Tuesday, May 15, 2007

संघ, सुदर्शन और साम्प्रदायिकता

अगर सब कुछ काला हो जाय तो ? काला आसमान , काली जमीन , काले काले आदमी , काली काली औरतें। बस सब कुछ काला हो जाय तो दुनिया कैसी होगी ? चलिये काला न सही किसी और रंग का हो जाय तो ? बस सब कुछ एक ही रंग का हो जाय। भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहाँ सारे रंग पाए जाते हैं। हरा , नीला, सफ़ेद, काला, केसरिया और बहुत सारे रंग। सबसे ज्यादा मत यहाँ पर हैं और मतांतर भी। यही तो भारत की खासियत है जो इसे दुनिया के कई देशो से अलग करती है और कई देशों को अपनी तरफ खींचती भी है। लेकिन अंधराष्ट्रवाद के नशे में डूबे कुछ लोगों को ये सारे रंग पसंद नही हैं। न सिर्फ नापसंद हैं बल्कि वो इन सारे रंगो को मिटा देने के लिए कृत संकल्प हैं। अभी दिल्ली मे हुए एक कार्यक्रम में सर संघ डिरेबर कूप सी सुदर्शन ने इन सारे रंगो को ख़त्म करने की बात कही । उन्होने कहा कि सिंधु के किनारे रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं।
दरअसल इस मामले में संघ की नियति एकदम साफ है। जो कि हिंदू ही होना चाहिऐ , की तर्ज़ पर आगे बढती है। ये अंग्रेजों द्वारा दिए गए इतिहास तो तोड़ मरोड़कर अपने पक्ष में कर लेने की निहायत ही भद्दी कोशिश है। दरअसल अभी तक सारे इतिहासकार ब्रिटिश इतिहासकार जे सी मिल के ही इतिहास को मानते चले आये हैं और किसी ने उसे दोबारा चेक करने की कोशिश ही नही की। मिल ने भारतीय इतिहास को तीन भागों मे बाँटा था। पहला हिंदू सभ्यता , दूसरा - मुस्लिम सभ्यता और तीसरा खुद उनका यह्नी कि ब्रिटिश सभ्यता। इस बारे में रोमिला थापर , जो खुद इतिहासकार हैं , कहती हैं कि "कितनी दिलचस्प बात है , इसाई सभ्यता नाम नही रखा। "
ऐसा मान लिया जाता है कि १००० ईसा पूर्व से १२०० ईसा पूर्व तक का जो काल है वह हिंदू काल है। यह काल विभाजन राज्वंशो के आधार पर किया गया। लेकिन उसी काल में मौर्य , भारत यवान , शक , कुषाण वगैरह भी तो थे जो कि हिंदू नही थे । बाद में बौध्द राजा हुए लेकिन वह हिंदू धर्म के विरोधी राजा नही थे। लेकिन उन्होने ने अपनी पहचान बौध ही रखी थी । (बौध धर्म का उदय ही वर्ण व्यवस्था के विरोध के फलस्वरूप हुआ और जब वर्ण व्यवस्था के अनुयायी लोगो ने राज्वंशो से बौध राजाओं को हटा दिया तो वो कहने लगे कि बौध भी हिंदू धर्म का एक अंग है जबकि ऐसा बिल्कुल नही है। बाबा साहब अम्बेडकर ने भी इसका प्रयोग हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था से छुटकारा पाने के लिए किया था न कि एक हिंदू धर्म से निकलकर दूसरे हिंदू धर्म मे घुस जाने के लिए। ) तो क्या इस काल को बौध काल के नाम से नही पुकारा जाना चाहिऐ? रोमिला कहती है , " कम से कम ५०० ईसा पूर्व से ३०० इसवी तक के काल को बौध काल ही कहा जाना चाहिऐ क्योंकि इसके अनुकूल ही इस भू भाग में बौधों की विशाल जनसँख्या मौजूद थी। "
जारी...

शूद्रों के बुद्ध और ब्राह्मणों के राक्षस

संघ,सुदर्शन और साम्प्रदायिकता -२
एक सवाल है कि हिंदू शब्द को क्या समझा जाय ? आख़िर हिंदू क्या है और कैसे बन गया ? हिंदू शब्द के बारे मे कुछ कहने से पहले या स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यह शब्द इस्लाम के भारत मे आने से पहले के किसी ग्रंथ या शास्त्र में नही मिलता। दरअसल यह शब्द अरबी लोगों ने भारत के लोगों को पुकारने के लिए प्रयोग किया क्योंकि भारत का यह इलाका हिंद भी कहलाता था। यानी कि हिंदू और हिंदुत्व की जो भी अवधारणा है, वह पूरी की पूरी विदेशी लोगों द्वारा बनाईं और दीं गई है। और इसी विदेशी अवधारणा का सहारा संघ ने लिया और इसे कहा कि सभी तो हिंदू हैं। वह भी जिनके वंशज बाहर से आये हैं।
आर्य भी तो बाहर से आये थे !!
हिंदू और आर्य , ये दो शब्द संघ की शाखाओं मे धड़ल्ले से प्रयोग किये जाते हैं। अब दूसरे शब् , जिसे आर्य कहते हैं और जिसे कथित हिंदुत्व के कथित ठेकेदार कहते हैं हम आर्य हैं और इस देश के मूल निवासी हैं। आर्यों का मूल निवास स्थान कभी भी भारत नही रहा। वो बाहर से आये। लोकमान्य तिलक ने अपनी किताब आर्कटिक होम ऑफ़ दी वेदाज में बताया है कि आर्यों का मूल निवास स्थान आर्कटिक था। हालांकि काफी सारे लोग इससे सहमत नही हैं तो भी इस बात से तो सहमत हैं ही कि आर्यों का मूल निवास स्थान भारत नही था। यहाँ तक कि हड़प्पा और सिंधु सभ्यता की खोज करने वाले राखालदास बनर्जी और माधोस्वरूप वत्स जैसे लोगों ने भी आर्यों की संस्कृति को हड़प्पा और सिंधु से अलग बताया है। यानी कि आर्य सिंधु सभ्यता के नही थे। अब न तो हिंदू रहे सिंधु के और ना ही आर्य रहे आर्यव्रत के। पता नही सुदर्शन का क्या होगा ?

अब थोडा सा अबाउट टर्न लेते हैं और आते हैं बुद्ध की तरफ। बुध्धम शरणं गच्छामी। हमारे कई सारे मित्रों ने विरोध किया कि बुद्ध को मत बांटो। और भी कई बातें कही थी लेकिन उनका जिक्र यहाँ बेमानी है। उन सबके जवाब मैं देने की कोशिश कर रहा हूँ।
तो प्रिय मित्रों। बौद्ध तो कभी हिंदू थे ही नही। और यहाँ एक बात और साफ हो जानी चाहिऐ कि बौद्धों से पहले कोई हिंदू शब्द या हिंदू धर्म था। इसके बारे मे मैंने पहले ही साफ कर दिया है। बौद्ध धर्म हिंदू धर्म के अन्तर्गत नही आता , इस बात को समझने से पहले हमे वर्ण व्यवस्था का वह समाज जो बुद्ध के पहले था, उसे समझना जरूरी है। बुद्ध के आने से पहले पूरा समाज चार वर्णों मे बटा हुआ था और दुर्भाग्य से आज भी बटा ही हुआ है, कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नही आ गया है। पहला ब्रह्मण , दूसरा क्षत्रिय तीसरा वैश्य और चौथा शूद्र। इन सारे वर्णों के कार्य विभाजन को तो आप अभी भी समझते ही होंगे। इनमे से दो वर्ण , यानी कि वैश्य और शूद्रों कि स्थिति का अध्ययन करने पर पता चलता है कि शूद्रों और वैश्यों की स्थिति बहुत खराब थी लेकिन उनमे से भी शूद्रों की स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब थी। इनकी जनसँख्या सबसे ज्यादा थी फिर भी समाज की सबसे ज्यादा प्रताड़ना इन्होने ही झेली। शाशक वर्ग जो कि क्षत्रिय और ब्राह्मण थे , उनके लिए ये जानवर ही थे। इस वर्ण विभाजित समाज में बुद्ध ने एक नया धर्म दिया जिसका मुख्य आधार ही समानता थी। यह उस वर्ण विभाजित समाज के मुखियाओं के विरुद्ध एक विद्रोह था। ये उस समय की क्रान्ति थी। जिसने पूरा समाज ही उलट डाला। ये वही धार्मिक क्रान्ति थी जिसकी बात बाबा साहेब अम्बेडकर करते हैं। और जिसकी आवश्यकता क्रान्ति के पूर्व की धार्मिक क्रान्ति के रुप मे बताते हैं। उस समय की क्रान्ति के लिए माहौल तैयार किया वर्ण व्यवस्था ने , जिससे कि लोग बुरी तरह से उब चुके थे। एक बात और साफ हो जाय कि शूद्र हिंदू नही थे बल्कि उनका तो कोई धर्म ही नही था। वो तो जानवर माने जाते थे।

जारी है ....

जिन्हे सुदर्शन छाती फुलाके हिंदू कहते हैं

संघ,सुदर्शन और साम्प्रदायिकता- आख़िरी
उच्च वर्ण के लोगों द्वारा बनाए गए ऐसे ही जानवरों की समानता के लिए ही बुद्ध ने अपनी पदयात्रा शुरू की थी। उद्देश्य था एक समतामूलक समाज की स्थापना। और फिर एक समय तो ऐसा आया जब भारत के अधिकांश भूभागों पर बौद्ध राजाओं का शासन था। जिसे जे.सी.मिल ने हिंदू काल कहा है उसमे से ज्यादातर बौध्ध्काल ही है और मिल ने जानबूझकर इसे हिंदुकाल कहा जिससे भारत मे यह स्थापित हो सके कि यहाँ पहले तो हिंदू थे और बाद में उन्हें भगाकर मुस्लिम शासक बन गए। जिनके अत्याचारों से अगर किसी ने मुक्ति दिलाई तो वह अंग्रेज थे। यह जान लें कि उस समय तक इस महाद्वीप का मुख्य व्यापार स्थल (हालांकि उस समय तक व्यापार व्यवस्था इतनी टाईट नही हो पायी थी) कुरुक्षेत्र और उसके आस पास का इलाका था। तो यह अभूतपूर्व खोज थी लोहे के भंडारों का उड़ीसा और बिहार के क्षेत्रों मे पाया जाना। ये उस समय की सबसे बड़ी खोज थी जिसने इस महाद्वीप की धुरी ही बदल कर रख दीं। अब तक की सारी सांस्कृतिक, राजनितिक गतिविधियों के केंद्र बदलने लगे और खिसक कर उसी तरफ चले गए जिस तरफ लोहा पाया गया। यही वह वक्त था जब भारत में हर चीज़ की व्यवस्थित प्रगति शुरू हुई। व्यापार, शिक्षा, दर्शन,गणित , विज्ञानं,भाषा और साहित्य जैसे क्षेत्रों के व्यवस्थित विकास का यही युग . इस बात पर एक बार फिर से याद कीजिये कि बौद्ध धर्म को अपनाया किसने था? वही जो शूद्र थे, वो नही जो ब्राह्मण थे। वो नही जिन्हे सुदर्शन छाती फुलाकर कहते हैं कि हिंदू हैं। बहरहाल , शूद्रों ने बौद्ध धर्म ग्रहन करने के बाद काफी प्रगति की. उनकी इस अप्रत्याशित प्रगति से कथित हिंदू खेमे मे बौखलाहट आनी स्वाभाविक थी और वह शुरू भी हो गयी। मनु स्मृति जैसे अमानवीय किताबों और महाभारत जैसे विभ्रमी ग्रंथों मे कुछ लचीलापन लाने की बात सोची जाने लगी जिससे कि लोग हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित होन और शासक वर्ग की तरफ होने वाला उच्च कुलीन पलायन रूक सके। यही वह समय था जब गीता जैसे अंतर्विरोधी ग्रंथ की परिकल्पना की गयी।

Sunday, May 6, 2007

कौसर की अजन्मी बेटी के नाम

अंशु मालवीय
मैं नही जानता कि अंशु कौन हैं , पता लगाने की सोची लेकिन मेरे फोन मे बैलेंस ही नही था . लेकिन इसे पढने के बाद...मुझे "हिंदू" शब्द गाली लगने लगा है, आख़िर किस तरह मैं इसे अपने से नोच कर फेंकू...किस तरह से.... और "हिंदू" गाली लगने लगा ही नही है , महसूस हो रह है कि मैं खुद एक गाली ही हूँ....


सब कुछ ठीक था अम्मा
तेरे खाए अचार की तरह
तेरी चखी हुई मिटटी
अक्सर पन्हुचते थे मेरे पास..... ।
सूरज तेरी कोख से छ्न कर
मुझतक आता था।

मैं बहुत खुश थी अम्मा !
मुझे लेनी थी जल्दी ही
अपने हिस्से की सांस
मुझे लगनी थी
अपने हिस्से की भूख
मुझे देखनी थी
अपने हिस्से की धूप।

मैं बहुत खुश थी अम्मा !
अब्बू की हथेली की छाया
तेरी पेट पर देखी थी मैंने
मुझे उनका चेहरा देखना था
मुझे अपने हिस्से के अब्बू देखने थे
मुझे अपने हिस्से की दुनिया देखनी थी।
मैं बहुत खुश थी अम्मा !

एक दिन मैं घबरायी.... बिछ्ली
जैसे मछली--
तेरी कोख के पानी मे
पानी मे किस चीज़ की छाया थी अनजानी ....
मुझे लगा
तू चल नही घिसट रही है
मुझे चोट लग रही थी अम्मा !
फिर जाने क्या हुआ
मैं तेरी कोख के
गुनगुने मुलायम अँधेरे से निकल कर
चटक धूप
फिर.....
चटक आंगन में पहुंच गयी।

वो बहुत बड़ा आपरेशन था अम्मा!

अपनी उन आंखो से
जो कभी नही खुली
मैंने देखा
बडे बडे डॉक्टर तुझ पर झुके हुए थे
उनके हाथ मे तीन मुँह वाले
बडे बडे नश्तर थे अम्मा....
वे मुझे देख चीखे अम्मा !
चीखे किसलिये अम्मा--
क्या खुश हुए थे मुझे देखकर!

बाहर निकलते ही
आग के खिलौने दिए उन्होने अम्मा...
फिर तो मैं खेल मे ऐसा बिसरी
कि तुझे देखा ही नही--
तूने अन्तिम हिचकी से सोहर गाई होगी अम्मा !

मैं कभी नही जन्मी अम्मा
और इसी तरह कभी नही मरी
अस्पताल मे रंगीन पानी मे रखे हुए
अजन्मे बच्चों की तरह
मैं अमर हो गाई अम्मा!
लेकिन यहाँ रंगीन पानी नही
चुभती हुई आग है!
मुझे कब तक जलना होगा ..... अम्मा !

( कौसर बानो की बस्ती पर २८ फ़रवरी २००२ को हमला हुआ था। वह गर्भवती थी। हत्यारों ने उसका पेट चीरकर गर्भस्थ शिशु को आग के हवाले कर दिया था। इस कविता मे उस शिशु को लडकी माना गया है , कुछ अन्य संकेतों के लिए )

Thursday, May 3, 2007

पेठिया का पावर

संदीप कुमार
पेठिया ऎसी चीज़ ही है कि जल्दी भूलती ही नही। और ये ना भूलना शायद हमारे अन्दर बची हुई इमानदारी को भी काफी सच्चाई से बाहर निकालता है , एक नयी दुनिया बनाता है , जिसके आस पास पेठिया है , उसमे टहलने वाले लोग हैं, चंद सामान रख कर कुछ बेचने वाले दूकानदार हैं और इन सब के बीच विचरते संदीप हैं । देखते हैं इस बार संदीप पर पेठिया ने कौन सा रंग चढाया है।

मैंने तो आप सबों को बताया ही था कि पेठिया का पड़ोसी हूं मैं। मेरे घर के सामने ही पेठिया (पेठिया माने साप्ताहिक हाट...बार-बार हिन्ट नहीं दूंगा... इसे रट लीजिए, बूझे) लगता-सजता है। हफ्ता में एक दिन ही सही लेकिन उस दिन (यानी गुरूवार को) अपने भाव कम नहीं होते। उस दिन पूरे पावर में रहता था मैं। ये उन दिनों की बात है जब मैं स्कूल में था। पिछले दशक से जबसे पढ़ने-लिखने (!) के बहाने घर से बाहर रहा और आज जब अपनी (कु)काबिलियत की वजह से टीवी के पर्दे के पीछे से मीडियाकारिता (पत्रकारिता नहीं जनाब) कर रहा हूं तो वो दिन बहुत याद आते हैं। दिहाड़ी के चक्कर में नोएडा-इंदिरापुरम अप-डाउन करते-करते चिर कुंवारा होते हुए भी यूं तो अपना कस्बा बगोदर और घर-परिवार बहुत याद तो नहीं आता पर जैसे ही गुरूवार का दिन आता है मुझे किसी की याद आए न आए, पेठिया की याद जरूर सताने लगती है।
अरे, वो भी क्या दिन थे जनाब। अपनी तो रज-गज (पूरी चलती) ही थी मानो। पेठिया में किरासन तेल (आपलोग इसे शायद घासलेट कहते हैं न...जब पहली बार मैंने किरासन तेल के लिए ये नाम सुना था, तो काफी हंसा था, आखिर तेल भी क्या घास पर लेट सकता है..) बिकता था। हफ्ते में एक दिन के लिए। किरासन की बड़ी किल्लत थी। राशन-कार्ड पर जो तीन-चार लीटर तेल महीने में मिलता था, उससे तीस दिन ढिबरी जलना मुश्किल था। सो बिना राशन-कार्ड पर मिलने वाले किरासन लेने के लिए पचीसियों गांव के लोग पेठिया के दिन कई कोस दूर से उमड़े चले आते थे। लाइन लगती थी लंबी-सी। लोग तो बुधवार की रात से ही मोबिल का पांच लीटर वाला डब्बा या कनस्तर लाइन में लगा देते थे। रात में लोग मेरे ही बरामदे में सोते और तीन-चार बजे सुबह पेठियाटांड़ में जम जाते। इतनी जुगत करने पर गुरूवार (पेठिया के दिन) की सुबह लोग किरासन तेल का ड्रम खत्म होने से पहले एक-दो लीटर पा पाते थे। लेकिन मुझे किरासन के लिए इस तरह की कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती थी। तेल बेचने वाला डीलर मेरे दरवाजे पर ही मोटरसाइकिल लगाता था और इसकी एवज में बिना किसी मेहनत के मुझे चार लीटर किरासन मिल जाता था। हालांकि कीमत मैं चुकाता था पर किरासन मिल जाना ही अपने-आप में बहुत बड़ी बात थी नहीं तो पॉकेट में गड्डियां रहते हुए भी किरासन तेल नहीं मिल पाता था, जनाब।
साथ ही जो लोग दूर गांवों से पेठिया आते थे उनमें से अधिकतर लोग मेरे दरवाजे पर ही साइकिल लगाते। और ये मेरी मर्जी होती कि किसकी साइकिल यहां लगे और किसकी नहीं। और जो साइकिल भाया उसे चलाने का पूरा सुख भी उठाता। सीधी हैंडिल वाली रेंजर साइकिल अपने मोहल्ले में सबसे पहले मैंने ही चलाई थी। ये साइकिल एक गांव का लड़का लेकर आया था जिसकी हाल ही में शादी हुई थी और स्कूल जाने के लिए उस दूल्हे राजा को ससुराल वालों ने ये साइकिल और एक चमचमाती टाइटन घड़ी, संतोष कंपनी का रेडियो दिया था। बंदा हाईस्कूल में मुझसे सीनियर था पर पेठिया के बगल वाला होने के कारण मेरे हर नखरे सहता था। पेठिया के दिन उसे अपनी साइकिल मेरे दरवाजे पर लगाना जो होता था।
इसी तरह कई लोगों को झोला की भी जरूरत होती तो मेरे पास ही आते। एक बार उस मास्टर साहब को कटहल बहुत भा गया जो बच्चों को मारने-पीटने को लेकर बेहद बदनाम थे। कभी-कभी मुझे भी कनेठिया देते थे। पर मास्टर साहब कटहल लेकर कैसे जाएं, झोला तो था नहीं। उन्हें मेरी याद आई और मां की नजरों से बचाकर उन्हें झोला दे भी दिया। हालांकि आज तक वो झोला उस मास्टर साहब ने नहीं लौटाया पर क्या मजाल कि उस दिन के बाद कभी स्कूल में मुझे नजर उठाकर भी देखें। ऐसे मेरी मां को हमेशा मुझपर ही शक होता रहा कि मैंने उनका वो कढ़ाई किया हुआ झोला कहीं इधर-उधर कर दिया जो उन्होंने अपनी शादी के पहले ढिबरी की रोशनी में आंखें फोड़-फोड़कर बनाया था और उसपर लिखा था स्वागतम। (सच इसलिए बोल दिया क्यूंकि...मेरी मां इस कन्फेशन को नहीं पढ़ पाएगी...)
पेठिया के बगल वाला होने पर एक अदना-सा बच्चा भी पावरफुल हो जाता है। मुझे नहीं पता कि बगोदर में आजकल मेरी वो जगह किसने हासिल की है। शायद पड़ोसी का कोई बच्चा आजकल पूरे पावर में हो। मेरे जमाने में तो साइकिल ही हाथ लग पाता था। हो सकता है उसे बाइक उड़ाने का मौका मिल जाता हो।
इसे भी अब को-इंसीडेंट ही कहें कि मेरे कस्बे बगोदर में भी गुरूवार को ही पेठिया लगता है तो आज जिस इंदिरापुरम में मेरी भाड़े की रिहाइश है, वहां भी गुरूवार को ही पेठिया (अब यहां के लोग तो इसे बाजार ही कहते हैं, कहते रहे, मुझे क्या, मैं तो पेठिया ही कहूंगा) लगता है। पर यहां इंदिरापुरम में वो पावर कहां जो बगोदर में था, बॉस।