Sunday, April 15, 2007

अब मैं मरती हूँ ...4

उसके चहरे की उन्मुक्त हँसी अभी भी दिखाई दे जाती थी लेकिन पता नही मुझे ऐसा क्यूं लगता था कि ये हँसी सिर्फ़ उसके चेहरे क़ी ही है . उसकी आँखें धसति ही जा रही थी . चेहरे का नूर दिनो -दिन ख़तम होता जा रहा थ . एक दिन उसका एक्सीडेंट हुआ तो उसने मुझसे रिक़्वेस्ट क़ी कि मैं दफ़्तर में किसी को बताए बिना ये बहाना बना कर दू कि मैं उसे आटो मे बिठाने जा रहा हू जबकि मुझे उसे उसके बॉयफ़्रेंड के पास ले जाना था जो कि उसका इंतेज़ार रोड पे कर रहा था . ख़ैर मैं उसे उसके बॉयफ़्रेंड के पास छोड़ आया . उस दिन मैने उसके बॉयफ़्रेंड को देखा . अच्छा ख़ासा स्मार्ट लड़का था . मैने सोचा कि आख़िर क्या वजह है कि उस उमर के लड़के जो सपना देखते हैं उसके विपरीत उसने इस प्रियंका जैसी लड़की को , जो ऐसे लड़को के मानदंड पर कतई ख़री नही उतरती है , वह इस से प्रेम करने लगा . एह एक काफ़ी सोचने वाली बात थी ... ख़ैर इतना सब होने के बाद नोयडा मे बहुचर्चित निठरि मे मार्मिक हत्या कांड हो गया. अब काफ़ी दिनों तक मेरी बातचीत उससे नही हो पाई . आख़िरी बार मेरी उससे क़ायदे से एक ही बार बातचीत हो पाई . वह फिर से मुझसे आत्महत्या के बारे मे पूछ रही थी . बातों ही बातों मे उसने नटवर सिंह कि पुत्रवधू कि बात छेड़ी . वो शराब पीकर और उसके बाद नींद कि गोली ख़ाके मर गयी थी . इस घटना के बाद वो मुझसे अक्सर शराब की माँग करने लगी . लेकिन मैं हमेशा उससे बहाने बना देता था . अभी कुछ दिन पहले ही जब हम लोग एक समाचार टी वी मे एक्ज़ाम देने जा रहे थे , वो मेरे घर आई . उसने फिर से शराब की माँग शुरू कर दी . यहाँ तक की रसोई मे रखी ख़ाली शिषियों मे भी काफ़ी खोजबीन की लेकिन उसे मायूस लौटना पड़ा. हम लोग काफ़ी जल्दी मे थे इसलिए कोई ख़ास बात नही हो पाई . मैने उसे सोमवार को निकलने वाली मेगज़ींन का सारा समान दिया और उसे कहा की इसे गुप्ता को दे देना . लेकिन पता नही क्यों मुझे लग रहा था की कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है . रास्ते मे भी उसने काई बार मुझे फ़ोन करके कहा की कब आ रहा हो वापस ? मैं उस समाचार चैनल मे अपना फ़ॉर्म जमा करके तक़रीबन 4 घंटे बाद वापस लौटा . वह अपने विभाग से मेरे पास आई ,मेरे सामने बैठ गयी . उसके बाद वो फिर से मुझसे शराब की माँग करने लगी . मैने जानने के लिए काफ़ी ज़ोर दिया तो उसने मुझे बताया की आत्महत्या करने के लिए उसे शराब चाहिए थी . लेकिन उसकी किसी भी बात पर मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था . ख़ैर मैने उसे किसी तरह चलता किया और अपना शक मैने सामने बैठे समाचार संपादक पर ज़ाहिर किया . मैने उससे कहा की ये बात बॉस को बताई जाए . लेकिन उस टाइम यही सोचा गया की थोडि देर और इंतेज़ार करके देखते हैं और इसे वाच करते हैं . वक़्त गुज़रा और मैने अपना काम निपटाया और अख़बार का पेज बनवाना शुरू कर दिया. उस दिन मेरे घर पर पार्टी थी इसलिए मुझे घर जाने की जल्दी भी थी . जल्दी जल्दी पेज बनवाने के बाद जब मैं निकलने लगा तो वह फिर से मेरे पास आई और शराब की ज़िद करने लगी . जब तक मैं उससे कोई और बात करता , मार्केटिंग की हेड ने मुझे बुला लिया और पूछने लगी की प्रॉपर्टी वाले पेज का क्या हुआ ? मैने उसे बताया की बन जाएगा और मैं आज अपनी नौकरी छोड़ रहा हू . मैने उसे ये भी बताया कि प्रियंका को आज अपने घर ले जाओ क्योकि मुझे लग रहा है की आज वो कुछ उल्टा सीधा करेगी लेकिन वो बोली की उससे कोई मतलब नही है , वो सिर्फ़ दफ़्तर मे ही उसे जानती है . इतना सुनने के बाद मुझे विश्वास हो गया की ये लड़की आज कुछ ना कुछ ज़रूर करेगी . मैने बाद मे उसे फ़ोन किया की कही वो कुछ ऐसा वैसा ना कर ले . उसने कभी हाँ तो कभी ना वाले जवाब दिए . रात मे उसने मुझे फिर से फ़ोन किया.

मै अब मरती हू ...३

पहले से आगे ..
ये वो दिन था जब दफ़्तर मे मुझे लेकर काफ़ी सारी भावनाएँ उत्पन्न हुईं . संपादकीय मे मुझे जलन से देखा गया तो मार्केटिंग मे ठीक ठाक़ सा लड़का . इसके बाद तो मेरी पूरे दफ़्तर से ही अच्छी दोस्ती हो गयी . हम लोग अक्सर आपस मे हँसी मज़ाक करते , आख़िर हमेशा काम तो नही ही हो सकता है ना . इसी मज़ाक मे अक्सर वह मुझसे पूछ लेती कि आत्महत्या करने का कोई आसान तरीक़ा मेरे दिमाग़ मे आया कि नही ? और मैं भी इसे मज़ाक समझ कर अक्सर हँस के टाल देता था . एक दिन हम यूँ ही बैठे थे और बस यूँ ही दुनिया जहान क़ी और एक दूसरे के बॉयफ़्रेंड और गर्लफ़्रेंड क़ी बातें कर रहे थे . प्रियंका ने मुझे बताया कि उसकी शादी हो चुकी है . मैं जानता था कि वो शादीशुदा नही है और उसका बॉयफ़्रेंड अक्सर उसे दफ़्तर से थोड़ी दूर पर छोड़ कर चला जाता था . दफ़्तर मे अक्सर लोग मज़ाक भी किया करते थे कि उसने तो करवा चौथ का व्रत भी रखा और चंद्र देव को जल भी चड़ाया . ख़ैर उसने कहा कि एक दिन वो उसको मुझसे मिलवाएगी . उसने मुझसे भी पूछा तो मैने भी उसे अपने बारे मे बताया . दरअसल अब तक हम दोनो अच्छे दोस्त बन चुके थे और जैसे ही टाइम मिलता दोनो काफ़ी सारी बातें एक दूसरे से शेयर करते . लेकिन एक चीज़ जो मुझे अक्सर ख़टकने लगी थी वो ये कि हमारी बात चाहे ज़हाँ से शुरू हो , ख़त्म पता नही कैसे आत्महत्या पर ही होती थी . ख़ैर उस टाइम हमारी बस इतनी ही बात हुई और हम काम मे लग गये . इस बीच मुझे पता चला कि उसे लेकर बॉस किसी होटल मे गये और वही सब किया जो आमतौर पर ऐसे दफ़्तरों मे बॉस लोग करना अपना हक़ समझते हैं बाद एक और ख़बर मिली कि ये सब उसके लिए अपनी नौकरी का ही एक हिस्सा बन गया . वह कमज़ोर होती जा रही थी , उसे अक्सर चक्कर भी आने लगे थे कमज़ोरी की वजह से . इसका ज़िक्र वो अक्सर मुझसे करती थी . लेकिन मैं हँस के टाल देता था . उसका काम भी ठीक से नही चल पा रहा था और इसलिए उसे बॉस की डाँट अक्सर ही सुनने के लिए मिल जाती थी .

मैं अब मरती हूँ ...आखिरी किश्त

चौथे से आगे ...
यह आधी रात का वक़्त रहा होगा और वह इतनी रात को मुझे कभी भी फ़ोन नही करती थी . मैने ये सारी बातें उसी समय बॉस को फ़ोन करके बताईं और यह भी बताया कि वह काफ़ी बहकी बहकी बातें कर रही है . बॉस ने उससे बात की , फिर मुझे वापस फ़ोन किया और कहा कि तुम व्हस्की पीकर बैठे हो तभी तुम्हे ये सारी बातें सूझ रही हैं . ख़ैर दूसरे दिन प्रियंका ने मुझे सवेरे फ़ोन करके बताया कि वह ठीक है . हालाँकि उसने रात मे भी बॉस के फ़ोन के बाद मुझे फ़ोन करके कहा भी था कि मैं ये सारी बातें बॉस को क्यो बताईं . लेकिन मैं अपनी ज़िम्मेदारी से नही बच सकता था . इतना सब हो जाने बाद मैं काफ़ी परेशान हो गया . उस दिन मेरा एक न्यूज़ चेनल मे मेरा इंटरव्यू भी था , सो मैं सबके साथ वहा चला गया . वहाँ हम लोग एक पार्क मे बैठ कर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे कि तभी उसका फ़ोन आया . उसने मुझे बताया कि वह लक्ष्मी नगर मे है और शराब ख़रीदने जा रही है . मैं समझ गया कि अब ये लड़की कुछ कर के रहेगी . मैने उसे फ़ोन पर बहुत समझाया . इसी बीच उसने बॉस से अपने संबंध होने कि बात क़बूल की . तब तक हमारी बस इतनी ही बात हो पाई . लौटते हुए हम सारे ही लोग इतना ज़्यादा थक गाये थे कि सभी ने अपने अपने फ़ोन साईलेंट मोड़ पर डाले और खाना खाकर सो गये . दूसरे दिन जब मैं सवेरे सोकर उठा तो देखा कि तड़के 4 बजे उसकी 4 मिस काल पड़ी हुई थी . मैने सोचा कि अभी तो वो सो रही होगी इसलिए मैने तुरंत उसे फ़ोन नही किया . तक़रीबन 9 बजे के आसपास मैने उसे फ़ोन किया लेकिन मुझे कोई जवाब नही मिल पा रहा था . मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा . मैने कई बार उसका फ़ोन ट्राई किया लेकिन कोई रिसपोंस नही मिल रहा थ . काफ़ी डरते हुए मैने पता लगाने की कोशिश की तो ये पता चला कि वह हॉस्पिटल मे है . मैं समझ गया , वो जो कह रही थी , उसने कर दिखाया . फिर दूसरे दिन उसका फ़ोन हॉस्पिटल से आया और उसने मुझे बताया कि उसने तक़रीबन 35-40 नींद की गोलियाँ खा लीं थी. उसी के साथ मुझे पता चला कि उसने कई लोगों से उधार भी लिया था . एक बार उसने मुझे बताया भी था कि उसके उपर काफ़ी उधारी भी हो गयी थी . अब उसे इतने ज़्यादा पैसों की ज़रूरत क्यों पड़ती थी यह तो वही जाने लेकिन जो बात मैं जानता हूँ , उसका ख़ुद का ख़र्च 4-5 हज़ार से ज़्यादा नही था . ज़ाहिर है यह पैसे वह किसी को देती थी . शायद उसका बॉयफ़्रेंड .....
गिद्ध उसके शरीर को ही नही बल्कि उसके मन को भी लगातार नोच रहे थे .. और ये ज़िल्लत वह बर्दाश्त नही कर पाई , मुझे भी उसके बच जाने का दुख हुआ ..काश वो मर ही गयी होती .. हालाँकि अब भी उसके फ़ोन आते हैं और मैं हर बार उससे वादा लेता हूँ कि अब वो दफ़्तर कभी नही जाएगी .. कम से कम बॉस से तो कभी नही मिलेगी ...
एक बार उसने मुझे बड़ी ही मासूमियत से पूछा कि क्यो ना वो बॉस से मिले तो मैने कहा कि तू ख़ूब जानती है कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हू...तब उसने हामी भरी कि
...हाँ ...मैं जानती हूँ कि तू क्यों ऐसा कह रहा है ...
और अंत में ...
आजकल वह कुछ ख़ुश दिखाई देती है ..कहती है कि उसने ग़लत किया .. उसके घर वाले उसे बहुत प्यार करते हैं ..लेकिन मैं जानता हूँ और हर बार उससे बात करने वक़्त महसूस करता हूँ .. कि वो ...वो अब नही रही ..
समाप्त

हिंदू होने के फायदे


मिलेट्री वाले मैदान मे पतंगो की बाजी हो रही थी । जबरदस्त । एक से एक पतंगबाज पता नही कहॉ कहॉ से आये हुए थे। इसी बीच मांझा लूटने वालों मे भी जबरदस्त बाजी हो रही थी कि कौन ज्यादा से ज्यादा लूट ले जाये। मैं, पतारू,कल्लू, घम्मड़,तबरेज़ ,अगम और पिंटू अपनी तेज़ नजर से मंझे का उतार चढ़ाव देख रहे थे। कल्लू और पतारू ने अब तक सबसे ज्यादा मंझा लूट लिया था। कल्लू मैदान से एकदम सटी हुई झोपडियों में रहता था जिसे हम लोग तकिया कहते थे क्योंकि सारे मुसलमान वही रहते थे । कल्लू अक्सर मंझा लूटता रहता था। पतारू भी उसी के साथ रहता था। इसलिये उसके पास भी ज्यादा मंझा था। पतारू और कल्लू स्कूल नही जाते थे । पतारू का तो स्कूल मे नाम लिखा था लेकिन कल्लू का नही। घम्मड़ और तबरेज़ का नाम भी स्कूल मे नही लिखा था। ये भी एक कारण था उनके ज्यादा मंझे लूटने का। मैं बड़ा निराश। मेरे पास बस ३ तिकल्ला मंझा और २ तिकल्ले सद्दी ही हो पायी थी। मैंने पतारू से कहा कि कुछ मुझे भी दे दे लेकिन उसने मना कर दिया। कल्लू से कहा तो उसने काफी ना नुकुर करते हुए आख़िर मुझे १ बड़ा तिकल्ला लाल वाला मंझा दे दिया। मैं बड़ा खुश। सीना फुलाते घर पंहुचा। घर पर अली हुसैन की अम्मा और मेरी अम्मा सर जोडे बैठी हुई थी। अली हुसैन भी उसी झोपड़ी मे रहता था जिसमे कल्लू रहता था। दरअसल अली हुसैन कल्लू का चाचा था। उन्हें फुसफुसाते देख मैंने बाबू से पूछा कि क्या बात है ? उन्होने ने बताया कि अली के अब्बा और अम्मी हज जाने वाले हैं। पूरा मुहल्ला पैसा देगा । चन्दा इकट्ठा होगा तब ये लोग जायेंगे । मैंने पूछा क्यों ? क्या इनके पास पैसा नही है ? तो बाबु ने बताया कि ये लोग बहुत गरीब हैं। अली अभी कुछ खास काम करता नही और अली के बडे भाई ने अभी अभी तो दर्जी का काम शुरू किया है। मैंने कहा, अच्छा , तभी कल्लू , तबरेज़ और घम्मड़ स्कूल नही जाते । मैंने देखा, अम्मा ने अली की अम्मा को पचास रुपये दिए। मैंने फिर बाबु से पूछा कि हज का किराया कितना होगा ? बाबू ने बताया, यही कोई १५- २० हज़ार रुपये। मैंने उनसे पूछा कि फिर ये लोग कैसे जायेंगे? बाबू ने कहा कि होगा कोई जुगाड़ । और जब उसके घर से बुलावा आता है तो आदमी किसी ना किसी तरह से जुगाड़ कर ही लेता है । मुझे नही समझ मे आया। मैंने फिर पूछा , कैसे? बाबू ने बताया , इन्हें मुसलमान होने के नाते हज जाने कि और भगवान कि पूजा करने मे छूट मिल जाती है । वहीँ से कोई जुगाड़ करेंगी अली हुसैन की अम्मा। मैंने कहा कि हम लोग तो हिंदु हैं । हमे कोई ऎसी छूट क्यों नही मिलती ? बाबु ने बताया कि मिलती है , लेकिन वो अलग तरीके से मिलती है । तभी तो देखो , अयोध्या मे इतने लोग मजे लूट रहे हैं । इनमे सरकारी भी होती है और ग़ैर सरकारी भी । सरकारी ऐसे , कि हर साल हमारे देश से जितने भी लोग हज जाते हैं , उससे कहीँ ज्यादा खर्च हमारी सरकार का होता है हमारे मंदिरों कि सुरक्षा मे। जैसे अगर कुम्भ हो तो उसमे बहुत साड़ी गाडियां चलायी जाती हैं जिसमे शायद ही कोई टिकट लेकर चलता हो , या फिर जैसे अपनी अयोध्या में राम नवमी का मेला लगता है , उसमे सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं । और जन्म भूमि को ही देख लो। सरकार के पास बजट नही है लेकिन महीने का पता नही कितना करोड़ रुपये सिर्फ उन जवानों को तनख्वाह देने मे ही खर्च हो जाता है जो उसके आस पास मटर गश्ती करते रहते हैं ।
जारी है .....

नमस्ते सदा वत्सले

हिंदू होने के फ़ायदे - २

थोड़ी देर बाद अली हुसैन की अम्मा चली गयीं। बाहर निकल कर देखा तो वो अनिल की अम्मा के चबूतरे पर बैठी हुई थीं। वहां गया तो उनकी पंचायत चल रही थी। अब सोचता हूँ तो हंसी आती है कि दुनिया का सबसे बड़ा झूठ यही हो सकता है कि दो औरतें एक कमरे में चुप बैठी थीं। मैं वहाँ पंहुचा और एक सोहर (जो हमारे यहाँ बच्चा होने पर गाया जता है ) गाने लगा। " नीम्बू ना खायू , इमलिया ना खायू , कवन फल खाए रहू भौजी , ललन बड़ा सुन्दर हो "। इतना सुनना था कि पीछे से मेरी अम्मा , सामने से अनिल और अली हुसैन की अम्मा ने मुझे मारने के लिए दौडा लिया। मैं थोड़ी दूर भागा फिर पीछे मुड़कर देखा तो तीनों हँस रही थीं। अनिल की अम्मा मेरी अम्मा से कह रही थी कि तोहार लड़का तो बहुत पाजी है।

थोड़ी देर बाद घर वापस आया। खाना खाया और बाबू के पेट पर तबला बजाने लगा । तब तक संजू और अप्पू क्रिकेट खेलने के लिए बुलाने आ गए। क्रिकेट हम लोग शाखा वाले मैदान में खेलते थे। कल्लू कभी कभी वहाँ हम लोगों के साथ शाम को क्रिकेट खेलने आ जता था । लेकिन जैसे ही वह टंडन जी को या खाकी हाफ पैंट पहने कुछ लोगों को देखता, तुरंत वहाँ से सरक लेता था। हालांकि तबरेज़ और घम्मड़ को मैंने कई बार उसी मैदान मे कबड्डी और फुटबाल खेलते देखता था लेकिन तब मेरी हिम्मत नही होती थी। मेरा स्कूल बारह बजे के आस पास छूटता था और तब काफी तेज़ धूप रहती थी। शाखा वाले मैदान मे तब कोई भी नही रहता था और तकिया के सारे बच्चे आकर या तो वहाँ पतंग उड़ाते या कबड्डी खेलते या फिर फुटबाल खेलते। लेकिन शाखा के बगल मे रहने वाले टंडन जी अगर उन्हें वहाँ खेलते देखते तो अपना वही डंडा जिसे लेकर वह रोज़ सवेरे टहलने जाते और लौटकर अपनी बगल मे दबाकर शाखा लगाते और नमस्ते सदा वत्सले गाते , उसे लेकर इन सारे बच्चों को दौडा लेते। इन सबको भागते देख मैं भी डर के मारे भागता । हालांकि मैं मैदान के बगल से गुजरने वाली सड़क पर चल रहा होता लेकिन भीड़ को भागते देख मैं भी उसके साथ हो लेता और हम लोग हो हो करते अपनी गली मे पहुचते । शाम को जब मैं बाबू को बताता कि टंडन जी ने दौड़ाया था तो बाबू हँसते। बोलते , तुम क्यों डरते हो ? तुम्हे वो कुछ नही बोलेंगे। वो तो सिर्फ तकिया वाले मुसलमानो के बच्चों को भगाने के लिए डांटते होंगे। मैं कहता , लेकिन वो तो मेरे दोस्त हैं। तो बाबू कहते , ऐसा तुम समझते हो ना। लेकिन टंडन जी ऐसा नही सोचते।
( जारी ....)