका मैं पिछले दो तीन घंटों से इंतजार कर रहा था। ये वही सुबह है, जिसके लिए मैंने अपना वह सपना तोड़ दिया था, जिसमें मैं उड़ीसा के कोर्णाक मंदिर के गलियारे में लड़की से औरत बनने को उतारू किसी लड़की के साथ घूम रहा था। सपने में मंदिर था, मंदिर के पत्थर थे, बुर्ज थे, हवा के अलसाए झोंके थे और सबसे बड़ी बात तो ये कि सपने में गरमी थी। मेरे उस्ताद शम्सुर्रहमान फारुकी साहब एक जगह पर लिखते हैं कि हम हिंदुस्तानियों के लिए गर्मी से ज्यादा सर्दी तकलीफदेह है और ये लिखने से पहले पता नहीं जमानत में या यूं ही वे कैफी आजमी साहब का एक मिसरा नज्र करते हैं- 

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी 

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है। 

सो सपना था, सपने में गर्म हवा भी थी जो शायद इस डर से सपने में डोल रही थी कि बाहर बहुत सर्दी है और सर्दी के डर से हमारे हिंदुस्तान में आज का दिन रोज के दिन की तरह निकलने से इन्कार कर रहा है। आज हिंदुस्तान में आने के लिए उसे कल की शाम का भी साथ चाहिए, भले कल की शाम से ही उसके डर की वजह शुरू हुई हो। मैं सोचने लगा, जीवन में मैंने भी ऐसे लोगों का साथ खूब जोड़ा है, जो मेरा नुकसान करते रहे, जिनसे कहीं न कहीं मैं डरता रहा, फिर भी शायद किसी बड़े डर की वजह से मैंने नुकसान का साथ नहीं छोड़ा और शायद यही वजह है कि आज मैं घाटे में हूं। लोगों को लगता है कि ये बहुत नफा मार रहा है, लेकिन नफा मुझे उस जूते की तरह लगता रहा है, जो मुझे देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, मगर उसे बर्दाश्त करने की काबलियत अपने पास न होने की वजह से मैं उसे देखकर ही संतोष कर लेता रहा हूं। तो क्या यह मेरा संतोष है जो मेरे नुकसान की वजह है? हिंदुओं के धर्मग्रंथों में तो बहुत कहा गया है कि संतोष ही परमधन है, तो क्या मेरा सारा नुकसान मेरे इस परमधन की वजह से हुआ? क्या मुझे संतोष नहीं करना चाहिए? मगर मैं संतोषी कब था? दुनिया की कोई भी चीज मेरे अंदर यह परमधन नहीं भर पाई, और शायद नहीं ही भर पाएगी। मैं संतोषी नहीं हूं। संतोष ने मुझे इतना दिक्क किया कि आखिरकार मैंने कंबल दूर फेंक दिया और उससे चार गज और दूर मैंने संतोष को फेंका। इसलिए भी फेंका कि पिछले दिन भर और आधी रात तक की मेहनत के बाद मैं नींद से संतुष्ट नहीं था। मैं सुबह से भी संतुष्ट नहीं था, जो इतनी मेहनत, इतने इंतजार के बाद आई, मगर शाम से हाथ मिलाकर आई। सुबह ऐसे भी कहीं आती है? भुनभुनाते हुए मैंने बिस्तर छोड़ा, कि आज मैं इस सुबह को नहीं छोड़ूंगा। इसी की खातिर मैंने सपने में बहती गर्म हवा छोड़ी, खुला आंगन छोड़ा, और सबसे बड़ी बात जो रही, वह बताने की नहीं है, कोई कहेगा, तो भी नहीं बताउंगा। 

सुबह मैंने बिस्तर छोड़ा। रात के छोड़े हुए कपड़े कैसे-कैसे करके अपने बदन पर डाले और कमरे से बाहर आया। बाहर शाम होने को थी। बल्कि ये दिन ऐसा दिन था कि दिन निकलने के साथ ही शाम अपने होने की जिद लिए गठरी बनी बैठी थी। शाम को सर्दी बहुत लग रही थी, लेकिन किसी भी मौसम, या किसी भी दिन या किसी भी चीज से ज्यादा बड़ी चीज जिद होती है। शाम सुबह से ही अपनी जिद पर थी। एकबारगी मैंने सोचा कि आज मैं दिन से हार मान लूं क्या? फिर मैंने सोचा कि हर किसी से हारने के बाद अगर मैं दिन से भी हार गया, तो फिर अगले दिन में जाना और फिर उसके भी अगले दिन में जाना मुसीबत हो जाएगा। दिन अपना दरवाजा एक बार किसी के लिए बंद कर लेता है तो जल्दी खुलना मुश्किल हो जाता है। कई लोग तो पूरी उम्र खुद को रात का राही कहते रहे हैं। कई लोग आज तक अवध की शाम से नहीं निकल पाए, उनके जीवन में सुबह हुई ही नहीं। फिर शाम से मेरी उतनी दोस्ती भी नहीं रही, क्योंकि मेरे पेशे सहाफत की कुछ ऐसी मजबूरियां हैं कि हम लोग जब इस पेशे में आते हैं तो अपनी हर शाम मुल्तवी करके आते हैं। जब दुनिया शाम की रंगीनियत से दो चार हुई रहती है, हम लोग दुनिया से उड़ते रंगों की रपट लिखने में मगशूल होते हैं। क्या करें, पेशा ही ऐसा है। दुनिया जब रंग बिगाड़ती है, बदलती है तो हम दुनिया भर को बताने की तैयारी में लगते हैं कि रंग बिगड़ चुका है- बदल चुका है। 

जब भी मैं शाम देखता हूं, एक बार यह जरूर सोचता हूं कि किसी और पेशे में होता तो कम से कम शाम देख लेता। जब तक मैं इस पेशे में नहीं था, या कि यूं कहें कि जब मैं कहीं भी नहीं था तो अपने बारा पत्थर के मैदान शाम का आसमान देख रहा होता था। पहले पीला, फिर नारंगी और फिर लाल होते हुए सबकुछ गाढ़े नीले में तब्दील होते देखता। मैं चित्रकार नहीं हूं और तब भी इसके बारे में नहीं सोचा, जब इतने सारे रंग मेरे सामने खेल रहे होते। बल्कि कभी कभी मुझे खुद से चिढ़ होती है कि मैंने इतने सुंदर सुंदर रंग देखे हैं, फिर भी जब बात रंग चुनने की हो तो मैं हमेशा कोई न कोई वाहियात रंग चुनता हूं। मेरे जीवन की सारी चित्रकारी सिर्फ इसी वजह से धरी रह गई, क्योंकि मुझे रंग देखने तो आते हैं, मगर चुनने नहीं आते। मेरे घर के सामने एक नीम का पेड़ है, जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। मगर क्या मजाल कि मैं कभी भी उसके लिए एकदम सही सब्ज चुन पाऊं। फिर भी मैं रोज शाम का इंतजार किया करता, और अपने आप से शर्त लगाता कि आज वाला लाल कल वाले लाल से ज्यादा लाल होगा। बहुत बाद में जब मैंने पहाड़ देखे, वहां की शाम देखी तो नोट किया कि जितनी लाल, जितनी नर्म और जितनी रोमानी हमारे मैदानों की शाम होती है, उतनी पहाड़ों की शाम नहीं होती। बल्कि अगर कोई मुझे इसके लिए सजा न दे तो मैं ये भी कहूंगा कि पहाड़ों की शाम बेहद खुरदुरी और जकड़न से भरी होती है, जिसमें एक रंग डर का भी होता है। डर यह कि बाहर निकले तो जाने कौन खा जाए, जाने कहां से पैर फिसल जाए या जाने कौन सा कीड़ा-मकोड़ा काट ले। मैदानों की शाम बेखौफ होती है और शायद यही वजह है कि उसमें लाल, पीले और नीले के जितने शेड्स होते हैं, उतने मुझे कहीं भी देखने को नहीं मिले। कुछ लोग समुद्र का जिक्र कर सकते हैं, लेकिन समुद्र भी मैदान में ही होते हैं, पहाड़ों में नहीं होते। रंगों को फैलने के लिए बहुत ढेर सारी जगह चाहिए होती है, जिनमें धरती की सिकुड़न बेवजह शोर मचाती है। 

मगर मैं यह क्या सोच रहा हूं? मैं यह क्या कह रहा हूं और आखिर क्यों कह रहा हूं? मैं तो सुबह के इंतजार में था और भले ही शाम के साथ हुई, मगर सुबह तो हुई ही। फिर मुझे किस चीज से इतनी शिकायत है? और फिर शिकायतों का बंडल तो शाम तले खुलता है, अभी तो सुबह हुई है? सुबह से कैसी शिकायत? वह तो नया दिन लेकर आई है। नया दिन, जिसमें वह सब कुछ होगा, जो उस दिन से पहले कभी नहीं हुआ। नया दिन, जिसमें उस दिन से पहले वह सारी चीजें सामने आएंगी, जो पिछले हजारों हजार दिनों से सामने आने से रह गई हैं। मुझे नए का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं खीझ रहा हूं। मुझे सुबह का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं उससे मुंह फेरकर बैठा हूं। अगर किसी सुबह दिन शाम के साथ आ जाएगा तो क्या मुझे बर्दाश्त नहीं होगा? आखिर मोहल्ले की सारी लड़कियों की शादी हुई, मैंने बर्दाश्त की और आज भी मोहल्ले में वापस जाना नहीं छोड़ा। ना चाहते हुए भी कानून की मोटी मोटी और नीरस किताबें मैं बर्दाश्त करता रहा हूं। बेमन से ही सही, मगर आंकड़ों की फेहरिस्त को घंटों बर्दाश्त करता हूं, फिर एक अदद सुबह मुझसे बर्दाश्त क्यों नहीं हो रही है?   

.... नहीं पता कि जारी या खत्म।

एक सुबह जब शाम हुई

नींद तो यूं ही तमाम हुई

काम न कोई हो पाया

नाक लाल औ जाम हुई।

और ये मिसरे कैफी साहब के नहीं हैं, बल्कि ये मिसरे किसी के भी नहीं हैं। 

Tuesday, March 3, 2020

मिशेल बैचले : शुक्र मनाइये कि वे खुद सुप्रीम कोर्ट आई हैं

बात तनिक पुरानी है। सितंबर सन 1973 की। साउथ अमेरिकी देश चिली में अमेरिका ने सेना के एक गुट से विद्रोह करा दिया। इनका इरादा तख्तापलट करके सत्ता हथियाने का था। उस वक्त चिली में लोक कल्याणकारी जनवादी सरकार बनी थी। इस सरकार में चिली की तकरीबन आधा दर्जन कम्यूनिस्ट पार्टियां शामिल थीं। चिली में एक अरसे से ठीक वैसे ही लोगों का शासन था, जैसा कि हम भारत में कांग्रेस, बीजेपी और बिना कोई विचारधारा वाली क्षेत्रीय पार्टियों के शासन में देखते हैं। लब्बोलुआब यह कि बस लूटो खाओ और कोई बोले तो मोदी और शाह बन जाओ। इन लोगों को जनवादियों का शासन बर्दाश्त नहीं हो रहा था। एक वजह यह भी थी कि राष्ट्रपति सल्वादोर अलांदे की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी।

उधर सेना और तथाकथित डेमोक्रेट्स की नेतागिरी सेना का ही एक अफसर आगस्तो पिनोचेट कर रहा था। उसने सल्वादोर की रातों-रात हत्या करा दी। इसके लिए उसे अमेरिका ने पैसा दिया था। तब रिचर्ड निक्सन अमेरिका के राष्ट्रपति थे। जानकार बताते हैं कि जब सागा को मारा जा रहा था तो उस कमरे में आगस्तो भी मौजूद था। उसी रात चिली भर में हजारों लोगों को जेल में ठूंस दिया गया, दर्जनों लोगों को गोली मार दी गई, जिनमें चिली एयरफोर्स के ब्रिगेडियर अल्बर्तो आतुरो मिगुएल बैचले, उनकी आर्कियोलॉजिस्ट पत्नी एंजेला जेरिया गोम्ज और बेटी मिशेल बैचले भी थी। ब्रिगेडियर ने पिनोचेट के शासन का विरोध किया था। ऐवज में पिनोचेट ने ब्रिगेडियर अल्बर्तो बैचले को तब तक यातना दी, जब तक की उनकी मौत नहीं हो गई। यातना का यह दौर कई महीनों तक चला।

ब्रिगेडियर की बेटी मिशेल ने मुल्क में तानाशाही को हम भारतीयों से भी अधिक नजदीक से देखा। पिनोचेट ने चिली के 29वें राष्ट्रपति/तानाशाह के रूप में कुर्सी हथियाई और उसके बाद वहां की सरकारी संस्थाएं बेच दीं, बैंक बेच दिए, बाजार बेच दिए, व्यापारी बेच दिया, मतलब, जो कुछ भी उसके दिमाग में आया, सब बेच दिया और जो उसके दिमाग में अमेरिका ने भरा, वह भी बेच दिया। पिनोचेट की यह बेखौफ बिकवाली लगातार सत्रह साल तक चलती रही, शुक्र मनाइये कि अभी बीजेपी वालों को छह साल ही हुए हैं। पिनोचेट ने एक कमेटी बनाई और उससे चिली का संविधान पूरा बदलवा दिया। सन 85 आते-आते चिली में वही हाल हो गया, जैसा कि अभी नोटबंदी के बाद शुरू हुआ है।

पिनोचेट चिली पर सन 90 तक शासन करता रहा। जब रिटायर हुआ तो सेनाध्यक्ष बन बैठा और जनता पर वैसा ही अत्याचार कराता रहा, जैसा इन दिनों मोदी जी की तरह तरह की सेनाएं कर रही हैं, बल्कि इससे भी बुरा। सन 98 तक वो जबरदस्ती सेनाध्यक्ष बना रहा और जब रिटायर हुआ तो बिना चुनाव लड़े अपने आप सांसद बन बैठा। वैसे वह मरने तक संसद का सदस्य बना रहे, इसके लिए उसने तरकीब की हुई थी। जब वह संविधान बदलवा रहा था, तभी उसने अपने लिए संसद का सदस्य बने रहने की बात उसमें डलवा ली थी। मतलब जब तक इसने जिंदा रहना था, तब तक जुल्म करते रहना था, इसकी इसने पूरी व्यवस्था करा ली थी। मोदी जी चाहें तो पिनोचेट से भी सीख ले सकते हैं, आखिर डोलांड ट्रंप उनको भी बहुत-बहुत मानते हैं।

सांसद बनने के बाद एक बार पिनोचेट लंदन गया इलाज कराने। वहां पर उसे मानवाधिकारों के उल्लंघन के सैकड़ों मामलों के आरोप में इंटरपोल ने गिरफ्तार कर लिया। दो साल तक तो पिनोचेट वहां बंद रहा। सन 2000 में सेहत खराब होने का बहाना बनाकर वह वापस चिली लौटा। चार साल तक चिली में ही रहा, कहीं बाहर नहीं निकला। चार साल बाद चिली के ही एक जज जॉन गज्मॅन तापिया ने फैसला दिया कि पिनोचेट की हेल्थ टनाटन है, इन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इस फैसले के दो साल बाद यानी 2006 में पिनोचेट मर गया। जब वह मरा, उसके ऊपर तीन सौ क्रिमिनल चार्जेस पेंडिंग थे।

बहरहाल, एक बार फिर से लौटते हैं मिशेल बैचले पर। ब्रिगेडियर की बेटी चिली की पहली चुनी हुई समाजवादी राष्ट्रपति बनी, और बेहद लोकप्रिय भी। 2006 में एक बार तो 2014 में एक बार। मिशेल चिली की पहली महिला राष्ट्रपति भी हैं। और ब्रिगेडियर की इस बेटी की चिली में लोकप्रियता की सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह है- मानवाधिकारों के प्रति उनका डेवोशन। जब वे चिली की राष्ट्रपति नहीं होती हैं तो दुनिया भर में घूम-घूमकर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करती हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले भी वे मानवाधिकारों के लिए काम करती थीं, अब तो खैर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की हाई कमिश्नर हैं ही।

इन्हीं मिशेल ने ही सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता संशोधन अधिनियम के लिए याचिका दाखिल की है। भारत को और सुप्रीम कोर्ट को इनका आभारी होना चाहिए कि मिशेल ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में याचिका दाखिल की है। वरना मिशेल चाहें तो जेनेवा से ही मोदी जी, शाह जी और इनकी सेना के खिलाफ इतने वारंट तो जारी कर ही सकती हैं, जितने अभी दिल्ली में लोग मर गए। और यकीन मानिए, ये सारे वारंट उन सारे देशों में तामील होंगे, जिन्होंने यूएन ह्यूमन राइट कमीशन के चार्टर पर साइन किए हैं।

तो हे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मिस्टर रवीश कुमार, जिस तरह का आपका बयान है कि संसद भारत में कुछ भी कर सकती है तो भारत के बाहर रहने वाले लोग भी यही कुछ भी भारत के तानाशाहों के साथ भी कर सकते हैं। और बोबडे साहब, आप तो अंतराष्ट्रीय कानूनों के प्रकांड पंडित हैं, आप तो साफ साफ जानते हैं कि मिशेल ने सीन में एंट्री ले ली है तो अब मामला कहां तक पहुंच चुका है। क्या इससे बड़ी कोई और बेइज्जती हमारे लिए होगी कि पीएम और होम मिनिस्टर के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के वारंट इश्यू हो जाएं? 

Sunday, March 1, 2020

कौन मरा है? किसका बेटा?

कौन मरा है
किसका बेटा
अभी यहीं था
पलंग पे लेटा
किसने थी
आवाज लगाई
किसने शामत
नियति बनाई
किसने मारा
पहला पत्थर
किसने ली
पहली अंगड़ाई
जांच करो भाई
जांच करो
किसने पहले
आग लगाई
मगर सुनो तो
हमको दे दो
बेटे की जो
लाश है आई
दे दो दे दो
जहां छुपाई
रोक के रखी
हमने रुलाई
रोना है अब
खून पर अपने
रोना है
सब जून पर अपने
रोना है
पी पीकर पानी
रोना है
जो छंटी जवानी
रोना है
क्यों ईंट उठाई
रोना है
अब लाश जलाई
रोना है
पहले नहीं सोचा
रोना है
लो भीगा अंगोछा
रोना है
कि तब क्यों बोले
रोना है
कि आ अब रो लें
रोना है
हर इक नारों पर
रोना है
दंगों के मारों पर
रोना है
क्यों आग लगाई
रोना है
क्यों बुझ ना पाई
रोना है
ये फेर जो आया
रोना है
सब घेर के आया
रोना है
अब उन आवाजों पर
रोना है
टूटे साजों पर
रोना है
सब रूठ चुका है
रोना है
सब टूट चुका है
होता सलामत
बच्चा अपना
पूरा करता
अपना सपना
मार पीट
दंगा फसाद में
बच्चा मरा
और मर गया सपना।

Friday, February 21, 2020

हमारा गुमान हमारा डर बन गया है

सुप्रीम कोर्ट की ओर से शाहीन बाग का रास्ता खुलवाने के लिए पहुंचे दो वार्ताकारों में से एक साधना रामचंद्रन ने यह पूछा कि क्या आप लोगों को सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है तो वहां मौजूद लगभग सभी लोग एक स्वर में यही बोले कि भरोसा है। लेकिन मेरे पास रिकॉर्डेड दूसरा सुर, जो पहले वाले से थोड़ा मध्यम था, और जो वार्ताकारों तक नहीं पहुंचा, वह यही था कि भरोसा नहीं है। अदालत पर 'भरोसा है भी और नहीं भी' की जो भावना है, यह सिर्फ शाहीन बाग तक ही नहीं है। पिछले कुछ सालों में हमारी अदालतें, खासतौर पर हमारे सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से कायदे कानून का तिया पांचा किया है, भरोसा रहना और ऐन उसी वक्त भरोसे के न रहने को क्या मानें? एक सामान्य बात या एक नियति, जो संसद से लेकर अदालत की उस गोल गुंबद वाली इमारत में बैठे लोग अपने-अपने हिसाब से तय कर रहे हैं? जस्टिस दीपक मिश्र से लेकर जस्टिस रंजन गोगोई और अब जस्टिस बोबडे जो कुछ और जैसा कुछ भी कर रहे हैं, उसका खामियाजा कम से कम यह तीनों तो नहीं भुगतेंगे। उसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ हमारी न्याय व्यवस्था भुगतेगी। आज अगर शाहीन बाग सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकारों को सुनने को तैयार नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट को खुद सोचना होगा कि आखिरी बार उसने मुसलमानों की कब सुनी थी?

तीन तलाक का मामला हो, बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला हो या फिर जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का मामला हो, शाहीन बाग को ही नहीं, कायदा कानून जानने-मानने वाले हर किसी को लगता है कि अन्याय हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी नजर में जो न्याय किया, उसको अनुचित ठहराने और बताने के लिए एक से बढ़कर एक फैसले पहले से ही हैं, नजीरें हैं और शाहीन बाग जैसे देश भर में जो साढ़े चार सौ से भी अधिक बाग बन चुके हैं, सभी बागों में इन दिनों यही सब डिसकस हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तो खैर अन्याय करके अपना दरवाजा यों बंद कर लिया कि चेहरा नहीं दिखाएंगे। फिर जब शाहीन बाग की दादी कहती हैं कि कागज नहीं दिखाएंगे तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि वो चीजें बाद में बताएंगे, पहले रास्ते से हटो। गुरुवार को जब सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकार संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन शाहीनबाग में बातचीत कर रहे थे, जामिया के पास रहने वाले इमरान अपनी दो बच्चियों के साथ उनके सामने पहुंचे और बेसाख्ता रोने लगे। कहने लगे कि उन्हें डर लगता है। अपने लिए और अपनी दो बच्चियों के लिए डर लगता है। इमरान की दोनों बच्चियों ने अपनी साइकिल पर तिरंगे बांध रखे थे और हाथ में एक पोस्टर ले रखा था, जिसपर लिखा था कि हम आपको हिम्मत देने आए हैं। इमरान का कहना था कि ये तिरंगा जो आज तक हमारा गुमान हुआ करता था, अब हमारा डर बन गया है। डर के मारे हमें तिरंगा अपने साथ रखना पड़ रहा है क्योंकि इसे नहीं रखेंगे तो आप हमें हिंदुस्तानी नहीं मानेंगे।

'किसे हिंदुस्तानी मानें और किसे न मानें' की शायद कोई याचिका अभी तक सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर नहीं पहुंची है। 'किसे हिंदुस्तानी मानें और किसे न मानें' का कोई गैजेट अभी तक केंद्र की मोदी सरकार ने जारी नहीं किया है। सीएए जब सीएबी था, तभी से केंद्र सरकार के गृह मंत्री अमित शाह सहित कई दूसरे मंत्री समूचे भारत में घूम-घूमकर वह क्रोनोलॉजी समझा रहे हैं, जिसकी आग से इन दिनों असम भभक रहा है। असम की आंच समूचे भारत को महसूस हो रही है और इसी आंच से वह भय पैदा हुआ जो गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकारों के सामने बेसाख्ता बह निकला। वार्ताकार कहते रहे कि कौन कहता है कि आप हिंदुस्तानी नहीं हो, वार्ताकार ढांढस बंधाते रहे कि आप हिंदुस्तानी ही हो, मगर भय का बहना बंद नहीं हुआ। भरी सभा से भय उठा और बाहर जाकर फुटपाथ पर बैठ गया। मैंने देखा, सभा से एक शाहीन उठी, फुटपाथ पर गई और उसने उस भय के आंसू पोंछ दिए। उसका इमरान से कोई नाता नहीं था, एक रिश्ता था, जिसे हम दर्द के रिश्ते के रूप में समझ सकते हैं और इन दिनों दर्द के इस रिश्ते में डर के एक नाते ने भी घर कर लिया है।

मोदी सरकार हर मंच से यही कह रही है कि किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है। फिर क्या बात है कि डरे हुए सारे लोगों ने हर शहर में अपना एक घेरा बना लिया है, जो मुसलसल बढ़ता जा रहा है?  इस बात का जवाब शाहीन बाग की सरवरी दादी देती हैं। वो कहती हैं कि हमें तो ये लोग एकदम बीच में लाकर घेर रहे हैं। दादी की बात में सचाई है। 2014 में जब से नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार बनी है, तब से जो मॉब लिंचिंग शुरू हुई, अगर इसे हांकने के रूप में ग्रहण करें तो दादी की बात बिलकुल सही है। मार मार कर मुसलमानों को बीच में लाकर खड़ा कर दिया है और अब क्रोनोलॉजी के जरिए उनमें से लोगों को चुनने की कवायद होने वाली है। और ये कवायद होने ही वाली है क्योंकि बीजेपी की सरकार ने संसद में यह लिखकर दिया है कि अभी उन्होंने एनआरसी लागू करने के बारे में तय नहीं किया है। शाहीन बाग में बैठे लोगों की मांग यही है कि एनआरसी को सिरे से रद्द किया जाए। अगर इसके बारे में सोचा भी गया है तो उस सोच को भी रद्द किया जाए और संसद को यह लिखकर दिया जाए कि एनआरसी नहीं होगी।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की ओर से जो दो वार्ताकार शाहीन बाग भेजे गए, उनका कोई मतलब बनता नहीं दिख रहा है। गुरुवार को शाहीन बाग और वार्ताकारों के बीच कुछ बातों को लेकर कई बार गहमागहमी हुई। पहली यही कि वार्ताकारों का कहना था कि वो सिर्फ रास्ते की बात करने आए हैं, कैसे दूसरों को परेशानी न हो, उनके अधिकार की रक्षा हो, इसकी बात करने आए हैं। शाहीन बाग की महिलाओं का कहना था कि दो महीने छह दिन से वे यहां रास्ते की बात करने नहीं बैठी हैं। वे यहां सीएए, एनआरसी और एनपीआर की बात करने बैठी हैं और सुख से नहीं बैठी हैं। उन्हें दुख और डर, दोनों है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने अपने वार्ताकार शाहीन बाग का दुख सुनने नहीं भेजे थे, इसलिए जब भी लोग यह कहें कि हमारा दुख तो सुनिए तो साधना रामचंद्रन उन्हें डांट दें कि हमें हमारा काम मत बताइये। जाहिर है कि इस तरह की लाग-डांट बेनतीजा ही रहने वाली थी और बेनतीजा रही भी। सुप्रीम कोर्ट जो सुनना चाहता है, सड़क पर बैठे लोग वह बात बोलें भी तो कैसे बोलें? मौके पर मौजूद रुखसाना सवाल करती हैं कि सवा दो महीने से यहां बैठे हैं, अभी तक तो कोई बात करने आया नहीं। ये लोग बात करने आए हैं तो हमारे दुख पर नहीं बल्कि इनके सुख कैसे पूरे हों, इस पर बात करने आए हैं। फिर क्या गारंटी है कि कहीं और जाकर बैठ जाएंगे तो कोई बात करने आ ही जाएगा? नब्बे की हो रही आसमां बेगम, जो शाहीन बाग की दादी के नाम से मशहूर हैं, कहती हैं कि वे बापू के जुग-जमाने की हैं। मुंह दुख गया बताते-बताते कि ये बापू वाली बात नहीं है। दादी ने तो पूछा नहीं, मगर हम खुद से तो पूछ ही सकते हैं कि बापू वाली बात क्या है? बापू होते तो ये होता?   

Sunday, February 16, 2020

शकरकंदी की कड़वाहट

मेरा एक दोस्त अक्सर कहता है कि लोग अच्छे नहीं होते, तो मैं कहता हूं कि लोग तो अव्वल अच्छे ही होते हैं, वक्त या हालात बुरे होते हैं। इस पर वह तुनककर अपनी उस पड़ोसी की बातें बताने लगता है, जिसे उसने आज तक किसी से सीधे मुंह या जरा सी मुलायमियत से बात करते नहीं देखा। मैं उसे समझाता हूं कि इसके पीछे उस पड़ोसी के वक्त का मुंह शायद हमेशा टेढ़ा रहता होगा या उसके हालात इतने कठोर होते होंगे। लेकिन वह नहीं माना। एक दिन वह मुझे अपने घर ले गया और अपनी उस पड़ोसन की निगरानी पर बैठा दिया। मैंने देखा कि उसकी पड़ोसन का मुंह कामवाली से लेकर मां-भाई के साथ भी टेढ़ा ही था। थी तो वह ठीक-ठाक घर की। देखने में गदराई शकरकंदी सी, लेकिन शकरकंदी जैसी अनाकर्षक तो नहीं थी। उसकी मां की आवाज तनिक तेज तो थी, लेकिन उसमें भी एक दिल्ली वाली पंजाबी शाइस्तगी तो थी ही।
फिर क्या वजह रही होगी कि इतनी सुंदर पड़ोसन का वक्त इस कदर टेढ़ा हो चुका था? मैंने दोस्त से पड़ोसन के बारे में कुछ पूछताछ की। वह पैंतीस पार थी, सुंदर थी। हंसे तो गोया फूल झड़ें। हालांकि मेरे दोस्त को मुझे दिखने वे फूल अब भी मेरी भूल ही लगते हैं और ज्यों ही मैं कभी भी उसकी हंसी में फूल देखता हूं, झट से वह हमेशा यही बोलता है, 'आई ऑब्जेक्ट मीलॉर्ड!' उस वक्त भी उसने यही जारी रखा। फूल दर फूल गिरते ऑब्जेक्शन से जब मैं परेशान हो गया तो मैंने दोस्त से पूछा, 'शादी हो गई है इसकी?' दोस्त बोला, 'नहीं हुई।' अब समस्या का एक सिरा तो मेरी गिरफ्त में था। इस सिरे पर अपनी गिरफ्त मजबूत करने के लिए मैंने फिर पूछा, 'कोई ब्वॉयफ्रेंड? किसी इश्क की कोई कहानी? या सिरे न चढ़ पाई किसी मोहब्बत की कोई दास्तां?' दोस्त बोला, 'पांच साल तो हो गए मुझे इस इलाके में रहते हुए, अभी तक तो ऐसी कोई चीज दिखी नहीं।'
फिर मैंने पूछा, 'क्या वह निपट अकेली है?' दोस्त ने जवाब दिया, 'लगता तो ऐसा ही है, जभी तो जब भी खिड़की पर आती है, खाती हुई आती है या खाते-खाते वापस चली जाती है।' इस जवाब पर मैं भड़क गया। मैंने कहा, 'खाने का अकेलेपन से क्या रिश्ता?' अरस्तू से सुकरात की देह में विचरते हुए दोस्त बोला, 'अकेला आदमी अक्सर किसी न किसी छोर पर ही रहता है। इस तरफ, या उस तरफ। उसके मन में बीच का रास्ता कहां होता है? फिर उसकी कोई ऐसी मजबूरी भी तो नहीं होती कि वह बीच का रास्ता अख्तियार करे ही करे।' उसके यह कहते ही मुझे याद आया कि मेरे दो मालिकों (जिनके यहां मैं कभी नौकरी करता था) ने कहा था कि साथ बहुत जरूरी होता है। एक बार जब मैं निपट अकेली महिलाओं से रूबरू था तो वहां भी मुझे ऐसी ही झल्लाहट दिखी थी। मैंने दोस्त से कहा, 'उसे समझाओ, अकेली न रहे।' अब तो दोस्त बिदक गया, बोला, 'अकेले के गले में समझाइश की घंटी बांधने की हिम्मत तुममें हो तो हो, मुझमें नहीं है।'