Saturday, February 15, 2020

डाटा से प्यार, डाटा से सेक्स और डाटा से बच्चे!

मुझे वो टिंडर पर मिली थी, या मैं उसे टिंडर पर मिला, यह तो ठीक से याद नहीं, लेकिन मैच हो गया था। झारखंड की थी, अनारक्षित वर्ग की और साढ़े तीन शादियां कर चुकी थी। साढ़े तीन यूं कि आखिरी में बात मंगनी के बाद टूट गई थी, लेकिन मिलना-मिलाना हो चुका था। हमारी बातें आगे बढ़ने लगीं तो पहले तो उसने धीमे से मुझे यह बताया कि उसके पापा मोदी जी के खिलाफ एक बात नहीं सुनते और अगर कोई कह दे तो उसको ऐसी-ऐसी सुनाते हैं कि पानी पनाह मांगे। मैंने उससे कहा, ‘तो क्या हुआ। मेरे घर में भी कुछ बीजेपी वाले हैं, कुछ कांग्रेस वाले हैं, सपा-बसपा वाले भी हैं और खुद मैं कम्यूनिस्ट हूं।’ तो वह बोली कि उसके यहां भी कुछ यही हाल है, उसका भाई कांग्रेसी है, भाभी को आम आदमी पार्टी अच्छी लगती है और मां इधर-उधर डोलती रहती हैं, और जो भी जोर से बोल दे, उसी की तरफ हो जाती हैं। मैंने उससे पूछा, ‘और तुम? तुम क्या हो’? वह बोली, ‘मैं तो वर्कोहलिक हूं। काम पसंद करती हूं। जो भी काम करता है, उसे पसंद करती हूं।’

यह सुनकर मेरे मन में लड्डू फूटा। आज के जमाने में जब लोग काम से ज्यादा नाम पसंद करते हों, ऐसे लोग मिलने मुश्किल होते हैं। कुछ दिन तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। फिर उसने धीमे-धीमे स्कूलों के बारे में फेक इन्फॉरमेशन मेरी ओर पुश करनी शुरू की। जैसे पहली तो यही कि अब देखो, सारे स्कूलों में पढ़ाई हो रही है। सारे टीचर्स स्कूलों में वक्त पर पहुंच रहे हैं और क्लासेस ले रहे हैं। लगातार आती इन फर्जी खबरों से जब मैं पक गया तो एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘आखिरी बार तुमने किस स्कूल का दौरा किया था?’ कहने लगी, ‘दौरा तो नहीं किया था, लेकिन उसका एक रिश्तेदार मध्य प्रदेश के स्कूल में पढ़ाता है, वही हमेशा सरकार से इस बात को लेकर हमेशा परेशान रहता है कि टाइम पर स्कूल पहुंचना है।’ मैंने उससे पूछा, ‘उसकी बीएलओ में ड्यूटी लगती है?’ वह बोली, ‘ये तो न पूछो, रोज ही जाने कहां कहां ड्यूटी लगती रहती है।’ मैंने फिर पूछा, ‘फिर वह स्कूल कब जाता है‌?’ इस पर वह थोड़ी नाराज हो गई और बोली, ये सब फालतू की बात है, वक्त पर तो स्कूल आना ही पड़ेगा।

फिर कुछ दिन बाद वह मुझसे सरकारी दफ्तरों की बेहतरी की बात बताने लगी। वहां भी आने-जाने के वक्त की पाबंदी की बात। मैंने पूछा, ‘अधिकारियों के दफ्तर वक्त पर आने जाने से क्या सारे काम वक्त पर होने लगे?’ वह बोली, ‘और क्या।’ मैंने पूछा, तुम अपनी जीएसटी कैसे फाइल करती हो तो बोली कि उसने इस काम के लिए एजेंट कर रखा है। मैंने पूछा कि अगर अधिकारी या सरकारी कर्मचारी अपने काम के इतने ही पाबंद हैं तो बीच में दलाल क्यों लगाया? क्या दलाल पूरा काम ईमानदारी से कराता है? छूटते ही वह बोली, ‘तुम मोदी विरोधी हो।’ पहले तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि मैं इस गलीच सिस्टम का विरोधी हूं, लेकिन वो तो समझने का नाम ही न ले। फिर मैंने उससे पूछा, ‘तुम मोदी समर्थक हो?’ इस बार वह खुलकर बोली, ‘हां। और मोदी जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।’ मैंने पूछा, ‘क्या अच्छा काम कर रहे हैं?’ बोली, ‘नोटबंदी करके काले धन की कमर तोड़ दी।’ मैंने कहा, ‘लेकिन सारा पैसा तो रिजर्व बैंक वापस आ गया।’ इस पर वह बोली, ‘इतना अंधा विरोध तो न करो।’ मैंने कहा, ‘ये मैं नहीं, रिजर्व बैंक का डाटा कह रहा है। ’तो कहती है, ‘जाओ, उसी डाटा से प्यार करो, उसी से सेक्स करो और उसी से बच्चे पैदा करना।’

Friday, January 3, 2020

सबसे मीठी तो बेहद गुस्सैल भी है उर्दू: संजीव सराफ

उर्दू पर दिल्ली में होने वाला सालाना जलसा जश्न-ए-रेख्ता पिछले दिनों भारी भीड़ के साथ संपन्न हुआ। एक भाषा को लेकर इतने सारे लोगों की मोहब्बत देखकर एकबारगी किसी को भी ताज्जुब हो सकता है। उर्दू की रगें झनझनाने का श्रेय संजीव सराफ को जाता है। उर्दू की मशहूर वेबसाइट रेख्ता डॉट ओआरजी इन्हीं की है और संजीव खुद भी उर्दू के जुनूनी पाठक हैं। पैदाइश नागपुर की है और पढ़ाई-लिखाई मुंबई, ग्वालियर और आईआईटी खड़गपुर की। फैमिली बिजनेस के बाद खुद का बिजनेस किया। पांच-छह मुल्कों में प्लांट्स हैं। सात साल पहले अपने जुनून के लिए सारे काम-धंधे से अलग हो गए। जुनून थी उर्दू, जिसकी महक पिछले दिनों दिल्ली सहित दुनिया भर में फिर से फैली। मैंने संजीव सराफ से बात की। पढ़िये प्रमुख अंश :

वेबसाइट रेख्ता की शुरूआत के बारे में बताएं?
अपने रोज-रोज के काम से उकता गया था। शांति मिल ही नहीं रही थी। शौक कहिए या अपनी रूह के लिए कहिए, मैंने उर्दू में शायरी और दूसरी चीजें पढ़नी-लिखनी शुरू कीं। तब लगा कि मुझ जैसे करोड़ों होंगे जो उर्दू पढ़ना चाहते हैं पर एक्सेस नहीं कर सकते। इसीलिए रेख्ता शुरू की। शुरू में लगभग पचास-एक शायरों के कलाम देवनागरी और रोमन में पेश किए। पर साल भर में उसमें पर लग गए। आज उसमें साढ़े चार हजार शायरों के कलाम हैं, चालीस हजार गजलें हैं, आठ हजार नगमे हैं। ऑडियो-वीडियो, डिक्शनरी के अलावा और भी बहुत कुछ है।

आपने नायाब किताबों को डिजिटली सेफ करने का भी काम किया है। इसके बारे में बताएं।
हम वेबसाइट के लिए कलाम खोज रहे थे, लेकिन उनकी अवेलिबिलिटी नहीं थी। कुछ किताबें लाइब्रेरी में थीं, कुछ लोगों के पर्सनल कलेक्शन में। मेरा मानना था कि धूल, दीमक, पानी या आग में ये सब बरबाद हो जाएंगी। तो हमने बड़े-छोटे पैमाने पर किताबों को स्कैन करके डिजिटली प्रिजर्व करना शुरू किया। फिर देखा कि किताबों की तादाद बहुत ज्यादा थी। तब हमारे पास सिर्फ एक मशीन थी। अब 17 शहरों में हमारी तीस मशीनें लगी हैं। अब तक हमने एक लाख किताबें डिजिटली प्रिजर्व की हैं।

ऐसी कितनी किताबें रहीं जो लगभग खत्म हो चुकी थीं, जिनकी दूसरी कॉपियां नहीं थीं? उनके बारे में बताइए।
ये कहना तो बहुत मुश्किल है। किताबें कहां-कहां हैं, ये किसी को अंदाजा नहीं है। जखीरा इतना बड़ा है, कि कहना मुश्किल है कि कितनी छपीं और कितनी बची हुई हैं? लेकिन नायाब किताबें तो बहुत हैं। सन 1700 से 1800 में छपी किताबें हैं। सन 1860 के बाद मुंशी नवल किशोर ने काफी किताबें छापी थीं, उसमें से भी काफी हैं।

पिछले दिनों दिल्ली में हुए जश्न-ए-रेख्ता में तकरीबन दो लाख लोग आए। यह दिल्ली का सबसे बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम हो चुका है। लेकिन बजरिए रेख्ता वेबसाइट, आप इस जुबान का ज्यादा बड़ा फैलाव देख पा रहे हैं। इसके बारे में बताइए।
ये तो जबान का कमाल है साहब, हम तो सिर्फ अरेंजमेंट करते हैं। इतनी मीठी जुबान दुनिया में कोई है ही नहीं। इसके जरिए ढेरों आर्ट फॉर्म्स बने हैं। गजल सिंगिंग, सूफी सिंगिंग, कव्वाली हो या ड्रामा या दास्तानगोई, इतने आर्ट फॉर्म्स किसी और जुबान में जल्दी नहीं मिलते। दुनिया के डेढ़-पौने दो सौ मुल्कों से रेख्ता वेबसाइट के दो करोड़ यूनीक यूजर्स हैं। जहां-जहां हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग बसे हैं, उनको रेख्ता के अलावा और कहीं भी इतना कंटेंट नहीं मिलता। 40 हजार लोगों ने तो उर्दू सीखने के लिए हमारी वेबसाइट जॉइन की है।

उर्दू क्या सिर्फ शायरी की जुबान है? शेर-ओ-शायरी के अलावा उर्दू को आप कहां देखते हैं?
ये गलत इलजाम है। शायरी की भाषा तो है ही, लेकिन इतनी खूबसूरत जुबान है कि इसमें आप कोई भी गुफ्तगू करें, लगता है कि शायरी कर रहे हैं। ये इजहार का जरिया है। हमारे इंडिपेंडेंट मूवमेंट के पहले से ही इंकलाबी शायरी हुई है। इंकलाब-जिंदाबाद हसरत मोहानी ने लिखा। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है, बिस्मिल अजीमाबादी ने लिखा। शायरी हर जगह इस्तेमाल हुई है। ये बोलचाल जुबान थी। ब्रिटिश ने थोड़ा पर्सनलाइज करके इसे मुसलमानों के लिए कर दिया और थोड़ा संस्कृटाइज करके हिंदुओं के लिए। फिर लिट्रेचर और बोलचाल की जुबान अलग भी होती है। जितना तंज-ओ-मजाह उर्दू में है, मेरे ख्याल से शायद अंग्रेजी के अलावा कहीं नहीं है। सोशल कॉन्टेस्ट में भी खूब लिखा गया है। मंटो की शॉर्ट स्टोरीज हों या इस्मत चुगताई की हों! ऑटोबायोग्राफीज हैं। वैसे ये बेहद गुस्सैल जुबान है, लेकिन ज्यादातर लोग शायरी या नगमे सुनते हैं तो उनके दिमाग में इसका इंप्रेशन वैसा ही है।

शायरी का पाठकों की उम्र से कुछ रिश्ता है? लोग किन शायरों को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं?
लोगों की पसंद होती है। पहले कहते थे कि जब तक कॉलेज में हो, साहिर लुधियानवी को पढ़ो, और बाद में भूल जाओ। साहिर को यों कि वो थोड़े रिवोल्यूशनरी प्रोग्रेसिव मूवमेंट के थे, थोड़ा इश्क भी किया था। लेकिन मैं मानता हूं कि उसी उम्र में रीडर को गालिब भी पसंद आएंगे और वह अर्थ भी अलग लेगा। वही शेर वह बाद में पढ़ेगा तो दूसरा ही मतलब समझ में आएगा। बात कैफियत की है जो बदलती रहती है और उसी हिसाब से अर्थ और शायर भी।

आप के पास उर्दू को देखने की तकनीकी नजर है। आप इस पर लगातार काम भी कर रहे हैं। इस नजर से बताइये कि उर्दू आज से दस साल पहले कहां थी, अब कहां है और आज से दस साल बाद इसे आप कहां देख रहे हैं?
जब हमने शुरू किया था, तब सुनते थे कि उर्दू जुबान पस्त है, मर रही है या कोमा में आ गई है, वगैरह-वगैरह। लेकिन रेख्ता की सक्सेस के बाद अब आप देखेंगे कि इसी तर्ज पर सैकड़ों जश्न होने लगे हैं। सबका नाम जश्न से ही शुरू हो रहा है। दरअसल पब्लिक कॉन्शस हुई और जबरदस्त चेंज आया है। अब ये जुबान मेनस्ट्रीम में आ गई है। अब आपको ये सुनने में नहीं आएगा कि उर्दू मर रही है।

अगर हिंदी से उर्दू निकाल दें तो क्या बचेगा?
सुबह-शाम मुंह से नहीं निकलेगा। प्रात:काल या संध्याकाल यूज करेंगे। या प्यार इश्क मोहब्बत न बोलकर प्रेम या फिर ऐसा ही कोई लफ्ज यूज करेंगे। हिंदी सिनेमा से निकाल के बताइए उर्दू, फिर क्या बचेगा? दूध में से चीनी निकाल दीजिए, फिर क्या बचा? कर लीजिए कोशिश। हमारी बोलचाल हिंदुस्तानी है। उर्दू-हिंदी का ग्रामर एक है। जो निकालना चाहें, निकाल दें, कर लें कोशिश।   

Friday, December 20, 2019

एनआरसी करने के लिए सीएए लाए हैं: कन्नन गोपीनाथन

अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर आईएएस ऑफिसर कन्नन गोपीनाथन ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद से वे देश भर में घूम-घूमकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अपनी बात कहते रहे। इसी बीच नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) आ गया। केंद्र के कई नेताओं ने इसे एनआरसी के साथ जोड़कर लागू करने की बात कही। अब कन्नन देश भर में घूम-घूमकर सीएए और एनआरसी पर जागरूकता सभाएं कर रहे हैं। मैंने उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

अपने बारे में बताइए।
मैं 12वीं तक केरल में पढ़ा। कोट्टयम का रहने वाला हूं। इसके बाद मैंने रांची के बिरला इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की। इसके बाद मैं नोएडा आ गया और नौकरी करने लगा। नोएडा में रहने के दौरान मैं सेक्टर 16 की झुग्गी में बच्चों को पढ़ाता था। कुछ दिन बाद में नोएडा के ही अट्टा मार्केट में भी बच्चों को पढ़ाने लगा। वहां का हाल देखकर समझ में आया कि सिस्टम के अंदर रहकर काम करना होगा- तब कुछ सही होगा, इसलिए मैंने आईएएस का एग्जाम पास किया। 2012 बैच में आईएएस बना, फिर मिजोरम में डीएम रहा, दादरा-नगर हवेली में भी कलेक्टर के साथ-साथ वहां के कई विभागों में कमिश्नर रहा। वहां डिस्कॉम कॉरपोरेशन था जो लगातार लॉस में जा रहा था, उसे एक-डेढ़ साल में प्रॉफिट में ले आया। जम्मू-कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 हटाया गया तो वहां पर प्रशासन ने लोगों की आवाज दबाई। अब भी दबा ही रही है। समस्या 370 हटाने या लगाने से नहीं, बल्कि आवाज दबाने से उपजी। फिर मुझे लगा कि ये सही बात नहीं है और कम से कम मैं लोगों की आवाज दबाने के लिए तो आईएएस में नहीं आया। इसलिए मैंने रिजाइन कर दिया। हालांकि सरकार ने अभी तक मेरा इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है।

इस्तीफा देने के बाद आप क्या कर रहे हैं?
रिजाइन करने के बाद मैंने ठीक से तय नहीं किया था कि किस ओर जाना था। इसी बीच कुछ जगहों पर टॉक के लिए बुलाया। इसी सिलसिले में एक बार चेन्नई गया। वहां एक टॉक में मैं 'बोलने की आजादी' विषय पर बोल रहा था कि बीच में एक लड़की ने मुझे टोक दिया। नॉर्थ ईस्ट की उस 23 साल की लड़की का कहना था कि बोलने की आजादी उसकी समझ से बाहर है क्योंकि अभी तो उसे यही डर है कि वो इस देश में रह पाएगी या नहीं। उसका दादा आईएमए में था और वो कोई सन 1951 का डॉक्यूमेंट खोज रही थी जो उसे मिल नहीं रहा था। उस शो में खड़ी होकर वह रो रही थी और मैं निरुत्तर था। मैंने खुद से यही पूछा तो पता चला कि पेपर्स तो मेरे पास भी पूरे नहीं। बीस साल से ज्यादा पुराने कागज तो मेरे पास भी नहीं है। फिर मैं मुंबई आया और दोस्तों से इस पर चर्चा की, मामले को ठीक से समझा। तब से मैं लोगों को बता रहा हूं कि कैब और एनआरसी किस तरह से हम सभी लोगों के लिए नुकसानदेह हैं।

अब तक आप कहां कहां जा चुके हैं और आगे का क्या प्रोग्राम है?
आगे का तो मैंने नहीं सोचा, लेकिन बिहार के कई जिलों में जा चुका हूं। सीएए और एनआरसी का खौफ देखना हो तो बिहार का दौरा करिए। वहां इस वक्त आधार कार्ड सेंटरों में वही नोटबंदी वाली भीड़ दिख रही है। रात के दो-दो बजे तक आधार कार्ड सेंटरों में लाइन लगी है। लोग अपना आधार कार्ड दुरुस्त करा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई जिलों में मैं लोगों को इसके नुकसान बता चुका हूं। महाराष्ट्र और साउथ में तो लगातार बोल ही रहा हूं। इसके बारे में अभी बहुत जागरुकता फैलानी होगी।

लोगों की क्या प्रतिक्रिया है?
लोग बहुत डरे हुए हैं। सबसे ज्यादा तो गरीब मुसलमान और दलित-आदिवासी डरे हुए हैं। वजह यह कि भारत में किसी के भी कागजात या तो पूरे नहीं हैं और अगर पूरे हैं भी तो उनमें कहीं न कहीं कोई गड़बड़ी छूटी हुई है। यही वजह है कि बिहार में आधी-आधी रात तक लाइनें लगी हैं। लोगों को लगता है कि आधार करेक्शन से काम हो जाएगा। इससे पता चलता है कि लोगों में कितना ज्यादा डर का माहौल है। वॉट्सएप के मुस्लिम ग्रुप में इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा ट्रेंड में है- डॉक्यमेंट्स कैसे पूरे करें? उनको पता है कि कागजात नहीं होंगे तो ये सीधे डिटेंशन सेंटर भेजेंगे। सबने देखा कि पिछले दिनों कैसे केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को डिटेंशन सेंटर बनाने का लेटर भेजा है।

सीएए और एनआरसी को अलग-अलग देखें या एक साथ?
सीएए इसलिए आया क्योंकि एनआरसी करना चाहते हैं। वरना सीएए नहीं आता। असम में एनआरसी हुआ तो सबसे ज्यादा हिंदू ही डिटेंशन सेंटर पहुंच गए। कागज तो हिंदुओं के पास भी नहीं हैं। ये चीज राजनीतिक रूप से इनके खिलाफ जाती है। हालांकि सरकार उनको वापस लेने के लिए वहां नोटिफिकेशन जारी कर रही थी, लेकिन अब वह इसके लिए कैब ले आई है। एनआरसी और सीएए- दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, सीएए का अकेले कोई खास मतलब नहीं है।

किसे किसे यह प्रभावित कर रहा है और कैसे?
अगर आपके पास करेक्ट डॉक्यूमेंट्स नहीं है तो यह आपको भी प्रभावित करेगा। मुझे लगता है कि सरकार नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के जरिए इसकी शुरुआत करेगी। सरकारी आदमी घर आएगा और हमारे कागजात चेक करेगा। वहां पर अगर कोई कमी हुई तो असम की ही तरह हमारे नाम के आगे संदिग्ध का निशान लग जाएगा और फिर हमें यह साबित करना होगा कि हम यहां के नागरिक हैं या नहीं हैं। पहले यह सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे, लेकिन अब यह उल्टा हो गया है। अब हम सबको साबित करना होगा कि हम भारत के नागरिक हैं या नहीं। कागजात तो बहुत कम लोगों के पूरे हैं, ऐसे में सीन साफ है। जो सबसे गरीब हैं, वो इसे भुगतेंगे। जो बाहर काम कर रहे हैं, यानी जितने कामगार हैं, उन्हें इससे दिक्कत होगी। हर साल देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ और सूखे से प्रभावित होता है, वहां विस्थापन नियमित चलता है, वो भुगतेंगे। आदिवासियों के पास तो कोई कागज ही नहीं होता।

डॉक्यूमेंट्स बनवाने में भ्रष्टाचार सबसे आम शिकायत है। क्या इससे भ्रष्टाचार भी बढ़ सकता है?
बिलकुल। अब जिसका शासन-सत्ता में कनेक्शन नहीं है, जिनका भ्रष्टाचार से कनेक्शन नहीं है, वो इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली में ऐसे हजारों लोग आपको मिल जाएंगे जो सड़क पर रहते हैं, वो कहां जाएंगे। फिर जनता को तो कैसे भी सर्वाइव करना है, वह कैसे भी करके कोशिश करेगी।

आईएएस लॉबी में इसे लेकर क्या कुछ प्रतिक्रिया है?
मुझे आईएएस लॉबी इसे लेकर क्या कर रही है, ये नहीं पता। हम सब इंडीविजुअल्स हैं। ऐसे तो कई सारे हैं जिन्हें लगता है कि इस मुद्दे को अभी छोड़ देना चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके लिए कोई लॉबी है। अधिकतर तो यही सोचते हैं कि मनपसंद पोस्ट मिल जाए या मनपसंद जगह ट्रांसफर हो जाए। मुझे तो लगता है कि जिस संविधान पर हाथ रखकर इन्होंने शपथ ली है, आधे भी उसका अर्थ ठीक से नहीं जानते होंगे।

अब तो बिल पास हो गया तो अब क्या करें?
बिल तो शुरुआत है। जब संसद फेल होती है तो जनता शुरू होती है। हमें संविधान ने यह अधिकार दिया है कि हम शांतिपूर्वक सभा कर सकते हैं और प्रदर्शन कर सकते हैं। हम यह अधिकार भूल चुके हैं। इसे हमें इस्तेमाल करना होगा, अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे? सरकार हमारी नागरिकता पर सवाल उठा रही है तो हम सरकार ने अब नहीं पूछेंगे तो कब पूछेंगे? नोटबंदी में हमारा पैसा तीन महीने बाद वापस किया, ऐसे ही हमारी नागरिकता ले ली जा रही है जो कब वापस होगी, नहीं पता। 

Saturday, September 28, 2019

मुसलमां हैं यूं बस खतावार हैं हम

व्हाटसएप्प पर एक बुजुर्ग इस लिखाई को सुनाते दिखे। पता किया तो सन 2017 में इनकी पहली रिकॉर्डिंग मिली, लेकिन नाम नहीं मिला। कुछ और पता किया तो पता चला कि शायद राहत इंदौरी साहब ने इसे लिखा हो सकता है, लेकिन कहीं भी इसकी स्क्रिप्ट नहीं मिली, इसलिए यह भी कन्फर्म नहीं कि इसे राहत इंदौरी ने ही लिखा है। बहरहाल, जिसने भी लिखा है, कमाल का लिखा है, कहीं गलती हो तो पहले से ही माफी दरकार है। आप भी मुलायजा फरमाएं, जब तक मोदी जी हैं, तब तक मौजूं है- 

हुकूमत के दिल से वफादार हैं हम,
इशारों पे चलने को तैयार हैं,
मुसीबत में फिर भी गिरफ्तार हैं हम,
मुसलमां हैं यूं बस खतावार हैं हम।

सजा मिल रही है अदावत से पहले,
समझते हैं बागी बगावत से पहले,
मुसलमां चीन और जापान में हैं,
यही कौम रूस और यूनान में है,
यही लोग यूरोप और सूडान में हैं,
जहां भी हैं ये अमन ओ अमान में हैं,
हर एक मुल्क में तो वफादार हैं हम,
मगर हिंद में सिर्फ गद्दार हैं हम।

हमें रोज धमकी भी दी जा रही है,
घरों में तलाशी भी ली जा रही है,
बिला वजह सख्ती भी की जा रही है,
अदालत यहां से उठी जा रही है।

जो मासूम थे वो तो मुजरिम बने हैं,
जो बदफितना थे आज हाकिम बने हैं,
कौन सिर में हमें ये रहने न देंगे,
हमें दर्द अपना ये कहने न देंगे,
गम ओ रंज सहिये तो सहने न देंगे,
सितम है कि आंसू भी बहने न देंगे।

जुंबा बंदियां हैं नजरबंदियां हैं,
हमारे लिए ही सारी पाबंदियां हैं,
अब उर्दू जुबां भी मिटानी पड़ेगी,
कि बच्चों को हिंदी पढ़ानी पड़ेगी,
यहां सबको चंदी रखानी पड़ेगी,
रहोगे तो शुद्धि करानी पड़ेगी।

वफादार होने का मेयार ये है,
यकीं फिर भी आ जाए दुश्वार ये है,
तकाजा है अपनी जमाअत को छोड़ो,
मुसलमानों की तुम कयादत को छोड़ो,
नहीं तो चले जाओ भारत को छोड़ो,
यही नजरिया है यही जेहनियत है,
इसी का यहां नाम जम्हूरियत है।

गिराते हो तुम मस्जिदों को गिराओ,
मिटाते हो तुम मकबरों को मिटाओ,
बहाते हो अगर खूं ये नाहक बहाओ,
मगर ये समझकर जरा जुल्म ढहाओ,
जालिम का लबरेज जब जाम होगा,
तो हिटलर और टीटो सा अंजाम होगा।

हमें मुल्क से है भगाने की ख्वाहिश,
हमें दहर से है मिटाने की ख्वाहिश,
तो सुन लें जिन्हें है मिटाने की ख्वाहिश,
तो हमको भी है सर कटाने की ख्वाहिश।

कटेगा सर तो ये मजमून होगा,
हिमालय से शिलांग तक खून होगा,
बिहार और यूपी में हम कुछ न बोले,
हुआ जुल्म देहली में हम कुछ न बोले,
किया कत्ल गाड़ी में हम कुछ न बोले,
घरों में घुसाए तो हम कुछ न बोले।

जालिम अगर यूं ही होते रहेंगे,
तो क्या अहले ईमां सोते रहेंगे?
अलग होके बरतानिया देखता है,
हरएक कौम का पेशवा देखता है,
जमाना हरेक माजरा देखता है,
कोई देखे न देखे खुदा देखता है,
करेगा जो जुल्म यूं आजाद होकर,
खुद ही मिट जाएगा वो बरबाद होकर।

Saturday, September 21, 2019

अमीनाबाद का ऐतिहासिक इंडियन बुक डिपो

हिमांशु वाजपेयी। माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पासआउट। जबान ऐसी कि पुरानी दिल्ली की भारी भरकम तमीजदार उर्दू बोलने वाली खवातीनें भी मुंह में तीन बीड़े पान दबा लें, एक दाहिने, एक बाएं तो एक बीच में- ताकि न अलिफ से लेकर जेड तक कुछ भी न निकल पाए। होता तो अलिफ से काफ तक है लेकिन यहां पर जेड पाकिस्तान वाले मरहूम उस्ताद मोइन अख्तर साहब की जबान से लिया गया है जिसे शब्द दिए थे मशहूर सहाफी अनवर मकसूद साहब ने। इनकी मिठास भरी जबान का मुलायजा फरमाएं...

लखनऊ शहर के सबसे सबसे ख़ास मक़ामात में से एक ये है। हज़ारों किताबों से रौशन एक सादा दयार । 1933 में शुरू हुआ अमीनाबाद का इंडियन बुक डिपो। पढ़ने लिखने में दिलचस्पी रखने वाले बेश्तर लोगों ने यहां की ज़ियारत ज़रूर की होगी। जिन्होंने नहीं की उन्हें ज़रूर करनी चाहिए। बग़ैर इसके उनकी तालीम-ओ-तरबियत अधूरी ही रहेगी। यहां आकर लगता है कि ये जगह आसमान की गर्दिश से आज़ाद है। वक़्त इस पर सितम नहीं ढाता। लगातार नए होते इस शहर में अभी कुछ जगहों पर पुरानेपन का हुस्न महफूज़ है। इन्डियन बुक डिपो उन्ही में से एक है। इसीलिए जब मुझसे कोई पूछता है कि लखनऊ में देखने लायक़ जगहें कौन सी हैं ? तो मैं इमामबाड़े, रेजीडेंसी, चौक, हजरतगंज के साथ इंडियन बुक डिपो का नाम भी ज़रूर लेता हूं।
लखनऊ में हिंदी किताबों के मामले में ये जगह अपना सानी नहीं रखती। यूनिवर्सल कपूरथला भी मेरी पसंदीदा जगह है, मगर इंडियन बुक डिपो अब शहर की धरोहर और शान बन चुका है। मैं हमेशा कहता हूं कि इसी शहर के राम आडवाणी साहब और उनकी किताबों की दुकान पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ख़ूब ख़ूब लिखा है। आडवाणी साहब का ख़ुलूस, प्रतिष्ठा और लियाक़त का अपनी जगह पूरा एहतराम है, मगर उन पर मीडिया के मेहरबां होने की दो बड़ी वजह और रहीं। पहली- उनकी दुकान हजरतगंज में थी, अमीनाबाद चौक या नक्खास में नहीं। दूसरी- उनकी दुकान अंग्रेज़ी किताबों की दुकान थी। अगर सच्चाई और इंसाफ के साथ बात लिखी जाए तो शहर की एक भी किताब की दुकान इंडियन बुक डिपो के आस-पास नहीं होगी। मगर मुझे इस अद्भुत जगह पर लोग उस तरह नहीं लिखते।
1933 में भाषा एवम साहित्य के विलक्षण विद्वान ओंकार सहाय ने इसकी स्थापना की और इसे शुरू से ही एक वक़ार अता किया। हिंदी साहित्य जगत में लखनऊ को जितना अमृतलाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा आदि से पहचाना गया उतना ही इंडियन बुक डिपो से भी। शुरू होने के दौर से बाद तक का शायद ही कोई बड़ा हिंदी लेखक हो जो लखनऊ से गुज़रा हो और यहां न आया हो। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तो इस जगह की स्थायी ज़ीनत थे। सरस्वती के यशस्वी संपादक पद्मभूषण श्रीनारायण चतुर्वेदी जी इंडियन बुक डिपो के सबसे बड़े मुरीदों में थे। नगर जी, यशपाल, भगवती बाबू, मुद्रा राक्षस, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, जैनेन्द्र, धर्मवीर भारती, आदि तमाम नाम हैं जो यहां नियम से आते रहे।
ओंकार सहाय जी को जितना उबूर भाषा एवं साहित्य पर था, वैसा ही प्रिंटिंग, पब्लिशिंग और किताबों के बिज़नेस पर भी। उनके बाद इस दुकान को उनके सुपुत्र सुशील जी ने लंबे वक़्त तक कामयाबी के साथ संभाला। किताबों और इसके व्यवसाय से जुड़ी सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारियों के भंडार थे सुशील जी। लखनऊ में हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उनकी अपनी मुस्तनद राय थी। पढ़ने लिखने में एक मेयार और तहज़ीब के क़ायल वो हमेशा रहे और उनके यहां आने वाले लोगों को भी उनके ज़रिए ये मेयार अता होता रहा।
सुशील जी के बाद अब काफ़ी सालों से ये जगह चित्रलेखा आंटी संभाल रही हैं। चित्रलेखा आंटी पर तो एक संस्मरण कभी मैं अलग से विस्तार में लिखूंगा। 70 साल की उम्र में भी इतनी ऐक्टिव, इतनी अनुशासित, इतनी मेहनती, इतनी रौबीली, इतनी गरिमामयी, इतनी सुंदर, इतनी ज़हीन, इतनी पढ़ी लिखी, इतनी आत्मीय, इतनी साफगो... उनके जैसी महिलाएं हमने ज़िन्दगी में बहुत कम देखी हैं। इतनी बड़ी जगह कई साल से चित्रलेखा आंटी अकेले दम पर पूरे जाहो जलाल के साथ संभाल रही हैं। बल्कि अब इस जगह की सारी ख़ूबसूरती, सारा नूर सारी ज़ीनत उन्ही से है।
हमारे यहां लखनऊ में अख़बार वालों को कला-संस्कृति की दुनिया मे फ़र्ज़ी हीरो गढ़ने का रोग है। दो दिन कोई शख़्स किसी 'इवेंट' में नज़र आया तो उसे संस्कृतिकर्मी और तीन इवेंट किसी ने करवा दिए तो वो लखनवी तहज़ीब का उद्धारक बना दिया जाता है। ऐसे में   असली लोगों तक पहुंच पाने की तौफ़ीक़ ही किसे है। इस पर स्टोरी कौन करेगा कि 7000 किताबों वाले इस विशाल प्रतिष्ठान को चित्रलेखा जी किस कमाल के साथ संभालती आयी हैं और संभाल रही हैं। ना जाने कितनी पीढ़ियों को उन्होंने पढ़ने लिखने का शऊर दिया है। मेरे जैसे कितने बच्चों को उन्होंने कितना ज्ञान अता किया है। दुकान में आने वाले हर इंसान से, भले भी वो एक भी किताब न ख़रीदे या 1000 किताब ख़रीद ले, चित्रलेखा आंटी बराबरी के साथ बात करती हैं। किताबों के बारे में ग्राहक से बात करना, उसके कंटेंट का विश्लेषण करना, उसकी रुचि समझना, उसे उसके मिज़ाज, ज़रूरत और बजट के हिसाब से किताब उपलब्ध करवाना ये चित्रलेखा आंटी की अपनी पहचान है।
ऐसा ही हर जगह होना चाहिये मगर ऐसा होता कहीं नहीं है। अब तो किताब की दुकानों में भी मॉल कल्चर आ गया है। किताब उठाओ, बिल कटाओ और चलते बनो। बात करने की ज़रूरत नहीं है। बात करोगे भी किससे क्योंकि किताब की दुकान का जो मालिक है या जो किताब उठाने निकालने वाला सहयोगी है या जो काउंटर पे बैठा है, वो ख़ुद ही नहीं पढ़ता। चित्रलेखा आंटी, यूनिवर्सल कपूरथला के सुरेश पाल जी और न्यू रॉयल बुक कंपनी के फुरकान बेग साहब ज़रूर अपवाद हैं। अख़बार में काला संस्कृति कवर करने वाले इसलिए भी इंडियन बुक डिपो पर नहीं लिखते क्योंकि उन्हें स्टोरी के लिए ऐसे लोग चाहिए होते हैं जो मीडिया वालों से मरऊब होते हों, उनके स्टोरी एंगिल में अपने आपको किसी भी तरह ग़लत सही बोल कर फिट कर लें और उन्हें इंस्टेंट कोट देने के लिए उप्लब्ध रहें।
चित्रलेखा आंटी में इनमें से एक भी खूबी नहीं है, उन्हें छपास और पीआर का रोग नहीं है, वो ग़लत-बयानी नहीं करेंगी आपका एंगिल गया तेल लेने, अगर आप रिसर्च करके नहीं आएंगे तो वो आपको फौरन आईना दिखा देंगी और सबसे बड़ी चीज़ कि इडियॉटिक बातों उन्हें बर्दाश्त नहीं होंगी। यही वजह है कि इडियट्स उनके पास जाते घबराते हैं। कुछ लोग को मैंने कहते सुना कि वो डांटती बहुत हैं। मैं इन लोग से कहता हूं कि उस डांट की गहराई में उतरो वहां आत्मीयता, स्नेह और अधिकार का एक अपार ख़ज़ाना छिपा है, जो सतह से नहीं दिखने वाला। घर के बुज़ुर्गों से समझो कभी इस डांट का मर्म। कितनी एनर्जी लगती है, इस तरह हर ग्राहक से विस्तार में बात करने से, जबकि तय नहीं है कि ग्राहक किताब लेगा या नहीं मगर फिर भी चित्रलेखा जी अपनी रविश नहीं छोड़तीं।
डिस्काउंट वाली बात भी बेकार की है।  रेस्टोरेंट में 500 का खाना खाओगे 700 देके आओगे डिस्काउंट नहीं मांगोगे, 150 की फ़िल्म 50 के पॉपकॉर्न के साथ 500 की हो जाती है, वहां डिस्काउंट नहीं मांगोगे मगर किताब की दुकान में डिस्काउंट मौलिक अधिकार है। जबकि अगर किसी किताब का सस्ता एडिशन अगर उपलब्ध है तो चित्रलेखा जी कभी महँगा वाला नहीं देतीं। कभी पुराने एडिशन के दाम चिप्पी लगाकर नहीं बढ़ातीं। जो किताब पूरे हिंदुस्तान में नहीं मिलेगी वो ढूंढकर ला देती हैं, जो प्रकाशन अब बंद हो चुके या बंद होने की कगार पर हैं, उनकी भी किताबें यहां मिल जाएंगी।
आप अपनी जहानत या अध्ययन से उन्हें प्रभावित कीजिये वो बड़े स्नेह से आपको एक किताब गिफ्ट कर देंगी। फिर भी डिस्काउंट तो इज़्ज़त का सवाल है ना। पोस्ट ज़ियादा लंबी हो रही है। पर मौज़ू ही ऐसा है कि तूल लाज़िम है। कहना सिर्फ ये था कि लखनऊ वालों, इंडियन बुक डिपो की ताज़ीम करो, इस धरोहर का एहतराम करो। अगली बार जब अमीनाबाद जाइए तो यहां ज़रूर जाइए, और पत्रकार भाइयों और उनकी बहनों, यहां बहुत सी स्टोरीज़ दफ़न हैं उनको निकाल लाइए।
शुक्रिया।
- हिमांशु वाजपेयी