Friday, April 17, 2015

नतमस्‍तक मोदक की नाजायज औलादें (31)

प्रश्‍न: आगरा में एक बार फि‍र चर्च पर हमला हुआ?
उत्‍तर: हमने नहीं कि‍या.
प्रश्‍न: आपके जैसे लोगों ने कि‍या?
उत्‍तर: ये साजि‍श है.
प्रश्‍न: कैसी साजि‍श?
उत्‍तर: ये हमारे नमो को बदनाम करने की साजि‍श है.
प्रश्‍न: वो कैसे?
उत्‍तर: ये ईसाई हैं साले हरामी, खुद ही हमला करा रहे हैं!!
प्रश्‍न: लेकि‍न वो खुद पर हमला क्‍यों कराएंगे?
उत्‍तर: हरामी अंग्रेजों का दि‍माग है.
प्रश्‍न: लेकि‍न ओबामा ने तो आपके नमो की तारीफ की है!
उत्‍तर: देके जो आए थे!!
प्रश्‍न: क्‍या देके आए थे?
उत्‍तर: मुंह में!
प्रश्‍न: क्‍या मुंह में देके आए थे?
उत्‍तर: वही जो अब हम इन ईसाइयों के मुंह में देंगे!
प्रश्‍न: तो क्‍या वो आपकी तारीफ करने लगेंगे?
उत्‍तर: नहीं भो**** के!! तुम्‍हारी तरह बकचोदी पेलेंगे!
प्रश्‍न: मतलब आप उन्‍हें मारेंगे?
उत्‍तर: बोलो हिंदू बन जाएं, कुछ नहीं करेंगे.
प्रश्‍न: मतलब आगरा में हमला आपके लोगों ने ही कि‍या?
उत्‍तर: सुने तुम दि‍ल्‍ली में कि‍सी लड़की के चक्‍कर में थे?
प्रश्‍न: और आप कह रहे हैं साजि‍श है?
उत्‍तर: लि‍ए वि‍ए नहीं उसकी?
प्रश्‍न: इस घटना के बाद एक बार फि‍र से वि‍देशों में भारत की कि‍रकि‍री हुई है?
उत्‍तर: शर्त लगाते हैं बेटा, चुम्‍मी भी नहीं दी होगी!!
प्रश्‍न: आपके नमो बच्‍चों के कान क्‍यों खींचते रहते हैं?
उत्‍तर: तो क्‍या खींचें?
प्रश्‍न: मतलब कुछ खींचना जरूरी है?
उत्‍तर: हां!
प्रश्‍न: क्‍या हां?
उत्‍तर: फोटो खींचना जरूरी है.
प्रश्‍न: पर बच्‍चों के कान खींचते हुए ही क्‍यों?
उत्‍तर: फि‍र पता कैसे चलेगा?
प्रश्‍न: क्‍या पता चलाना है?
उत्‍तर: कि कान खींचा!
प्रश्‍न: अरे पर खींचा क्‍यों?
उत्‍तर: क्‍या क्‍यों खींचा?
प्रश्‍न: कान क्‍यों खींचा?
उत्‍तर: कुछ और खींचने को रहा नहीं होगा.
प्रश्‍न: आराम से इंसानों की तरह भी मि‍ल सकते थे?
उत्‍तर: वो इंसान हैं?
प्रश्‍न: नहीं, लगता तो नहीं!
उत्‍तर: सही लगता है तुम्‍हें भो*** के!! दोबारा हमारे नमो को इंसान न कहना!!
प्रश्‍न: शैतान है?
उत्‍तर: तुम्‍हरी मां की ***!! भो**** के!! तुम्‍हरी हिम्‍मत कैसे हुई ऐसा कहने की?
प्रश्‍न: शांत हो जाइये!
उत्‍तर: शांति गई हमरे लौ*** पे!! तुम रुको साले आज तुम्‍हें मुसलमान बनाते हैं!
प्रश्‍न: फि‍र हिंदू राष्‍ट्र का क्‍या होगा?
उत्‍तर: राष्‍ट्र गया पाकि‍स्‍तान, तुम्‍हारी हि‍म्‍मत कैसे हुई बे?!
प्रश्‍न: अच्‍छा शांत हो जाइये नहीं तो हिंदू घट जाएंगे.
उत्‍तर: तुम्‍हरी जात को देखके छोड़ रहे हैं तुमको.
प्रश्‍न: कान क्‍यूं खींचा?
उत्‍तर: रुको भो*** के!! बाभन की झां***!! आज तुम्‍हारी गां*** पक्‍का टूटेगी!! 

Monday, March 30, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 10 (फुटकर नोट्स)


1-
हमने नशा नहीं कि‍या था, पर नशे में थे। उनने नशा भी कि‍या था और ज्‍यादा नशा करने के उनके पास ज्‍यादा कारण थे। वो शोर मचा रहे थे, संगीत बजा रहे थे। शोर और संगीत हममें भी खूब मच और बज रहा था। वो दि‍ल्‍ली जीत लेने पर आह्लादि‍त थे, हम खुद को हार जाने पर... हमारे सामने ये ति‍रंगा मंद हवा में अलट पलट रहा था। और भी बहुत कुछ अलट पलट रहा था। शोर था, संगीत था, नशा था और ति‍रंगा भी था। बस ये हवा ही कुछ धीमी हो चली थी...। अब शायद कई लोगों के लि‍ए सांसों को लंबा करके छोड़ने का वक्‍त आ गया है।
2-
कॉफी लेंगे सर। पानीदार प्‍लास्‍टि‍क की ट्रे में थर्माकोल के ग्‍लास में फूली हुई कॉफी दि‍खाकर उसने पूछा। हमने कहा नहीं। उसने कहा केजरीवाल की कॉफी है। हमने कहा नहीं, हम चाय पीते हैं। उसने कहा चाय का जमाना गया, अब आपका वक्‍त है। हमने फि‍र भी कहा कि नहीं, हमने चाय ही पीनी है। वो हमारे बीच कॉफी का ट्रे ढक्‍कन लगवाकर रखकर चाय लाने चला गया। हमने कॉफी के कपों के साथ दूरि‍यां बरतकर रखीं। ति‍रंगा अब भी लहराकर फैलने की पुरजोर कोशि‍श कर रहा था। कॉफी के पानीदार प्‍लास्‍टि‍क के ढक्‍कन पर पांच साल केजरीवाल का स्‍टीकर लगा था। हम आज शाम ही आइंदा के सालों का वायदा ले लेना चाह रहे थे... वहां साल लि‍मि‍टेड थे, यहां अनलि‍मि‍टेड। पॉलि‍टि‍क्‍स अभी भी लि‍मि‍टेशंस तोड़ देती है।
3-
हम दया करते हैं तो प्रेम नहीं कर सकते। उसने कहा। हम प्रेम करते होंगे तो शायद दया नहीं कर सकते। मैने सोचा। इस बार हवा जरा सी तेज चली और तिरंगा उड़कर आधा हो गया। उसने कहा- यू सक्‍स। उधर संगीत और नारों का शोर दोबाला हो गया। इधर संगीत का वॉल्‍यूम धीमा होता गया और शोर बढ़ता गया। थककर कई सारे चरसी मैदान में औंधे पड़े थे और हम एक बाउंड़ी वॉल पर। हम सब थके थे। हम सब सीमाओं में बंधे थे। हम सब बंधन तोड़ने की लंबे अर्से से कोशि‍श कर रहे थे। हम सब बंधन तोड़ चुके थे... या फि‍र हमें बस लग रहा था कि हम सबकुछ तोड़ चुके हैं।
4-
हम जीत चुके हैं, इसलि‍ए बाद में बात करेंगे। आप ने कहा। हम हारकर थक चुके हैं, इसलि‍ए बात नहीं करेंगे। उसने कहा। हमारे पास बहुत सारे अधूरे काम हैं। आप ने कहा। हमारे पास बहुत से अधूरे काम हैं। उसने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍ए। आप ने कहा। हमें सीमाएं नहीं तोड़नी चाहि‍एं। उसने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। आप ने कहा। सबको अपने बच्‍चे पालने हैं। उसने कहा। पालि‍का बाजार की उन अचानक तंग होती सीढ़ि‍यां में अपना पैर कि‍सी की एड़ि‍यों तले दबवाते मैं सोचता रहा... मैं कहां कि‍सके तले इस वक्‍त होउंगा।
5-
कल खुशी की रात थी। कि‍सी को नींद नहीं आई। आज वि‍जय की रात है, जीतने वाले चैन की नींद सोएंगे। हारने वालों की बैटरी बार बार लो होगी, फि‍र भी वो उसे चार्ज नहीं करेंगे। बैटरी चार्ज करने के बावजूद हारने वालों को जीतने में कोई मदद नहीं मि‍लने की, भले ही बैटरी फुल चार्ज हो। एफबी पर फोटो मैसेज दि‍खा- जीत हार में बस हार जीत जि‍तना ही फर्क होता है।

Sunday, March 29, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-9

तुम परेशान होगे, बार बार तुम्‍हारा मन कभी कुछ करने को तो कभी कुछ कहने को कचोटेगा, लेकि‍न कह नहीं पाओगे। सांसें अंदर जाएंगी तो सवाल के साथ जाएंगी कि जा क्‍यों रहीं हैं और जाने से पहले रुक क्‍यों न गईं, इन दो सवालों के साथ-साथ तुम्‍हारी सांसें ही तुम्‍हारी सजा होंगी। हर सुबह तुमसे अपना हि‍साब लि‍खवाएगी, पलक का हर झपकना तुमसे पानी की दरख्‍वास्‍त करेगा, लेकि‍न न तो तुम अपना हि‍साब पूरा कर पाओगे और न ही पानी की कोई दरख्‍वास्‍त। तुम अपना सबकुछ मुझे बताना चाहोगे, फि‍र भी न बता पाओगे और अगर बताओगे, तो भी मैं उनमें से कोई भी बात नहीं सुनने वाली, समझना तो उतनी दूर की बात है जि‍तना तुम्‍हारा हि‍साब और दरख्‍वास्‍त के नजदीक जाकर उन्‍हें वैसे सहलाने की हि‍म्‍मत करना। तुम अक्‍सर चौंकोगे, अपने चौंकने को अपनी नि‍यति न मानने की जि‍द में बार बार फि‍र से वैसे ही चौंकना चाहोगे और कभी कभार शायद तुम्‍हारा चाहना पूरा हो भी जाए, लेकि‍न याद रखना, तुम्‍हारा चाहने की हद सिर्फ तुम्‍हारे चौंकने तक ही खुदी हुई है। और हां, ये दरार इतनी चौड़ी है कि इ‍समें मैं अपने उसी मुखौटे के साथ अंदर तक पैवस्‍त हूं, जि‍से पार करने की हि‍म्‍मत तुम्‍हारे अंदर के मैं में तो नहीं है, नहीं ही है।

मुझे पता है कि मेरा मन कचोटेगा, लेकि‍न आखि‍र है तो मेरा ही मन। सीधी सच्‍ची बात ये है कि मेरे मन में क्‍या चल रहा है, इससे वाकई दुनि‍या को या फि‍र तुम्‍हें भी कोई खास मतलब नहीं है, अगर होगा भी तो मैं ये अच्‍छी तरह से जानता हूं कि तुम तो मुझे कभी नहीं बताओगी और दुनि‍या अव्‍वल तो आदतन नहीं बताएगी और अक्‍सर इरादतन नहीं। सांसों का सवाल भी कोई नया नहीं है और नया न होने के बावजूद बस इस सजा को कुछ देर के लि‍ए भूलने की कोशि‍श करने में न तो कोई बेजा बात है और न कोई बेइमानी, इसलि‍ए सजा को अगर कुछ देर के लि‍ए भी भूला रह गया तो ये मेरी अपनी सांसों के साथ कुछ गनीमत होगी, जि‍सका शायद सि‍वाय मेरे और कि‍सी से कुछ लेना देना नहीं है। मुझे ये भी पता है कि दुश्‍वारि‍यों की दरख्‍वास्‍त बड़े ही कमजोर पन्‍नों और बड़ी ही फीकी स्‍याही से लि‍खी होती है। पन्‍ना हाथ में लेते ही चि‍टककर टूट जाता है और हर्फ बेपढ़े ही उसी पन्‍ने में गीले होकर जज्‍ब हो जाते हैं। मैं ये भी जानता हूं कि मेरे चौंकने से न तो दुनि‍या चौंकती है, न तुम चौंकती हो और तुम्‍हारा वो मुखौटा तो बि‍लकुल भी नहीं चौंकता जो चौंकने से लेकर ऊपर से नीचे तक की सारी दरख्‍वास्‍तों को सांसों से जुड़ी एक तफरीह मानता है। 

Saturday, March 14, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-8

और फि‍र ऐसा वक्‍त आया जब हर गलत पर दोनों एक दूसरे की दाद देने लगे। आदमी ने सबसे पहले गलत बोलना शुरू कि‍या और औरत ने सबसे पहले उस गलत पर वाह की दाद दी। आदमी मुसलसल गलत बयान करता जाता था। भाषा और उसकी खूबसूरती को पूरी दुर्दांतता से नष्‍ट करता जाता था और जब जब जि‍तना भी क्रूर हुआ, हर क्रूरता के स्‍वागत में एक दाद बड़ी खामोशी से कि‍सी पुल से उसे नि‍हारते सबसे ऊंचे सुर में सराहती सहलाती हुई मि‍ली। दोनों के हाथों में बस औरत की ही पकड़ मजबूत थी जो पूरे जोर के साथ हथेलि‍यों को पकड़ती थी, दबाती थी और तफरीहन एक अंगूठे से दो उंगलि‍यों के बीच सहलाती थी। मुख्‍तसर में अगर इसे समेट दें तो दोनों एक दूसरे के साथ बेहद क्रूर होने की कोशि‍श करने की जद्दोजहद में हर गलत को दाद देते देते कुछ इस कदर मुलायम होते जा रहे थे कि उनका आने वाला वक्‍त चि‍ल्‍ला चि‍ल्‍लाकर उनके न हो पाने की बात बता रहा था, पर दाद के शोर में और अंगूठे के जोर में न तो वो सुनाई दे पा रहा था और न ही उसका अहसास हो पा रहा था। ये वो वक्‍त था जब दोनों उस हरी बेंच पर बैठकर हवाओं के चलने और सामने लगे झंडे का लहराकर और बलखाकर भी उड़ने का इंतजार करते हुए एक दूसरे से हवाओं के न चलने की शि‍कायत कि‍या करते थे, लेकि‍न उनकी लाख शि‍कायतों के बीच गलति‍यों का एक बीज फूटकर अपनी हरी पत्‍ति‍यां बाहर फेंक चुका था और हर पत्‍ती के साथ एक मनमोहना फूल जानबूझकर नजरअंदाज की जाने वाली गलति‍यों के साथ खि‍ल रहा था। उन्‍हें बि‍लकुल भी इसकी परवाह नहीं थी और जो होनी भी नहीं थी क्‍योंकि जो हो रहा था वो सबकुछ अपने आप बस होता ही जा रहा था। उसे होने से रोकना चाहते हुए भी, जि‍समें कि‍सी को कुछ साबि‍त नहीं करना था या कि‍सी को उसे होने के बारे में सोचना भी नहीं था, वो दोनों कुछ ऐसे लम्‍हों की बुनावट में लगे थे, जि‍नकी सलाइयों ने पहले के आठ फंदे ही इस कदर उलझा दि‍ए कि उन्‍हें सुलझाते सुलझाते दोनों को कब ये लगने लगा कि दोनों पुराने हो गए हैं, पता नही नहीं चला। इस पता न चलने या पता न चलने देने की जबरदस्‍ती ने दोनों को कब उस बेंच से उठाकर हरे मैदान में बैठा दि‍या, कब दोनों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जि‍द में बाजार ने उन्‍हें हाथोहाथ लि‍या, इसका जि‍क्र बेकार है। बल्‍कि बेकार वो सबकुछ ही है, जो है और जो होने से बचा हुआ है, वो भी।