Thursday, November 10, 2016

नतमस्‍तक मोदक की नाजायज औलादें- 47

प्रश्‍न- दो हजार का छुट्टा है?
उत्‍तर- तुम्‍हरे पास दो हजार कहां से आया बे?
प्रश्‍न- अभी एटीएम से नि‍काले!
उत्‍तर- तुम्‍हरे पास एटीएम कहां से आया बे?
प्रश्‍न- दफ्तर से मि‍ला है!!
उत्‍तर- दफ्तर वाले तुमको घूस देते हैं?
प्रश्‍न- नहीं, तनख्‍वाह देते हैं!
उत्‍तर- चल भो** के!! तनख्‍वाह वालों के पास दो हजार नहीं रहता!!
प्रश्‍न- अब नहीं रहेगा, छुट्टा दे दीजि‍ए.
उत्‍तर- झां** ले लो हमारी!!
प्रश्‍न- वो आप रखि‍ए, छुट्टा दीजि‍ए, कि‍सी को देना है..
उत्‍तर- उसे भी वही दे देना!!
प्रश्‍न- आपकी झां*** से मुझे दवा नहीं मि‍लेगी!!
उत्‍तर- बेटा हमारा एक एक बाल दो हजार का नोट है!!
प्रश्‍न- आपने कैंप नहीं लगाया?
उत्‍तर- कि‍स चीज का बे?
प्रश्‍न- छुट्टा बांटने का?
उत्‍तर- वामपंथी समझे हो का?
प्रश्‍न- छुट्टा तो वो भी नहीं बांट रहे!
उत्‍तर- चीन से लात खाए होंगे साले!
प्रश्‍न- धुंआ हुआ तो आपने मास्‍क बांटने के कैंप लगाए!
उत्‍तर- अबे नोट धुंआ नहीं होता है बे!!
प्रश्‍न- धुंआ तो कर दि‍या ना??
उत्‍तर- क्‍या धुंआ कर दि‍या?
प्रश्‍न- पांच सौ और हजार के नोट?
उत्‍तर- वो तो काला धन था अकल के ढक्‍कन!!
प्रश्‍न- सारा काला धन था?
उत्‍तर- तो?
प्रश्‍न- सारा काला धन रुपयों में था?
उत्‍तर- ई लाल चश्‍मा उतारो!
प्रश्‍न- बताइए ना?
उत्‍तर- ना, पहि‍ले तुम ई लाल चश्‍मा उतारो!!
प्रश्‍न- मेरे चश्‍मे में कोई रंग नहीं है!
उत्‍तर- तभी तुमको काला धन नहीं दि‍खता!
प्रश्‍न- मतलब सारा काला धन रुपये में था?
उत्‍तर- नहीं गां*** साले, मेरी झां*** में था!!
प्रश्‍न- अब क्‍या होगा?
उत्‍तर- सफाई
प्रश्‍न- सफाई के बाद क्‍या होगा?
उत्‍तर- नए नोट आएंगे!
प्रश्‍न- नए नोट काले नहीं होंगे?
उत्‍तर- दि‍खाओ ससुर नया नोट
प्रश्‍न- नए नोट में गलती भी है
उत्‍तर- गलती तो तुम हो भो** के
प्रश्‍न- नए नोट में एक गलती रह गई
उत्‍तर- भगवान तुमको एकदम सही से बना के भेजे हैं?
प्रश्‍न- अब जैसा भी बनाके भेजे हैं
उत्‍तर- तुममें कोई गलती नहीं?
प्रश्‍न- मुझमें हैं, लेकि‍न मैं सही कर लेता हूं.
उत्‍तर- तो 2000 वाले में भी हो जाएगी!
प्रश्‍न- लेकि‍न नोट में कैसे?
उत्‍तर- उसकी लीला...
प्रश्‍न- उसकी कि‍सकी?
उत्‍तर- भो*** के, कि‍सका राज है बे?
प्रश्‍न- फुटकर तो दे दीजि‍ए!
उत्‍तर- रोज सुबे श्रीराममंदि‍र आरती सुना करो
प्रश्‍न- धुंए की दवा लेनी है, गला चोक है..
उत्‍तर- चोक है तो हरामी आरती सुनो!!
प्रश्‍न- मुझे बोलना पड़ता है, पूछने के लि‍ए..
उत्‍तर- तुमको बोलने को कौन बोला?
प्रश्‍न- पूछने के लि‍ए बोलना पड़ता है..
उत्‍तर- तुमको पूछने के लि‍ए कौन पूछा?
प्रश्‍न- हमारा काम है..
उत्‍तर- हम बताएं हमारा क्‍या काम है?
प्रश्‍न- फुटकर तो दे दीजि‍ए!!
उत्‍तर- हमसे भी जान लो हमारा काम!!
प्रश्‍न- बाद में, अभी दवा लेनी है..
उत्‍तर- 1950 देंगे.
प्रश्‍न- क्‍यों?
उत्‍तर- 50 रुपया नोट बदलवाई!
प्रश्‍न- ये धंधा कब शुरू कि‍ए?
उत्‍तर- हमारे यहां ऊपर से नीचे तक ध्‍यान रखा जाता है.
प्रश्‍न- 50 रुपए हर पांच सौ पर नीचे वाले को?
उत्‍तर- सरकार है हमारी, कमीशन है.
प्रश्‍न- तो ये योजना थी?
उत्‍तर- पोंटी हर क्‍वार्टर पर कमाए, हम एक ठो नोट पे भी ना कमाएं??
प्रश्‍न- नहीं, बि‍लकुल कमाइए, आपका राज है।

Tuesday, November 8, 2016

BAN ON MEDIA: बिलकुल लोमड़ी की तरह काम कर रही मोदी सरकार

हर सरकार की अपनी एक भाषा होती है। कोई बल की भाषा में विश्वास करती है तो कोई बुद्धि की। और कोई सरकार अपनी अलग ही भाषा विकसित कर लेती है। मौजूदा मोदी सरकार बल की भाषा ही जानती है और उसी में विश्वास करती है और उसी भाषा में बात करती है। देश के गृहमंत्री ने कल ही इसकी ताजा नजीर पेश की है। जब कैराना में उन्होंने 'किसने अपनी मां का दूध पिया है' जैसी भाषा का इस्तेमाल किया। इसके पहले प्रधानमंत्री 56 इंच सीने की बात कर ही चुके हैं। इस तरह के डायलाग हम अभी तक धर्मेंद्र की फिल्मों में ही सुना करते थे। अब राजनीति में बीजेपी नेताओं के मुंह से सुन रहे हैं।

सरकार का शीर्ष नेतृत्व अगर इस तरह की भाषा में बात करेगा, तो नीचे कार्यकर्ताओं और भक्तों की भाषा का स्तर क्या होगा? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यह मूलतः ताकत की भाषा है और स्टेट की ताकत मिलने के बाद यह और भी ज्यादा अहंकारी और बलशाली हो जाती है। लेकिन इस भाषा की एक खासियत है। अपने से बड़ी ताकत के सामने यह तुरंत नतमस्तक हो जाती है। एनडीटीवी मसले पर भी यही हुआ। सरकार को अपनी ताकत से बड़ी ताकत सामने उभरती दिखी। उसे लग गया कि अब उसकी छीछालेदर होनी तय है। क्योंकि पूरी प्रेस बिरादरी एकजुट है और सुप्रीम कोर्ट से कोई बड़ा कोड़ा पड़ सकता है। प्रेस क्लब में पत्रकारों की कल हुई बैठक ने तस्वीर साफ कर दी थी। चंद चमचों और भक्त पत्रकारों को छोड़कर पत्रकारों के बड़े हिस्से ने इसमें शिरकत की। खुदा न खास्ता सुप्रीम कोर्ट अगर आगे के लिए कोई दिशा निर्देश जारी कर देता तो सरकार के भविष्य के मंसूबों पर पानी फिर जाता। इसलिए उसने तत्काल अपने कदम पीछे खींच लिए और चैनेल पर एकदिनी पाबंदी के फैसले को स्थगित कर दिया।

लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि चिंता और गहरी हो जाती है। अगर सरकार इस नतीजे पर पहुंची थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचा है और उसके लिए सजा मिलनी चाहिए, तो वह इस मुद्दे पर कैसे पीछे हट सकती है? उसे अपने फैसले पर अडिग रहना चाहिए था। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कहने का मतलब है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उसके लिए महज एक ढोंग है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसी चीज है जिससे समझौता किया जा सकता है? या फिर यह सरकार के हाथ का खिलौना है जिससे कभी भी खेला जा सकता है और एनडीटीवी पर पाबंदी भी उसी खेल का हिस्सा है।

अगर सचमुच में मोदी सरकार यह मानती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा दांव पर लगी थी तो फिर वह कैसे उससे समझौता कर सकती है? लेकिन अगर बात-बात सुरक्षा के नाम पर उसका इस्तेमाल हो रहा हो, फिर तो जरूर दाल में कुछ काला है। वैसे भी जिस पार्टी का एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष 1 लाख रुपये में बिका हो, जिस पार्टी का मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष कानूनन तड़ीपार हो, जिस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर नरसंहार के दाग हों, कम से कम उसे राष्ट्रवाद की परिभाषा तय करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। जो खुद को बार-बार एक खास तबके और खास हिस्से की सरकार के तौर पेश करने से परहेज नहीं करता हो, उससे किसी निरपेक्षता की आशा भी नहीं की जा सकती है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कल का कैराना का बयान इसकी ताजी नजीर है।

लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। कहा जा सकता है कि पहले दौर की जोर-आजमाइश में सरकार को मात खानी पड़ी है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि सरकार ने पहलवानी छोड़ दी है, या फिर उसकी भाषा बदल गई है। यह सरकार बिल्कुल लोमड़ी की तरह काम करती है। उसका एजेंडा साफ है। उसे विरोध की कोई आवाज बर्दाश्त नहीं। आज नहीं तो कल वह उसको बंद करने की कोशिश करेगी। मीडिया के एक बड़े हिस्से को उसने अपने काबू में कर लिया है। बाकियों को अलग-अलग तरीके से अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रही है। यहां तक कि एनडीटीवी भी समझौते की राह पर बढ़ गया था। पी चिदंबरम के इंटरव्यू का प्रसारण नहीं करना उसी का हिस्सा था। पिछले दिनों तमाम खबरों की प्रस्तुति में भी इसकी झलक मिल रही थी।

दरअसल एनडीटीवी का मैनेजमेंट कई मामलों में फंसा है जिनको सरकार हथियार बनाकर उसकी घेरेबंदी कर रही है। आज नहीं तो कल शायद वह एनडीटीवी के खिलाफ अपने मंसूबों में सफल हो जाएगी। इसलिए प्रेस और पत्रकार बिरादरी को भविष्य में इस तरह के किसी भी खतरे के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे में किसी एनडीटीवी और संस्थान की जगह पत्रकारों को खुद अपनी ताकत पर भरोसा करना होगा। क्योंकि प्रेस की आजादी किसी संस्थान का मोहजात नहीं। यह जितना पत्रकारों से जुड़ी है उससे ज्यादा जनता से। यह हमारे और जनता के लिए खुली हवा में सांस लेने जैसा है। इसके खत्म होने का मतलब है लोकतंत्र का खात्मा।


लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 

Sunday, November 6, 2016

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं और इसी आलम में वो सड़क पर उतरकर धुंए का विरोध कर रहे हैं। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता! मैं जो जानता हूं, वो ये कि मेरे अंदर भरा धुंआ बहुत जल्द मुझे सड़क पर ला पटकेगा। धुंआ नहीं पटकेगा तो मैं खुद को ही सड़क पर पटक दूंगा।

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

ये दिल्ली और मेरा धुंआकाल है

दोपहर दो बजे की धुंआ दिल्ली
दिल्ली में बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरफ देखता हूं, धुंआ ही धुंआ दिखता है। मेरे अंदर भी बहुत धुंआ भर गया है। जिस तरह से दिल्ली में बताते हैं कि कहीं बाहर से आकर धुंआ भरा है, पता नहीं कैसे उसी तरह से मेरे में भी धुंआ कहीं बाहर से ही आकर भरा है। आग मेरे अंदर नहीं है। थी, लेकिन बुझा ली। अब तो दूसरे आग लगाते हैं। एक बार से जिसे चैन नहीं मिलता, वो दो बार और ट्राई करके देखता है कि देखूं तो सही, सही से भरा है ना! आग लगती रहती है, दिल्ली में धुंआ भरता रहता है, बस वो होती कहीं और है।

धुंए से दिल्ली रो रही है, दिल्ली के लोग रो रहे हैं। लोग परेशान हैं, लेकिन सड़कों पर भी नहीं उतर सकते। मैं भी रो रहा हूं, परेशान हूं, लेकिन अपनी इस परेशानी को लेकर मैं कहां कौन सी सड़क पर उतर जाऊं, धुंए में दिखाई नहीं देता। लेकिन मुझे लग रहा है कि मेरी सड़कों पर आने के दिन आ रहे हैं। इस बार उनके कदम थोड़े तेज भी हैं। जब से धुंआ भरा है, सांस रुकी फंसी सी ही जा रही है। आने में कौन सी सांस आ रही है, पूरी दिल्ली जानती है, मैं कहीं अलग से सांस नहीं लेता!

ये दिल्ली का धुंआकाल है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा ये मेरा काल है, धुंआ तो ऑलरेडी होइए रखा है। लोग कहते हैं कि एनडीटीवी पर बैन लगा है तो वो इतना चिल्ला रहा है! मैं खुद पर लगे बैन को कहां बांचूं? मैंने तो माइम की भी कभी प्रैक्टिस नहीं की, अलबत्ता लोग जो जो कर देते हैं, उससे मेरी घर बैठे और अक्सर लेटे लेटे ही प्रैक्टिस होती रहती है। माइम तो चुप है, लेकिन मैं दुखी हूं। मुझे दुख में चिल्लाना है। कहां किसके सामने चिल्लाऊं मीलॉर्ड? ओह!! सॉरी! मीलॉर्ड!! आप हैं! मैंने देखा नहीं था! सॉरी वंस अगेन! एक्चुअली बड़ा धुंआ धुंआ हो रखा है ना! देख ही रहे हैं हर तरफ! सर, आशा ताई का वो वाला गाना सुना क्या? 'चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..' यूट्यूब पे है सर, अकेले आशा ताई के ही दो दो वर्जन है सर।

फिर भी मैं नाउम्मीद नहीं हूं। धुंआ ही है, छंट जाएगा। क्या हुआ कि अभी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट्स दिन में सूरज को दिया दिखा रही है, वो दिन जरूर आएगा जब सूरज मुझे दिया दिखाएगा। सबको दिखाएगा वो दिया। सबको देगा उजाला। सांस बची रहेगी तो मैं भी देखूंगा सूरज। मेरी आंखों में सूरज के सपने हैं, लेकिन धुंआ भी बहुत भर गया है। न सपने ठीक से दिख रहे हैं और न ही सूरज, फिर भी चलते गुजरते मैं अपनी पीठ आप ठोंक कहता हूं कि दिखेगा, दिखेगा एक दिन!!

दिल्ली को धुंए से आजादी चाहिए। सरकार वेंटीलेटर लगा देगी! मुझे जिस धुंए से आजादी चाहिए, मैं कहां की सरकार से मांग करूं कि उसके लिए भी एक वेंटीलेटर बनवा दे। ज्यादा नहीं तो बस मेरे सपनों में आने वाली सड़क ही धुलवा दे। रात मैंने एक भी सपना नहीं देखा। तय करके सोया था कि आज सपना नहीं देखूंगा। अगर भूले से दिख गया तो जाग जाउंगा। दो बार सपने ने दिखने की कोशिश की, लेकिन मैं जाग उठा। सपनों से मेरी गुजारिश है कि वो इन दिनों मुझसे थोड़ा दूरी बनाए रखें। यहां हकीकत की ही दुनिया में इतना धुंआ है कि वहां का धुंधलापन और बर्दाश्त नहीं होता।

सपनों, मुझसे दूर रहो। धुंए, तुम भी दूर रहो। चिपकने वालों, तुम नजर न आना। मेरे मन की चिड़िया के घोंसले पर उस खोंसला ने जानबूझकर अवैध कब्जा कर लिया है। घोंसले के असली कागजात चिड़िया के पास हैं। चिड़िया फुर्र हो गई है। इसीलिए कहता हूं, बाकी लोग भी फुर्र हो लो। आसमान तुम सबके इंतजार में है। मेरे भी इंतजार में है। मैं अभी नीचे ही हूं। यहां धुंआ बहुत है। मैं रास्ता खोज रहा हूं, मिलते ही आता हूं। कमबख्त धुंआ छंटे तो मुक्ति मिले।

अरे, अभी तो फैजाबाद भी जाना है। 

Saturday, November 5, 2016

बैन क्यूं? जनता को मार के छील दीजिए मोदी महोदय

एनडीटीवी पर पाबंदी किसी एक चैनल का मसला नहीं है। यह पूरे प्रेस और उसकी स्वतंत्रता से जुड़ा है। यह बोलने की आजादी पर हमला है। यह कुछ और नहीं बल्कि जनता के दमन और उत्पीड़न की तैयारी है, क्योंकि सरकार के आखिरी निशाने पर वही है। दरअसल मोदी सरकार सारे मोर्चों पर नाकाम हो गई है। उसका सिराजा बिखर रहा है। अच्छे दिन का गुब्बारा फूट चुका है और वादे जुमले साबित हो चुके हैं। अब बचे-खुचे इकबाल के भी जाने का खतरा पैदा हो गया है। हालात बद से बदतर हैं। जनता में रोष है। ऐसे में सरकार को पता है कि उसके अलग-अलग हिस्से सड़क पर उतरेंगे और सरकार को उनसे निपटने के लिए बल की जरूरत पड़ेगी।

सरकार के इस रास्ते में तीन चीजें आड़े आएंगी। अदालत, प्रेस और विपक्ष। इसलिए बारी-बारी से इनको ठिकाने लगाने की तैयारी शुरू हो गई है। न्यायपालिका और मोदी सरकार के बीच की लड़ाई किसी से छुपी नहीं है। न्यायिक आयोग कानून के जरिये अदालतों को अपने चंगुल में लेने में नाकाम सरकार अब दूसरे रास्ते अपना रही है। कई जगहों और कई मंचों पर मुख्य न्यायाधीश इसको जाहिर भी कर चुके हैं। इसका असर भी दिखना शुरू हो गया है। अदालतें देखने के बाद भी अब चीजों की अनदेखी कर रही हैं।

प्रेस का बड़ा हिस्सा कारपोरेट मालिकाने की गिरफ्त के चलते पहले से ही समर्पण कर चुका है। सरकार का सुर ही उसका सुर बन गया है। तमाम दबावों के बाद कुछ ने झुकना मंजूर नहीं किया। उन्होंने अपनी रीढ़ सीधी रखी। लिहाजा सरकार अब ऐसे घरानों के ‘इलाज’ में जुट गई है। एनडीटीवी पर पाबंदी उसी का हिस्सा है। प्रेस और कुछ नहीं बल्कि जनता की आवाज होता है। वह जनता और सरकार के बीच माध्यम है। अब इसी पुल को ही तोड़ने की कोशिश हो रही है। यह मार्ग अब एकतरफा हो जाएगा जिसमें सरकार का पक्ष तो होगा, लेकिन जनता का पक्ष और उसके सवाल गायब हो जाएंगे। इसलिए यह कार्रवाई प्राथमिक और आखिरी तौर पर जनता के खिलाफ है।

रामकिशन मसले पर दिल्ली में विपक्षी नेताओं के साथ सलूक ने बहुत कुछ बता दिया है। लोकतंत्र में विपक्ष अगर सरकार नहीं तो उसकी हैसियत उससे कम भी नहीं होती है। संसद से लेकर सड़क तक वह जनता की आवाज होता है। वह सरकार के जनविरोधी और गलत कामों का तुर्की ब तुर्की जवाब देता है। अनायास नहीं संसदीय लोकतंत्र में शैडो कैबिनेट की अवधारणा है। जनता पार्टी के शासन के दौरान बिहार के बेलछी में हुए दलित हत्याकांड का इंदिरा गांधी ने दौरा किया था। मोरारजी सरकार उन्हें वहां जाने से तो नहीं रोक पायी थी? यहां राजधानी के भीतर अगर विपक्षी नेताओं को पीड़ित के परिजनों से नहीं मिलने दिया जा रहा है तो यह बहुत कुछ कहता है। विपक्ष को अपने बराबर न सही, लेकिन दौ कौड़ी का भी न समझना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। क्योंकि किसी अदालत और प्रेस के मुकाबले विपक्ष जनता के सबसे करीब होता है और उसकी आवाज को बंद करने की कोशिश का मतलब है जनता की पहल पर पाबंदी। अनायास नहीं सरकार ने इन तीनों स्तंभों के चोटी के लोगों के गिरेबान पर हाथ डाला है। उसे पता है कि एकबारगी इन्हें काबू में कर लेने का मतलब है पूरा मैदान साफ।

इस तरह से बारी-बारी से जनता की रक्षा करने वाले हथियारों को छीनकर उसे निहत्था किया जा रहा है। आखिर में वह फिल्म किस्सा कुर्सी का में जनता बनी शबाना आजमी की तरह अकेली तो रह जाएगी, लेकिन आत्महत्या नहीं कर पाएगी। इस बार जनता से जो भी सड़क पर उतरेगा मारा जाएगा। कारपोरेट विरोध मौत का पैगाम होगा। सरकार के विरोध का मतलब सीने पर गोली। यह बात अलग है कि वह कहीं किसान होगा तो कहीं दलित, तो कहीं मुसलमान। कहीं बेरोजगार और किसी जगह नक्सली होगा। यह सब कुछ राष्ट्रवाद और देश की रक्षा के नाम पर किया जाएगा। एक ऐसा राष्ट्रवाद जिसमें जनता नहीं होगी, उसके हित नहीं होंगे। जनता की बलि देश की सुरक्षा के नाम पर ली जाएगी। इसकी शुरुआत हो चुकी है। झारखंड में 8 किसानों की पुलिस की गोली से मौत इसी का हिस्सा है। उड़ीसा में नक्सली के नाम पर 24 आदिवासियों की हत्या इसका ट्रेलर।

इस कड़ी में सरकार का सबसे ज्यादा जोर सुरक्षा बलों और उसके जवानों पर है। क्योंकि यही वह हिस्सा है जिसके कंधे पर बैठकर मोदी भविष्य की सत्ता की सवारी करेंगे। इस लिहाज से उसका भरोसा और विश्वास हासिल करना पहली जरूरत बन जाती है। और फिर जवान अपने किसान बाप की छाती गोलियों से छलनी करेगा। राष्ट्र और उसके सुरक्षा के नाम पर छेड़ा गया यह गृहयुद्ध देश को तबाही के रास्ते पर ले जाएगा।

लेखक महेंद्र मिश्र लंबे समय से जन अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।