Friday, March 6, 2015

मैनें उससे ये कहा/ मुर्शिद/ हबीब जालि‍ब

क्‍या चचा गालि‍ब अल्‍ला ताला को प्‍यारे हो गए ? क्‍या मियां मीर नूर खानम की याद में नहर का बर्फ जैसा पानी पी-पीक गला इतना खराब कर लि‍ए कि उनकी आवाज अब कि‍सी को सुनाई नहीं देती है ? खैर, वो दौर और था वो वक्‍त और था.. 

मरहूम हबीब जालि‍ब हों या पाश, हालि‍या ना गुजरने वाले गुजरे वक्‍त के जरि‍ए बहुत कम आवाजें सुनाई देती हैं, दोनों उन्‍हीं आवाजों में हैं। बाअदब माफ करने वाली गुस्‍ताखी के साथ मैं ये अर्ज करना चाहता हूं कि हर दौर की तरह इन्‍हें भी वो खि‍ताब मि‍लना चाहि‍ए, ये उस वक्‍त का सम्‍मान होगा, जि‍समें इन्‍होंने कहने के लि‍ए जलते हुए हर्फों का हल उठाया। वरना अंगुलि‍माल वाजपेयी भी आप हो सकते हैं और दो सौ चालीस रि‍सर्च खुदपर कराकर चश्‍मा पेट पे उगती नाक पर लगाकर एक पेट तक लटकता चेहरा पैदा करने में महारत हासि‍ल कर खि‍ताब और कि‍ताब, दोनों की ले सकते हैं।  

मैंने उससे ये कहा
            ये जो दस करोड़ हैं
            जेहल का निचोड़ हैं
         
            इनकी फ़िक्र सो गई
            हर उम्मीद की किरण
            ज़ुल्मतों में खो गई

            ये खबर दुरुस्त है
            इनकी मौत हो गई
            बे शऊर लोग हैं
            ज़िन्दगी का रोग हैं
            और तेरे पास है
            इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा

            तू ख़ुदा का नूर है
            अक्ल है शऊर है
            क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये शर पसंद हैं
इनकी खींच ले ज़बाँ
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा

            जिनको था ज़बाँ पे नाज़
            चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़
            चैन है समाज में
            वे मिसाल फ़र्क है
            कल में और आज में
            अपने खर्च पर हैं क़ैद
            लोग तेरे राज में
            आदमी है वो बड़ा
            दर पे जो रहे पड़ा
            जो पनाह माँग ले
            उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा

            हर वज़ीर हर सफ़ीर
            बेनज़ीर है मुशीर
            वाह क्या जवाब है
            तेरे जेहन की क़सम
            ख़ूब इंतेख़ाब है
            जागती है अफ़सरी
            क़ौम महवे ख़ाब है
            ये तेरा वज़ीर खाँ
            दे रहा है जो बयाँ
            पढ़ के इनको हर कोई
            कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा

            चीन अपना यार है
            उस पे जाँ निसार है
            पर वहाँ है जो निज़ाम
            उस तरफ़ न जाइयो
            उसको दूर से सलाम
            दस करोड़ ये गधे
           जिनका नाम है अवाम
            क्या बनेंगे हुक्मराँ
            तू "चक़ीं" ये "गुमाँ"
            अपनी तो दुआ है ये
            सद्र तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा

Tuesday, March 3, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे-6

आदमी का मन है कि मन से बाहर बस यूं ही नि‍कल जाता है, पर मन सी बात कहीं पाता है-नहीं पाता है इसकी खबर लि‍ए बगैर ही मन से बाहर नि‍कलता और अक्‍सर तो बहता चला जाता है। औरत का मन है कि मन ही मन सि‍मटा और बगलों में चि‍पका कभी कभी सड़कों पर बेतरतीब घि‍सटता चला जाता है। आदमी फूटना चाहता है और औरत महसूस करना चाहती है। आदमी मन में बात करते करते बीत जाना चाहता है, औरत एक मजबूत जकड़न में जकड़े जकड़े रीतती जाती है। आदमी सामने लगे झंडे की बात करता है, औरत उसे उड़ाने वाली हवा की। आदमी को भूख भी लगी है, औरत को चाय की इच्‍छा है। आदमी रोना चाहकर भी नहीं रो सकता, औरत न चाहते हुए भी बार बार रो देती है। आदमी का मन, मन से जैसे ही बाहर आना चाहता है, औरत का मन झट से कहीं छुप जाता है। इस बीच हवा थोड़ी सी तेज चलती है, आदमी जैकेट पहन लेता है। औरत एक और वादा चाहती है, आदमी मन ही मन मुस्‍कुरा देता है। आदमी सपने देखता है, औरत कहती है कि वो सपनों से घबराती है क्‍योंकि उसे अकेले मरने के सपने आते हैं और यकीनन ये एक सार्वभौम सपना होगा जो ति‍रछी नजरों से नहीं देखा जाता होगा, जो बेइमानी के साथ कभी न बरता गया होगा। एक दिन आदमी ने औरत को एक सपना बताया। इसमें न आप था, न तुम था। जो था वो बस एक शायद था। ठीक दूसरे दि‍न औरत ने भी वही सपना देखा। दोनों अपने अपने सपनों में घि‍सट रहे थे, लोग दोनों को दोनों तरफ से खींच खींचकर आधा कर देना चाहते थे। पहले से ही दोनों की आधी जान और पूरा मन सपनों में ही जज्‍ब हो रहे थे, उसपर ये शायद के बाद की दुनि‍या, जि‍से कोई भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहा था। सपनों में घसीटे जाने से ऊबकर दोनों ने एक दूसरे पर शर्तें लादने का नया दौर शुरू कर दि‍या। असल में ये दौर नहीं बल्‍कि शुरुआती मुफलि‍सी का मन में दायर वो मुकदमा था जि‍समें न तो मुद्दई था और न गवाह। न वकील था और न ही कोई मुंशी। दोनों जज थे और वो भी दोनों की तरफ पीठ कि‍ए हुए। कैसी अजीब पीठ थी उस मुकदमे की जि‍सके जज ही शायद की दुनि‍या में आकर एक दूसरे पर शर्त दर शर्त दुश्‍मन बने जाते थे। आदमी हंसता है कि वि‍दा का गीत दोनों ने शुरुआत से ही पढ़ा था। आंगन में बच्‍चा खि‍ला लेने की ख्‍वाहि‍श से लेकर जांघों की मछलि‍यों को एक साथ बरता था।
(जारी...)

मि‍लेगा तो देखेंगे-इंट्रो- विपुमेले में हि‍ले हुए को कैसे देखें

हि‍लते-हि‍लते शुरू होता है। क्‍या मजाल दि‍न कि‍सी भी दि‍न चैन से शुरू हो। कैसी उम्‍मीद भरी नजरों से देखता हूं, मायूसि‍यों के डूबे समंदर में बेहयाई से इस हि‍लन को थामकर सुस्‍थि‍रता की तरकीब हासि‍ल करने को हाथ पैर पटकता हूं, मगर दि‍न की तो कोई क्‍या कहे, हरामखोर डोंगल तक जो अपनी जगह सुस्‍थि‍र रहे, कनेक्‍ट होता नहीं कि डि‍स्‍कनेक्‍ट होता हूं। ओह... कैसा हिलता हुआ डोंगल है और कैसे हि‍ले हुए दि‍न। बेवकूफ लोग क्‍या जानें, क्‍या हमारी हसरत थी, खूब थी कि हम भी तीन नई कि‍ताबों के कवर के साथ फोटो खिंचाएं। मगर क्‍या मजाल कि फोटो चैन से खिंच जाए, वह भी साली मि‍ली, तो हि‍ली हि‍ली। एक प्रेम था ठहरा हुआ, चल रहा सा, मगर आज खबर हुई कि वह भी अपनी जगह था हि‍ला-हि‍ला सा। सन्‍न हूं... यह कैसा दौर है? कैसा समय है? कैसे लोग हैं? और कैसा मैं हूं? इतने हैं फोटो लहरा रहे, क्‍या क्‍या हि‍ला रहे, फि‍र ऐसा क्‍यों है कि मैं ही हि‍ला हि‍ला हुआ हूं? दि‍खता हूं कभी कभी पुस्‍तक मेलों में खुद को, मगर वह सुस्‍थि‍र मैं नहीं, 'मेरा मैं' हि‍ला हुआ है।

मेरे महबूब तुम्‍हारा शुक्रि‍या कि तुमने ऐसा हि‍लाया।

Monday, March 2, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 5

जब भी आदमी अपने मन को माशूक कर थोड़ा सा भी मुलायम होने की सोचता, मन के सारे कोने कमरे की हर ओर से नि‍कलकर एक साथ आ खड़े होते और शोर करने लगते। ये लालसा भी आदमी को उस शोर से बाहर न नि‍काल पाती जो कोने दर कोने उसके मन में पैवस्‍त हुए जाते थे। औरत बार बार भरोसा दि‍लाती थी, आंखों में मन को उतारती थी, हवाओं को बि‍छा देती थी, पहाड़ों में लहलहा उठती थी और टटोलने पर फूटकर बहने भी लगती थी। आदमी कुछ और कमजोर होकर कहता था कि वो यूं ही फूटकर बह जाएगी और उसके लब एक एक कतरा आब को यूं ही तरसते रहेंगे, बजाय इसके भी मन उस आब का माशूक है और आइंदा भी बना रहेगा। पहाड़ी नदी ने पत्‍थर पर कई कतरे बना डाले थे जि‍नमें से बूंद बूंद पानी पत्‍थर और उस नदी के होने तक रि‍सता रहेगा। ये एक सोची समझी नि‍यति थी जो लाख मुफलि‍स वक्‍तों के होते हुए तय हो चुकी थी। आदमी को गुमान था कि वो होनी को टाल सकता है, औरत को यकीन था कि वो होनी को पलट सकती है। दोनों के मन का शोर उस मैदान में होते शोर के साथ बढ़ता जा रहा था, जो कई तारीखों का नया गवाह हुआ होना चाहता था। उस तनहा झंडे के साथ फैलता जा रहा था जो खुद ब खुद चमकने में नाकामयाब था, जि‍स दि‍न में दि‍न की तो रात में बि‍जली सी रोशनी की हर वक्‍त जरूरत थी, जो खुद लहराने या फहरने में भी कि‍सी काम का न था अगर हवा न चले। कोने थे कि चुपके से कैसे आकर कमरे में खड़े हो जाते थे, शोर की उस डूब में पता ही न चलता था, लेकि‍न जब झिंझोड़ते थे तो दोनों उठ-उठकर अलग अलग या एक ही दि‍शा में बगैर एक दूसरे को देखे भागने लगते थे। इन सब के बीच कठोर हाथों में जो हाथ था, वो अपनी मुलायमि‍यत न खोने के लि‍ए दूसरे हाथ से लड़ रहा था, पर बार बार हारकर मायूस बैठ जाता था या कान में कुछ बुदबुदाने लगता था। कहीं भी न जाने का ये वक्‍त दोनों को बेंच से लगातार उठने को मजबूर कर रहा था और दोनों ने खुद भी कहीं न पहुंचने का शाप अपनी अपनी मर्जी से चुना। दोनों भागने के लि‍ए बैठे रहे। इस बीच हाथ उन सारी खुशबुओं को याद करने के लि‍ए उनके कोनों में दुबका रहा, जो अभी तक नि‍कलकर कमरे में आने की हि‍म्‍मत नहीं कर पाए हैं, पर जि‍नका आना होना है और होना ही आ जाना।

Sunday, March 1, 2015

मि‍लेगा तो देखेंगे- 4

कि‍तनी बार तो उसने औरत से कहा कि वो उसके मन सी नहीं थी और उसका मन भी उसके मन सा नहीं था, इसीलि‍ए जो था, वो मन नहीं था और जो नहीं था, वो अरगनी पर लटकी आस्‍था की मानिंद चि‍ढ़ा रही थी। जाने कैसा वो वक्‍त था, जाने कैसी वो हवा थी, जाने कैसा वो खोल था और जाने कैसे वो आदमी-औरत थे जो बार बार अपने मन मुताबि‍क मरने का वादा लेकर अपनी बेहूदी आस्‍थानुमा मायूसि‍यों को थोड़ा और पुख्‍ता कर लेना चाहते थे। ये पत्‍थर पर जबरदस्‍ती उगती काई जैसी को अनचाही इच्‍छा ही रही होगी जि‍सपर फि‍सल कर जबरस्‍ती की आस्‍थाएं और मायूसि‍यां अपने पूरी होने की ताकत के साथ आत्‍मा पर गि‍रती हैं और अपने आने को ही खोते हुए एक दरार पैदा करके आगे बढ़ जाती हैं। आदमी बार बार उससे कहकर बगैर नाप का एक और गड्ढा खोदता था कि तुम जिंदा रहना ताकि मुझे मरते हुए देख सको या मेरे मरने की खबर तो पा सको। औरत फि‍र से डर जाती थी कि मरने पर, मन से मरने की एकाधि‍कृत आस्‍था उसी की है, जो गड्ढा उसने खुद बाकायदा नाप के साथ खोदा है, वो कि‍सी और का कैसे हो सकता है। अगर मायूसि‍यों की प्रमेय हर कोई सिद्ध करने लगे तो वो पाइथागोरस का नंगा बदन जली कोठी के कूड़ेदान में ही फेंक दि‍ए जाने काबि‍ल है। बाद में भले ही कोई जेसीबी उसे कूड़े के साथ उठाकर डंपिंग ग्राउंड में फेंक आए, जहां वो टनों कूड़े के नीचे अनगि‍नत सालों तक के लि‍ए दबा रहे और दबा दबा एकदि‍न यूं ही खाद बनकर मि‍ट्टी में मि‍ल जाए। पर उससे भी मुसीबत का अंत न होना था क्‍योंकि डंपिंग ग्राउंड में भी गाहे बगाहे हरी दूब उग ही आती है। कभी कि‍सी से भी खफा न होने वाली दूब, कभी कि‍सी का भी अहि‍त न करने वाली दूब, हमेशा दूसरों का पेट भरने वाली आत्‍मा पर उगी वो दूब आत्‍मा के डंपिग ग्राउंड में हमेशा खाकर खत्‍म कर दी जाती है, लेकि‍न कभी मरती नहीं, हरी होकर उग ही आती है। इंसान की मुसीबतें हरी दूब की तरह हर कहीं उग आने को बेताब हैं। मायूसि‍यों की फि‍सलन हर काठ पर फंफूद की तरह फूटती रहती हैं। आस्‍थाओं की काई हर पत्‍थर पर जमी पसरी है और इनमें से कोई भी ऐसा सुचालक नहीं, जो एक रात को कि‍सी एक दि‍न से भी जोड़े या जो हवाओं का मन बताकर आत्‍मा में एक बि‍जली कौंधा सके। ये सब तो बस एक मुफलि‍सी थी जो दोनों के मन में बराबरी में दायर थी। जज दो थे, अदालत एक थी।  
(जारी...)