Thursday, November 27, 2014

नतमस्‍तक मोदक की नाजायज औलादें (1)

प्रश्‍न- आप समाज में द्वेष क्‍यों फैला रहे हैं?
उत्‍तर- आपकी बीवी को कल पान वाले के साथ चौक में टहलते देखा था।
प्रश्‍न- आप दूसरे धर्मों के साथ सद्भाव से क्‍यों नहीं रहते?
उत्‍तर- आपका लड़का स्‍कूल के बाथरूम में हस्‍तमैथुन करता है।
प्रश्‍न- आप एक धर्म वि‍शेष के प्रति हिंसक क्‍यों हैं?
उत्‍तर- आप अपनी पत्‍नी के साथ रात में क्‍या कुकर्म करते हैं, हमें सब पता है।
प्रश्‍न- आप दंगों के बहाने क्‍यों खोजते हैं?
उत्‍तर- आपकी मां पड़ोसी के साथ सोती है।
प्रश्‍न- क्‍या आप कभी प्रेम और सद्भाव से समाज में रह सकते हैं?
उत्‍तर- हमें पता है आपकी बीवी आपको छोड़कर क्‍यों चायवाले के साथ भागी।
- मैं आपको दंगा फैलाने से रोकना चाहता हूं।
उत्‍तर- और हम आपकी मां बहन *** चाहते हैं।

Sunday, November 23, 2014

रोटी नाही राम भजा हो तब तौ आए नरमी...

जौ जेब ना होवै एक्‍को पइसा
हाथे ना फूटी कौड़ी
पेट करौवय, रहि रहि बोलय
भूख से दौड़ा दौड़ी।

भूख से दौड़ा दौड़ी कि केहू
दै दे एक्‍को दाना
दाना खाय के पीके पानी
चलौ सुनाई गाना।

चलौ सुनाई गाना कि सगरे
देश मा भुक्‍खड़ बाटे ओलरा
भूख पि‍यास मा मरत वै बाटे
कंबरौ फाट के होइ गै झलरा।

कंबरौ होइ गै झलरा कि
कइसे नवका ओढ़न आवै
पेटवा के आग बुझै पहि‍ले
तौ साटन बाटन जावै।

साटन के चक्‍कर मा तौ
रोजै लागै लंबी लाइन
रोटी मांगेन तो नेता जी
कइसे तो समझाइन।

पूरनमासी का जब दि‍खै
पूरी गोल यक रोटी
तब समझो कि मि‍लै हि‍यां पे
तुमका ओकै बोटी।

ओकरे पहि‍ले मंगबा तौ
तू अहा बहुत बि‍धर्मी
रोटी नाही राम भजा हो
तब तौ आए नरमी।

औ कहूं भूलके मांग लि‍हा हो
भइया आपन हि‍स्‍सा
काल कराल के करि‍या वाला
सुरू होए फि‍र कि‍स्‍सा।

भूल गया कि यही कति‍कवा
कतल कि‍हि‍स हजारन कै
पेट पे पत्‍थर रख के भइया
सुना तनी जि‍उजारन कै।

सुना तनी जिउजारन कै
कि कैसे माल उड़ावैं
काला करि‍खा केतना कै धन
बांट बांट के खावैं।

बैंक के बाबू खोलैं खाता
कुछ अइसा समझावैं
आए करि‍या ओढ़ लबादा
पइसा भाग जगावैं।

रोटी मि‍लै कि दूनौ टाइम
पूछै पे पछतावैं
जि‍उजारन का जि‍ताए दि‍हा अब
भूत भबि‍स्‍स बतावैं।

Tuesday, November 18, 2014

बात बुझाता नहीं, कान सुनाता नहीं

तस्‍वीर के जनक: नि‍धीश त्‍यागी
लैट जलती नहीं। 
फूल फरता नहीं। 
गमला बढ़ता नहीं। 
बि‍जली आती नहीं। 
ठंड जाती नहीं। 
सरसों फूलती नहीं। 
मछली पि‍चकती नहीं 
प्रेम होता नहीं
बात बुझाता नहीं
कान सुनाता नहीं
आंख देखाता नहीं 
गाल फुलाता नहीं
मुंह बि‍चकाता नहीं
समोसा चलता नहीं 
कबूतर पलता नहीं 
दि‍ल मचलता नहीं  
सुख मि‍लता नहीं
नशा हि‍लता नहीं 
गालि‍ब छि‍लता नहीं
बोतल गाती नहीं
मय हि‍लाती नहीं
बयार आती नहीं
दरार जाती नहीं
ठीक होता नहीं
बोल सोता नहीं
नींद मुड़ती नहीं 
मुंडेर चढ़ती नहीं
दुख होता नहीं
रात छि‍लती नहीं 
बात मि‍लती नहीं 
तुमको बुझाता नहीं 
हमको समझाता नहीं
कोई मनाता नहीं
मन सनाता नहीं। 

Sunday, November 16, 2014

हम पुरुषों का स्‍पेस

हम पुरुषों का भी एक स्‍पेस होता है। पता नहीं महि‍लाएं इस स्‍पेस के बारे में कि‍तना समझती होंगी और कि‍तने पुरुष इसे स्‍वीकार करते हुए भी अस्‍वीकार करना चाहेंगे, पर हकीकत यही है कि हम पुरुषों का भी एक स्‍पेस होता है। हम उस स्‍पेस में अपने दोस्‍तों के साथ कभी गा रहे होते हैं या दूसरे के रोने पर जरा सा स्‍त्रैण होकर उसके सि‍र को अपना कंधा और पीठ को हथेलि‍यों की गर्माहट दे रहे होते हैं। उस स्‍पेस में हम साथ साथ नशा करके एक साथ जोर का ठहाका लगा रहे होते हैं और ठहाकों में मगन हमें इस बात का भी ध्‍यान नहीं रहता कि अगल बगल के लोग हमें अजीब नजरों से देख पागल सा कुछ समझ रहे होते हैं। उस स्‍पेस में कभी कभी रात यूं चुटकी में गुजर जाती है कि दि‍न का होना ही अखरने लगता है। वहां हम पहाड़ों के तीखे मोड़ों पर एक दूसरे के पीछे बाइक लेकर भाग रहे होते हैं या मैदानों में कार के डैशबोर्ड पर पैर टि‍काए कुछ गुनगुना रहे होते हैं। ये इस दीन दुनि‍या से थोड़ा दूर होता है, पर इतना दूर भी नहीं कि दो बोतल बि‍यर के साथ एक पनीर टि‍क्‍का 20 मि‍नट में न मि‍ल सके। हम थोड़े से स्‍वार्थी होते हैं, थोड़े से लालची होते हैं और थोड़े से नकलची भी। थोड़ी देर के लि‍ए अकल का इस्‍तेमाल मुल्‍तवी करके हर कि‍सी के बारे में एकदम पुरुषों की तरह बात करते हैं, हर कि‍सी को एकदम पुरुषों की तरह बरतते हैं। असल में इस स्‍पेस के खत्‍म होने तक हम सब बेतरतीब नशे में सरोबार होते हैं। शायद इसलि‍ए कि एक बार फि‍र से हमें अपने स्‍पेस के खत्‍म होने के दुख के साथ उस सुख भरे समय के वापस लौटने का इंतजार करना होता है। जो फि‍र पता नहीं कब मि‍लता है, पर मि‍लता है कभी कभी।

और जब फि‍र से ये स्‍पेस मि‍लता है तो हम जल्‍दी जल्‍दी पहले तो नए ट्रैक सुनाने लगते हैं, अपनी नई पुरानी गर्लफ्रेंड्स के कि‍स्‍से तो जैसे कि हमारी जबान पर होते हैं। ठीक है, कई लोग शादीशुदा होते हैं पर दुनि‍या ऐसे नहीं न चलती आई है ना। एक जीवन में हर पुरुष के हर कि‍सी से संबंध होते हैं और हर संबंध अपनी अलग तरह की व्‍याख्‍याएं लि‍ए रहते हैं। हम एक दूसरे के साथ शेयर करके एक तरह से खुद को पापमुक्‍त करने की दि‍लासा सा दे रहे होते हैं। पता नहीं कितनी पापमुक्‍ति कराते हैं हम इस स्‍पेस में, कभी गि‍नती न हो पाएगी। पहले पैग में तीन तो दूसरे में पांच और पांचवे में हर सि‍प पर चि‍यर्स करते हैं, ठहाका लगाते हैं, थोड़ी सी अश्‍लील बातें भी करते हैं। और थोड़ी देर बाद अश्‍लील बातें ही करते हैं। फि‍र हम तरह तरह के लोगों की बुराइयां करते हैं और उन्‍हें जमकर गालि‍यां देते हैं, ये भूलकर कि हम उजाले में नारीवाद की बातें करते हैं या उसका वि‍रोध करने वालों का वि‍रोध करते हैं। हमारा ये स्‍पेस या फि‍र स्‍पेस का नशा हमें बहुत ही सुवि‍धाजनक और स्‍वार्थी मोड में ले आता है, जो कि ईमानदारी से, हर कोई होना चाहता है। इस स्‍पेस में हम पकोड़े से लेकर आधी जली सि‍गरेट तक की कसम खाकर और नि‍भाकर भी दि‍खाते हैं। हर जगह आराम से खुजा सकते हैं और जहां हाथ न पहुंच रहा हो, वहां खुजाने को भी कह सकते हैं।

इस स्‍पेस में हम दुनि‍या की सभी वर्जित चीजें करने के लि‍ए पूरी तरह से स्‍वतंत्र होते हैं। हमें पता है कि लोगबाग हमारे इस स्‍पेस  से जलते भुनते और कुढ़ते हैं, पर हमारी ये जगह हमें उनपर भी हंसने ठहाका लगाने पर मजबूर कर देती है, जो ऐसा करते हैं। कुछ लोगों के जीवन में ये स्‍पेस मंगलवार को भी आता है तो कुछ लोग इसे हर गुरुवार में तलाशते हैं। हमें पता होता है कि हम इस स्‍पेस की एक बड़ी कीमत चुकाएंगे, इस पाप को हम ही भुगतेंगे, फि‍र भी चूंकि बेसि‍कली हम सब पापी ही हैं, तो हम पाप करते हैं। हमें पता होता है कि जीवन में ये स्‍पेस न हर मंगलवार आना होता है और न हर गुरुवार। फि‍र भी हम दि‍न का इंतजार करते हैं। हम हर दि‍न अपने उसी स्‍पेस के इंतजार में सि‍गरेट के धुंए के छल्‍ले उड़ा रहे होते हैं, या मेरी तरह पान खा रहे होते हैं। पापी स्‍पेस का इंतजार, पाप करने के लि‍ए। 

Monday, November 3, 2014

रोज थोड़ा सा और लंगड़े हो जाते हैं

कभी कभी सोचता हूं कि आदमी अपनी पूरी जिंदगी में कि‍तनी बार मरता होगा। पानी नहीं है तो प्‍यास से मर जाता होगा, हवा नहीं है तो सांस से मर जाता होगा। जमीन तो जमीन, लोगबाग आसमान में भी जाकर मर जाते होंगे। फि‍र भी, एक अदद जिंदगी अपनी ही कि‍तनी मौतों की जि‍म्‍मेवार होती होगी, इसका हि‍साब लगाना जरा टेढ़ा काम है। सुख की तकलीफदेह पड़ताल में लगे हम लोग रोज ही तो मरते हैं। सुख मि‍ले ना मि‍ले, तकलीफ जरूर मि‍लती है। वास्‍तवि‍क मौत की पीड़ा से दूर हम उसे ही रोज का मरन समझकर खुद को घसीटते रहते हैं, रोज अपनी टांग का एक हि‍स्‍सा काटकर कम कर देते हैं और रोज थोड़ा सा और लंगड़े हो जाते हैं। और फि‍र जब कोई कहता है कि सलीम लंगड़े पर मत रो, तो बेसाख्‍ता हंसी नि‍कल ही जाती है। हम मरते हुए भी हंसते हैं और हंसते हुए भी मर रहे होते हैं। मरते मरते हमें मोबाइल फोन याद आने लगता है, उसके कीपैड पर उंगलि‍यां तो फि‍राते हैं, पर असल में समझ नहीं पाते कि अपनी मौत के वक्‍त हम अपने सबसे पास कि‍से देखना चाहते हैं। दरअसल हम तय न करने की स्‍टेज में हमेशा होते हैं। तय न करने देना खुद को थोड़ा सा और ढीला छोड़ना है, मरने से पहले एक जरा सा आराम करना है, एक लंबी सांस होता है ये तय न करना। सांस नि‍कली और दम छोड़ा। हर सांस के बाद की मृत्‍यु और हर सांस से पहले का जीवन हमें एक ऐसे कुंए में बैठाए रखता है, जहां बस हम ही हम होते हैं। और फि‍र हम कि‍तना भी तय कर लें, कि‍तना भी प्रेम कर लें, कि‍तनी भी घृणा कर लें, कि‍तने भी दुखी हो लें, कि‍तना भी रो लें, कुंए में अकेले पड़े हम खुद को अंतत: जिंदा ही पाते हैं। शायद कि‍सी के पास जवाब हो कि क्‍या सांस चलने का नाम ही जीवन है। शायद कोई ये बता दे कि मुक्‍ति कहां है और इसी एक शायद का जवाब पाने के लि‍ए कहां कहां नहीं भटकते। ज्‍यादा परेशान होते हैं तो कि‍सी मन वाले से बात करके दि‍लासा देते हैं कि हम बोल रहे हैं, हमसे आवाज नि‍कल रही है, हम जिंदा हैं। और ज्‍यादा परेशान हुए तो मनपसंद जगह पर जाकर फि‍र एक बार दि‍लासा देते हैं कि वो पेड़ सुंदर है, पहाड़ सजीव है और फूल महकता है, इसलि‍ए हम जिंदा हैं। पर क्‍या वाकई हमारी दि‍लासा हमको लगती है। क्‍या वाकई दि‍लासा नाम की कोई चीज होती है। क्‍या वाकई जीवन नाम की कोई चीज हम जीते हैं...

महानगरों की दीवारों के बीच कैद हुए हम अपनी टूटी चप्‍पल और जूते के छेद को नि‍हारते हुए बस गुमसुम जिंदगी काटने को जि‍स तरह से अभि‍शप्‍त हैं, वो शाप रोज होने वाली मौतों से भी नहीं टूटता। दीवारें हैं कि चारों तरफ से खि‍सकती हुई खुद को खुद में चुनने के लि‍ए आगे भी नहीं बढ़तीं, उनके आगे बढ़ने के लि‍ए नशे की दरकार होती है। और फि‍र नशे के बाद वही दीवारें काटने को दौड़ती हैं, लहूलुहान कर देती हैं जहां इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो लाल हैं या सफेद या क्रीम कलर की। फर्श धुली हो या गंदी हो, कांच की जो कि‍रचें रोज ब रोज चुभती हैं, उनसे नि‍जात पाने के लि‍ए उन्‍हें चुनचुन कर हटाने की जद्दोजहद कि‍तना घायल कर जाती है, इसे समझने में पूरी एक जिंदगी नि‍कल जाती है और हमें उन्‍हें न समझने के लि‍ए, न सोच पाने के लि‍ए कि‍तने केमि‍कल अपने अंदर डालने होते हैं कि पूरी जिंदगी ही केमि‍कल का लोचा बन जाती है। सुंदरता के सुख को पाने के लि‍ए हम रोज कि‍तने धोखे देने के लि‍ए तैयार रहते हैं, कि‍तने धोखों के जाले अपने दि‍माग में बनाते हैं, इसका कोई पार ही नहीं है। कोई हंसता है, कोई ठठाकर हंसता है, कोई पार्क जाकर हंसता है, कोई यमुना कि‍नारे जाकर हंसता है, बस यही नहीं समझ में आता कि हम हंस रहे हैं या चि‍ल्‍ला रहे हैं। वैसे हंसी आती है तब, जब पता चलता है कि हम अपनी रोज की मौतों से उतना परेशान नहीं होते हैं, जि‍तना दूसरे की लंगड़ी चाल देखकर खुश होते हैं। अजीब हैं हम लोग.. एकदम अजीब।