Wednesday, October 29, 2014

उफ ये बच्‍चे और इनके नखरे

पेड़ हों या पौधे, एकदम बच्‍चे जैसे होते हैं। जमीन में हों तो बड़े हो भी जाएं, लेकि‍न गमलों में ये ताजिंदगी बच्‍चों जैसे ही होते हैं। पता नहीं, शायद इसके लि‍ए सौंदर्यशास्‍त्र को दोष दि‍या जाए या नहीं, पर हम सभी लोग अपने आसपास हरा भरा ही देखना चाहते हैं। भले ही असलि‍यत हरी भरी ना हो, कंकरीटी हो, एसी से तपती हुई धूप की तरह जलती हुई हो, पर आसपास हरा भरा जरूर हो। हो सकता है कि इसके लि‍ए हमारे दि‍माग के सामंती अवशेष जि‍म्‍मेदार हो या फि‍र ये भी हो सकता है कि... कुछ और हो, बहरहाल कुछ तो है जो हम अपने आसपास हरा भरा देखना चाहते हैं। सभी लोग अपने घर में अपने इस नयन सुख के लि‍ए (बाज़ लोग इसे चाहे जैसा सुख समझें) गमले पौधे लगाते ही हैं, मैनें भी लगाए हैं। अक्‍सर लोगों से उनके बारे में राय भी लेता रहता हूं जो पौधे मैने लगाए हैं। बहरहाल बात ये नहीं कि मैने पौधे लगाए हैं, बल्‍कि बात ये है कि आज मेरे दो पौधों में मारे जलन के बुरी तरह से लड़ाई हुई है और कुल मि‍लाकर चूंकि मेरे ही दो बच्‍चों में लड़ाई हुई है, इसलि‍ए भुगतना मुझे पड़ रहा है।

गुड़हल भाई मेरे घर के सबसे पुराने मेंबर हैं। भाईजान एक बखुद एक मि‍ट्टी भरे अदद सीमेंटेड गमले सहि‍त हमारी छत पर पधारे थे। उसी वक्‍त हम इनकी जगह ठीक उस जगह तय कर दि‍ए, जहां सबसे पहले सूरज की रोशनी आती थी। मिट्टी भरे दूसरे गमले में साइकस बहुत बाद में लगा और अभी भी ठीक से सर्वाइव नहीं कर पाया है। गुड़हल भाई को हम रोज पानी देते थे और आते जाते हाथ फेर देते। तकरीबन 3 महीने तक भाई साहेब का मजाल कि एक फूल दि‍ए हों। पहले दूसरी जगह पर थे और रोजाना दो तीन फूल देते थे। जब हम जगह बदले तो भाईजान तीन महीने तक नाराज रहे हैं। हम रोज पानी दें और कमोबेश रोज हाथ फेर दें। इस बीच हमरे पास एक और कदंब चच्‍चा आ गए। ये वाले चच्‍चा तो लगावे के एक महीने के अंदर शेषनाग के फन भए। भरी गर्मी में गुड़हल और कदंब, दोनों लोगों का दि‍न में दो बार पानी देना पड़े, तब जाके दूनों की प्‍यास शांत हो।

परसों की बात है। सारे गमलों में पहले गुड़ाई कि‍ए, फि‍र कुछ देर बाद हलका पानी डाल दि‍ए। ईमानदारी से बता रहे हैं कि गुड़हल और कदंब में भी डाले थे, हमको पक्‍का याद है। और इन दोनों की गुड़ाई भी नहीं कि‍ए थे। कल दोनों को पानी नहीं दि‍ए, सोचे कि ठंड में कम सूख रहा है... लेकि‍न गुड़हल चच्‍चा तो ये रंग दि‍खाए कि पूछि‍ए मत। गलती हमसे ये हुई कि कदंब को कल रात में एक गि‍लास पानी पि‍ला दि‍ए, लेकि‍न गुड़हल को कुछ नहीं दि‍ए। आज सुबह भी दोनों को कुछ नहीं दि‍ए, लेकि‍न सुबह ही गुड़हल 3-4 हरी से पीली होती पत्‍ति‍यों से चेतावनी जारी कर रहा था। अभी रसोई आते जाते वक्‍त भाई साहब कई बार ध्‍यान दि‍लाए कि 7-8 पत्‍ती पीली हो चुकी है, जल्‍दी से पानी दि‍ए हैं। देखिए भाईजान को कब तक आराम मि‍लता है। और तुर्रा ये कि सामने वाला कदंब, जि‍ससे इनका कंपटीशन है, लहलहा रहे हैं। हम अभी खड़े होकर भाईजान को समझाकर आए हैं कि ऐसे परेशान न हुआ करें। वो घर के सबसे बुजुर्ग सदस्‍य हैं। कदंब के चि‍ढ़ाने पे तो बि‍लकुल ना जाया करें।अभी वो बच्‍चा है और ऐसे ही बचपने की हरकत करता रहेगा। और देखि‍ए तो, छठ हो ना हो, वैदि‍क रीति से भगबान सूरज को आपै रोज नमस्‍ते करते हैं, कदंबवा को तो हम करने भी नहीं देते। न तो बेचारा चांद देख पाता है ना सूरज, अब ऐसे में तनि‍क हंसी ठि‍ठोली कर लि‍या आपसे तो आप लगे पीले होने। ये कोई बात नहीं होती और अब तो आप सबके खुश होने के दि‍न हैं। कुछ दि‍न में आपके बगल वाली गुलदाउदी भी आपका पूरा साथ देगी। कदंबो देगा, लेकि‍न आप तो जानते ही हैं कि अभी वो बच्‍चा है। रात में पांच मि‍नट तक गुड़हल भाईजान को प्रवचन दि‍ए हैं, तब अभी सुबह जाकर देखते हैं कि कुछ कुछ हरापन लाना शुरू कि‍ए हैं।. उफ ये बच्‍चे और इनके नखरे। 

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं, चार आने की धनि‍या हैं।

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।
करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।


- राइजिंग राहुल (अवध बीज भंडार, हरिंग्‍टनगंज मि‍ल्‍कीपुर खजुरहट वाले)

कौन है पत्रकार? कहां है समाचार??

कौन है पत्रकार?
कहां है समाचार??
पीएम की सभा में 
कलम से हो बलात्‍कार।
कैमरा नि‍कले भी तो 
सेल्‍फी का कदाचार।
कौन पूछे मरा कौन?
कौन बोले सदाचार।
रंगीन तंबुओं में
कौन घुटा कहां यार।
चंद कट प्‍लेटों में
नीलाम हुआ पत्रकार।
बि‍क चुके खंबों को
कौन मारे जूते चार।
सीमेंट का यहां पर
ना बने कोई अचार।
हंसता है नरपि‍शाच
खि‍लखि‍लाते कलमकार
कौन है पत्रकार?
कहां है समाचार??


- राइजिंग राहुल (अवध बीज भंडार, हरिंग्‍टनगंज मि‍ल्‍कीपुर खजुरहट वाले)

टुकुर टुकुर देखा केहेन

मन भर पि‍सान मि‍लै 
तौ देस महान बनै 
तबलेक तौ सूखा 
पतरका कि‍सान चलै। 
.
एक जून खाब मि‍लै
चबैना हि‍साब मि‍लै
आलू हेरान बा
मि‍रचा परसाद मि‍लै।
.
कनटरी से प्रेम पै
जेल बेहि‍साब मि‍लै
मांग लि‍हो जहां हक
गोली साफ साफ मि‍लै।
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मौजो खाओ ना झेलै जाओ
पइसा बेहि‍साब मि‍लै
सेना कि‍हि‍स घोसना
सबका आसपास मि‍लै।
.
पइसा मि‍लै साफ मि‍लै
काला से हाफ मि‍लै
जमि‍नि‍या बचायो भाय
बेभाव के नाप मि‍लै।
.
लोभी चहुं ओर मि‍लै
क्रोधी तौ साथ चलै
बचके बचाय ल्‍यो
सपरी तौ काल्‍ह मि‍लै।
.
इहै पेड़ जंगल बा
जेसे हमका सांस मि‍लै
काटै पे तुला बाटे
कि कइसे अब फूल खि‍लै।
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दाम लिहि‍न दंभ कि‍हि‍न
रुपि‍या मा आग लगै
मोट मूस मोटान बाटै
सागौ में भाग लगै।
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उत्‍तर की तरफ जभै
टुकुर टुकुर देखा केहेन
दक्‍खि‍न से आवै आग
बाग सब खाक मि‍लै।
.
समझा हो मोर बाबू
अब तो दुरभाग मि‍ले
उठावा मशाल अब
तभै भाेर भाग जलै।


- राइजिंग राहुल (अवध बीज भंडार, हरिंग्‍टनगंज मि‍ल्‍कीपुर खजुरहट वाले)

Sunday, September 14, 2014

The Ant: चींटी

जब भी चींटी की मम्‍मी और चौकसी चाची आपस में मि‍लते, चींटी बेचारी इतनी बोर होती, इतनी बोर होती कि तकि‍ए के नीचे मुंह छुपाने पर भी मम्‍मी और चौकसी चाची की चि‍कचि‍क लगातार कान में कुछ इस तरह से जाती, जैसे कान में दर्द होने पर टपकाई जाने वाली दवा जाती है। दरअसल चौकसी चाची के पास पूरे मोहल्‍ले के बच्‍चों की खबर रहती जि‍से चींटी की मम्‍मी बड़े चाव से सुनतीं। पर चींटी अपनी छोड़, दूसरों की बड़ाई सुनना ही नहीं चाहती थी। इस बार जब चौकसी चाची चींटी के घर आईं तो चींटी ने चुपचाप अपने जूते पहनने शुरू कर दि‍ए। वो तुरंत पास वाले पार्क में जाकर चिंटू और वि‍क्‍की के साथ गेंदताड़ी खेलना चाहती थी और ये भी चाहती थी कि मम्‍मी और चौकसी चाची की वो फालतू वाली चि‍कचि‍क उसे सुनाई ना पड़े। लेकि‍न चींटी के छठें जूते में एक छेद था और वो पहले भी तीन बार अपनी मम्‍मी से बता चुकी थी। मम्‍मी ने उसे वादा कि‍या था कि मधु आंटी के छत्‍ते से वो बहुत जल्‍द मोम लाएगी और उसका जूता जोड़ देंगी। पर मधु आंटी तो पि‍छले छह दि‍नों से अपने छत्‍ते में आई ही नहीं थी। चींटी की मम्‍मी वहां तक गई भी थीं कि अगर मधु आंटी होंगी तो मोम के साथ दो बूंद शहद भी दे देंगी। शहद के नाम से तो चींटी क्‍या, चींटी के 24 भाई बहनों के मुंह से पानी बहने लगता था।

तो इस बार चींटी ने अपना जूता ठीक करने के लि‍ए एक जुगत लगाई। उसने पड़ोस में रहने वाली पि‍न्‍नी को साथ लि‍या और दोनों लोग घास के मैदान में पहुंच गए। एक छोटी सी घास की पत्‍ती दोनों ने मि‍लकर तोड़नी शुरू की। पर पत्‍ती बड़ी मजबूत थी। चींटी और पि‍न्‍नी ने मि‍लकर खींचा पर पत्‍ती नहीं टूटी। इस खींचतान में चींटी के छठें जूते में जो छेद था, वो और बड़़ा हो गया और जूते से चींटी का एक अंगूठा बाहर झांकने लगा। चींटी परेशान हो गई। अब तो ये छेद मोम से भी नहीं जुड़ने वाला और अगर कि‍सी तरह से मम्‍मी ने इसे मोम से जोड़ भी दि‍या तो पार्क में एक मैच में ही सारा मोम पि‍घल जाएगा और चींटी को जो बेहतरीन फि‍ल्‍डर का खि‍ताब मि‍ला था, वो भी छि‍न जाएगा। चींटी और पि‍न्‍नी घास नोंचने की मेहनत से थककर आराम से पार्क की बेंच के हैंडि‍ल पर लेट गए और दूसरी जुगत सोचने लगे। तभी पि‍न्‍नी को वि‍क्‍की जाता दि‍खाई दि‍या। उसने वि‍क्‍की को आवाज लगाई तो वि‍क्‍की भी अपने सारे पैर बड़े मन से इधर उधर डोलाते हुए उस बेंच के बगल लगे लैंपपोस्‍ट के नीचे पहुंचा और लैंपपोस्‍ट पर चढ़ गया। पि‍न्‍नी ने जब उससे कहा कि चींटी का छठां जूता आज टूट गया है और वो फि‍ल्‍डिंग नहीं कर पाएगी तब जाकर वि‍क्‍की के समझ में आया कि उसे चींटी के पास जाना चाहि‍ए था, न कि लैंपपोस्‍ट पर चढ़कर आराम से दूर दूर देखना चाहि‍ए था।

इतना समझ में आना था कि वि‍क्‍की के दि‍माग में एक जुगत आई। उसने चिंटू को आवाज लगाई, चिंटू ने अप्‍पू को और अप्‍पू ने चालाक चमचे चींटे को। चींटे को जब आवाज सुनाई दी तब वो अपने घर में बैठकर धौंकनी में हवा भर रहा था और उसके पापा इस साल फसल काटने के लि‍ए आग में हंसि‍या तपा तपाकर तेज कर रहे थे। अप्‍पू की आवाज आने का मतलब था कि जरूर कहीं कोई इमरजेंसी है, पर चींटा बेचारा अपने पापा को अकेले काम करता कैसे छोड़े। चींटा वहां से नि‍कलने की जुगत सोच ही रहा था कि उसके पापा ने उसे कुल्‍हाड़ी और उसकी बेंत दी और उसे धनोकू बढ़ई से ठीक कराके लाने को कहा। चींटे को तो जैसे मन का काम मि‍ल गया। उसने एक हाथ में बगैर बेंत लगी कुल्‍हाड़ी ली और कंधे पर कुल्‍हाड़ी का बेंत रखा और घर से मटकते मटकते धनोकू के यहां जाने को नि‍कला। हालांकि चींटे को पता था कि गली के बाहर अप्‍पू आवाज लगाकर उसी का इंतजार कर रहा है। चींटा अपने सारे सामान के साथ जैसे ही गली से बाहर नि‍कला, अप्‍पू ने उसे बताया कि वि‍क्‍की ने पार्क के लैंपपोस्‍ट पर चढ़कर सबको आवाज लगाई है, जरूर कुछ गड़बड़ हुई है और हम सबको जल्‍दी से जल्‍दी पार्क में पहुंचना चाहि‍ए। चींटे ने अप्‍पू से कहा कि पहले वो वो वाला काम कर ले, जो पापा ने उससे कहा है। इसपर अप्‍पू ने तुरंत चींटे को अपनी सूंड़ पर बैठा लि‍या और आनन फानन में दोनों धनोकू बढ़ई के पास पहुंचे। हांफते हुए अप्‍पू ने धनोकू बढ़ई से कहा कि जल्‍दी जल्‍दी से कुल्‍हाड़ी में बेंत लगा दो, हम लोगों को बहुत जल्‍दी जल्‍दी एक जगह पहुंचना है। धनोकू ने पांच मि‍नट में कुल्‍हाड़ी में बेंत लगा दि‍या और दो खपच्‍ची फंसाकर उसे खूब मजबूत भी कर दि‍या। अप्‍पू और चींटा वहां से भागे तो सीधे पार्क में लगे लैंपपोस्‍ट के बगल पहुंचे, उसी लैंपपोस्‍ट के बगल, जहां से चिंटू ने आवाज लगाई थी।

ओह... तो जूते में छेद हो गया है। अप्‍पू बोला। उधर जूते में हुए छेद से ज्‍यादा न खेल पाने से परेशान चींटी बेचारी रुंआसी भी हो रही थी। पि‍न्‍नी जो थी, वो चींटी को तरह तरह की कवि‍ता सुनाकर हंसाने की कोशि‍श कर रही थी। पि‍न्‍नी ने चींटी को सुनाया-

चकमक चकमक चि‍कचि‍क चि‍कचि‍क
ट्यूब से नि‍कली पि‍चपि‍च पि‍चपि‍च
अंदर डाला सारा पेस्‍ट
एक बूंद भी हुआ ना वेस्‍ट।

पर चींटी थी कि हंसने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसके दि‍माग में तो बस आज का मैच, जो वो अपने फटे जूते की वजह से नहीं खेल पा रही थी, वही चल रहा था। इतने में चींटे ने थोड़ा दि‍माग लगाया। चींटे से और थोड़ा ज्‍यादा दि‍माग अप्‍पू ने लगाया। चींटा भागा भागा गया और पार्क में से एक घास उसी कुल्‍हाड़ी से काट लाया। उधर अप्‍पू ने चिंटू और वि‍क्‍की को अपने ऊपर बैठाया और मधु आंटी के छत्‍ते के नीचे पहुंच गया। अप्‍पू के सि‍र पर चिंटू चढ़ा और चिंटू के सि‍र पर वि‍क्‍की। वि‍क्‍की कि‍सी तरह से छत्‍ते से एक बूंद मोम तोड़ने में कामयाब हो गया। मधु आंटी ने जब वि‍क्‍की को ये करते देखा तो उससे पूछा। वि‍क्‍की ने मधु आंटी को बताया कि चींटी के छठें जूते में एक छेद हो गया है और उसका अंगूठा भी जूते के बाहर आकर दि‍ख रहा है। हम सबको चींटी का जूता जोड़ना है। इतना सुनना था कि मधु आंटी भी सुई धागा लेकर अप्‍पू, चिंटू और वि‍क्‍की के साथ पार्क की तरफ उड़ चलीं।

पार्क पहुंचकर मधु आंटी ने पहले तो चींटी के छठें जूते के छेद को घास से ढंक दि‍या और फि‍र उसे चारों तरफ मोम से पैक कर दि‍या। सुई धागे से मधु आंटी ने जैसे ही जूते के छेद में गांठ मारी, चींटी खुशी से चीख पड़ी और पार्क में हर तरफ दौड़ने लगी। और पता है... उस दि‍न चौकसी आंटी की चि‍कचि‍क से दूर चींटी ने चार कैच पकड़े। चींटी की पूरी टीम खुश थी और अप्‍पू ने चींटी को अपनी सूंड़ पर बैठाकर पूरे मुहल्‍ले की सैर भी कराई।