Saturday, March 28, 2026

होकर रहेगी नमाज, औकात में रहे बुलडोजर

"इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आर्टिकल 25 की व्याख्या करते हुए कहा कि निजी जगह पर नमाज, दुआ या पूजा मौलिक अधिकार है, लेकिन धर्म के नाम पर दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काने की इजाजत संविधान नहीं देता।"



इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भारत के संविधान का आर्टिकल 25 देश में हर धर्म के लोगों को इबादत के लिए इकट्ठा होने का हक देता है, लेकिन यह दुआ के बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने की इजाजत नहीं देता। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी आदमी की अपनी निजी जगह पर की जाने वाली दुआ या धार्मिक कार्यक्रम पर कोई रोक या रुकावट नहीं हो सकती, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। ये बातें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहीं। याचिका में कहा गया कि योगी आदित्यानाथ का प्रशासन याचिकाकर्ता (मुनाजिर खान) को उस जगह पर नमाज पढ़ने से रोक रहा था, जहां याचिकाकर्ता का कहना है कि एक मस्जिद है। 

याचिकाकर्ता का कहना था कि रमजान के दौरान बड़ी संख्या में लोग आकर नमाज पढ़ना चाहते हैं और एक समय पर नमाज पढ़ने वालों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं हो सकती। 27 फरवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रशासन का फैसला खारिज कर दिया, जिसमें रमजान के दौरान नमाज पढ़ने वालों की संख्या सीमित की गई थी। कोर्ट ने कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। बेंच ने यह भी कहा कि अगर पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर को कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है और इसलिए वे इबादत करने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर वे कानून का राज लागू नहीं कर पा रहे हैं। 

16 मार्च को जब यह मामला फिर से आया तो सबसे बड़ी बात यह हुई कि योगी आदित्यनाथ की सरकार न सिर्फ अपनी बात से पलट गई, बल्कि भरी अदालत में झूठ भी बोलने लगी। आगे सुनिए कि अजय सिंह बिष्ट की सरकार ने कैसे अदालत को बरगलाने की कोशिश की। 16 मार्च को हुई सुनवाई में एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने वकील प्रियंका मिधा की मदद से अदालत को यह समझाने की कोशिश की कि 27 फरवरी के ऑर्डर में 20 लोगों की पाबंदी का जिक्र याचिकाकर्ता के वकील की गलतबयानी की वजह से आ गया, और राज्य ने असल में कभी ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई। कोर्ट ने अजय सिंह बिष्ट उर्फ आदित्यनाथ की सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 27 फरवरी का ऑर्डर खुली अदालत में दोनों पक्षों की मौजूदगी में दिया गया था। फिर जब ऑर्डर लिखा जा रहा था, तब राज्य की तरफ से कोई आपत्ति नहीं की गई। 

कोर्ट ने उस सप्लीमेंट्री हलफनामे को भी देखा, जिसमें उस जगह की तस्वीरें थीं। ये हलफनामा याचिकाकर्ता ने दिया था। यह सब देखने के बाद बेंच ने कहा कि जिस इमारत की बात हो रही है, वह आज की तारीख में मस्जिद नहीं है। हालांकि, यह देखते हुए कि उस जगह का इस्तेमाल पहले नमाज पढ़ने के लिए होता था, कोर्ट ने कहा कि उसी जगह पर नमाज पढ़ने वालों को कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। इस तरह कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए राज्य को कहा कि वह 'मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य' मामले में अपने पहले के फैसले का पूरा ध्यान रखे।

इस मामले में इसी बेंच ने इस साल जनवरी में कहा था कि किसी भी नागरिक को धार्मिक पूजा करने के लिए कानून के तहत किसी भी तरह की अनुमति की जरूरत नहीं होती। यह भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत उसका मौलिक अधिकार है, अगर वह अपनी निजी जमीन पर पूजा कर रहा हो। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई व्यक्ति या कोई समूह अपनी निजी जगह पर पूजा करता है और उसके खिलाफ कोई आपत्ति आती है, तो राज्य को उस पर ध्यान देना चाहिए। जरूरत पड़े तो पूजा की जगह और पूजा करने वालों को सुरक्षा भी दी जानी चाहिए। हालांकि राज्य ने कहा कि वह किसी भी धर्म के लोगों द्वारा अपनी निजी जमीन पर या अपने पूजा स्थल पर की जाने वाली पूजा में कोई दखल या रुकावट नहीं डालेगा। 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी कहा कि वह यह सुनिश्चित करे कि 1995 से उस जगह पर चली आ रही परंपराओं का सख्ती से पालन हो। इस मामले को खत्म करते हुए कोर्ट ने आर्टिकल 25 पर अहम बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि दुआ के लिए इकट्ठा होना अब्राहमिक धर्मों का एक हिस्सा है और यह कानून इबादत के लिए ऐसे इकट्ठा होने को सुरक्षा देता है। बेंच ने कहा, 'यहूदी शुक्रवार को शब्बत के लिए सिनेगॉग में इकट्ठा होते हैं। शनिवार उनके धर्म के अनुसार आराम और सोच का दिन होता है। ईसाई रविवार को चर्च में मास के लिए इकट्ठा होते हैं, और मुसलमान शुक्रवार की दोपहर की नमाज के लिए मस्जिद में इकट्ठा होते हैं। इसके उलट, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म जैसे पूर्वी धर्मों में मंदिरों में पूजा के लिए इकट्ठा होने के कोई तय दिन नहीं होते। इन धर्मों के लोग त्योहारों के समय इकट्ठा होते हैं, जिसमें पूजा भी शामिल होती है।' 

बेंच ने साफ कहा कि आर्टिकल 25 दुआ के बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने की इजाजत नहीं देता। बेंच ने कहा, '(आर्टिकल 25) ऐसे कामों पर रोक लगाता है, जिनसे एक धर्म के लोग दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाएं और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का खतरा हो। ऐसा करने पर वह काम आर्टिकल 25 की सुरक्षा से बाहर हो जाएगा। ऐसा करने वाले व्यक्ति को आपराधिक कानून के तहत सख्त सजा मिल सकती है।'

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आर्टिकल 25 का मतलब यह नहीं है कि यह भारत में इस्लाम धर्म के लोगों को कोई खास दर्जा देता है। कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 25 धर्म और आस्था के मामले में पूरी तरह निष्पक्ष है। इसके तहत एक नास्तिक व्यक्ति भी अपनी सोच, समझ और विज्ञान के आधार पर यह मान सकता है, उसका पालन कर सकता है और उसका प्रचार कर सकता है कि भगवान का कोई अस्तित्व नहीं है। बेंच ने आगे कहा, 'इस गणतंत्र की ताकत इसकी सहनशीलता में है। यह देश 1.4 अरब लोगों का घर है और इसकी ताकत इसकी अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाओं की विविधता से आती है। दुनिया में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है, जहां इतने अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाएं सदियों से शांति और आपसी सम्मान के साथ साथ रह रही हों, और जिसे भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत कानूनी मान्यता मिली हो।' 

इन बातों के साथ ही रिट याचिका को खत्म कर दिया गया। साथ ही राज्य सरकार से कहा गया कि इस ऑर्डर की एक कॉपी उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) तक पहुंचाई जाए, ताकि इसे राज्य में कानून-व्यवस्था लागू करने वाले सबसे निचले स्तर के अधिकारियों तक पहुंचाया जा सके।

अब आइए देखते हैं कि भारत के संविधान के आर्टिकल 25 में है क्या, ये कहता क्या है- 

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में धर्म, आस्था और पूजा की आजादी बहुत अहम मानी जाती है। इसी आजादी को सुरक्षित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 25 दिया गया है। यह अनुच्छेद हर नागरिक को अपनी अंतरात्मा के मुताबिक किसी भी धर्म को मानने, उस पर चलने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है।


इसमें नंबर 1 है आस्था की आजादी। अनुच्छेद 25 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ धर्म मानने का ही नहीं, बल्कि ‘अंतरात्मा की आजादी’ का अधिकार देता है। यानी कोई व्यक्ति चाहे तो किसी धर्म को माने, बदल ले या किसी भी धर्म को न माने - यह उसका निजी फैसला है। एक नास्तिक व्यक्ति भी इसी अधिकार के तहत अपनी सोच पर कायम रह सकता है। नंबर 2 है धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार। यानी यह अनुच्छेद तीन अहम अधिकार देता है: एक, धर्म को मानना, दो, धर्म के अनुसार जीवन जीना और तीन, अपने धर्म का प्रचार करना। लेकिन यह प्रचार जबरदस्ती नहीं हो सकता। किसी को बहकाकर, दबाव डालकर या लालच देकर धर्म बदलवाना इस अधिकार के दायरे में नहीं आता। 

नंबर 3 इसका प्वाइंट है सभी धर्मों के लिए बराबरी। अनुच्छेद 25 की एक और बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह निष्पक्ष है। इसमें किसी एक धर्म को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या कोई भी अन्य धर्म - सभी को बराबर हक मिलता है। यही भारत की धर्मनिरपेक्षता (secularism) की असली ताकत है। नंबर 4 है निजी और सार्वजनिक पूजा की आजादी। यह अनुच्छेद व्यक्ति को अपनी निजी जगह पर पूजा या इबादत करने की पूरी छूट देता है। साथ ही लोग सामूहिक रूप से भी इकट्ठा होकर धार्मिक गतिविधियां कर सकते हैं। लेकिन यह सब कानून और व्यवस्था के दायरे में रहकर ही होना चाहिए। 

नंबर 5 में यह सीमाएं भी देता है। यानी अनुच्छेद 25 पूरी तरह असीमित नहीं है। इस पर कुछ जरूरी शर्तें भी लागू होती हैं: एक, सार्वजनिक व्यवस्था (law and order), दो, नैतिकता (morality), और तीसरा है स्वास्थ्य (health)। अगर कोई धार्मिक गतिविधि इन चीजों को नुकसान पहुंचाती है, तो राज्य उस पर रोक लगा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी धार्मिक कार्यक्रम से हिंसा भड़कने का खतरा हो, तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है। हो सकता है अजय सिंह बिष्ट के प्रशासन ने इसी आधार पर रोक लगाई हो। नंबर 6 है सामाजिक सुधार का रास्ता। अनुच्छेद 25 राज्य को यह भी अधिकार देता है कि वह सामाजिक सुधार के लिए कानून बना सके, भले ही वह किसी धार्मिक प्रथा को प्रभावित करे। जैसे सती प्रथा या देवदासी प्रथा जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाना। नंबर 7 है विविधता में एकता की पहचान। भारत में अलग-अलग धर्म, परंपराएं और मान्यताएं हैं। 

अनुच्छेद 25 इन सबको साथ लेकर चलने की संवैधानिक नींव देता है। यह सुनिश्चित करता है कि हर व्यक्ति अपने विश्वास के साथ जी सके, बिना किसी डर या भेदभाव के। अनुच्छेद 25 सिर्फ एक कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा को दर्शाता है। यह व्यक्ति की आजादी, समानता और विविधता का सम्मान करता है। साथ ही यह संतुलन भी बनाए रखता है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरों के अधिकारों या समाज की शांति को नुकसान न पहुंचाए। इसी संतुलन की वजह से अनुच्छेद 25 भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक माना जाता है।

सबको जज लोया बनाने पर उतारू मोदी-शाह

 


जज लोया का भूत अभी तक जजों के सिर पर नाच रहा है। जज डर रहे हैं कि कहीं यह सरकार उन्हें ही जज लोया न बना दे। जज लोया की मौत के लगभग दस साल बीतने के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज भी अब ढके छुपे ही सही, लेकिन इस मसले पर आवाज उठाने लगे हैं। एक दो नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन-तीन जजों ने इस मसले पर आवाज उठाई है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम पहले ऐसे जजों की हिफाज़त करने में नाकाम रहा है, जिन्होंने हिम्मत और ईमानदारी दिखाई। उन्होंने जज लोया का नाम तो नहीं लिया, लेकिन जुडिशरी के हालिया इतिहास में अगर हम जज लोया के साथ ऐसा होते नहीं देखते हैं तो क्या जस्टिस रंजन गोगोई, या जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ ऐसा होते हुए देखते हैं। 

जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि ऐसी बातों की वजह से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय सही और ईमानदार रास्ता चुनने से पीछे हट सकते हैं। नाम तो नहीं लिया उन्होंने, लेकिन कहने को तो यह कहा ही जा सकता है कि जस्टिस अरुण मिश्रा बन सकते हैं या दीपक मिश्रा भी बन सकते हैं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि कई जजों में बड़े भले के लिए नुकसान उठाने का हौसला और मजबूत यकीन रहा है। लेकिन आज के वक्त में कितने जज अपने करियर की तरक्की के बजाय ईमानदारी को आगे रखेंगे? क्या आप उनसे यह उम्मीद करते हैं कि जो बातें वो दूसरों को समझाते हैं, उन पर खुद भी ईमानदारी से अमल करेंगे? यह एक कड़वी सच्चाई है, जिसे मानना आसान नहीं है। पहले भी कई ऐसे मामले रहे हैं, जहां जो लोग इस रास्ते पर चले, उन्हें कॉलेजियम की तरफ से कोई हिफाज़त नहीं मिली, यानी यह यकीन नहीं दिलाया गया कि उन्हें उनकी ईमानदारी की वजह से परेशान नहीं किया जाएगा।' 

जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई सोच' पर हुए 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के लोगों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथ काम करने वाले जजों की हिफाज़त करनी चाहिए। उन्होंने जस्टिस बी.वी. नागरत्ना से भी अपील की, जो मंच पर मौजूद थीं और कॉलेजियम की मेंबर भी हैं। उन्होंने जस्टिस बीवी नागरत्ना से कहा कि 'कॉलेजियम के मेंबर के तौर पर मैं आपसे गुज़ारिश करता हूं कि आप आगे आएं और उन जजों के साथ खड़ी हों और उनकी हिफाज़त करें, जो वही करते हैं जो आपने अपने उस खास भाषण में कहा था।' जस्टिस दत्ता, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में झिझकना नहीं चाहिए, चाहे इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन के रूप में चुकानी पड़े या इससे हुकूमत में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं। 

बता दें कि इसी महीने यानी मार्च में केरल हाई कोर्ट में हुए 'दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि 'भले ही जजों को पता हो कि गैर-लोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें बतौर अपने प्रमोशन, या एक्सटेंशन में चुकानी पड़ सकती है, या इससे वो हुकूमत में बैठे लोगों की नजर में नीचे गिर सकते हैं। लेकिन यह बातें उनके फैसलों के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। आखिर में हर जज का अपना मजबूत यकीन, हिम्मत और आज़ादी ही सबसे ज्यादा अहम होती है। जज के तौर पर हमें हमेशा अपने ओहदे की कसम का पालन करना चाहिए, जो उनका 'कानूनी फर्ज' है, और अपने करियर पर पड़ने वाले असर की परवाह किए बिना उस पर खरा उतरना चाहिए।' जस्टिस नागरत्ना की बात से भी कहीं न कहीं ये तो लगता ही है  कि जज लोया का भूत  आज तक जजों के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। भारत के जज अब मोदी सरकार से क्या पूरी तरह डर चुके हैं, या कुछ जजाों में जस्टिस मुरलीधर या जस्टिस अुतल श्रीधरन जैसी हिम्मत बाकी है? 

वैसे जस्टिस दत्ता या जस्टिस नागरत्ना ही नहीं, जस्टिस उज्जवल भुइयां भी इस मसले पर बोले हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को वॉर्निंग दी कि जुडिशरी के कुछ हिस्सों में मौजूद "राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार होने की मानसिकता" के चलते आरोपी व्यक्तियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रवृत्तियों के कारण लोग महीनों और सालों तक जेल में ही रह जाते हैं, खासकर उन मामलों में जहाँ कड़े कानून लागू होते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा “जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। नतीजतन, लोग महीनों-महीनों तक जेलों में सड़ते रहते हैं।” जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। क्या जस्टिस भुइयां का इशारा उमर खालिद की ओर था, जिसे कि सभी जानते हैं कि सिर्फ और सिर्फ मोदी और अमित शाह के चलते जेल में रखा गया है। 

बात जब राजा की आ ही गई है, तो देखते हैं कि कैसे जस्टिस नागरत्ना ने मोदी सरकार की वो पोल भी खोली, जिसमें ये भगवा झंडे बार बार अदालत पहुंच जाते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के उस उल्टे रवैये को सामने रखा, जिसमें वो केसों के ढेर पर फिक्र भी जताती है, और खुद ही सबसे ज्यादा केस डालकर उस ढेर को बढ़ाती भी है। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अदालतों में पड़े मुकदमों के ढेर को लेकर सरकार पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि केसों का ढेर बढ़ने के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। उनका कहना था कि सरकार का तरीका सीधा नहीं है। एक तरफ वो कहती है कि केस ज्यादा हो गए हैं, दूसरी तरफ खुद ही सबसे ज्यादा केस डालती है और बार-बार अपील करती है, जिससे मसला और बड़ा हो जाता है। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के केस लड़ने के तरीके पर सख्त सवाल उठाए। 

उन्होंने साफ कहा कि सरकार बहुत ज्यादा केस डालती है और हर बात पर अपील करती है, यही सबसे बड़ी वजह है केसों के ढेर की। उन्होंने कहा कि यह अजीब बात है कि सरकार खुद ही ढेर बढ़ाती है और फिर उसी पर चिंता भी जताती है। उन्होंने कहा, "इससे एक अजीब हालत बन जाती है। सरकार खुद ही शिकायत करती है और खुद ही समस्या भी खड़ी करती है।" उन्होंने कहा कि सरकार से उम्मीद होती है कि वो सोच-समझकर केस डाले, लेकिन इसके उलट वो हर केस को आखिर तक खींचती रहती है। उन्होंने कहा, "सरकार से उम्मीद होती है कि वो एक अच्छा वादी बने, लेकिन ऐसा नहीं होता। वो हर केस को आख़िर तक लड़ती रहती है। सरकार सिर्फ एक पक्ष नहीं है, बल्कि सबसे ज्यादा केस पैदा करने वाली भी है।"

वहीं जस्टिस दत्ता ने यह सवाल भी उठाया कि लोग क्यों कहते हैं कि कॉलेजियम सिस्टम नाकाम हो गया है। उन्होंने पूछा: अगर कॉलेजियम सिस्टम शुरू से ही संविधान का हिस्सा होता, तो डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके बारे में क्या कहते? डॉ. अंबेडकर की इस बात का हवाला देते हुए, 'संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह बुरा साबित होगा। और संविधान कितना भी कमजोर क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे हैं, तो वह अच्छा साबित होगा,' जस्टिस दत्ता ने कहा कि आखिर में सही लोगों को चुनने की जिम्मेदारी जजों पर ही होती है। उन्होंने कहा कि जजों का चुनाव सिर्फ योग्यता से नहीं, बल्कि काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत को देखकर होना चाहिए। 'असली फैसला एक साफ और निष्पक्ष सोच पर होना चाहिए, जो पूरी तरह रिकॉर्ड पर मौजूद बातों पर टिका हो। फैसले जजों के दिए गए फैसलों, रिपोर्ट किए गए मामलों, पेशेवर जांच, लिखे गए काम और दस्तावेजों में दर्ज उनके व्यवहार के आधार पर होने चाहिए। और आखिरी बात, दूसरा पॉइंट भी बहुत अहम है। 

उन्होंने कहा कि निजी जान-पहचान, सामाजिक करीबियां, लॉबिंग, गैर-औपचारिक सिफारिशें, या हुकूमत में बैठे लोगों के साथ कथित रिश्ते — चाहे वह न्यायिक हों, राजनीतिक हों या किसी और तरह के — इन सबको पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।' अपने भाषण में जस्टिस दत्ता ने यह भी राय दी कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 40 कर दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि आखिरी बार 2019 में जजों की संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी, और उसके बाद से मामलों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कोलेजियम की भी पोल खोली थी। इसी महीने यानी मार्च में उन्होंने कहा था कि कॉलेजियम में साफगोई की इतनी कमी है साफ़गोई में कि खुद जजों को भी अक्सर यह नहीं पता होता कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और कहां बैठकर फैसले करता है। उन्होंने कहा था कि "आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि हमें सिर्फ यह नहीं पता कि क्या चल रहा है... हमें तो यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहां बैठ रहा है।"

दरअसल मौजूदा सीजेआई सूर्यकांत जबसे आए हैं, तभी से कोर्ट कचेहरी के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर कॉलेजियम चला कौन रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट के जज साहबान चला रहे हैं या सरेंडर सिलेंडर मोदी सरकार चला रही है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जस्टिस मुरलीधर के रातोंरात ट्रांसफर को लेकर बदनाम हुए सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर को लेकर फिर से बदनामी का भगवा चोला ओढ़ लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन सीनियॉरिटी में इस वक्त किसी न किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की अहमियत रखते थे। लेकिन मोदी सरकार के कहने पर उनको मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में भेज दिया गया। न सिर्फ भेज दिया गया, बल्कि वहां उनकी सीनियॉरिटी सातवें नंबर पर बना दी गई, ताकि वो हाई कोर्ट के कॉलेजियम में भी न रहने पाएं। 

वहीं उनसे जूनियर जज एसए धर्माधिकारी को सरेंडर मोदी के हक में फैसले सुनाने के चलते मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। और सीजेआई संजीव खन्ना के बाद, या कि कहें कि पिछले सीजेआई बीआर गवई के बाद से जबसे ये नए वाले सीजेआई सूर्यकांत आए हैं, सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने अपनी डिटेल वेबसाइट पर डालनी ही बंद कर दी है। मतलब पहले जनता को हक था, और हक तो खैर अब भी है सब कुछ जानने का, लेकिन कॉलेजियम में सीजेआई सूर्यकांत ऐसा क्या कर रहे हैं कि हर चीज में पर्दादारी है। उनकी इसी पर्दादारी के खिलाफ रीढ़ सीधी रखने वाले कुछ जज बोलने लगे हैं। जाहिर है, कि पहले जज लोया, फिर जस्टिस मुरलीधर, फिर जस्टिस अतुल श्रीधरन, यानी जजों को ये मोदी सरकार आजादी से कहीं भी काम न करने देने को जिस तरह से आमादा है, कुछेक जज ही सही, लेकिन आवाज तो उठने ही लगी है।